चना सिंचाई भारी मृदा में फूल आने के पहले एक सिंचाई तथा हल्की दोमट मृदा में फूल आने से पहले ही दूसरी सिंचाई चने चने की फसल में पहली सिंचाई के लगभग एक सप्ताह बाद वायु संचार के लिये हल्की निराई-गुड़ाई करें, जिससे जड़ों की गांठों का विकास लाभदायक ढंग से हो। सामान्य रूप से चने की फसल में दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय की जानी चाहिए। यदि जाड़े में वर्षा हो जाये तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नही होती है। लम्बे समय तक वर्षा न हो तो अच्छी पैदावार लेने के लिये हल्की सिंचाई अवश्य करें। अनावश्यक रूप से सिंचाई करने पर पौधों की वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा हो जाती है, जिसका उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चने की फसल से भरपूर पैदावार हेतु जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए अन्यथा फसल के मरने का अंदेशा रहता है। नवीनतम प्रयोग-यूरिया का घोल नवीनतम प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि 2 प्रतिशत यूरिया के घोल के दो पर्णीय छिड़काव 10 दिनों के अन्तराल पर फली में दाना बनते समय करने से उपज में निश्चित रूप से 15-20 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। फलीछेदक कीट एवं उसके उपाय चने के खेत में चिड़िया बैठ रही हो तो यह समझ लें कि चने में फलीछेदक कीट का प्रकोप होने वाला है। चने की फसल में फलीछेदक कीट का प्रकोप पर इसकी गिडारें हल्के हरे रंग की होती हैं और बाद में भूरे रंग की हो जाती हैं। ये फलियों को छेदकर अपने सिर को फलियों के अन्दर डालकर दानों को खा जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिये फली बनना प्रारम्भ होते ही मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. की 750 मिली. या फेनवेलरेट 20 ई.सी. की 500 मि.ली. मात्रा 500 से 600 लीटर पानी घोलक प्रति हैक्टर खेत में छिड़काव करें। फसल में पहला छिड़काव 50 प्रतिशत फूल आने के बाद करें। यदि छिड़काव के लिये रसायन उपलब्ध नहीं हो तो मिथाइल पॅराथियान 2 प्रतिशत धूल की 25 कि.ग्रा. मात्रा का छिड़काव करें। फलीभेदक का नियंत्रण फलीभेदक कीट की निगरानी हेतु 5 फेरोमोन ट्रैप/हैक्टर का प्रयोग करना चाहिए। फेरोमोन ट्रैप में 4-5 नर पतंगे/ ट्रैप/रात्रि आ जाने पर सामान्यतः 14 दिनों बाद कीट की संख्या आर्थिक हानि स्तर तक पहुंच जाती है। हेलिकोवर्पा कीट के संदर्भ में संख्या आर्थिक हानि स्तर 1 सूंडी प्रति 1.5 मीटर फसल पंक्ति है या 5 प्रतिशत ग्रसित फली या 8-10 मॉथ/ ट्रैप/लगातार 3 रात्रि तक। इस कीट का नियंत्रण कीट के आर्थिक हानि स्तर पर पहुंचते ही तुरंत कर देना चाहिए अन्यथा कीट की संख्या आर्थिक हानि स्तर से अधिक हो जाने पर कीट नियंत्रण की लागत अत्यधिक हो सकती है। अतः जैसे ही आर्थिक हानि स्तर आता है उसी समय कीट नियंत्रण की विधियां अपनाना लाभकारी होता है। उकठा रोग उकठा रोग एक फफूंदी (फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम प्रभेद साइसेरि) द्वारा होता है। फसल में इस रोग के लक्षण में सामान्यतः संक्रमित पौधे का ऊपरी भाग मुरझा जाता है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, जिससे संक्रमित पौधे दूर से ही पहचाने जा सकते हैं। अंत में पौधा पूर्ण रूप से सूखकर मर जाता है। यह पौधे किसी भी अवस्था में संक्रमित कर सकता है, परन्तु सामान्यतः फसल की पौध अवस्था या फिर फसल की फूल व फली लगने वाली अवस्था में इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। इसकी रोकथाम के लिये उकठा अवरोधी प्रजातियों (के.डब्ल्यू.आर. 108, जे.जी. 74, पूसा 372, पूसा1003 (काबुली) डी.सी.पी. 92-3, जी.एन.जी. 1581, जी.पी.एफ. 2, हरियाणा चना 1,पूसा 329, पूसा 362, पूसा 372, पूसा चमत्कार (बी.जी. 1053-काबुली) का चयन करें। सरसों के साथ अन्तःफसल की 4:1 या 4:2 अनुपात में बुआई करें व बीजोपचार-जैव नियंत्रक फफूंदी ट्राइकोडर्मा (4 ग्राम) + वीटावैक्स (1 ग्राम) प्रति कि.ग्रा. बीज को शोधित करने के बाद बुआई करें। चने की फसल में फलीछेदक कीट के नियंत्रण के लिए न्यूक्लियर पॉलीहेड्रोसिस वायरस (एनपीवी) 250-350 शिशु समतुल्य 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। चने में 5 प्रतिशत एन.एस.के.