जाै की फसल की देखभाल मिट्टी जौ की खेती रेतीली से लेकर मध्यम दोमट मृदा तक में की जा सकती है। परन्तु इसकी अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उचित जल निकास एवं अच्छी उर्वरता वाली दोमट मृदा उपयुक्त मानी जाती है। जौ की खेती अन्य प्रकार की भूमि जैसे-लवणीय, क्षारीय या हल्की मृदा में भी की जा सकती है। बुआई का समय इसकी बुआई के लिए जो बीज प्रयोग में लाया जाए, वह रोगमुक्त, प्रमाणित व क्षेत्र के मुताबिक उन्नत किस्म का होना चाहिए। बीजों में किसी दूसरी किस्म के बीज नहीं मिले होने चाहिए। बोने से पहले बीज के अंकुरण का परीक्षण जरूर कर लेना चाहिए। जौ रबी मौसम की फसल है, जिसे सर्दी के मौसम में उगाया जाता है। आमतौर पर इसकी बुआई अक्टूबर से दिसंबर तक की जाती है। सिंचाई असिंचित क्षेत्राें में 20 अक्टूबर से 10 नवंबर तक जौ की बुआई करनी चाहिए, जबकि सिंचित क्षेत्राें में 25 नवंबर तक बुआई कर देनी चाहिए। पछेती जौ की बुआई 15 दिसंबर तक कर देनी चाहिए। बीज एवं बीजाेपचार जौ के लिए 80-100 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर बुआई के लिए उचित है। जौ की बुआई हल के पीछे कूंड़ों में अथवा सीडड्रिल से 20-25 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर 5-6 सें.मी. गहराई पर करें। असिंचित दशा में 6-8 सें.मी. गहराई में बुआई करें। बीज से पैदा होने वाली रोगों पर नियंत्रण के लिए बीज उपचार आवश्यक है। खुली कंगियारी से बचाव के लिए 2 ग्राम बाविस्टन अथवा वीटावैक्स से प्रति कि.ग्रा. बीज उपचारित करें। बंद कंगियारी के नियंत्रण हेतु थीरम तथा बाविस्टीन/ वीटावैक्स को 1:1 के अनुपात में मिलाकर 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज के लिए प्रयोग करें। प्रजातियां असिंचित एवं सिंचित क्षेत्राें के लिए जौ की छिलका वाली उन्नत प्रजातियां जैसे-अंबर, ज्योति, आजाद, के 141, आरडी 2035, आर.डी. 2052, आरडी 2503, आरडी 2508, आरडी 2552, आरडी 2559, आरडी 2624, आरडी 2660, आर.डी. 2668, आरडी 2660, हरितमा, प्रीती, जागृति, लखन, मंजुला, आरएस 6, नरेंद्र जाै1, नरेंद्र जाै 2, नरेंद्र जाै 3, के 603, एनडीबी 1173, एसओ 12 हैं।बिना छिलके वाली उन्नत प्रजातियां गीतांजलि (के-1149), डीलमा, नरेंद्र जौ 4 (एनडीबी 943)। ऊसरीली भूमि के लिए आजाद, के-141, जे.बी. 58, आर.डी. 2715, आर.डी. 2786, पी.एल. 751, एच.बीएल. 316, एच.बी.एल. 276, बी.एलबी. 85, बी.एल.बी. 56 व लवणीय एवं क्षारीय भूमि के लिए एन.डी.बी. 1173, आर.डी. 2552, आर.डी 2794, नरेन्द्र जौ-1, नरेन्द्र जौ-3 हैं। माल्ट व बीयर के लिए उन्नत प्रजातियां प्रगति, तंभरा, डीएल 88 (6 धारीय), आरडी 2715, डीडब्ल्यूआर 28 व रेखा (2 धारीय) एवं डी.डब्ब्लूू आर. 28 तथा अन्य प्रजातियां जैसे-डी.डब्ल्यूआर.बी.91, डी.डब्ल्यू.आर.यू.बी. 52, बी.एच. 393, पी.एल. 419, पी.एल. 426, के. 560, के.-409, एन.ओ.आरजौ-5 आदि हैं। उर्वरकाें का उपयाेग उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उचित रहता है। असिंचित दशा के लिए एक हैक्टर में 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 20 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करें। सिंचित एवं समय से बुआई के लिए प्रति हैक्टर 60 कि.ग्रा. नाइट्राेजन, 30 कि.ग्रा. फास्फाेरस तथा 20 कि.ग्रा. पोटाश एवं माल्ट प्रजातियाें के लिए 80 कि.ग्रा. नाइट्राेजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 20 कि.