<h3 style="text-align: justify;">चने की फसल की देखभाल</h3> <p style="text-align: justify;">चना एक शुष्क एवं ठण्डे जलवायु की फसल है जिसे रबी मौसम में उगाया जाता है। चने की खेती के लिए मध्यम वर्षा (60-90 सें.मी. वार्षिक वर्षा) और सर्दी वाले क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त है। इसकी खेती के लिए 24-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उचित माना जाता हैं। फसल में दाना बनते समय 30 डिग्री सेल्सियस से कम या 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान हानिकारक रहता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">मिट्टी </h4> <p style="text-align: justify;">चने की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं जैसे-बलुई, दोमट से चिकनी या गहरी दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जा सकती है। उचित जल निकास तथा मध्यम उर्वरता वाली मृदा जिसका पी-एच मान. 6.5 से 7.5 हो, चने की अच्छी फसल लेने के लिए सर्वथा उपयुक्त होती है। एक गहरी जुताई के बाद हैरो तथा पाटा लगाने से बुआई के लिए खेत तैयार हो जाता है। असिंचित अवस्था में मानसून शुरू होने से पूर्व गहरी जुताई करने से रबी के लिए भी नमी संरक्षण होता है। एक जुताई मृदा पलटने वाले हल तथा 2 जुताई देसी हल से की जाती है। फिर पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है। चने के खेती के लिए मृदा का बारीक होना आवश्यक नहीं है, बल्कि ढेलेदार खेत को ही इसकी उत्तम फसल के लिए अच्छा माना जाता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h4> <p style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। चने की अच्छी फसल के लिए प्रति हैक्टर 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन और 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस का प्रयोग बुआई के समय करना चाहिए। गंधक की कमी वाली मृदा में 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हैक्टर तथा जस्ते की कमी वाली मृदा में 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर का प्रयोग लाभकारी होता है। चने की बुआई पंक्तियों में करनी चाहिए तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सें.मी. होनी चाहिए। यह आवश्यक है कि बीज जमीन में लगभग 10 सें.मी. की गहराई में डाला जाए। बीज की गहराई कम करने से उकठा रोग अधिक लगता है। पछेती बुआई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 22.5 सें.मी. रखनी चाहिए। दलहनी फसल होने के कारण चने के बीज को उचित राइजोबियम टीके से उपचारित करने से लगभग 10-15 प्रतिशत अधिक उपज मिल सकती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए 2.5-3.0 लीटर पेन्डीमीथिलिन को 650 लीटर पानी प्रति हैक्टर की दर से घोलकर बुआई के 2-3 दिनों के अंदर अंकुरण से पूर्व छिड़काव करने से 4 से 6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते हैं। चौड़ी पत्ती तथा घास वाले खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिये एलाक्लोर की 4 लीटर या फ्रलूक्लोरोलिन (45 ई.सी.) नामक रसायन की 2.22 लीटर मात्रा को 700 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरन्त बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव कर देना चाहिए। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3> उन्नत प्रजातियां</h3> <p style="text-align: justify;">भारत के विभिन्न क्षेत्राें व परिस्थितियों के लिए अनुमोदित चने की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा 3043, बीे.जी.डी. 111-1, पूसा 5028, पूसा हरा चना 112, पूसा 256, पूसा 391, पूसा 362, पूसा 372, पूसा 329, पूसा धारवाड़ प्रगति, पूसा 1103, राधे, डी.सी.पी. 92-3, पी.जी-114, टी-3, के-468, जे.जी. 315, जे.जी.-11, जे.जी.-14, जे.जी.-16, जे.जी. 315, जी.एन.जी. 663, जी.एन.जी. 1488, जी.एन.जी. 1499, जी.एन.जी. 1581, जी.एन.जी. 1958, जी.एन.जी. 2144, जीएन.जी. 2171, जी.एन.जी. 2207 (अवध), सी.एस.जी. 515, के.जी.डी.1168, डी.सीपी. 92-3, आर.एस.जी. 963, वरदान, प्रगति, अवरोधी, पन्त चना 186, पन्त जी 114, जी.पी.एपफ. 2, सम्राट, अनुभव, राज विजय ग्राम 201 पंत चना-3, पंत चना-4 हैं। ऊसर क्षेत्र के लिए करनाल चना-1 एवं काबुली चने की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा 2085, पूसा 5023, पूसा चमत्कार, पूसा 2024, पूसा 1108, पूसा 1105, पूसा 1088, पूसा 3022, पूसा शुभ्रा (बी.जी.डी. 128), पूसा काबुली 1003, आ.वी.जी. 203, जेजी.के. 1, आई.सी.सी.वी. 