अमरूद हमारे देश की मुख्य बागवानी फसल है। यह मिरटैसी कुल का पौधा है व सिडियम वंश के अंतर्गत आता है। इसका उत्पत्ति स्थान मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय अमेरिका को माना गया है। अमरूद सम्पूर्ण देश में उगाया जाता है परन्तु राजस्थान के सवाईमाधोपुर को अमरूद की नगरी के नाम से जाना जाता है। यहां अमरूद की खेती पिछले कई वर्षों से हो रही है। अमरूद, सवाईमाधोपुर में लगभग 15,000 हैक्टर भूमि में फैल चुका है तथा दिन-प्रतिदिन किसानों में इसके बगीचों के प्रति रुझान के साथ-साथ इसका क्षेत्रफल बढ़ रहा है। यहां के किसानों के लिए अमरूद एक वरदान साबित हुआ है, जिसने उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारा है। अमरूद का पौधा 3 वर्ष बाद फल देने लगता है, परन्तु इसके बगीचों में शुरूआती 3 वर्षों में किसान पारंपरिक रूप से अंतःसस्य फसल के रूप में खरीफ में उड़द, मूंग या सोयाबीन तथा रबी में गेहूं, चना आदि की खेती करते हैं। किसानों के मुनाफे को अधिक बढ़ाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, सवाईमाधोपुर के एक प्रयास से कृषक श्री रामनिवास मीणा जी ने अमरूद के बगीचों में पपीता की अंतःसस्य फसल के रूप में कुल 4,25,500 रुपये की औसत आय प्राप्त कर सभी कृषकों के सामने सफलता की एक मिसाल कायम की है। आर्थिक व सांख्यिकी निदेशालय के आकंड़ों के अनुसार वर्ष 2017-18 में भारत में अमरूद का क्षेत्रफल 260,000 हैक्टर तथा उत्पादन 3615000 मीट्रिक टन हुआ। राजस्थान में इसके क्षेत्रफल तथा उत्पादन में निरतंर वृद्धि देखने को मिल रही है। पपीते के लिए उपयुक्त मृदा व जलवायु पपीते की खेती मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में होती है, लेकिन समशीतोष्ण क्षेत्रों में इसकी खेती करके अच्छी उपज ली जा सकती है। पपीते की खेती के लिए गर्म नमीयुक्त जलवायु सबसे उपयुक्त रहती है। लेकिन अधिक नमी वाला क्षेत्र सबसे हानिकारक होता है। यह सभी प्रकार की भूमि में लगाया जा सकता है। पपीते के सफल उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मृदा, जो कि जीवाश्म पदार्थ से भरपूर हो, सर्वोत्तम मानी गयी है। इसका पी-एच मान 6.5 से 7.5 होना चाहिए। सारणी 1. दो पंक्तियों के बीच अंतःसस्यन 0.25 हैक्टर क्रसं. वर्ष अंतःसस्य फसलें वास्तविक उपज (क्विंटल/बीघा में) कुल आय (रुपये) लागत (रुपये) 1. खरीफ 2017 उड़द 2.0 10800 1200 2. रबी 2017-18 गेहूं 10.0 17000 5000 3. खरीफ 2018 मूंगफली 3.0 10500 5200 4. रबी 2018-19 गेहूं 10.0 17000 5000 भूसा - 8000 कुल 46900 16400 अमरूद के बगीचों में पपीते का अंतःसस्यन कृषि विज्ञान केंद्र, सवाईमाधोपुर द्वारा अपने निरंतर प्रयासों से पिछले 2 वर्षों से अमरूद के एक से तीन वर्ष के बगीचों में विकल्प निरंतर अंतःसस्यन फसल के रूप में पपीते की पौध (रेड लेडी किस्म) का प्रदर्शन किया जा रहा है। इसमें वर्ष 2017-18 में 20 कृषकों को कुल 125 पौध, 2018-19 में 20 कृषकों को कुल 125 पौध एक हैक्टर क्षेत्रफल में तथा वर्ष 2019 में 25 कृषकों को 125 पौध, 1.2 हैक्टर क्षेत्रफल में पपीते का प्रदर्शन अमरूद के 1 से 3 वर्ष के बगीचों में किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र में किस्म रेड लेडी ताइवान की पौध तैयार की गयी तथा कृषक श्री रामनिवास मीणा ने 0.25 हैक्टर भूमि में सर्वप्रथम अमरूद के 1 वर्ष 5 माह के पौधों के बीच पपीते के 277 पौधे वर्ष 2017 में लगाए। अमरूद के पौधे को 6 मीटर की दूरी पर लगाया गया। पपीते की पौध लगाने से पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए। 