कॉस का नियंत्रण उत्तर प्रदेश में कॉस से प्रभावित सर्वाधिक क्षेत्रफल बुन्देलखण्ड एवं तराई का भाग हैं। इन क्षेत्रों में इस खरपतवार से फसलों की वृद्धि अवरूद्ध हो जाती है तथा पैदावार में भारी कमी हो जाती है। खरीफ की बुवाई में भी कठिनाई होती है। चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर एवं अखिल भारतीय समन्वित खरपतवार नियंत्रण योजना के अन्तर्गत फसल शोध प्रक्षेत्र, वेलाताल महोबा पर किये गये परीक्षणों के आधार पर इस खरपतवार के नियंत्रण हेतु सफल तकनीकी का विकास किया गया है।इन प्रयोगों में ग्लोइफोसेट नामक रसायन बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुआ है। इस तकनीकी की विस्तृत जानकार निम्नलिखित है नियंत्रण तकनीक सस्य विधि वर्षा ऋतु के प्रारम्भ अर्थात् जुलाई में खेत की गहरी जुताई कर देते हैं। इसके बाद डिस्क प्लाऊ द्वारा जुताई करते हैं। जिससे बड़े-बड़े ढेले टूट जाते हैं एवं कॉस के राइजोम (भूमिगत तने) ऊपर आ जाते हैं तथा कुछ हद तक टुकड़ों में कट जाते हैं। इस प्रकार उखड़े हुए भूमिगत तनों को निकाल कर इक्ट्ठा कर जला दिया जाता है जिससे उनका वानस्पातिक प्रसारण पुनः न हो सके। समय हो तो पाटा लगा देना चाहिए तथा खेत को खाली छोड़ देना चाहिए। रासायनिक विधि उपरोक्त क्रिया के 35-40 दिन के बाद जब कॉस के नये पौधे तीव्र व (वृद्धि की अवस्था में 6-8 पत्तियां) अग्रसर हो तो ग्लाइफॉसेट 41 प्रतिशत एस.एल. की 3-4 ली./हे. मात्रा 400-500 लीटर/हे. पानी में घोलकर फ्लैट पैन नाजिल से पर्णीय छिड़काव मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर तक के खुले सूर्य के प्रकाश में करना चाहिए। यदि कॉस की गहनता भयंकर हो तो रसायन की मात्रा बढ़ाकर उसे 4 ली./हे. कर देनी चाहिए। इससे अच्छा परिणाम मिलता है। इस रसायन के छिड़काव के बाद कॉस की पत्तियों का रंग बदलने लगता है तथा 15-20 दिन में पौधे पूर्णतः सूख जाते हैं। यह रसायन कॉस के भूमिगत तनों तक पहुंचकर उसे समूल रूप से नष्ट कर देता है तथा पुनः नया पौधा भूमि से नहीं निकलता। किसी वजह से खेत के अन्दर कॉस के पौधे का जमाव हो जाये तो पुनः छिड़काव कर देना चाहिए। रसायन प्रयोग करने के एक माह बाद फसलों की बुवाई की जा सकती है। सावधानियाँ रसायन का प्रयोग कॉस की तीव्र वृद्धि की अवस्था 35-40 दिन पर करें। छिड़काव के बाद लगभग 6-8 घण्टे खुली धूप एवं पर्याप्त वायु मण्डल की आर्द्रता आवश्यक है। छिड़काव का उपयुक्त समय मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर हैं। छिड़काव के समय हवा तेज न हो। खेत में पानी भरा न हो किन्तु पर्याप्त नमी आवश्यक है। मोंथा के रासायनिक नियंत्रण की तकनीक मोंथा (साइप्रस रोटनडस) एक दुष्ट प्रकृति का खरपतवार है। इसके भूमिगत टयूबर जमीन के अन्दर लगभग 30-45 सेमी. तक फैले होते है। इन्ही ट्यूबर से इसका प्रसारण तेजी से होता है। खुरपी आदि से निराई के बाद यह पुनः निकल आते हैं मोथा का प्रकोप वाली भूमि में की गई फसलों में ज्यादा भयंकर होता है। चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर के शस्य विज्ञान विभाग में चल रहे अखिल भारतीय समन्वित खरपतवार योजना के अन्तर्गत किये गये शोध कार्यों के उपरान्त ग्लाइफोसेट नामक रसायन का प्रभाव काफी लाभप्रद सिद्ध हुआ है। इसकी प्रयोग करने की तकनीकी निम्नलिखित है नियंत्रण तकनीक जिस खेत में मोथा की