<h3 style="text-align: justify;">आम के पेड़</h3> <p style="text-align: justify;">जनवरी में आम के पेड़ों में बौर आना शुरू हो जाता है। इसलिए किसानों को अच्छा उत्पादन पाने के लिए अभी से इसकी देखभाल करनी होगी। अगर जरा सी चूक हुई, तो रोग और कीट पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">भुनगा कीट</h4> <p style="text-align: justify;">आम की फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। इस कीट के लार्वा एवं वयस्क कोट कोमल पत्तियों एवं पुष्पक्रमों का रस चूसकर हानि पहुचाते हैं। इसकी मादा 100-200 तक अंडे नई पत्तियों एवं मुलायम प्ररोह में देती है। इनका जीवनचक्र 12-22 दिनों में पूरा हो जाता है। इसका प्रकोप जनवरी-फरवरी से शुरू हो जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">आम के भुनगा कीट से बचने के लिए मोनोक्रोटोफॉस नामक रसायन को 4 मि.ली. मात्रा को 10 लीटर पानी में मिलाकर या कार्बोरिल 0.2 फीसदी का छिड़काव करें। इसके अलावा बिवेरिया बेसिआना फफूद के 0.5 फीसदी घोल या नौम तेल 3000 पीपीएम प्रति 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से भी राहत मिल जाएगी। आम के शूट गोल कौट से बचाव के लिए दिसंबर-जनवरी में गांठ से नीचे थोड़ी सी पुरानी लकड़ी के साथ काट कर इसे जला दें। दिसंबर-जनवरी में पुष्पक्रमों को काट दें। </p> <h4 style="text-align: justify;">सफेद चूर्णी रोग</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के प्रभाव से रोगग्रस्त भाग सफेद दिखाई पड़ने लगता है। इसकी वजह से मंजरियांऔर फूल सूखकर गिर जाते हैं। इस रोग के लक्षण दिखाई देते हो आम के पेड़ों पर 5 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करें। इसके अलावा 500 लीटर पानी में 250 ग्राम कैराथेन घोलकर छिड़काव करने से भी रोग पर काबू पाया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में बौर आने के समय मौसम असामान्य रहा हो, वहां हर हालत में सुरक्षात्मक उपाय के आधार पर 0.2 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करें एवं आवश्यकतानुसार दोहराएं।</p> <h4 style="text-align: justify;">काला वर्ण</h4> <p style="text-align: justify;">यह रोग अधिक नमी वाले क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। इसका आक्रमण पौधों के पत्तों, शाखाओं और फूलों जैसे मुलायम भागों पर अधिक होता है। प्रभावित हिस्सों में गहरे भूरे रंग के धब्बे आ जाते हैं। रोग के लक्षण दिखाई देते हो आम के पेड़ों पर 0.2 प्रतिशत जिनैब का छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">अमरूद के बागों की कटाई-छंटाई का कार्य पौध रोपण के दूसरे वर्ष के दौरान भी जारी रखा जाता है। दो वर्षों के बाद, कैनॉपी की परिधि के भीतर वाली छोटो शाखायें सघन तथा सशक्त ढांचे का निर्माण करती हैं। सही तरीके से सधाई तथा छंटाई द्वारा तैयार किये गये पौधे का व्यास दो मोटर तथा ऊंचाई 2.5 मीटर तक सीमित रखने के लिए प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी में कल्लों की कटाई की जाती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">गुठलीभेदक</h4> <p style="text-align: justify;">यह कीट जून से जनवरी तक क्रियाशील रहता है। अंडे फल में एक छोटा सा गड्ढा बनाकर बाह्य सतह से नीचे दिए जाते हैं। इसका लार्वा निकलने के बाद गूदे से होता हुआ गुठली को छेदता अंदर चला जाता है और बीजों को खाकर पूर्णतः नष्ट कर देता है। इस कोट का प्रकोप देसी एवं बनारसी प्रजाति के आंवलों पर देखा गया है। अधिक प्रकोप होने पर प्रथम छिड़काव 0.2 प्रतिशत कारिल या 0.04 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस या 0.05 प्रतिशत क्विनालफॉस कीटनाशी का फलों के मटर के दाने के बराबर की अवस्था में करना चाहिए। यदि आवश्यकता हो, तो दूसरा छिड़काव कीटनाशी बदलकर 15 दिनों के अंतराल पर करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">अंगूर, आडू, अनार व नाशपाती के पौधे</h3> <p style="text-align: justify;">जनवरी में अंगूर, आडू, अनार व नाशपाती के पौधे लगाने के लिए सर्वोत्तम समय है। लगाने के समय दीमक नियंत्रण जरूर करें। आम, अमरूद, आंवला. लोची, पपीता एवं केला के नवरोपित बागों को सिंचाई व निराई-गुड़ाई करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">तुड़ाई </h3> <p style="text-align: justify;">अमरूद, पपीते,आंवले और नौबू के पके फलों की तुड़ाई करें। फलों के पुराने बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">कागजी कलां नींबू</h3> <p style="text-align: justify;">कागजी कलां नींबू को दूसरी फसल इस माह में तैयार हो जाती है। ठीक प्रकार से फलों को तुड़ाई कर प्रसंस्करण द्वारा अधिक लाभ कमाया जा सकता है। नीबूवर्गीय फलदार वृक्षों जैसे-किन्नों में करना खट्टा और सोह सर्कार मूल वृंतों का उपयोग कर किन्नों में फलों की उपलब्धता इस माह तक सुनिश्चित की जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="140" height="123" /></p> <h3 style="text-align: justify;">आंवला</h3> <p style="text-align: justify;">आंवला के बाग में गुड़ाई करें एवं थाले बनायें। आंवला के एक वर्ष के पौधे के लिए 10 कि.ग्रा. गोबर/कम्पोस्ट खाद, नाइट्रोजन 100 ग्राम, फॉस्फेट 50 ग्राम व पोटाश 75 ग्राम देना आवश्यक है।10 वर्ष या उससे ऊपर के पौधे में यह मात्रा बढ़कर 100 कि.ग्रा. गोबर/ कम्पोस्ट खाद, नाइट्रोजन 1 कि.ग्रा. फॉस्फेट 500 ग्राम व पोटाश 750 ग्राम प्रयोग करें। पूरे फॉस्फोरस, आधी नाइट्रोजन व आधी पोटाश की मात्रा का प्रयोग जनवरी से करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">मृदु सड़न</h4> <p style="text-align: justify;">आंवले में मृदु सड़न दिसंबर से फरवरी के मध्य अधिक देखी जा सकती है। संक्रमित भाग पर जलासिक्त भूरे रंग का धब्बा बनता है, जो पूरे फल को लगभग 8 दिनों में आच्छादित कर फल के आकार को विकृत कर देता है। यह रोग छोटे तथा परिपक्व फल, दोनों को प्रभावित करता है। परिपक्व फलों में इसका प्रकोप अधिक होता है। तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटॉन (0.15 प्रतिशत). डाइथेन एम-45 या बाविस्टीन (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करके भंडारित करने से रोग को रोकथाम की जा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर,सस्य विज्ञान, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012; और अमन सिंह,आनुवंशिकी विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या-224229 (यूपी)।</p>