राई सिंचाई राई की फसल में सिंचाई, जल की उपलब्धता के आधार पर कर सकते हैं। यदि एक सिंचाई उपलब्ध है तो 50-60 दिनों की अवस्था पर करें। दो सिंचाई उपलब्ध होने की अवस्था में पहली सिंचाई बुआई के 40-50 दिनों बाद एवं दूसरी सिंचाई 90-100 दिनों बाद करें। यदि तीन सिंचाई उपलब्ध हैं तो पहली सिंचाई 30-35 दिनों बाद व अन्य दो 30-35 दिनों के अन्तराल पर करें। खरपतवार से मुक्ति फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए 20-25 दिनों में एक बार निराई-गुड़ाई करना आवश्यक है। यह देखा गया है कि इस निराई के बाद सरसों की फसल अच्छी तरह और जल्दी बढ़ती है। सरसों माहूं का प्रकोप एवं बचाव सरसों में माहूं का प्रकोप दिसम्बर से जनवरी में बादल वाले मौसम में अधिक होता है। इससे बचाव के लिए सरसों की बुआई मध्य अक्टूबर तक अवश्य कर देनी चाहिए। इससे फसल पर माहूं का कम प्रयोग होगा। यदि फिर भी प्रकोप होता है तो मैलाथियान दवा की एक लीटर या फास्फेमिडान 85 प्रितशत के 250 मि.ली. मात्रा को प्रति हैक्टर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। सफेद रतुआ की रोकथाम सरसों की फसल में सफेद रतुआ की रोकथाम के लिए एप्रॉन 35 एड.डी. 6 ग्राम या बाविस्टिन 2 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज उपचारित करें। बीज उपचार के अलावा बुआई के 50-60 दिनों बाद रोग के लक्षण दिखाई देते ही फफूंदनाशक दवा रिडोमल एम.जैड-72 डब्ल्यू.पी. का 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से 600-800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिनों बाद इंडोफिल का छिड़काव करें। झुलसा रोग झुलसा रोग का प्रकोप हो तो जिंक मैग्नीज कार्बामेंट 75 प्रतिशत की 2.0 कि.ग्रा. या जीनेब 75 प्रतिशत की 2.5 कि.ग्रा. मात्राा को 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। सरसों के पत्ते में धब्बा रोग की रोकथाम के लिए बोने से पूर्व बीज का उपचार बाविस्टिन या थीरम दवा की 2.5 ग्राम मात्राा/कि.ग्रा. की बीज दर से करें। रोग दिखाई देने पर ही फफूंदीनाशक ब्लाइटॉक्स-50 या डायथेन एम-45 की 500-600 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में घोलकर/एकड़ फसल पर 10-15 दिनों के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करें। तोरिया की फसल पक जाने पर समय पर कटाई करें। देरी करने पर फलियों से दानें गिरने का डर रहता है। जहां सिंचाई का साधन उपलब्ध है, वहां दो सिंचाई, पहली फूल आने पर तथा दूसरी दाना बनते समय करने से उपज में बढ़ोत्तरी होती है। सूरजमुखी सूरजमुखी की बीजाई जनवरी में भी हो सकती है। दिसम्बर में बोई गई फसल में नाइट्रोजन की दूसरी व अंतिम किश्त एक बोरा यूरिया बीजाई के 30 दिनों बाद दें तथा पहली सिंचाई भी करें व फसल उगने के 17 से 20 दिनों बाद गुड़ाई करके खरपतवार निकाल दें। अलसी अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग अलसी की फसल में अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग में पत्तियों की ऊपरी सतह पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं, जो गोल छल्ले के रूप में पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। यह रोग तने, शाखाओं एवं फलियों को भी प्रभावित करता है। तीव्र प्रकोप की दशा में फलियां काली होकर मर जाती हैं। अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत डब्ल्यू.एस. 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजशोधन कर बुआई करनी चाहिए। अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा एवं गेरुई रोग के नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 75 डब्ल्यू.पी. की 2.0 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टर लगभग 600-750 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। गेरुई रोग गेरुई रोग में पत्तियों, पुष्पक्रमों तथा तने पर नारंगी रंग के फफोले बनते हैं, जिससे पत्तियां पीली होकर सूखने लगती हैं। अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा एवं गेरुई रोग के नियंत्रण हेतु मैंकोजेब 75 डब्ल्यू.पी. की 2.0 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टर लगभग 600-750 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। मृदा एवं बीजजनित रोगों का नियंत्रण मृदा एवं बीजजनित रोगों के नियंत्रण हेतु जैव कवकनाशी ट्राइकोडर्मा विरिडी 1 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. अथवा ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. की 2.5 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टर 60-75 कि.ग्रा. सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिनों तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से अलसी के बीजजनित रोगों के प्रबंधन में सहायक होता है। पाउडरी मिल्ड्यू रोग नियंत्रण अलसी की फसल में पाउडरी मिल्ड्यू रोग नियंत्रण के लिए 3 ग्राम सल्फेक्स प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार छिड़क़ाव करें। अलसी की फसल में फलीमक्खी कीट के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 का 500 मि.ली. प्रति हैक्टर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर फली बनने से पहले 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह, 'सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012