<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;">जून माह जिसे आप ज्येष्ठ-आषाढ़ भी कहते है भयंकर गर्मी लेकर आता है । चारों दिशाओं में पानी व बिजली की कमी महसूस होती है । मानव तो गन्ने व आम का रस या तरबूज से अपनी प्यास बूझा लेता है परन्तु धरती व फसलें इंतजार करती है मॉनसून के आगमन का जोकि जून अन्त तक दस्तक दे देती है फिर चारों तरफ बहार ही बहार छा जाती है । सभी नापतौल प्रति एकड़ हिसाब से है ।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593f93893e92894b902-915947-93293f90f-92e94c93892e-90692793e93093f924-91594393793f-93893293e939/92e93e93993593e930-91594393793f-91593e93094d92f/soyabeencrop.jpg" width="319" height="214" /></p> <p style="text-align: justify;">महीने के प्रमुख कृषि कार्य</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>इस महीने में धान का रोपा लगाया जाता है - छत्तीसगढ़ जिसे धान का कटोरा कहा जाता है, वहाँ धान बड़े पैमाने में लगाया जाती है।</li> <li>सभी धनहा खेतों को बंधान बाँध दिया जाता है ताकि नमी हो। वर्षा होने के बाद खेत जोतकर बोनी करते हैं।</li> <li>हरा चारा ताकी लगातार मिले इसीलिए ज्वार, मक्का, ग्वार, लोबिया, संकर नेपियर घास फसलों की बुवाई करते रहते हैं।</li> <li>जो फसले बोई गयी है, उसकी सिंचाई करते रहते हैं।</li> <li>मक्का, बाजरा, ज्वार, लोबिया की फसल, जो मार्च-अप्रैल में बोई गयी थी, उसकी कटाई करते हैं। मक्का को सूत आने पर काटते हैं। बाजरा को, जब बाली कोथ में हो, तब कटाई की जाती है। लोबिया और ज्वार की कटाई फूल आने पर की जाती है।</li> <li>इस महीने में बारिस की जरुरत से ज्यादा पानी को खेत से निकालने का व्यवस्था करते हैं।</li> <li>धान की रोपा लगाने के बाद उसी खेत में सवई, ढेंचा की बोनी हरी खाद के लिए करते हैं।</li> <li>ऐसी जमीनों में, जहाँ पानी नहीं रुकता, धान की खेती नहीं करते हैं। वहाँ दलहन, तिलहन फसलों के बोनी की जाती है इस महीने में।</li> <li>धान के खेत की मेड़ों पर अरहर या चारावाली फसलों की बोवाई करते हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">कृषि में ध्यान देने योग्य बातें</h3> <p style="text-align: justify;">जल संग्रहण - जीवित प्राणियों में चाहे पशु हो या पौधे जल की मात्रा तीन-चौथाई से अधिक होती है । ये मात्रा कम होने से जीवन का ह्रास होना शुरू हो जाता है तथा ज्यादा देर तक पानी की कमी से जीवन समाप्त हो सकता है । इसलिए पानी की प्रत्येक बूंद अमूल्य है चाहे ये वर्षा से, नदी से या जमीन से प्राप्त हो, इसे बर्बाद न करें । वर्षा के पानी को तालाबों में ले जाकर जमा करें एवं खेती के लिए प्रयोग करें ।</p> <p style="text-align: justify;">नमी संरक्षण</p> <p style="text-align: justify;">गर्मियों में उपलब्ध पानी से अधिक से अधिक कृषि पैदावार लेने के लिए पानी का जमीन से वाष्पीकरण कम करना जरूरूरी हे क्योंकि १/३ पानी इस विधि से उड जाता है मलचिंग करने से वाष्पीकरण बहुत कम हो जाता है और उपलब्ध पानी सिर्फ फसल को ही मिलता है । इससे खेत की मिट्टी का तापमान सही रहता है जिससे पैदावार बढ़ती है ।