32, जवाहर चना 1, सुभ्रा, उज्ज्वल, सदाबहार, के-4, के-5, एल-550 तथा काक-2, पंत काबुली चना-2,जी.एन.जी. 1969, काबुली-1292 अच्छी किस्में हैं। ये प्रजातियां 145-150 दिनों में पक जाती हैं। चने की बुआई का उचित समय उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानी क्षेत्राों में बारानी दशाओं में अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा तथा सिंचित दशाओं में नवंबर का प्रथम पखवाड़ा है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="192" height="168" /></p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">मटर की फसल की देखभाल</h3> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <p style="text-align: center;"><strong>मटर</strong></p> <p style="text-align: justify;">मटर की बुआई का उपयुक्त समय अक्टूबर के अंत से लेकर 15 नवंबर तथा मध्य भारत के लिए अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा है। भारत के विभिन्न क्षेत्राें व परिस्थितियों के लिए अनुमोदित मटर की उन्नत प्रजातियों जैसे-पूसा प्रभात, पूसा पन्ना, पूसा मुक्ता, एच.यू.डी.पी. 15, सपना, वी.एल. मटर 42, वी.एल. मटर 45, वी.एल. मटर 47, एस.केएन.पी. 04-9, रचना, अपर्णा, मालवीय मटर-2, मालवीय मटर-15, पन्त मटर-25,पन्त मटर-13, पन्त मटर-14, पन्त मटर-43, पन्त मटर-74, एच.एफ.पी. 9426, एच.एफपी. 907, एच.एफ.पी. 8713, एच.एफ.पी. 8909, एच.एफ.पी. 5239, शिखा, अमन, प्रकाश, विकास, आई.पी.एफ. 99-25, के.पी.एम.आर. 522 (जय), के.पी.एम.आर. 400 (इन्दिरा), आई.पी.एफ. 4-9, आई.पी.एफ.डी. 1-10, आई.पी.एफ.डी. 10-12, जे.पी-885, आदर्श, अम्बिका, गोमती, एच.पी.एफ.-529, एच.पी.एफ.-715 की बुआई माह के दूसरे पखवाडे़ में करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="274" height="148" /></p> </td> </tr> </tbody> </table> <h4>जलवायु एवं मिट्टी</h4> <p style="text-align: justify;">मटर की अच्छी फसल लेने के लिए शुष्क एवं ठंडी जलवायु अधिक उपयुक्त होती है। इसकी अच्छी फसल लेने के लिए उचित जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मृदा अधिक उपयुक्त होती है। अच्छी फसल लेने के लिए एक जुताई मृदा पलट हल से तथा दो से तीन जुताइयां कल्टीवेटर या हैरो से करके खेत में पाटा लगाकर समतल एवं ढेलेरहित कर लें।</p> <h4 style="text-align: justify;">मृदाजनित एवं बीजजनित रोगों के नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">मृदाजनित एवं बीजजनित रोगों के नियंत्रण के लिए जैव कीटनाशी ट्राइकोडर्मा विरडी 1 प्रतिशत डब्ल्यूपी. अथवा ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. की 2.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर 60-75 कि.ग्रा. सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिनों तक छाया में रखने के उपरांत बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से मटर के बीज प्रति मृदाजनित रोगों का नियंत्रण हो जाता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा एवं उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">मटर के छोटे दाने वाली प्रजातियों के लिए बीज दर 50-60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तथा बड़े दाने वाली प्रजातियों के लिए 80-90 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर पर्याप्त है। मटर की बुआई से पूर्व मृदा एवं बीजजनित कई कवक एवं जीवाणजुनित रोग होते हैं, जो अंकुरण तथा इसके बाद बीजों को काफी क्षति पहुंचाते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण तथा स्वस्थ पौधों की पर्याप्त संख्या के लिए बीजों को कवकनाशी उपचारित करने की सलाह दी जाती है। बीजजनित रोगों के नियंत्रण के लिए थीरम 75 प्रतिशत + कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत (2:1) 3.0 ग्राम, अथवा ट्राइकोडर्मा 4.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित कर बुआई करना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h4> <p style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाए। सामान्य दशाओं में मटर की फसल के लिए नाइट्रोजन 15-20 कि.ग्रा., फॉस्फोरस 40 कि.ग्रा., पोटाश 20 कि.ग्रा. तथा गंधक 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है। मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने पर 15-20 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर तथा 1.0-1.5 कि.