तापमान उष्ण कटिबंध पौधा होने के कारण इसे लम्बे समय तथा गर्म मौसम की आवश्यकता पड़ती है। मूंगफली के अंकुरण और प्रारंभिक वृद्धि के लिए 14-15 डिग्री सेल्सियस तापमान का होना आवश्यक है। फसल के जीवनकाल में पर्याप्त सूर्य प्रकाश का उच्च तापमान तथा सामान्य वर्षा का होना अति उत्तम रहता है। फसल वृद्धि के लिए सर्वोत्तम तापमान 70-80 डिग्री फारेनहाइड होना जरूरी है। मूंगफली की खेती उन सभी स्थानों पर, जहां 60-130 मि.ली. वार्षिक वर्षा होती है, की जाती है। बहुत अधिक वर्षा भी इसकी खेती के लिए हानिकारक होती है। फसल की कटाई के समय स्वच्छ और तेज धूप का होना लाभदायक होता है। इस अवस्था में उत्पाद भलीभांति सूख जाता है तथा इसके गुण भी अच्छे होते हैं। मृदा देश के विभिन्न भागों में मूंगफली की खेती बलुई, बलुई दोमट, दोमट और काली मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। बलुई दोमट मृदा, जिसका पी-एच मान 5.5-7.0 के मध्य हो, मूंगफली के लिए सबसे उत्तम होती है। इसकी अच्छी उपज के लिए मृदा हल्की होनी चाहिए और जीवांश पदार्थ पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए। भारी मृदा की अपेक्षा हल्की मृदा की मूंगफली का रंग अच्छा होता है। इसका छिलका पतला होता है और अधिक उपज देती है। जायद में बुआई मार्च से अप्रैल तक की जा सकती है, जिससे कि फसल अच्छी पैदावार दे सके। बुआई पंक्तियों में करनी चाहिए। पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूर 25-30 × 8-10 सें.मी. रखनी चाहिए। बीज एवं उसका उपचार जायद की फसल में 95-100 कि.ग्रा./ हैक्टर बीज बुआई में लगता है। बोने से पहले बीज को 2 ग्राम थीरम और 1 ग्राम 50 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम के मिश्रण को 2 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित करना चाहिए। इस शोधन के पांच-छह घण्टे बाद बोने से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए। उन्नत प्रजातियां मूंगफली की उन्नत प्रजातियां जैसे-टीजी 37, आर-8808र्, आइ सीजीएस-44, आईसीजीएस-1, डीएच-86, आर-9251 प्रमुख हैं। ये आलू, मटर, सब्जी मटर एवं राई की कटाई के बाद खाली मृदा में बोयी जा सकती हैं। निराई-गुड़ाई का मूंगफली की खेती में बहुत अधिक महत्व है। 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 गुड़ाई-निराई करना लाभदायक होता है। गुच्छेदार प्रजातियों में मिट्टी चढ़ाना लाभदायक पाया गया है। पौधों में फलियों के बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाये, तो कभी भी निराई-गुड़ाई या मिट्टी चढ़ाने का कार्य नहीं करना चाहिए। स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012