<h3 style="text-align: justify;">चने की फसल </h3> <p style="text-align: justify;">चने की फसल में दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय की जानी चाहिए। यदि जाड़े में वर्षा हो जाये, तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। लम्बे समय तक वर्षा न हो, तो अच्छी<br />पैदावार लेने के लिए हल्की सिंचाई करें। अनावश्यक रूप से सिंचाई करने पर पौधों की वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा हो जाती है, जिसका उपज पर प्रतिकूल . प्रभाव पड़ता है। चने की फसल से भरपूर पैदावार के लिए जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, अन्यथा फसल के मरने का अंदेशा रहता है। नवीनतम प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि 2 प्रतिशत यूरिया के घोल के दो पर्णीय छिड़काव 10 दिनों के अन्तराल खेती पर फली में दाना बनते समय करने से उपज में निश्चित रूप से 15-20 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उकठा रोग</h4> <p style="text-align: justify;">उकठा रोग, एक फफूंदी (फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम प्रभेद साइसेरि) द्वारा होता है। फसल में इस रोग के लक्षण में सामान्यतः संक्रमित पौधे का ऊपरी भाग मुरझा जाता है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं तथा संक्रमित पौधे दूर से ही पहचाने जा सकते हैं। अंत में पौधा पूर्ण रूप से सूखकर मर</p>