ग्रा. अमोनियम मॉलीब्डेट के प्रयोग की संस्तुति की जाती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवार की समस्या का नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">पौधों की पंक्तियों में उचित दूरी खरपतवार की समस्या के नियंत्रण में काफी सहायक होती है। एक या दो निराई-गुड़़ाई पर्याप्त होती है। पहली निराई प्रथम सिंचाई के पहले तथा दूसरी निराई सिंचाई के उपरांत ओट आने पर आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। मटर की फसल में खरपरवार नियंत्रण के लिए पेन्डिमेथिलीन 0.75-1.00 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर का बुआई के तुरंत बाद किन्तु जमाव के पूर्व अथवा बासालिन (0.75-1.0 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर) का बुआई के पहले 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव खरपतवार नियंत्रण के लिए लाभप्रद है। </p> <p style="text-align: justify;">बुआई के 25-30 दिनों बाद एक निराई-गुड़़ाई अवश्य कर दें। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए फ्लूक्लोरलीन 45 प्रतिशत ई.सी. की 2.2 लीटर मात्रा प्रति हैक्टर लगभग 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त पहले मृदा में मिलानी चाहिए। अथवा पेण्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर अथवा एलाक्लोर 50 प्रतिशत ई.सी. की 4.0 लीटर मात्राा का प्रति हैक्टर उपरोक्तानुसाक पानी में घोलकर फ्लैट फैन नोजिल से बुआई के 2-3 दिनों के अंदर समान रूप से छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">मसूर की फसल की देखभाल</h3> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <p style="text-align: center;"><strong>मसूर</strong></p> <p style="text-align: justify;">मसूर की उन्नत प्रजातियों जैसे-पूसा वैभव, पूसा मसूर 5, पूसा शिवालिक, गरिमा, वी.एल. मसूर 507, वी.एल. मसूर 1, वी.एल. मसूर 4, वी.एल. मसूर 103, वी.एल. मसूर 125, वी.एल. मसूर 126, वी.एल. मसूर 129, पंत मसूर 5, पंत मसूर 6, पंत मसूर 7, एच.यू.एल. 57, शालीमार मसूर 1, अरुण मल्लिका, नरेन्द्र मसूर 1, के.एल. 218, डब्ल्यू.बी.एल. 77, आई.पी.एल. 406, आई.पी.एल. 81, एल.एच. 89-48, शेरी, डी.पी..एल.15, आई.पी.एल. 220, आई.पी.एल. 526, आई.पी.एल. 321, आई.पी.एल. 315, आई.पी.एल. 316, जवाहर मसूर 3, जेएल.1 अरुण मल्लिका, सपना, प्रिया, शेरी की बुआई करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="202" height="177" /></p> </td> </tr> </tbody> </table> <h4>बुआई का समय</h4> <p style="text-align: justify;">मसूर की बुआई का उचित समय उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्राों में अक्टूबर के अंत मेंनतथा उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों व मध्य क्षेत्र में नवंबर का दूसरा पखवाड़ा है। पन्तनगर जीरोटिल सीडड्रिल द्वारा मसूर की बुआई अधिक लाभप्रद है। 10 कि.ग्रा. बीज को एक पैकेट 200 ग्राम राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम कल्चर से उपचारित करके बोना चाहिए। विशेषकर उन खेतों में जिनमें पहले मसूर न बोई गयी हो। बीजोपचार एवं रासायनिक उपचार के बाद बीजोपचार किया जाय। इसके अतिरिक्त फॉस्फेट सोल्बुलाइजिंग बैक्टीरियल कल्चर का प्रयोग पौधों को फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाता है, और उत्पादन अच्छा होता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा</h4> <p style="text-align: justify;">मसूर के बड़े दानों वाली प्रजातियों के लिए बीज दर 55-60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तथा छोटे दानों वाली प्रजातियों के लिए बीज दर 40-45 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर उचित है। बीजजनित रोग से बचाव के लिए थीरम 2.5 ग्राम या जिंक मैग्नीज कार्बोनेट 3.0 ग्रा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीज को बोने से पूर्व शोधित कर लेना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h4> <p style="text-align: justify;">मसूर की फसल में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुति के आधार पर करना चाहिए। मसूर की बुआई से पूर्व 15-20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हैक्टर की दर से संस्तुत है। यदि डीएपी उपलब्ध है, तो इसकी 100 कि.ग्रा. मात्रा तथा सल्फर 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तत्व का प्रयोग करें। सल्फर की पूर्ति 200 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर जिप्सम से भी की जा सकती है। यदि मृदा में नमी कम है तो खाद की मात्रा कम कर देना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और बिपिन कुमार ’सस्य विज्ञान संभाग एवं जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001</p>