गहनता हो उस खेत को वर्षा प्रारम्भ होने के पश्चात् खाली छोड़ दिया जाये। ग्लाइफोसेट 41 प्रतिशत की 4 ली./हे. मात्रा 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर तक मोथा की तीव्र वृद्धि की अवस्था पर छिड़काव किया जाये। छिड़काव के बाद सभी खरपतवार 10-15 दिन में सूख जाते हैं। अगर मोथा का जमाव दिखाई दे तो पुनः एक छिड़काव स्पाट ट्रीटमेन्ट कर देना चाहिए। छिड़काव के बाद एक माह तक खाली छोड़ दिया जाय, एक माह के अन्दर सभी खरपतवार नष्ट हो जाते हैं तथा रसायन का भूमि में प्रभाव भी लगभग समाप्त हो जाता है। तत्पश्चात् इच्छानुसार अगली फसल तोरिया, आलू, गेहूँ इत्यादि फसलें बोयी जाय। उपरोक्त क्रिया से अगली फसल में मोथा का जमाव लगभग 85 से 97 प्रतिशत तक कम हो जाता है। आवश्यकता महसूस होने पर पुनः छिड़काव (स्पाट ट्रीटमेन्ट) कर दिया जाय। शोध कार्यों से यह भी साबित हुआ है कि लगातार 3-4 साल तक मोथा की गहनता वाले खेतों में ढेंचा तथा तिल की खेती की जाय तो इनकी गहनता में लगभग 50-60 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। मक्का, अरहर तथा गन्ने के बीच में लोबिया की सहफसली खेती करने से भी मोथा की गहनता में काफी कमी आ जाती है। रसायन प्रयोग में सावधानियाँ छिड़काव का उपयुक्त समय मध्य अगस्त से मध्य सितम्बर है। इस समय मोथा तीव्र वृद्धि की अवस्था में होता हैं तथा उपयुक्त तापक्रम एवं वायुमण्डल आर्द्रता भी प्राप्त होती हैं। छिड़काव खुली धूप में किया जाय तथा छिड़काव के बाद 6-8 घण्टे धूप का मिलना आवश्यक है। छिड़काव खड़ी फसल में न किया जाय अन्यथा फसल नष्ट हो जायेगी। छिड़काव के समय हवा तेज न हो। खेत में पानी न हो किन्तु खेत में पर्याप्त नमी आवश्यक है। गाजर घास (पारथेनियम) का नियंत्रण गाजर घास का प्रकोप मुख्यतः सड़कों के किनारे तथा बेकार भूमियों में होता है। परन्तु कहीं-कहीं खेती की जाने वाली भूमियों में विभिन्न फसलों के साथ उगते दिखाई देते हैं। गाजर घास के सम्पर्क में आने पर मनुष्यों में चर्म रोग, दमा, क्षय रोग, सूजन आदि रोग हो जाते है। पशुओं में भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। गाजर घास एक राष्ट्रीय समस्या है जिसका नियंत्रण करना नितांत आवश्यक है। इसके नियंत्रण हेतु पैराक्वाट डाइक्लोराइड 24 प्रतिशत ई.सी. की 4-5 लीटर प्रति हे. मात्रा को 700-800 लीटर में पानी में घोलकर अथवा ग्लाइफोसेट 4 प्रतिशत एसएल की 4-5 लीटर प्रति हे. मात्रा अथवा 2-4 डी सोडियम लवण 80 प्रतिशत डब्लू.पी. की 1.0 किग्रा. प्रति हे. मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोलकर गाजर घास के पौधों में फूल आने से पहले छिड़काव करना चाहिए। गाजर घास के जमाव से पूर्व एट्राजिन 50 प्रतिशत डब्लू.पी. को 2-3 किलोग्राम प्रति हे. मात्रा का 500-600 लीटर पानी में घोलकर खाली भूमि में छिड़काव करने से इसका जमाव ही नहीं होता है। गाजर घास के नियंत्रण के लिए जाइगो ग्रामा, वाइकोलो राटा कीट काफी प्रभावी पाया गया है। इस कीट को जुलाई-अगस्त के महीने में पौधों पर छोड़ने से उनको खाकर पूरी तरह नष्ट कर देते है। इस कीट के बारे में नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमार गंज के कीट विज्ञान विभाग एवं राष्ट्रीय खरपतवार विज्ञान शोध केन्द्र, आधारताल, जबलपुर (म.प्र.) से अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।