<h3 style="text-align: justify;">गरमा धान</h3> <p style="text-align: justify;">खेतों में जल जमाव बनाए रखने के लिए मेढ को दुरुस्त रखें तथा समय से रोपे गए धान में रोपा के 40 से 45 दिनों बाद यूरिया का दूसरा भुरकाव करें |</p> <h3 style="text-align: justify;">गरमा मूंग</h3> <p style="text-align: justify;">अगर मिट्टी में नमी की कमी हो तो एक हल्की सिंचाई अवश्य करें | सिंचाई के पहले निकाई-गुड़ाई अवश्य करें, ताकि मिट्टी में नमी ज्यादा से ज्यादा दिनों तक रह सके |</p> <h3 style="text-align: justify;">जैट्रोफा</h3> <p style="text-align: justify;">(1) बीजोपचार: जड़ सड़न तथा तना बिगलन के रोकथाम हेतु बीज उपचार 2 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के अनुसार थाइरेम, बेविस्टीन तथा वाइटावेक्स के (1:1:1) मिश्रण को बीज में मिलाकर बोये |</p> <p style="text-align: justify;">(2) बुआई के लिए आर जे – 117, GIE नागपुर और बरमुण्डा अच्छी पाई गई | सरदार कृषि विश्वविद्यालय, बनासकांठा से विकसित एस डी ए यू जे 1 किस्म भी अच्छी है |</p> <h3 style="text-align: justify;">आम</h3> <p style="text-align: justify;">(1) जब तक पौधा फलन में नही आता तब तक पौधे के उचित बढ़वार एवं विकास के लिए सर्दी के मौसम में 15-20 दिनों के अंतराल पर एवं गर्मी में 10 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए |</p> <p style="text-align: justify;">(2) फल मक्खी के वयस्कर कीटों को फंसाने के लिए ट्रैप का इस्तेमाल करें | ट्रैप के लिए गुड़ का शीरा या ताड़ी में 0.2 प्रतिशत काब्रोरिल मिलाकर खुले डिब्बों में पेड़ पर टांग देते हैं |</p> <h3 style="text-align: justify;">लीची</h3> <p style="text-align: justify;">(1) लीची के प्रवर्धन के लिए शाही, चाइना और स्वर्ण रूपा ये किस्में अनुशंषित की जाती हैं |</p> <p style="text-align: justify;">(2) फल तोड़ाई के पश्चात सूखी, रोगग्रसित शाखाओं को कैंची से काट देना चाहिए | पौधों की समुचित देख-रेख, गुड़ाई तथा कीड़े एवं बीमारियों से रक्षा करने से पौधों का विकास अच्छा होता है एवं उपज बढ़ती है |</p> <h3 style="text-align: justify;">केला</h3> <p style="text-align: justify;">(1) गोबर या कम्पोस्ट की सड़ी खाद 20-25 कि.ग्रा. या 2-3 टोकरी तथा 100 ग्रा. बी.एच.सी. प्रति गड्ढा, उपरोक्त पदार्थों को गड्ढे की ऊपर की मिट्टी में मिश्रित करके जमीन की सतह से लगभग 10 से.मी. ऊँचाई तक भरकर सिंचाई कर देनी चाहिए | जिससे मिट्टी मिश्रण गड्ढे में अच्छी तरह से बैठ जाए |</p> <p style="text-align: justify;">(2) पत्ती विटिल के रोकथाम के लिए इन्डोसल्फान 2 मिली अथवा कार्वरिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव फूल आने के तुरन्त बाद तथा दूसरा इसके 15 दिन बाद करना चाहिए |</p> <h3 style="text-align: justify;">अमरुद</h3> <p style="text-align: justify;">10 दिनों के अंतराल पर पौधों पर यूरिया के 15 प्रतिशत घोल का दो छिड़काव कर दिया जाता है, जिससे आने वाले फूल एवं पत्तियाँ गिर जाती हैं | तत्पश्चात पर्णीय शक्ति से हस्त बहार की फसल में अधिक ओजपूर्ण फूल और फल आते हैं | जिससे उपज में वृद्धि होती है |</p> <h3 style="text-align: justify;">आँवला</h3> <p style="text-align: justify;">छालभक्षी कोट के प्रबंधन के लिए बाग़ को साफ़-सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए | समय-समय पर बागों में जाकर नये सूखे प्ररोहों की जाँच करनी चाहिए ताकि समय रहते ही इस कीट का पता लग जाए | प्रकोप के शुरुआत में ही, आवासीय छिद्रों को साफ़ कर, उनमें तार डाल कर लार्वे को नष्ट कर देना चाहिए |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">नींबू वर्गीय फल</h3> <p style="text-align: justify;">उर्वरक की आधी मात्रा नये कल्ले निकलने के समय तथा आधी मात्रा फल लगने के बाद देने से अच्छी उपज मिलती है |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">अन्य फल</h3> <p style="text-align: justify;">इमली, शरीफा, चीकू, कमरख, बेल, चिरौंजी इत्यादि में नियमित काट-छाट की आवश्यकता कम पड़ती है |</p> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">पशुपालन</h3> <p style="text-align: justify;">घाव में कीड़े पड़ने पर सबसे पहले घाव के आस पास बालों को काट कर साफ़ किया जाता है फिर जहाँ तक हो सके कीड़े को निकाल कर केरोसिन तेल में डुबो कर मार देना चाहिए | घाव को साफ़ करने के बाद उसमें तारपीन के तेल से भिंगोया हुआ कपड़ा घाव के अंदर तक प्रवेश कराकर 8-12 घंटे पट्टी बांधकर छोड़ देना चाहिए | जब तक सारे कीड़े नहीं मर जाते घाव ठीक नहीं होता है |</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593f93893e92894b902-915947-93293f90f-92e94c93892e-90692793e93093f924-91594393793f-93893293e939/91593f93893e928-91594393793f-92a90291a93e902917/April.jpg" /></p> <p style="text-align: justify;"><strong><em>स्त्रोत: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)</em></strong></p>