</p> <p style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/90591c94893593f915-90692693e928/91693092a92493593e930-92893f92f90292494d930923">खरपतवार नियंत्रण</a></p> <p style="text-align: justify;">खरपतवार फसल के मुकाबले शीक्षुधा बढ़ते हैं तथा जमीन में उपलब्ध नमी पोषक तत्वों का उपयोग तेजी से करते है । इससे फसल की बढ़त कम रह जाती है तथा पैदावार में भरी गिरावट होती है । खेती में हने वाले कुल नकसान के लिए ५०-६० प्रतिशत सिर्फ खरपतवार जिम्मेदार हैं । इसलिए समय पर खरपतवार नियंत्रण विशेषकर फसल के पहले ३०-४० दिन बहुत जरूरी है ।</p> <h3 style="text-align: justify;">धान</h3> <p style="text-align: justify;">वासमती धान की नर्सरी जून के पहले पखवाडे में पहले बताई गई विधि से लगायें । बाकि धान की रोपाई १७ जून से शुरू कर दें जिसमें कम व मध्यम अवधि वाली बौनी किस्मों की ३० दिन पुरानी पौध चुने । खेत में पानी देकर अच्छा गारा बनालें फिर सुहागे से समतल कर रोपाई करें । पौध को उखाडने से पहले एक दिन क्यारी में पानी दें तथा ध्यान रहे कि पौध की जड़ों को नुकसान न हो । पानी से धोकर जड़ों से किचड हटालें । पौध को लाइनों में रोपें तथा एक जगह २-३ पौधे ६ x ६ इंच दूरी पर लगायें । पौध सीधी तथा 1 इंच से गहरी नहीं बैठनी चाहिए। खाद, मिट्टी जांच आधार पर डालें। बौनी व मध्यम अवधि वाली किस्मों में एक बोरा यूरिया, ३ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट तथा एक बोरा म्यूरेट आफ पोटाश प्रति एकड़ लेव बनाते समय दें । यह मात्रा कम अवधि वाली किस्मों में थोड़ी कम कर सकते है । यदि खेत में मई माह में हरी खाद के लिए टैंचा बोया है तो उसे ४७ दिन बाद जमीन में दबा दें तथा 1 सप्ताह के बाद धान रोपाई कर दें अन्यथा लेव बनाते समय ६ टन प्रति एकड़ गोबर की खाद दें । यदि टैंचा को फासफोरस टी है तो धान में देने की जरूरत नहीं होती है तथा अनन्य खाद की मात्रा भी २/३ कर सकते हैं । यदि लेव बनाते समय खाद न डाल सके तो ७ दिन के अन्दर भी डाल सकते हैं । रोपाई के १७ दिन बाद पैडीवीडर दवारा निराई की जा सकती है । दवाईयों से भी खरपतवार नियंत्रण कर सकते हैं । दानेदार व्यूटाक्लोर १२ कि.ग्रा. या थायोवैनकार्व ६ कि.ग्रा. पौधरोपण के २-३ दिन बाद तक २ इंच गहरे पानी में एकसार विखेंर दें । यदि उक्त दवाईयां तरल है तो १.२ लीटर के हिसाब से ६० कि.ग्रा. रेत में मिलाकर छिडकें । इसके अतिरिक्त पैडोमेथालिन, एनिलोफास, प्रेटिलाक्लोर, पलुक्लोरालिन 3मी प्रयोवा की जा सकती है । धान के खेत में २ ईचं से ज्यादा पानी नहीं होना चाहिए । रोपाई के ६ से १० दिन बाद जब पौध जड पकड लें, पानी रोक ले ताकि जड़ें विकसित हो जाये । प्रति सप्ताह पानी निकास करके ताजा पानी भरें। सिंचाई का पानी अच्छी किस्म का होना चाहिए ।</p> <p style="text-align: justify;">जून माह में कुछ काडे तथा बिमारियां धान में आक्रमण करती हैं जैसे कि धान के टिड्डे पनीरी और रोपी गई फसल के पत्तों को खाते हैं तथा नियंत्रण के लिए १० कि.ग्रा. मिथाइल पैराथियान २ प्रतिशत घूडा प्रति एकड़ करें । जीवाणु पत्ता अगमारी रोग में पत्तियां पीली पडकर सूख जाती है तथा तने से पीला-सफेद चिपचिपा पदार्थ निकलता है । इसकी रोकथाम के लिए एच.के.आर-१२० और आई आर ६४ किस्में के प्रमाणित बीज लगायें । नेत्रजन खाद की मात्रा कम डालें, अगेती रोपाई न करें तथा नर्सरी को छाया में न उगायें । यदि रोपी गई फसल में पीलापन नजर आये तो लोहे की कमी हो सकती है जिसके लिए ०.७ प्रतिशत फेरस सल्फेट का घोल छिडके । यदि पत्तों पर कथई के रंग के धब्बे नजर आये तो ०.५ जिंक सल्फेट का घोला छिडके ।