ताेरिया की फसल की देखभाल सितंबर में बोयी गयी तोरिया में बुआई के 25-30 दिनों बाद पहली सिंचाई करने के बाद 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग करें। आलू के साथ मिलवां फसल के लिए आलू की तीन पंक्तियों के बीच राई की एक पंक्ति की बुआई करें। बुआई का समय तोरिया की बुआई का कार्य माह के प्रथम सप्ताह तक पूरा कर लें। बीजजनित रोगों से सुरक्षा के लिए फफूंदीनाशक दवा बाविस्टीन 2 ग्राम, एप्रॉन 6 ग्राम, कैप्टॉफ 2 ग्राम या थीरम 2.5 ग्राम नामक रसायन से प्रति कि.ग्रा. बीज को उपचारित अवश्य करें। बीज दर 3-4 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सें.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सें.मी. व बीज की गहराई 2.5-3.0 सें.मी. उचित होती है। असिंचित क्षेत्रों में 5-6 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से उपचारित बीज का प्रयोग करें। बुआई के 20-22 दिनों के अंदर निराई-गुड़़ाई के साथ सघन पौधों को निकालकर पौधों से पौधो की दूरी 10-15 से.मी. कर देनी चाहिए, ताकि पौधों की बढ़वार अच्छी तरह हो सके। खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग मदृा परीक्षण के आधार पर किया जाए। फसल में बुआई से पूर्व 15 से 20 टन प्रति हैक्टर गोबर की सड़ी खाद तथा उर्वरकों के रूप में 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश तथा 30 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हैक्टर प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस, पोटाश, सल्फर की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुआई के समय प्रयोग करनी चाहिए। बुआई के 30 से 35 दिनों बाद 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रथम सिंचाई के समय प्रयोग करनी चाहिए। जिंक की कमी के लक्षण बुआई के 20 से 25 दिनों बाद पत्तियों पर आते हैं। इससे पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है और उनके किनारे गुलाबी हो जाते हैं तथा शिराओं के मध्य में ऊतकों का रंग पीला, सफेद या कागजी सफेद हो जाता है, जबकि शिरायें हरी रहती हैं। पत्तियां नीचे या ऊपर की तरपफ प्याले की आकृति लेती हैं। प्रभावित पौधों पर फूल तथा फली देर से बनते हैं। अतः 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर लाभदायक है। खड़ी फसल में जिंक की कमी दिखाई दे तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का घोल बनाकर छिड़काव करने से बीज की गुणवत्ता व मात्रा में वृद्धि होती है। फूल आने के समय मल्टीप्लेक्स या एग्रेमिन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने से परागण पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। खरपतवार नियंत्रण खरपतवारों से खेत को मुक्त रखने के लिए 20-25 दिनों में एक बार निराई-गुड़़ाई करना आवश्यक है। रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने के लिए फलूक्लोरेलिन (बासालीन 45 ई.सी.) 2.2 लीटर दवा 800 लीटर पानी प्रति हैक्टर की दर से अन्तिम जुताई से पहले छिड़काव कर तुरन्त जुताई करें व पाटा लगा दें अथवा स्टाम्प-30 पेन्डिमिथेलीन (स्टाम्प-30 ई.सी.) 3.3 लीटर दवा 800 लीटर पानी प्रति हैक्टर की दर से बुआई के तुरन्त बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व (1-2 दिनों के अंदर) छिड़काव करें। फसल की एक-दो निराई गुड़़ाई अवश्य करें। सरसाें की फसल की देखभाल भारत में सरसों की खेती रबी मौसम (शीत ऋतु) में की जाती है। इस फसल को 18-25 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। सरसों की खेती रेतीली से लेकर भारी मटियार मृदा में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट से दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है। यह फसल हल्की क्षारीयता को सहन कर सकती है, लेकिन मृदा अम्लीय नहीं होनी चाहिए। अगेती सरसों में सामान्यतः दो सिंचाई पर्याप्त रहती है। प्रथम सिंचाई बुआई के 30 से 35 दिनों बाद तथा दूसरी सिंचाई फलियों में बीज बनने की अवस्था पर सूखे की स्थिति में करनी चाहिए। किस्में एवं देखभाल सिंचित क्षेत्र में समय से बुआई (अक्टूबर) के लिए उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा सरसों 21, पूसा सरसों 22, पूसा सरसों-24, पूसा सरसों-26, पूसा सरसों-27, पूसा सरसों-29, पूसा सरसों-30, पूसा डबल जीरो सरसों-31, पूसा बोल्ड, पूसा विजय, पूसा करिश्मा, पूसा जगन्नाथ, पूसा बोल्ड, पूसा अग्रणी, गिरिराज, एन.डी.आर.ई.-4, माया, बसुंधरा, आर.जी.एन.-73, आर.जी.एन.-236, आर.जी.एन.-229, एन.आर.सी.एच.बी-101, डी.आर.एस.आर.आई.जे.-3,आर.एच.-0749, दिव्या-33, राज विजय मस्टर्ड-2, जे.एमडब्ल्यू.आर. 8-3, आर.एच.-0406, पंत राज-19, पी.आर.-20016, डी.एम.आर.-601, डी.आर.एम.आर.-150-35, पी.बी.आर.-357 एवं संकर प्रजाति एन.आर.सी.एच.बी.-506, कोरल-437,पी.ए.सी. 432 उपयुक्त हैं। सिंचित पछेती बुआई के लिए उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा सरसों 28, आर.जी.एन. 145, नव गोल्ड एवं क्षारीय व लवणीय भूमि के लिए प्रजातियां जैसे-सी.एस. 56, सी.एस. 54, सी.एस. 52 आदि अच्छी किस्में हैं। उन्नत प्रजातियों का स्वस्थ बीज, समय पर बुआई एवं फसल सुरक्षा तरीके अपनाकर इसकी उत्पादकता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। तोरिया और सरसों की बुआई का उचित समय उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानी क्षेत्रों में बारानी दशाओं में अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा तथा सिंचित दशाओं में नवंबर का प्रथम पखवाड़ा है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001