<h3 style="text-align: justify;">गेहूँ</h3> <p style="text-align: justify;">गेहूँ की समय पर बुआई के लिए (सिंचित क्षेत्र): के 9107 (देवा), एच.यू.डब्लू-468 बिरसा गेहूँ 3 समय पर बुआई के लिए (असिंचित क्षेत्र): के 9107 (देवा) देर से बुआई के लिए (सिंचित क्षेत्र): एच.यू. डब्लू – 234, डी.व्ही.डब्लू 14 की अनुशंषा की जाती है |</p> <h3 style="text-align: justify;">जैट्रोफा</h3> <p style="text-align: justify;">कीट नियंत्रण: कोमल पौधों में कटुवा (सुंडी) तने को काट सकता है | इसके लिए लिन्डेन या फ़ॉलीडॉल धूल का सूखा पाउडर भूरकाव से नियंत्रित किया जा सकता है | माइट के प्रकोप से बचाव के लिए 1 मि.ली. मेटासिस्टॉक्स दवा को 1 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें |</p> <h3 style="text-align: justify;">संकर धान</h3> <p style="text-align: justify;">शीथ ब्लाइट की रोकथाम के लिए हेक्साकोनाजोल (कोंटाफ) 0.2% या र्वलीडामायसीन का 0.25% का छिड़काव करें |</p> <h3 style="text-align: justify;">चना</h3> <p style="text-align: justify;">(1) समय पर बुवाई के लिए प्रति हेक्टर में लगभग 70 किलोग्राम (100 दानों का वजन लगभग 15 ग्राम) या 90 किलोग्राम (100 दानों का वजन लगभग 25 ग्राम) बीज दर रखनी चाहिए | देर से बुवाई के लिए बीज की मात्रा 20% अधिक रखनी चाहिए |</p> <p style="text-align: justify;">(2) उकठा रोग से बचाव के लिए वीटावेक्स फफूंदीनाशक तथा ट्राइकोडर्मा फफूंद के साथ मिलाकर बीज का उपचार करना चाहिए तथा खड़ी फसल में 1 ग्राम बैविस्टीन को एक लीटर पानी (0.1%) में घोलकर पौधों की जड़ के पास छिड़काव करना चाहिए |</p> <h3 style="text-align: justify;">तीसी</h3> <p style="text-align: justify;">(1) बुआई के लिए टी 397 तथा श्वेता इन किस्मों की अनुशंषा की जाती है |</p> <p style="text-align: justify;">(2) असिंचित अवस्था में बोआई मध्य अक्टूबर में करें, अन्यथा बीज अंकुरण में नमी की कमी बाधा बन जाती है | यदि खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध हो तो बोने की अवधि मध्य नवम्बर तक बढ़ाई जा सकती है | सिंचित अवस्था में इसकी बुआई मध्य नवम्बर तक की जा सकती है |</p> <h3 style="text-align: justify;">राई-सरसों</h3> <p style="text-align: justify;">(1) राई: राई की अधिक उपज देने वाली किस्में क्रमश: शिवानी, पूसा बोल्ड, कान्ति, पूसा महक, पूसा अग्रणी एवं वरुणा है | इस राज्य में शिवानी सिंचित एवं असिंचित अवस्था दोनों के लिए उपयुक्त हैं |</p> <p style="text-align: justify;">(2) राई (सिंचित अवस्था में): 80:40:20:40 किलोग्राम नेत्रजन: फ़ॉस्फोरस: पोटाश: तथा सल्फर प्रति हेक्टर की दर से तथा असिंचित अवस्था में 40:20:20:20 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से देना उत्तम है |</p> <h3 style="text-align: justify;">सरगुजा</h3> <p style="text-align: justify;">चूर्णी फफूंद रोग से फसल को बचाने के लिए 0.3% सल्फेक्स का छिड़काव करना चाहिए |</p> <h3 style="text-align: justify;">आलू</h3> <p style="text-align: justify;">अधिक उपज प्राप्त करने के लिए 120 किलोग्राम नेत्रजन, 100 किलोग्राम स्फुर, 100 किलोग्राम पोटाश तथा 24 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टर की दर से रासायनिक खाद के साथ प्रयोग करें |</p> <h3 style="text-align: justify;">आम</h3> <p style="text-align: justify;">(1) बगीचों में खरपतवार नियंत्रण हेतु जुताई करें |</p> <p style="text-align: justify;">(2) छोटे पौधों को पाला से बचाने के लिए नियमित सिंचाई करें |</p> <h3 style="text-align: justify;">लीची</h3> <p style="text-align: justify;">लीची की मकड़ी (लीची माइट) के रोकथाम के लिए समय-समय पर ग्रसित पत्तियों एवं टहनियों को काटकर जला देना चाहिए | नई कोपलों के आगमन के समय केलथेन या फ़ॉसफामिडान (1.25 मि.ली./लीटर) का घोल बनाकर 7-10 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव लाभप्रद पाया गया है |</p> <h3 style="text-align: justify;">केला</h3> <p style="text-align: justify;">पौधों के नीचे पुआल अथवा गन्ने की पत्ती की 8 सेंमी मोटी पर्त् बिछा देनी चाहिए | इससे सिंचाई की संख्या में 40 प्रतिशत की कमी हो जाती है, खरपतवार नहीं उगती तथा उपज एवं भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ जाती है |</p> <h3 style="text-align: justify;">अमरुद</h3> <p style="text-align: justify;">तना वेधक कीट के रोकथाम के लिए तनें के छिद्रों को साफ़ कर नुवान (2 मि.ली./ली. पानी) के घोल में रुई भिगों कर छिद्रों में भर कर गीली मिट्टी से बंद कर देते हैं |</p> <h3 style="text-align: justify;">काजू</h3> <p style="text-align: justify;">काजू के पौधों को प्रारंभिक अवस्था में अच्छा ढांचा देने की जरूरत होती है | उपयुक्त काट-छांट के द्वारा पौधों को अच्छा ढांचा के तत्पश्चात फसल तोड़ाई के बाद सुखी, रोग एवं कीट ग्रसित शाखाओं को कैंची से काटते रहें |</p> <h3 style="text-align: justify;">पशुपालन</h3> <p style="text-align: justify;">थैलेरियोसिस बेरीनील – 5 ग्राम दवा में 15 मि.ली. पानी घोलकर 5 मि.ली. प्रति 100 किलो शरीर भार पर मांस में सूई दें | सूई ऑक्सीटेट्रासाइक्लीन 15 से 20 मि. ग्राम की दर से नस में 5 -7 दिन तक सूई दें |</p> <p style="text-align: justify;"> </p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्त्रोत:</strong><a class="ext-link-icon" title="अधिक जानकारी के लिए" href="https://www.nabard.org" target="_blank" rel="noopener"> राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)</a></p>