</p> <h3 style="text-align: justify;">मक्की</h3> <p style="text-align: justify;">खेत में से घासफूस निकाल दें अन्यथा ७० प्रतिशत तक पैदावार कम हो जाती है । नेत्रजन खाद की दूसरी किस्त (आधा बोरा यूरिया) मक्का के तनों के पास रखकर मिट्टी में मिला दें इसके खाद भी लग जायेगी तथा घासफूस भी निकल जायेगा । जून में मक्की को नियमित नमी की जरूरत रहती है तथा पानी खडा भी नहीं रहना चाहिए । जल निकास के लिए पौधों की कतारों के बीच छोटी-छोटी नालियां बनायें । जून माह में तना छेदक का आक्रमण होने पर पौध की गोभ में १०-१० दिन के बाद एण्डोसल्फान ३७ ई.सी.के चार छिडकाव करें । पहले २५० मि.ली., फिर ३७५ मि.ली., फिर तीसरी तथा चौथी बार १०० मि.ली. २००-४०० लीटर पानी में छिडके । चुरडा (थिप्स) व हरा तेला छोटे पौधों के पत्तों का रस चूसता हैं। इसकी रोकथाम के लिए २७० मि.ली. मैलाथियान ७० ईसी २७० लीटर पानी में छिडकें । रोगों की सामुहिक रोकथाम के लिए ७-७ सप्ताह की फसल पर १७० ग्राम कैप्टान और ३३ ग्राम स्टेवल ब्लीचिंग पाऊडर को १०० लीटर पानी में घोलकर पोधों की जड़ों को गीला करें । जब फसल घुटनों तक हो जाये तो पत्तों की अंगमारी व <a href="../../../../../../../health/diseases/अन्य-रोग">अन्य रोग</a>ों के लिए १ किलोग्राम जीनेव या मन्कोजेव का घोल १०-१५ दिनों के अंतर पर छिडकाव करें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">गन्ना</h3> <p style="text-align: justify;">सिंचित भूमि में नेत्रजन खाद की बची हुई मात्रा (एक बोरी यूरिया भी जून के अन्त तक डाल दें । असिंचित भूमि में मानसून शुरू होने पर डालें । इसके तुरंत बाद जून माह में ही गन्ने में भारी मिट्टी चढ़ा दें । जून में सिंचाई १० दिन के अन्तर पर करें । कीट नियंत्रण के लिए अप्रैल व मई माह में बताये तरीके अपनायें । गुरदारसपुर वोरर के हमले वाले गन्ने के बीच के पत्ते सूखने लग जाते है तथा गन्ने बीच में से आसानी से टूट जाते है । ऐसे गन्नो को हर सप्ताह काटकर नष्ट कर दें । ऐसे खेतों में मोढ़ी फसल न लें तथा खाली पडे गन्ने के खेतों की जुताई करके ढूंठ नष्ट कर दें । दीमक यदि सिचाई से काबू न आवे तो २.७ लीटर क्लोरपारीफास ६०० लीटर पानी में मिलाकर छिडके । जून माह में कंडुआ (स्मट) नामक फफूंद रोग बहुत फैलता है । जिसके लिए नम उष्म विधि से उपचारित बीज लगाये तथा रोगी पौधों को निकालकर नष्ट करें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">कपास</h3> <p style="text-align: justify;">कपास जून के पहले सप्ताह तक भी लगाई जा सकती है परन्तु मई की बीजाई कीड़ों से रक्षा करती है । कपास के लिए ४-६ सिंचाईयों की जरूरत पडती है । पहली सिंचाई बीजाई के 1 महिने बाद तथा इसके बाद २-३ सप्ताह के बाद दें । कपास में पानी खडा नहीं रहना चाहिए, इसे तुरंत निकाल देना चाहिए । इससे फसल में अच्छी बढ़ोतरी होगी । यदि नेत्रजन खाद बीजाई के समय नहीं दी है तो एक बोरा यूरिया पौधों को विरला करने पर दे सकते है । कपास में टीमक, पौधे की जड़े काटकर खा जाती है तथा हरा तेला, चुरडा (सिाप) व सफेद मक्खी पत्तों में से रस चूसकर पौधे की बढ़वार तथा उपज कम करती है । रोकथाम के लिए मई माह में बताये तरीके अपनाएं ।</p> <h3 style="text-align: justify;">अरहर, मूंग व उडद</h3> <p style="text-align: justify;">जून में भी अरहर लगाई जा सकती है पूसा बैसाखी (टाईप-४४) मूग जून में भी लगाया जा सकता है । उडद की टी-९ किस्म हरियाणा में तथा मास-33८ व मास १-१ पंजाब में लगाई जा सकती है । कृषि क्रियाएं मई माह में बताई जा चुकी है ।