<p style="text-align: justify;">एक ओर जहां शीत ऋतु में पड़ने वाली कड़कड़ाती ठंड से सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त होने लगता है, वहीं बगीचों में होने वाले उद्यानिकी क्रियाकलापों का महत्व भी बढ़ जाता है। इस समय बागों में की गई अंत:सस्यन गतिविधियों का पौधों की उत्तरजीविता एवं फलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। इस अवधि के दौरान, नवस्थापित बागों की देखभाल, निराई-गुड़ाई, सिंचाई, उर्वरक कीट एवं व्याधियों की रोकथाम जैसे इत्यादि महत्वपूर्ण कार्य करने होते हैं। उच्च गुणवत्ता के फलों के उत्पादन के लिए बगिया की समुचित देखभाल अति आवश्यक है। आज की मेहनत कल सफलता की मिठास घोलेगी, जान लें कि कैसे। महत्वपूर्ण फलों में जनवरी व फरवरी में की जाने वाली प्रमुख कृषि क्रियाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नवत प्रस्तुत है।</p> <h3 style="text-align: justify;">आम </h3> <h4 style="text-align: justify;">पहली बौर आम की, करें सुनिश्चित व्यवस्था बागान</h4> <p style="text-align: justify;">की इस मौसम में पौधों, विशेषकर नव-स्थापित बागान के पौधों, को पाले से बचाना अति आवश्यक है। जनवरी में नर्सरी में लगे पौधों की पाले से सुरक्षा के लिए छप्पर से ढकना चाहिए। वहीं दूसरी ओर छोटे पौधों को भी पुआल से ढक दें। पाले से बचाव के लिए बाग में समय-समय पर हल्की सिंचाई करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। आम के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। इस समय लगने वाले बौरों का भी ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं पर फलोत्पादन निर्भर करेगा। जनवरी के प्रथम सप्ताह में आने वाले बौर में फल नहीं लगते और ये अक्सर गुच्छे का रूप धारण कर लेते हैं। अत: ऐसे बौर को निकालकर नष्ट कर दें। आम में उर्वरक देने का यह सही समय है। नाइट्रोजन 500 ग्राम, फॉस्फोरस 500 ग्राम तथा पोटाश 700 ग्राम प्रति पौधा प्रयोग करें। इन्हें मिट्टी में मिलाकर हल्की सिंचाई कर दें। इसी दौरान बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।फरवरी में थालों की गुडाई करें। फुदका या तेला (मैंगो हॉपर) के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड (0.3 प्रतिशत) तथा <a href="../../../../../../../../agriculture/crop-production/93892e92894d93593f924-91594091f-92a94d93092c902927928/राई-सरसों-के-रोग/चूर्णिल-आसिता">चूर्णिल आसिता</a> रोग से बचाव के लिए केराथेन (20 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) का छिड़काव फरवरी के अंतिम सप्ताह में अवश्य करें।फरवरी में छोटे पौधों के ऊपर से छप्पर हटा दें। मिलीबग के बचाव के लिए वृक्षों के तने पर पॉलीथिन की 3 फीट चौड़ी पट्टी बांध दें। 250 ग्राम प्रति वृक्ष की दर से क्लोरपायरीफॉस धूल (1.5 प्रतिशत) को पेड़ के चारों ओर की मिट्टी में मिश्रित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भूमि की सतह पर परभक्षी ब्यूवेरिया बेसियाना (2 ग्राम प्रति लीटर, 1x10' बीजाणु प्रति मि.