आम, अमरूद, आंवला, लीची, पपीता एवं केला आम, अमरूद, आंवला, लीची, पपीता एवं केले के नवरोपित बागों की सिंचाई व निराई-गुड़ाई करें। अमरूद, पपीते, आंवला और नीबू के पके फलों की तुड़ाई करें। फलों के पुराने बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। आम जनवरी में आम के पेड़ों में बौर आना शुरू हो जाता है। इसलिए किसानों को अच्छा उत्पादन पाने के लिए अभी से इसकी देखभाल करनी होगी। अगर जरा सी चूक हुई तो रोग और कीट पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं। भुनगा कीट एवं बचाव भुनगा कीट का प्रकोप जनवरी-फरवरी से शुरू हो जाता है। भुनगा कीट आम की फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। इस कीट के लार्वा एवं वयस्क कीट कोमल पत्तियों एवं पुष्पक्रमों का रस चूसकर हानि पहुंचाते हैं। इसकी मादा 100-200 तक अंडे नई पत्तियों एवं मुलायम प्ररोह में देती है और इनका जीवनचक्र 12-22 दिनों में पूरा हो जाता है। इसका प्रकोप जनवरी-फरवरी से शुरू हो जाता है। आम के भुनगा कीट से बचने के लिए मोनोक्रोटोफॉस नामक रसायन की 4 मि.ली. मात्रा को 10 लीटर पानी में मिलाकर या कार्बोरिल 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें। इसके अलावा बिवेरिया बेसिआना फपूंफद के 0.5 प्रतिशत घोल या नीम तेल 3000 पीपीएम प्रति 2 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से भी राहत मिल जाएगी। शूट गॉल कीट से बचाव आम के शूट गॉल कीट से बचाव हेतु दिसम्बर-जनवरी में गांठ से नीचे थोड़ी सी पुरानी लकड़ी को काटकर जला दें। दिसम्बर-जनवरी के महीने में पुष्पक्रमों को काट दें। सफेद चूर्णी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू) सफेद चूर्णी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू) इस रोग के प्रभाव से रोगग्रस्त भाग सफेद दिखाई पड़ने लगता है। इसकी वजह से मंजरियां और फूल सूखकर गिर जाते हैं। इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही आम के पेड़ों पर 5 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करें। इसके अलावा 500 लीटर पानी में 250 ग्राम कैराथेन घोलकर छिड़काव करने से भी रोग पर काबू पाया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में बौर आने के समय मौसम असामान्य रहा हो वहां हर हालत में सुरक्षात्मक उपाय के आधार पर 0.2 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करें एवं आवश्यकतानुसार दोहराएं। कालचूर्ण (एंथ्रेक्नोस) यह रोग अधिक नमी वाले क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। इसका आक्रमण पौधों के पत्तों, शाखाओं और फूलों जैसे मुलायम भागों पर अधिक होता है। प्रभावित हिस्सों में गहरे भूरे रंग के धब्बे आ जाते हैं। रोग के लक्षण दिखाई देते ही आम के पेड़ों पर 0.2 प्रतिशत जिनैब का छिड़काव करें। गुठलीभेदक यह कीट जून से जनवरी तक क्रियाशील रहता है। यह फल में एक छोटा सा गड्ढा बना कर बाह्य सतह से नीचे देता है। इसका लार्वा निकलने के बाद गूदे से होता हुआ गुठली को छेदता अंदर चला जाता है और बीजों को खाकर पूर्णतः नष्ट कर देता है। इस कीट का प्रकोप देसी एवं बनारसी प्रजाति के आंवलों पर देखा गया है। अधिक प्रकोप होने पर प्रथम छिड़काव 0.2 प्रतिशत कार्बेरिल या 0.04 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस या 0.05 प्रतिशत क्वीनालफॉस कीटनाशी का फलों के मटर के दाने के बराबर की अवस्था में करना चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो दूसरा छिड़काव कीटनाशी बदल कर 15 दिनों के अंतराल पर करें। अंगूर अंगूर में कटाई-छंटाई का कार्य पूरा कर लें। अंगूर में प्रथम वर्ष गोबर/ कम्पोस्ट खाद के अलावा नाइट्रोजन 100 ग्राम, फॉस्फेट 60 ग्राम व पोटाश 80 ग्राम प्रति पौधा आवश्यक होता है। 5 वर्ष या इससे ऊपर यह मात्रा बढ़कर नाइट्रोजन 500 ग्राम, फॉस्फेट 300 ग्राम व पोटाश 400 ग्राम हो जाती है। फॉस्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा तथा नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा कटाई-छंटाई के बाद जनवरी में अवश्य दें। आंवला मृदु सड़न आंवले में मृदु सड़न दिसम्बर से फरवरी के मध्य अधिक देखा जा सकता है। संक्रमित भाग पर जलसिक्त भूरे रंग का धब्बा बनाता है, जो पूरे फल को करीब 8 दिनों में आच्छादित कर फल के आकार को विकृत कर देता है। यह रोग छोटे तथा परिपक्व फल, दोनों को प्रभावित करता है, किन्तु परिपक्व फलों में इसका प्रकोप अधिक होता है। तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटान (0.15 प्रतिशत), डाइथेन एम-45 या बाविस्टीन (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करके भंडारित करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है। कागजी नीबू कागजी कलां नीबू की दूसरी फसल इस माह में तैयार हो जाती है। ठीक प्रकार से फलों की तुड़ाई कर प्रसंस्करण द्वारा अधिक लाभ कमाया जा सकता है। नीबूवर्गीय फलदार वृक्षों जैसे किन्नों में मूल वृंतों का उपयोग कर फलों की उपलब्धता इस माह तक सुनिश्चित की जा सकती है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह, 'सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012