ई या 3 प्रतिशत नीम आयॅल तथा आवश्यकतानुसार कीटनाशी का प्रयोग करें। शुष्क जड़ गलन रोग (राइजाक्टोनिया बटाटीकोला) यह रोग बड़े पौधों में फूल एवं फलियां बनते समय दृष्टिगोचर होता है। इसकी रोकथाम के लिये शुष्क जड़गलन सहिष्णु प्रजातियां जैसे एच. 355 तथा आई.सी.सी.वी. 10 उगायें। इस रोग से बचाव के लिये बुआई के समय कार्बेन्डाजिम + थीरम (1:2 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज) या वीटावैक्स तथा ट्राइकोडर्मा विरडी 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज में मिलाकर या बेनोमिल (2 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज) द्वारा उपचार करना चाहिये। मटर सिंचाई प्रथम सिंचाई आवश्यकतानुसार बुआई के 45-60 दिनों बाद (फूल आने के पहले) तथा दूसरी फलियों में दाना बनते समय की जानी चाहिए। यदि जाड़े की वर्षा हो जाये तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होगी। फूल आते समय सिंचाई न करें अन्यथा लाभ की बजाय हानि हो जाती है। सिंचाई के लगभग एक सप्ताह बाद ओट आने पर हल्की गुड़ाई करना लाभदायक होता हैं। असिंचित या देर से बुआई की दशा में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का फूल आने के समय छिड़काव करें। बुकनी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू) मटर की फसल में बुकनी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू), जिसमें पत्तियों, तनों तथा फलियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है, की रोकथाम के लिए 3.0 कि.ग्रा. घुलनशील गधंक 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से 10-12 दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करें। मटर में 10-15 दिनों के अंतर से फलियां तोड़ी जाती हैं। झुलसा रोग झुलसा रोग की रोकथाम के लिए प्रति हैक्टर 2.0 कि.ग्रा. जिंक मैग्नीज कार्बामेट को 600 लीटर पानी में घोलकर फूल आने से पूर्व व 10 दिनों के अन्तराल पर दूसरा छिड़काव करें। फलीछेदक के नियंत्रण मटर की फसल में फलीछेदक के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरोप्रिड 200 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से 600 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। मटर में पत्तीभेदक के लिए मेटासिस्टॉडक्सो 20 ई.सी. दवा का 1 लीटर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। खरपतवार मसूर की फसल में व्हील हैंड-हो की सहायता से खरपतवार निकाल दें, इससे फसल में वृद्धि होगी। एक सिंचाई फूल आने के पूर्व करनी चाहिए। धान के खेतों में बोई गई मसूर की फसल में यदि वर्षा न हो तो एक सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए। मसूर जड़ सड़न रोग मसूर की फसल में जड़ सड़न रोग के कारण बुआई के 20-25 दिनों बाद पौध सूखने लगता है। पौधों को उखाड़कर देखने पर तने पर रूई के समान फफूंद लिपटी हुई दिखाई देती है। उकठा रोग मसूर की फसल में उकठा रोग में पौधा धीरे-धीरे मुरझाकर सूख जाता है। छिलका भूरे रंग का हो जाता है तथा जड़ को चीर कर देखें तो उसके अन्दर भूरे रंग की धारियां दिखाई देती हैं। उकठा का प्रकोप पौधो की किसी भी अवस्था में हो सकता है। जड़ सड़न एवं उकठा रोग के नियंत्रण के लिए जिस खेत में प्रायः उकठा लगता हो तो यथासम्भव उस खेत में 3-4 वर्ष मसूर की फसल नहीं लेनी चाहिए। उकठा से बचाव हेतु नरेन्द्र मसूर-1, पन्त मसूर-4, मसूर-5, प्रिया, वैभव आदि प्रतिरोधी प्रजातियों की बुआई करनी चाहिए। बीजजनित रोगों का नियंत्रण बीजजनित रोगों के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत + कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत (2:1) 3.0 ग्राम या ट्राइकोडर्मा 4.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित कर बुआई करनी चाहिए। भूमि एवं बीजजनित रोगों के नियंत्रण हेतु जैव कवकनाशी ट्राइकोडर्मा विरडी 1 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. या ट्राइकोडर्मा डारजिएनम 2 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. की 2.5 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टर 60-75 कि.ग्रा. सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिनों तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई भूमि में मिला देने से मसूर के बीज/मृदाजनित रोगों का नियंत्रण हो जाता है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह, 'सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012