ली.) अथवा 5 प्रतिशत नीम बीज के गिरी सत का अनुप्रयोग प्रौढ़ कीटों को मारने के लिए करें। ध्यान रखने योग्य बात है कि इन्हीं दिनों में पौधों पर फल आते हैं। यदि किसी भी कीटनाशी का प्रयोग फूलों पर किया गया तो संपूर्ण परागण न होने से कम फल लगेंगे। </p> <h3 style="text-align: justify;">सिट्रस</h3> <h4 style="text-align: justify;">समुचित सिंचाई और उर्वरण, सिट्रस में लाए भरपूर फलन</h4> <p style="text-align: justify;">जनवरी में एक-दो सिंचाई करें तथा पाले से बचाने के हरसंभव उपाय अपनाएं। मूलत तैयार करने के लिए बीज की बुआई पॉलीथिन में करें। प्रति पौधा 400 ग्राम नाइट्रोजन, 200 ग्राम फॉस्फोरस तथा 400 ग्राम पोटाश का प्रयोग 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद के साथ करके हल्की सिंचाई कर दें। इस अवधि में बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। फरवरी में फूल आने से कुछ दिन पहले सिंचाई न करें अन्यथा सभी फूल झड़ सकते हैं। यदि फूलों या फलों में गिरने की समस्या अधिक हो, तो 2-4, डी (10 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव करें। फल लगते समय र्याप्त मात्रा में नमी बनाए रखें। नए पौधे तैयार करने के लिए फरवरी में अंत में कलिकायन की जा सकती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">अंगूर</h3> <h4 style="text-align: justify;">काट-छांट , खाद और पानी, अंगूर में बरतें पूरी सावधानी</h4> <p style="text-align: justify;">बेहतर अंगूर उत्पादन के लिए, वार्षिक काट-छांट अत्यंत आवश्यक है। उत्तरी भारत में अंगूर की काट-छांट के लिए जनवरी सबसे उपयुक्त माह है। काट-छांट के बाद कटे भाग पर नीले थोथे का घोल लगाना न भूलें, ताकि किसी व्याधि के प्रकोप से बचा जा सके। अंगूर में प्रथम वर्ष गोबर/कम्पोस्ट खाद के अलावा 100 ग्राम नाइट्रोजन, 60 ग्राम फॉस्फेट व 80 ग्राम पोटाश प्रति पौधा आवश्यक होता है। 5 वर्ष या इससे ऊपर यह मात्रा बढ़कर 500 ग्राम नाइट्रोजन, 300 ग्राम फॉस्फेट व 400 ग्राम पोटाश हो जाती है। फॉस्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा तथा नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा काट-छांट के बाद जनवरी में दें। उर्वरक डालने के बाद हल्की सिंचाई करें। कटी हुई शाखाओं से 30-40 सें.मी. आकार की कलमें तैयार कर लें तथा इन्हें 10-15 दिनों तक नम मृदा में दबाने के बाद पौधशाला में लगा दें। बेहतर परिणाम के लिए, कलमों को 500-1000 पीपीएम इंडोल ब्यूटाइरिक अम्ल से उपचारित भी कियाजा सकता है। उत्तरी भारत में अंगूर के नए बाग लगाने का भी यही उपयुक्त समय है।फरवरी में चूर्णिल आसिता रोग से बचाव के लिए केराथेन (0.1 प्रतिशत) का छिड़काव करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">अमरूद</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/sda142.jpg" width="160" height="115" /></p> <h4 style="text-align: justify;">सहज तुड़ाई सही रखरखाव, बना रहे अमरूद का भाव</h4> <p style="text-align: justify;">जनवरी में अमरूद के बागों में फलों की तुड़ाई का कार्य जारी रखें। तुड़ाई का सबसे अच्छा समय सुबह का होता है। फलों को उनकी किस्मों के अनुसार अधिकतम आकार तथा परिपक्व-हरे रंग (जब फलों के सतह का रंग गाढ़े से हल्केहरे रंग में परिवर्तित हो रहा हो) पर तोडना चाहिए। इस समय फलों से एक सुखद सुगंध भी आती है। सुनिश्चित करें कि अत्यधिक पके फलों को तोड़े गए अन्य फलों के साथ मिश्रित नहीं किया जाए। प्रत्येक फल को अखबार से पैक करने से फलों का रंग और भंडारण क्षमता बेहतर होती है। फलों को पैक करते समय उन्हें एक-दूसरे से रगड़ने पर होने वाली खरोंच से भी बचाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बक्से के आकार के अनुसार ही उनमें रखे जाने वाले फलों की संख्या निर्धारित हो। जनवरी में पत्तियों पर कत्थई रंग का आना सूक्ष्म तत्वों की कमी के कारण होता है। अत: कॉपर सल्फेट तथा जिंक सल्फेट का 0.4 प्रतिशत की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। फरवरी के दूसरे पखवाड़े में छंटाई का कार्य शुरू किया जाना चाहिए और मार्च के प्रथम सप्ताह तक जारी रखा जा सकता है। पिछले मौसम में विकसित शाखाओं के 10-15 सें.मी. अग्र भाग को काट देना चाहिए। इसके अतिरिक्त, टूटी हुई, रोगग्रस्त तथा आपस में उलझी शाखाओं को भी निकाल देना चाहिए। छंटाई के तुरंत बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (2-3 प्रतिशत) का छिड़काव अथवा बोर्डो पेस्ट का शाखाओं के कटे भाग पर लेपन करना चाहिए। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। अमरूद के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">बेर</h3> <h4 style="text-align: justify;">बागानी का सही ज्ञान, बेर का रखे पूरा ध्यान </h4> <p style="text-align: justify;">बेर में चूर्णिल आसिता रोग अत्यधिक हानि पहुंचाता है। इससे बचने के लिए फरवरी में 0.2 प्रतिशत केराथेन का छिड़काव करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा यही छिड़काव करें। फरवरी के अंत में किसान बेर के पौधे भी लगा सकते हैं। फरवरी में बेर की अगेती किस्में पकने लगती हैं। फलों को अच्छी दशा में बनाए रखने के लिए, तुड़ाई सुबह या शाम को ही करनी चाहिए। तुड़ाई के समय फलों को उनके रंग एवं आकार के आधार पर छांट कर श्रेणीकृत किया जाना चाहिए। छंटाई उपरांत फलों को कपड़े की चादरों, जूते के बोरॉन, नाइलोन की जालीदार थैलियों, बांस की टोकरियों, लकड़ी अथवा गत्तों के डिब्बों में रखकर बाजार भेजा जा सकता है। बागों की निराई-गडाई एवं सफाई का कार्य करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">अनार</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccsda141.jpg" width="160" height="115" /></p> <h4 style="text-align: justify;">करें अनार की देखभाल, हो जाएं मालामाल</h4> <p style="text-align: justify;"> जंगली अनार के पौधों पर वेज ग्राफ्टिंग द्वारा जनवरी-फरवरी में 90 प्रतिशत सफलता के साथ पौधे तैयार किए जा सकते हैं। यदि जनवरी के दौरान पौधों को सुषुप्तावस्था में रखा गया है, तो इस अवधि में 15 दिनों के अंतराल पर बोर्डो मिश्रण और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड व ब्रोन्पोल का एकांतरित छिड़काव करें। सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर नए बागों की स्थापना का कार्य फरवरी में किया जा सकता है। पौधों के रोपण से पूर्व 2.5 ग्राम प्रति लीटर की दर से कॉपर ऑक्सीक्लोराइड से छिड़काव करें। अनार के किशोर पौधों (1-3 वर्ष आयु) में संस्तुत उर्वरकों की मात्रा नयी वृद्धि के साथ तीन बराबर भागों में जनवरी, जून और सितंबर में देनी चाहिए। यदि मृग बहार की फसल ली गयी हो, तो तैयार फलों को जनवरी में तुडाई के बाद बाजार ले जाने की व्यवस्था करें।