चना (1) यूरिया 2% घोल का छिड़काव फली बनते समय 10 दिनों के अंतराल पर दो बार सायंकाल के समय करना चाहिए। इससे चने की उपज में भरपूर वृद्धि होती है। (2) चना की फसल को फली भेदक कीट से सर्वाधिक नुकसान होता है फली भेदक का प्रकोप देर से बोई जाने वाली फसल में अपेक्षाकृत अधिक होता है कीट नियंत्रण के लिए 0.07% एन्डोसल्फान 35 ई.सी. (2 मिलीलीटर प्रतिलीटर पानी) घोल का 10 दिनों के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करना चाहिए। चने की खेती और वैज्ञानिक बुवाई तकनीक | देखिए यह विडियो तीसी पाऊडरी मिल्ड्यू रोग नियंत्रण के लिए 3 ग्राम सल्फेक्स प्रति लीटर पानी में घोल कर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार छि़ड़काव करें। फली मक्खी कीटके नियंत्रण के लिए एमिडाक्लोप्रीड 17.8 का 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर फली बनने से पहले 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें । राई-सरसों रोग-नियंत्रण: सफेद रतुआ, धब्बा रोग एवं स्टॅग हेड रोग प्रमुख हैं। इनके नियंत्रण हेतु इंडोफिल एम-45 फफूंदीनाशक का 0.2% घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए। आलू जब लाही कीड़ों की संख्या 20 प्रति 100 आलू की पत्तियों पर पहुंच जाये, तो पौधों को जड़ से काटकर खेत से बाहर कर देना आवश्यक है। प्राक्केट घास नाशक दवा का छिड़काव पौधे काटने के बाद एक बार 2 लीटर प्रति हेक्टर की दर से छिडकाव कर देने पर पुन: पत्तियाँ नहीं निकल पाती हैं। आम तने के चारों ओर गुड़ाई एवं क्लोरोपायरिफ़ॉस या मिथाइल पैराथियॉन के 200 ग्रा. धूल कि भुरकाव अथवा पोलोथिन के चादर से तने पर 30 से.मी. की पट्टी एवं ग्रीस लगाने से इसके नवजात को फांस कर इस कीट का निराकरण किया जा सकता है। लीची मंजर आने के सम्भावित समय से तीन माह पहले पौधों में सिंचाई न करें तथा आंतरिक फसल न लगाएं। आँवला गोबर की खाद की सम्पूर्ण मात्रा, नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा जनवरी-फरवरी माह में फूल आने से पहले डाल देनी चाहिए। शेष नत्रजन की आधी मात्रा जुलाई-अगस्त के महीने में डालनी चाहिए । सिंचाई के लिए खारे पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए । फल देने वाले बागानों में पहली सिंचाई खाद देने के तुरन्त बाद जनवरी-फरवरी में करनी चाहिए । फूल आने के समय (मध्य मार्च से मध्य अप्रैल तक) सिंचाई नहीं करनी चाहिए । पशुपालन पशुओं के आहार तैयार करने से पहले ध्यान रखने योग्य कुछ मुख्य बातें: आहार में सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में होने चाहिए।आहार होने के साथ-साथ पशु को संतुष्टि प्रदान करने वाला भी होना चाहिए। थोड़ा भारीपन (स्थूल) भी होना चाहिए । आहार संतुलित हो लेकिन विषैला नहीं होना चाहिए।सस्ता,ताजा तथा पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन युक्त होना चाहिए। उचित समय अंतराल पर दिन में केवल दो बार आहार देना चाहिए ताकि पाचन क्रिया ठीक रहे। हरे चारे को साल भर देने का प्रयास करना चाहिए। पुआल को भिगोंकर ही देना चाहिए,इसके अलावा दाना को हमेशा पानी में फुलाकर ही खिलाना चाहिए जिससे उसकी पौष्टिकता बढ़ जाती है। बछड़े,गाय,गर्भवती गाय,भार वहन करने वाले बैल, सांड,सुखी गर्भवती गाय तथा बढ़ने वाले पशुओं को दिए जाने वाले आहार अलग-अलग प्रकार के होते हैं । स्त्रोत: राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)