</p> <h3 style="text-align: justify;">तिल</h3> <p style="text-align: justify;">सिंचित अवस्था में जून माह में तिल की फसल लगा सकते है । हरियाणा तिल-१ तथा पंजाब तिल१ लगभग ८० दिन में तैयार हो जाती है तथा ७० प्रतिशत तेल देती है । तिल के लिए अच्छी जल निकास वाली रेतीली-दोमट भूमि अच्छी तरह तैयार करें । १० टन गोबर की खाद प्रति एकड़ काफी होती है । कमजोर मिट्टी में आधा बोरा यूरिया बीजाई के समय डाल सकते है। पौधों में ६ ईचं तथा लाइनों में 1 फुट दूरी रखें । १-२ कि.ग्रा. बीज प्रति एकड़ २ ईचं गहराई पर लगायें । बीज का उपचार थाइरम ३ ग्रा / कि.गा. बीज के हिसाब से करें । हरा तेला के लिए २०० मि.ली. मैलाथियान ७० ई.सी को २०० लीटर पानी में मिलाकर २ सप्ताह के अन्तर पर दो बार छिडके ।</p> <h3 style="text-align: justify;">मूंगफली</h3> <p style="text-align: justify;">सिंचित क्षेत्रों में मूगफली की बीजाई १७ फरवरी से शुरू हो जाती है तथा जून अन्त तक बो देनी चाहिए । बारानी क्षेत्रों में मानसून आने पर जुलाई प्रथम सप्ताह तक बो दें । यह ११०-१३० दिनों में पक जाती हैं । दोमट मिट्टी जिसपर ऊपर रेतीली मिट्टी की तह तथा अच्छा जल निकास वाली भूमि पर मूगफली अच्छी होती है । स्वस्थ्य और मोटी मूगफलियों को बीजाई से १७ दिन पहले हाथ से छील कर ३०० भाग साफ दानों को 1 भाग दवाई थिराम या कैप्टान से उपचारित करें । मूगफली का ३७-६० कि.ग्रा. प्रति एकड़ बीज को २ ईंच गहरा, किस्म के हिसाब से जैसे पंजाब मूगफली-१ के लिए 1 फुट x ९ ईंच दूरी पर, मूगफली हरियाणा-१, ४,एम-१३ व एम-१४७ के लिए ६ ईंच X ६ ईंच दूरी पर लगायें । खाद की पूरी मात्रा ( आधा बोरा अमोनियम सल्फेट, २.५ बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा १/३ म्यूरेट आफ पोटाश तथा १०० कि.ग्रा. जिप्सम) बिजाई के समय ड्रील कर दें । पहली निराई व गुडाई, बिजाई के ३ सप्ताह बाद कर दें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">सोयाबीन</h3> <p style="text-align: justify;">फसल की किस्में ब्रैग, पी.के.४१६, ४७२, ७६४ हरियाणा के लिए - पी.के.४१६ पंजाब के लिए - शिवालिक, ली, ब्रैग, पालम सोया हिमाचल में उपयुक्त पायी गई है । सोयाबीन की बीजाई जून अन्त से लेकर जुलाई शुरू तक हो जानी चाहिए । पलेवा करने के बाद बीजाई करने से अकुरण पर बुरा प्रभाव नही पडता है । ३० कि.ग्रा. बीज को सोयाबीन - राईजाबियम टीका लगाकर १.७ फुट दूरी पर तथा 1 ईंच गहरा लगाये । सोयाबीन और मक्का की मिश्रित खेती भी बहुत लाभदायक है । इसमें 1 फुट की दूरी पर दो सोयाबीन लाईनें फिर 1 लाईन मक्का लगायें । बीजाई के समय आधा बोरा यूरिया तथा ४ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट तथा १०० कि.ग्रा. जिप्सम डालें । खेत में पानी का रूकना हानिकारक होता है ।</p> <h3 style="text-align: justify;">चारा</h3> <p style="text-align: justify;">ज्वार की बीजाई जून में करने से इसके चारे में एच.सी.एन. का जहर कम बनता है तथा इसे खाकर पशु बीमार नहीं होते । बीजाई जून अन्त में करें । मक्चरी को भी २७ जून से १४ जुलाई तक 1 फुट दूर लाईनों में १६ कि.ग्रा. बीज के हिसाब से बीजें । जून में लोबिया व ग्वार भी लगा सकते है । अप्रैल-मई में बोई चारे की फसल में पानी लगा दें ताकि फसल कटाई जल्टी मिल सके ।