</p> <h3 style="text-align: justify;"> केला</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/sda138.jpg" width="160" height="115" /></p> <h4 style="text-align: justify;">पाले से बचाव की वरीयता, केले की प्राथमिकता</h4> <p style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../../../agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/93594d92f93593893e92f93f915-92b938932947902/915947932947-915940-92b938932">केले की फसल </a>में जनवरी के प्रथम एवं तृतीय सप्ताह में सिंचाई करें, ताकि पाले से बचाव हो सके। पाले से बचाव के लिए किसी पलवार (मल्च) का प्रयोग करें तथा बागों में सायंकाल में धुआं भी करें। पौधों को यदि सहारा न दिया हो तो बांस के डंडे से सहारा प्रदान करें।</p> <p style="text-align: justify;">फरवरी के प्रथम तथा तृतीय सप्ताह में सिंचाई करें। केवल एक तलवारी पत्ती (भूस्तारी) को छोड़कर पौधे के आधार से निकलने वाली अन्य पत्तियों को काट दें। नाइट्रोजन की 60 ग्राम मात्रा प्रति 10 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">स्ट्रॉबेरी</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/sda137.jpg" width="160" height="115" /></p> <h4 style="text-align: justify;">निराई-गुड़ाई और पलवार, स्ट्रॉबेरी जाएगा बाजार</h4> <p style="text-align: justify;">जनवरी में स्ट्रॉबेरी के खेत में निराई-गुड़ाई करें। यदि पलवार न बिछाई गई हो, तो वांछित पलवार जैसे-पुआल या पॉलीथिन का प्रयोग करें। फलों में उच्च गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए फरवरी के शुरू में जिब्रेलिक अम्ल (75 पी.पी.एम.) का छिड़काव करें तथा समय पर सिंचाई करते रहें। पत्तियों पर यदि धब्बे दिखाई पड़ें, तो डाइथेन-एम-45 (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) या बाविस्टीन (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। पहाड़ी क्षेत्रों में किसान स्ट्रॉबेरी को केवल नए पौधे तैयार करने के लिए लगाते हैं। यदि फरवरी के अंत में पौधों पर फूल आ रहे हैं, तो उन्हें तुरंत हटा दें। परंतु मैदानी भागों में किसान ऐसा न करें। मैदानी भागों में फरवरी में स्ट्रॉबेरी की फसल तैयार हो जाती है। इसे तोड़कर, 250 ग्राम के पन्नेट में पैक कर बाजार भेजने की व्यवस्था करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">शीतोष्णफल</h3> <h4 style="text-align: justify;"> शीतोष्ण फलों की निगरानी, न बरतें असावधानी </h4> <p style="text-align: justify;"> शीतोष्णवर्गीय फलों के बाग लगाने का सही समय जनवरी है। यदि किसी कारणवश दिसंबर में छंटाई न कर पाएं हों, तो जनवरी में इन फलवृक्षों की छंटाई अवश्य करें। छंटाई, सधाई प्रणाली को ध्यान में रखकर करनी चाहिए। कटे भाग पर चौबटिया लेप (सिंदूरः कॉपर कोर्बोनेट : अलसी तेल :: 1:1:1.<span id="2957_TRN_0"><span id="5333_TRN_0"><span id="5553_TRN_0"><span id="5597_TRN_0"><span id="5641_TRN_0"><span id="5729_TRN_0"><span id="5773_TRN_0"><span id="5949_TRN_0"><span id="5993_TRN_0"><span id="6037_TRN_0"><span id="6081_TRN_0"><span id="6125_TRN_0"><span id="6169_TRN_0"><span id="6213_TRN_0"><span id="6257_TRN_0"><span id="6301_TRN_0"><span id="6345_TRN_0"><span id="6389_TRN_0"><span 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id="8413_TRN_0"><span id="8457_TRN_0"><span id="8501_TRN_0"><span id="8545_TRN_0"><span id="8589_TRN_0"><span id="8633_TRN_0"><span id="8677_TRN_0"><span id="8721_TRN_0"><span