पाला इस माह में पाला पड़ने की पूरी आशंका होती है और फलदार पौधे, जो कि पाले के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं, उनके बागानों में बचाव के उपाय करने चाहिए। पाला प्रबंधन शुरू की अवस्था यानी नए बागानों में अधिक जरूरी होता है। सिंचाई के साथ-साथ, घास-फूस अथवा फसल अवशेष या पॉलीथीन से नए छोटे पौधों को ढककर रखना चाहिए। पाले से बचने के लिए सल्फरयुक्त रसायन जैसे-डाइमिथयाइल सल्फोऑक्साइड का 0.2 प्रतिशत अथवा 0.1 प्रतिशत थायो यूरिया का छिड़काव लाभप्रद होता है। सिंचाई आंवला, अमरूद, केला, पपीता, बेर, नीबू, हल्दी और अदरक आदि की आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। आवंला के फल की तुड़ाई एवं विपणन की व्यवस्था करें। अमरुद आवश्यकतानुसार पौधों में नियमित सिंचाई करें। अमरूद में सिंचाई प्रबंधन के साथ-साथ तैयार फलों को सही समय पर तुड़ाई कर बाजार में भेजें या प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के लिए इनको ठीक प्रकार से प्रयोग करें। अमरूद की फसल में फल-मक्खी के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस 1.5 मि.ली. या साइपरमेथ्रिन 2.0 मि.ली. प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर फल परिपक्वता के पूर्व 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें। प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा बगीचे में फल मक्खी के वयस्क नर को पफंसाने के लिए पफेरोमोन ट्रैप लगाने चाहिए। आम आम के बागानों में उत्तम परागण के लिए मधुमक्खी-पालन के डिब्बों को लगाना चाहिए, इससे फल का विकास भी अच्छा होता है। आवश्यकतानुसार पौधों में नियमित सिंचाई करें। आम के बागों की साफ-स़फाई करें। 10 वर्ष या इससे ज्यादा उम्र के पेड़ों में प्रति पेड़ 750 ग्राम फॉस्फोरस और कि.ग्रा पोटाश थालों में दें। मिलीबग कीट की रोकथाम के लिए तने के चारों तरफ 2 फुट की ऊंचाई पर 4 सौ गेज वाली 30 सें.मी. पॉलीथीन की शीट की पट्टी बांधें। आम में गुच्छा रोग से ग्रसित पुष्प गुच्छों को इस माह में नष्ट करें। आम में मिलीबग से बचने के लिए रोग निरोधक के तौर पर तने के निचले हिस्से में 20 सें.मी. 400 गेज की पॉलीथीन को ग्रीस के साथ लगा देना चाहिए। मधुआ कीट एवं पाउडरी मिल्ड्यू के नियंत्रण के लिए मंजर निकलने के समय बाविस्टिन कैराथेन या बाविस्टिन (0.2 प्रतिशत) तथा इमिडाक्लोरोप्रिड या मोनोक्रोटोपफॉस (0.05 प्रतिशत) का पहला ऐहतियाती छिड़काव करें। बेर बेर के फलों को गिरने से रोकने के लिए सुपरफिक्स हार्मोन 1.1 मि.ली. प्रति 4.5 लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करें। आंवला आंवले की फसल में तुड़ाई उपरांत फलों को डाइफोलेटान (0.15 प्रतिशत), डाइथेन एम-45 या बाविस्टीन (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करके भंडारित करने से रोग की रोकथाम की जा सकती है। अनार अम्बे बहार अनार के लिए पाे षक तत्व प्रबंधन के लिए 600-700 ग्राम नाइट्रोजन, 200-250 ग्राम फाॅस्फोरस और 200-250 ग्राम पोटाश प्रति पेड़ प्रति वर्ष प्रयोग करना चाहिये। पपीता पपीता की फसल में वृक्षारोपण के छः महीने के बाद प्रति पौधा उर्वरक देना चाहिए। नाइट्रोजन 150 -200 ग्राम, फॉस्फोरस 200-250 ग्राम, पोटेशियम 100-150 ग्राम। तीनों उर्वरक 2-3 खुराक में वृक्ष लगाने से पहले फूल आने के समय तथा फल लगने के समय दे देनी चाहिए। लीची लीची की फसल में मंजर आने के 30 दिनों पहले पौधों पर जिंक सल्फेट (2 ग्राम/लीटर) के घोल का पहला एवं 15 दिनों बाद दूसरा छिड़काव करने से मंजर एवं फूल अच्छे होते हैं। लीची में मिलीबग कीट के नियंत्रण के लिए प्रति वृक्ष 200-250 ग्राम मिथाइल पैराथियान का बुरकाव पेड़ के एक मीटर के घेरे में कर दें। पिफर पेड़ के तने पर जमीन से 30-40 सें.मी. की ऊंचाई पर 400 गेज वाली एल्काथीन की 30 सें.मी. चौड़ी पट्टी सुतली आदि से कसकर बांध दें। उसके दोनों सिरों पर गीली मिट्टी या ग्रीस से लेप कर दें, ताकि मिलीबग नीचे से ऊपर पेड़ पर न चढ़ पाये। हल्दी व अदरक पुराने बागों में अंतरासस्य के रूप में हल्दी व अदरक की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। अंगूर अंगूर के नए गड्ढों की भराई करें तथा प्रत्येक गड्ढे में 10 कि.ग्रा. कम्पोस्ट, 100 ग्राम डी.ए.पी. और 75 ग्राम सल्फेट ऑफ पोटाश डालें तथा उस पर धरातल से 3-4 मीटर पॉलीथीन चढ़ा दें। स्त्रोत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अजय कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012