</p> <h3 style="text-align: justify;">मुलैठी</h3> <p style="text-align: justify;">एक बहुवर्षीय औषध फसल है जिसकी जड़ों से खांसी की दवाई बनती है । जून के अंतिम सप्ताह में यदि अच्छी वर्षा हो जाये तो इसे अच्छे जल निकास वाली भूमि में लगा सकते है , नहीं तो मोनसून आने पर जुलाई-अगस्त में लगायें । बीजाई के लिए लाईनों में ३ फुट तथा पौधों में १.५ फुट दूरी रखें । ३-४ आखों वाले जड के ६ इंच टुकडे के १/४ हिस्से को जमीन से बाहर रखकर वाकी को मिट्टी में दबा में दें और खेत में पानी लगा दें । जड़ गलन से बचाव के लिए जड़ों को वाबस्टीन के घोल में ५-१० मिनट डुबाये तथा फिर पानी से धोकर लगाये । एक एकड़ में १०० कि.ग्रा. जड़ों की रोपाई करें ।</p> <h3 style="text-align: justify;">टुंचा</h3> <p style="text-align: justify;">एक फलीदार फसल है जोकि हरी खाद बनाने के लिए सर्वोत्तम है । पंजाब दैचा-१ किस्म के २० कि.ग्रा. बीज को ८ ईचं दूरी पर लाईनों में लगाये । यदि फसल से बीज बनाना है तो बीज मात्रा आधी तथा पोधों में दूरी दुगुनी कर दें । बीजाई पर १.५ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालें यदि गेहू में फासफोरस दिया है तो इस खाद को न डालें । हरी खाद वाली फसल से ३-४ सिंचाईयां करें तथा ७७-६० दिन बाद मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर हरी खाद बना दें फिर एक सप्ताह बाद अगली फसल लग सकती है ।</p> <h3 style="text-align: justify;">सब्जियाँ</h3> <p style="text-align: justify;">जून महिने में लगी हुई सब्जियों में पानी समय-समय पर देते रहे इससे खूब फल आयेणें । भिण्डी बोने का समय भी हो गया है । पूसा सावनी का ७ कि.ग्रा. बीज प्रति एकड़ १.५ फुट दूर लाईनों में तथा ६ ईंच दूर पौधों में लगायें । मिर्च की पौध भी लगा सकते है, इसकी उन्नत किस्म पूसा ज्वाला है । बैगन की लम्बी किस्मों में पूसा परपल लोग, पूसा परपल कलस्टर , पूसा क्रान्ति है । गोल बैंगन में पूसा परपल राउण्ड, पूसा अनमोल, पंत ऋतुराज है । टमाटर के लिए पूसा रूबी, पूसा अर्ली, सलेक्शन १२०, मारग्लोब प्रमुख है । बुआई के समय 1 बोरा यूरिया, ४ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट, 1 बोरा म्यूरेट आफ पोटाश दें तथा काफी मात्रा में गोबर की खाद दें । पहाडी क्षेत्रों में जून में प्याज की पोध की रोपाई भी ८ ईंच x ४ ईंच दूरी पर कर दें । खेत में १० टन गोबर की खाद तथा एक बोरा यूरिया, ३ बोरा सिंगल सुपर फास्फेट, 1 बोरा म्यूरेट आफ पोटाश बीजाई के समय डाले ।</p> <h3 style="text-align: justify;">बागवानी</h3> <p style="text-align: justify;">जून माह में फलों को आवश्यकतानुसार पानी देते रहे । नींबू में आयु के हिसाब से ७० ग्राम यूरिया एक वर्ष पुराने पेड के लिए तथा हर वर्ष आयु के लिए ७० ग्राम यूरिया प्रति पेड बढ़ा दीजिये । यह मात्रा ७ वर्ष से बडे पेड में २७० ग्राम ही रहेगी । नींबू की सूखी टहनियों को काटकर स्ट्रैप्टोसाइक्लिलान २ ग्राम तथा व्लाइटोक्स २० ग्राम को १० लीटर पानी में मिलाकर १७ दिन में अन्तर में छिडकें । फूल - हल्का पानी नियमित रूप से देते रहें तथा तेज धूप से बचाव रखें । घास के लॉन भी लगा सकते हैं । नए फूलों में पारचूलाका, कैना, सल्विया, पटूनिया, कॉकसकाम्ब लगा सकते हैं । वर्षा ऋतु वाले फूलों की बीजाई भी पूरी कर लें ।</p> <p style="text-align: justify;">स्रोत: जेवियर सेवा संस्थान, राँची</p> </div>