id="8765_TRN_0"><span id="8809_TRN_0"><span id="8853_TRN_0"><span id="8897_TRN_0"><span id="8941_TRN_0"><span id="8985_TRN_0"><span id="9029_TRN_0"><span id="9073_TRN_0"><span id="9117_TRN_0"><span id="9161_TRN_0"><span id="9205_TRN_0"><span id="9249_TRN_0"><span id="9293_TRN_0"><span id="9337_TRN_0"><span id="9381_TRN_0"><span id="9425_TRN_0"><span id="9469_TRN_0"><span id="9513_TRN_0"><span id="9557_TRN_0"><span id="9601_TRN_0"><span id="9645_TRN_0"><span id="9689_TRN_0"><span id="9733_TRN_0"><span id="9777_TRN_0"><span id="9821_TRN_0">25 )</span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span></span>लगा देना चाहिए। दो प्रतिशत डोर्मेंट तेल (सर्वो छिड़काव तेल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम छिड़काव तेल) का प्रयोग सैनजोस स्केल और चिचड़ी की रोकथाम के लिए किया जा सकता है। बागों की निराई-गुडाई एवं सफाई का कार्य करें।फलदार व छोटे पौधों में गोबर की खाद तथा फॉस्फोरसयुक्त उर्वरकों का प्रयोगकरना चाहिए। कीटों एवं रोगों की रोकथाम के लिए यदि दिसंबर में कोई छिडकाव न कर पाए हों, तो जनवरी के प्रथम सप्ताह में यह कार्य संपूर्ण करें। बागों में जनवरी मेंतेल) का प्रयोग उर्वरक देना भी न भूलें।</p> <h3 style="text-align: justify;">लीची</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/csda140.jpg" width="274" height="185" /></p> <h4 style="text-align: justify;">लीची को बढ़ाना है, पाले से बचाना है</h4> <p style="text-align: justify;">जनवरी में पाले से सुरक्षा के प्रबंध अवश्य करें। फरवरी में लीची में फूल आते समय सिंचाई न करें। इससे फलों के गिरने का डर रहता है। फूल आने से पहले एवं बाद में पानी की समुचित व्यवस्था करें। में पानी की समुचित व्यवस्था करें। लिए लीची में संस्तुत रसायनों का प्रयोग करें। कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट की आधी मात्रा अर्थात 1.5 कि.ग्रा. प्रति पौधा फरवरी में प्रयोग करें। लीची के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">खजूर</h3> <h4 style="text-align: justify;"> खजूर है ऊर्जा की खान, परागण का रखें पूरा ध्यान</h4> <p style="text-align: justify;">जनवरी-फरवरी में खजूर के बागों में कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं। इनमें कटाई-छंटाई , उर्वरकों का प्रयोग तथा परागण प्रमुख हैं। खजूर के पौधे एकबीज पत्रीय तथा एकल तना होने से शाखित नहीं होते हैं। व्याधिग्रस्त, सूखी, पुरानी, क्षतिग्रस्त पत्तियों को सर्दियों में हटा देना चाहिए। फल गुच्छों से सटी हुई पत्तियों के डंठलों से कांटे निकालना आवश्यक है. ताकि उनके आसपास परागण, फल गुच्छों की छंटाई, डंठल मोड़ना, रसायनों का छिड़काव, थैलियां लगाना एवं फलों की तुड़ाई आदि कार्य सरलता से हो सकें। पत्ती को डंठल सहित, जितना संभव हो सके, मुख्य तने के समीप से हटाया जाना चाहिए, ताकि मुख्य तने की सतह को चिकना रखा जा सके। फलःगुच्छा अनुपात 1:6 रखने पर अधिक फल उत्पादन एवं उत्तम गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते हैं। अच्छी फसल के लिए पूर्ण विकसित वृक्ष पर लगभग 70-100 पत्तियां होनी चाहिए। फॉस्फोरस (0.5 कि.ग्रा.) और पोटाश (0.5 कि.ग्रा.) की पूर्ण मात्रा और नाइट्रोजन की 50 प्रतिशत मात्रा (0.75 कि.