50 ×50×50 सें.मी. आकार के गड्ढे, 1.8×1.8 मीटर की दूरी पर खोदने चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में पपीते की पौध को लगाने के लिए गड्ढों को एक रात्रि पहले खोद लेना चाहिए। गड्ढों में ऊपरी मृदा के साथ 20 कि.ग्रा. गोबर की खाद व एक कि.ग्रा. नीम की खली मिला देनी चाहिए। पपीते को भारी मात्र में खाद व उर्वरक की आवश्यकता होती है। प्रति गड्ढे में 200 से 250 ग्राम नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म तत्व जिंक सल्फेट (0.5 प्रतिशत) तथा 0.1 प्रतिशत बोरिक एसिड का छिड़काव करने से पौधे की उपज में वृद्धि होती है। अमरूद के बगीचों में पारंपरिक रूप से अंतःसस्यन के कारण खरीफ 2017 में उड़द लगाने पर 2.0 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज प्राप्त हुई। इससे कुल आय 10,800 रुपये प्राप्त हुई। रबी वर्ष 2017-18 में गेहूं द्वारा 10 क्विंटल प्रति हैक्टर के साथ 17,000 रुपये का कुल लाभ प्राप्त हुआ। इसी प्रकार खरीफ वर्ष 2018 में मूंगफली से 3 क्विंटल प्रति बीघा से 10,500 रुपये प्राप्त हुए। रबी वर्ष 2018-19 में 10 क्विंटल गेहूं से 17,000 रुपये का मुनाफा प्राप्त हुआ। इस प्रकार 2 वर्षों में कुल आय 46,900 रुपये प्राप्त हुए। अमरूद के एक बीघा बाग में 69 पौधों के मध्य पपीते के 277 पौधे श्री रामनिवास मीणा जी ने लगाए तथा पपीते की प्रति बीघा खेती से कुल खर्च 34,174 रुपये प्रति हैक्टर तथा कुल आय 4,16,625 रुपये प्रति बीघा प्राप्त हुई। सारणी 2. अमरूद की पंक्तियों के बीच पपीता का अतंःसस्यन(0. 25 हैक्टर क्षेत्रफल) पौधों की संख्या 277 औसत उपज (कि.ग्रा./पौधा) 50 कुल उपज (कि.ग्रा.) 13887 औसत भाव (रुपये/कि.ग्रा.) 30 कुल आय (रुपये) 416625 लागत (रुपये) 34174 शुद्ध आय (रुपये) 382451 पपीता लगाने का उचित समय व तरीका पपीते के पौधे पहले रोपणी के रूप में नर्सरी में तैयार किये जाते हैं। तैयार पौधों को गड्ढों में जून-जुलाई में लगाना चाहिए। जहां सिंचाई का समुचित प्रबंध हो वहां सितंबर से अक्टूबर तथा फरवरी से मार्च तक पपीते के पौधे लगाए जा सकते हैं। फलों की तुड़ाई व उपज पपीते का फल पौधे लगाने के 9 से 10 महीने बाद तुड़ाई करने योग्य हो जाता है। पपीते की औसत उपज लगभग 35-50 कि.ग्रा. फल प्रति पौधा तथा 35-40 टन प्रति हैक्टर उपज प्राप्त होती है। पपीते के प्रमुख रोग व उनका प्रबंधन आर्द्रगलन रोग यह रोग मुख्य रूप से पौधशाला में कवक के कारण होता है। इसका प्रभाव नए अंकुरित पौधे पर होता है, जिससे पौधा जमीन के पास से सड़कर नीचे गिर जाता है। इसके उपचार के लिए नर्सरी की मृदा को सबसे पहले फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से उपचारित कर पॉलीथीन से 48 घंटों के लिए ढक देना चाहिए। बीज को थीरम या कैप्टाॅन (2 ग्राम प्रति कि.ग्रा.) दवा से उपचारित करके ही बोना चाहिए। पर्ण कुंचन रोग यह पपीते का गंभीर विषाणुजनित रोग है। इस रोग की शुरुआत में पौधे का विकास रुक जाता है और पत्तियां गुच्छेनुमा हो जाती हैं तथा पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है। इससे पत्तियों का सिरा अंदर की ओर मुड़ जाता है तथा पौधे में फूल-फल नहीं लगते हैं। इसके नियंत्रण के लिए रोगी पौधे को उखाड़कर फेंक देना चाहिए। सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए डाइमिथोएट एक मि.ली. का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। स्त्राेत : नूपुर शर्मा-सस्य वैज्ञानिक, बी.एल.मीणा-वरिष्ठ वैज्ञानिक और के.सी. मीणा-अध्यक्ष, सहायक प्राध्यापक, प्रसार शिक्षा, कृषि विज्ञान केंद्र, सवाईमाधोपुर (राजस्थान)।