<h3 style="text-align: justify;">बुआई का उपयुक्त समय </h3> <p style="text-align: justify;">सामान्य स्थितियों में मटर की बुआई का उपयुक्त समय अक्टूबर के अंत से लेकर 5 नवम्बर तथा मध्य भारत के लिए अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा है।</p> <h3 style="text-align: justify;">उन्नत प्रजातियां</h3> <p style="text-align: justify;">भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों व परिस्थितियों के लिए अनुमोदित मटर की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा प्रभात, पूसा पत्ता, एच-यूडी.पी. 5, सपना, वी;एल. मटर 42, वी.एल. मटर 45, 'पी.-885 एवं सपना प्रजातियों की बुआई माह क॑ दूसरे पखबाड़े में करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC1.jpg" width="180" height="158" /></p> <h3 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा</h3> <p style="text-align: justify;">मटर के छोटे दाने वाली प्रजातियों क॑ लिए बीज दर 50-60 कि-ग्रा. प्रति हैक्टर तथा बड़े दाने वाली प्रजातियों के लिए 80-90 कि.आ. प्रति हैक्टर पर्याप्त होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कवक एवं जीवाणुजनित रोग </h3> <p style="text-align: justify;">मटर की बुजाई से पूर्व मृदा एवं बीजजनित कई कवक एवं जीवाणुजनित रोग होते हैं, जो अंकुरण होते समय तथा इसके बाद बीजों को काफी क्षति पहुंचाते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीज उपचार</h3> <p style="text-align: justify;">अच्छे अंकुरण तथा स्वस्थ पौधों को 'पर्वाप्त संख्या के लिए बीजों को कवकनाशी से बीज उपचारित करने की सलाह दी जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीजजनित रोगों का नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">बीजजनित रोगों के नियंत्रण के लिए थीरम 75 प्रतिशत + का्बन्डाजिम 50 प्रतिशत (2४) 3/0 ग्राम, अथवा ट्राइकोडर्मा 4.0 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधित कर बुआई करनी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत: खेती पत्रिका, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीन कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग और अमन सिंह शोध छात्र, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या-224229 (उत्तर प्रदेश)</p>