ग्रा.) को फूल आने से तीन सप्ताह पहले दिया जाना चाहिए, जो विभिन्न किस्मों में जनवरी-फरवरी के दौरान होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटहल</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/sda136.jpg" width="160" height="115" /></p> <h4 style="text-align: justify;">कटहल की ना करें उपेक्षा, पाले और कीटों से हो सम्पूर्ण सुरक्षा</h4> <p style="text-align: justify;">यदि दिसंबर में खाद एवं उर्वरक न दिए गए हों, तो जनवरी में यह कार्य पूर्ण करें। छोटे पौधों की पाले से रक्षा के उपाय करें। फरवरी के अंत में मिलीबग के प्रकोप से बचने के लिए पेड़ों पर आम की भांति . पॉलीथिन की पट्टी लगाएं।</p> <h3 style="text-align: justify;">लोकाट</h3> <h4 style="text-align: justify;">कलिकायन, उर्वरण एवं कीट प्रबंधन, लोकाट में लाए भरपूर फलन</h4> <p style="text-align: justify;">जिन क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित । व्यवस्था हो, उन क्षेत्रों में वसंत के आगमन के साथ ही पौध रोपण का कार्य फरवरी के दूसरे पखवाड़े से प्रारंभ किया जा सकता है और मार्च तक जारी रखा जा सकता है। एक मीटर गहरे और एक मीटर व्यास के गड्ढे की खुदाई का कार्य वास्तविक वृक्षारोपण से कम से कम एक महीने पहले किया जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप हो, वहां क्लोरपाइरीफॉस 10 मि.ली. प्रति गड्ढे की दर से प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रति पौध 25-30 कि.ग्रा. अच्छी तरह से सड़ा हुआ गोबर खाद दी जानी चाहिए। इस माह के दौरान, शील्ड अथवा 'टी' कलिकायन विधि द्वारा तीन माह पुरानी शाखा से कालिका लेने पर पौध-प्रवर्धन में भी अपेक्षित सफलता मिलती है। उत्तर भारत के कुछ स्थानों पर जनवरी तक लोकाट में फूल आते हैं। फलों के सेट होने के बाद, 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जानी चाहिए, ताकि फलों का विकास हो सके। फरवरी में नाइट्रोजन उर्वरक की आधी खुराक दी जा सकती है, ताकि फलों की अभिवृद्धि हो सके। यदि फल मक्खी का प्रकोप हो तो कीटनाशी इमिडक्लोरपीड (0.5 मि.ली./प्रति लीटर) का छिड़काव फरवरी में15 दिनों के अंतराल पर दो बार किया जा सकता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">फालसा</h3> <h4 style="text-align: justify;">फूटेंगी फालसा में नव मंजरी, इस ऋतु काट-छांट है जरूरी</h4> <p style="text-align: justify;">उत्तरी भारत में फालसे में जनवरी में गहन काट-छांट करनी चाहिए। काट-छांट के बाद कटे भागों पर बोर्डो लेप लगाएं। पौधों को उपयुक्त मात्रा में गोबर की खाद और उर्वरक दें।उपरोक्त सावधानियों और सझावों को ध्यान में रखते हुए फल बागानों में होने वाले कृषि-कार्यों को इस द्विमाही सम्पन्न करें। आगामी द्विमाही (मार्च-अप्रैल) में भी बागों में बहुत कुछ करना है, जिसे जानने के लिए जुड़े रहें 'फलफूल' से।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : हरे कृष्ण-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी-221005 (उत्तर प्रदेश); सुशील कुमार माहेश्वरी एवंअरविंद कुमार सिंह-भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क बागवानी अनुसंधान संस्थान, बीछवाल, बीकानेर-334006 (राजस्थान); नृपेंद्र विक्रम सिंह- भाकृअनुप-राष्ट्रीय अनार अनुसंधान केंद्र, सोलापुर-413255 (महाराष्ट्र)</p>