ग्रा पोटाश प्रयोग करें। ऊसर एवं विलंब से बुआई की दशा में नाइट्रोजन 30 कि.ग्रा., फॉस्फेट 20 कि.ग्रा. तथा जिंक सल्फेट 20-25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर प्रयोग करें। गेहूँ की फसल की देखभाल बुआई सिंचित/बारानी तथा सीमित सिंचाई व समय से गेहूं की बुआई अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह से प्रारंभ कर दें। गेहूं की बुआई के लिए दिनों का औसत तापमान 21-25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसकी खेती मुखयतः सिंचाई पर आधारित होती है। मिट्टी गेहूं की खेती के लिए दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है, लेकिन इसकी खेती बलुई दोमट, भारी दोमट, मटियार तथा मार एवं कावर मृदा में भी की जा सकती है। साधनों की उपलब्धता के आधार पर हर तरह की भूमि में गेहूं की खेती की जा सकती है। गेहूं दाने की चमक, आकार, स्वाद, और उच्च बाजार भाव के लिये सुप्रसिद्ध है। प्रजातियाँ कम पानी व बारानी क्षेत्राें के लिए गेहूं की कई प्रजातियां विकसित की गई हैं, जिनको उगाकर ऐसे क्षेत्राों के किसान अच्छी उपज व अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। हमेशा उन्नत, नई तथा क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत प्रजातियों का चयन करना चाहिए। असिंचित/बारानी तथा सीमित सिंचाई व समय से बुआई के लिए गेहूं की उन्नत प्रजातियां पी.बीडब्ल्यू. 644, डब्ल्यू.एच. 1080, एच.डी. 2888, एम.ए.सी.एस. 6145, एच.आई. 1531, एच.आई. 8627, एच.आई. 1500, एच.डी. 4672, एच.डब्ल्यू. 2004, एम.पी. 3288, एच.एस. 507, एच.पी.डब्ल्यू. 349, वी.एल. 907, टी.एल. 2942 (ट्रिटिकेल),टी.एल. 2969 (ट्रिटिकेल), एस.के.डब्ल्यू. 196,एच.पी.डब्ल्यू. 251, वी.एल. 829, एच.डी. 2987, एन.आई.ए.डब्ल्यू. 1415, ए.के.डी.डब्ल्यू. 2997-16, एच.डी. 2781, सी,-306 के-8962, के-9465 मालवीय-533 एच.डी.-3338, एवं अमर अच्छी हैं। बीज गेहूं की प्रति हैक्टर बुआई के लिए 125 प्रति कि.ग्रा. बीज एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी 23 सें.मी. तथा बीज की गहराई 5-7 सें.मी. रखनी चाहिए। उर्वरकाें का उपयाेग उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उचित रहता है। असिंचित/बारानी तथा सीमित सिंचाई व समय से बुआई के लिए 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा 20 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करें। खरपतवार नियंत्रण रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण सुगम एवं आर्थिक दृष्टि से लाभदायक होता है। गेहूं बोने के तीन दिनों के अंदर पेन्डिमेथिलीन की 1000 मि.ली. प्रति हैक्टर मात्रा को 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से चौड़ी पत्ती एवं घासवर्गीय खरपतवार नियंत्रित हो जाते हैं। मेट्रिब्यूजिन की 175 ग्राम मात्राा प्रति हैक्टर की दर से 500 लीटर पानी में घोलकर बोने के 25-30 दिनों बाद प्रयोग करें अथवा सल्फोसल्फ्यूरॉन की 25 ग्राम मात्रा का 250-300 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें अथवा 25 ग्राम सल्फोसल्फ्यूरॉन + 4 ग्राम मेटासल्फ्यूरान मिथायल को 250-300 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टर में प्रयोग करें। रसायनों का छिड़काव खिली धूप वाले दिनाें जब हवा की गति बहुत कम हो, तभी करें। संस्तुत मात्रा से कम या ज्यादा रसायनों के प्रयोग से फसल को हानि हो सकती है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001