<h3 style="text-align: justify;">फूलों या स्पाइकों की कटाई </h3> <p style="text-align: justify;">फूलों या स्पाइकों की कटाई सुबह के समय करनी चाहिए। कटाई के बाय इंडियों को बाल्टी में भरे पानी में रखना चाहिए। यदि पुष्प दूर भेजना हो, तो डंडी की नीचे की कली में जैसे ही रंग दिखाई देना शुरू हो जाये, तो काट लेना चाहिए तथा सौ-सौ के गुच्छों में बांधकर बाजार में भेजना चाहिए। यदि जल्दी प्रयोग में लाना हो, तो तीन-चार पुष्प अवश्य पूर्ण विकसित होने चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">एल्स्ट्रोमीरिया में स्टेकिंग, कॉरनेशन को खेतों में लगाएं।</p> <h3 style="text-align: justify;">जरबेरा तथा लिलियम</h3> <p style="text-align: justify;">जरबेरा तथा लिलियम में समय-समय पर सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">ग्लेडियोलस </h3> <p style="text-align: justify;">ग्लेडियोलस की मुड़ी हुई टहनियों को निकाल दें तथा आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। घनकदों की बुआई के पश्चात अगेती किस्मों में लगभग 60-65 दिनों में मध्य किस्मों में 80-85 दिनों तथा पछेती किस्मों में 100-110 दिनों में पुष्प उत्पादन शुरू हो जाता है। पुष्प दाँडकाओं को काटने का समय बाजार की दूरी पर निर्भर करता है। गुलाब में समय-समय पर सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई करें। आवश्यकतानुसार बाँडिग व इसके जमीन में ग्लेडियोलस लगाने का कार्य कर लें।</p> <h3 style="text-align: justify;">गुलाब </h3> <p style="text-align: justify;">गुलाब में माहूं दीमक एवं सिल्क कीट के दिखाई देने पर तुरंत डाइमिथोएट 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में या मोनोक्रोटोफॉस 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर 2-3 छिड़काव करने चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">दीमक का नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">दीमक के नियंत्रण के लिए सिंचाई करनी चाहिए तथा फोरेट 10 जी 3 से 4 ग्राम या फॉलीडॉल 2 प्रतिशत धूल 10 से 15 ग्राम प्रति पौधा गुड़ाई करके मृदा में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। इसमें झुलसा रोग, कंद सड़न एवं पत्तियों केगुलाब सूखने के रोग लगते हैं। इनके नियंत्रण के लिए 0.05 प्रतिशत को-ओरियोफेंजी का घोल बनाकर या 0.2 प्रतिशत बाविस्टीन अथवा वेलनेट का घोल बनाकर 10 से 12 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। इसमें माहू एवं लाल सूंडी कीट लगते हैं। इनकी रोकथाम के लिए रोगार 30 ई.सी. की 250 मि.ली. दवा 250 लीटर अर्थात 1 मि.ली. दवा । लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">रजनीगंधा </h3> <p style="text-align: justify;">रजनीगंधा के बल्बों की रोपाई के लिए क्यारियों में 45 सें.मी. गहरी खुदाई करके 15 दिनों के लिए छोड़ दें। खेतों तथा क्यारियों की नियमित निराई करके साफ रखना चाहिए। यह कार्य माह में एक बार किया जा सकता है। खेतों को साफ-सुथरा रखने से पौधे स्वस्थ रहते हैं और प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। पुष्पों का आगमन कंदों के रोपण से 60-90 दिनों बाद प्रारंभ हो जाता है तथा जाड़े तक चलता रहता है। स्पाइक को तेज चाकू या ब्लेड से काटकर 100-100 के बंडल बनाकर पुष्प बाजार में विक्रय के लिए भेजा जाता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="153" height="134" /></p> <h4 style="text-align: justify;"> माहूं </h4> <p style="text-align: justify;">रजनीगंधा में माहूं आदि का आक्रमण होता है। विशेष रूप से लम्बे समय तक आकाश में बादल छाये रहने पर या समुचित धूप न मिलने पर इसके निवारण के लिए 0.25 प्रतिशत मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए। टिड्डे नई पत्तियों एवं फूलों को प्रभावित करते हैं। 5 प्रतिशत कान्फीडोर का छिड़काव करके इसे रोका जा सकता है। लाल चींटियां अत्यन्त सूक्ष्म जीव हैं, जो पत्तियों की निचली सतह पर मिलते हैं। यह पौधों का रस चूसकर पत्तियों को पीला या सफेद, भूरा बना देते हैं। 0.2 प्रतिशत केलथेन या मोनोक्रोटोफॉस के छिड़काव द्वारा इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर,सस्य विज्ञान, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012; और अमन सिंह,आनुवंशिकी विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या-224229 (यूपी)।</p>