खेजड़ी, मरूस्थली भूमि के लिए बहुत लोकप्रिय वृक्ष है। यह पेड़ ज्येष्ठ के महीने में भी हरा रहता है और गर्मी में जब रेगिस्तान में पशुओं के लिए धूप से बचाव का कोई सहारा नहीं होता है, तब खेजड़ी छाया देता है। इतना ही नहीं जब पशुओं के लिए कुछ खाने को नहीं होता है, तब भी यह वृक्ष चारा देता है। खेजड़ी मरूस्थलीय क्षेत्रों के प्राणियों का जीवन का आधार है। इस मरूस्थलीय राज्य वृक्ष का अपना एक अलग ही इतिहास है। वर्ष 1730 में जोधपुर के राजा अभय सिंह ने अपने नए महल के निर्माण का आदेश दिया। इसमें महल को बनाने के लिए चूना बनाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता हुई, जिसके लिए खेजड़ी के वृक्षों को कटवाने का आदेश दिया। इस आदेश का वहां के आसपास रहने वाले लोगों ने विरोध किया। वे लोग अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी के लिए इस पर निर्भर थे। इसके अलावा इस पेड़ को लोगों ने अपने धर्म के साथ भी जोड़ रखा था। इसलिए वहां के लोगों व राजा के आदेश में टकराव की वजह से बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जब राजा को इस बात का पता चला, तो उन्होंने अपना आदेश वापिस ले लिया। खेजड़ी की किस्म थार शोभा, भाकृअनुप4-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर द्वारा विकसित की गई थी। यह अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता वाली किस्म है। सब्जी के उपयोग के लिए इसकी एक समान फली की कटाई की जाती है। इससे प्राप्त एक कि.ग्रा. सूखी सांगरी का भाव लगभग 900 से 1000 रुपये रहता है व एक ग्राफ्टेड खेजड़ी के पौधे से प्रतिवर्ष लगभग 20 से 30 कि.ग्रा. कोमल फली (सांगरी) और 2-4 क्विंटल लूंग व काफी मात्रा में छडी का उत्पादन मिल जाता है। जलवायु यह वृक्ष हमारे देश का स्थानीय वृक्ष है। राजस्थान तथा गुजरात के उष्ण भागों में, जहां तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तापमान होता है, वहां भी सफलतापूर्वक उगने वाला पेड़ है। खेजड़ी देश के विभिन्न भागों में भी पाया जाता है, क्योंकि इसकी जलवायु सहनशीलता अधिक है। राजस्थान व गुजरात में बिश्नोई समाज के लोग इस वृक्ष के रखवाले के तौर पर प्रसिद्ध हैं। उपयोगिता लकड़ीः इसकी लकड़ी ईंधन के रूप में प्रयोग की जाती है। खेजडी की लकडी में 5000 केसीएल/केजीके (भारी मात्रा में कैलोरी) गुण होता है। इसकी लकड़ी कोयला बनाने के काम आती है। बड़ी मात्रा में इस वृक्ष की लकड़ी ईंधन व इमारती लकड़ी के रूप में प्रत्येक वर्ष प्राप्त होती है। फलिया यह बहुत ही पौष्टिक व स्वादिष्ट फली होती है। इसका उपयोग अचार व सब्जी के रूप में किया जाता है। सूखी फलियों को सांगरी कहा जाता है व आजकल प्रत्येक मेगा स्टोर पर यह पैकेट्स में उपलब्ध है। सूखी सांगरियों की देश-विदेश में बहुत मांग है। सूखी सांगरियों की सब्जी राजस्थान की अपनी अलग एक पहचान है। भूमि अपरदन रोकने में सहायकहै इसलिए इसे 'राजस्थान की संजीवनी' भी कहा जाता है। औषधियां खेजडी का वक्ष एक महत्वपर्ण औषधीय वक्ष के रूप में जाना जाता है। इसके तने की छाल से कोढ़, दमा, पेचिश, गठिया, खांसी, जुकाम इत्यादि रोगों का इलाज सम्भव है। नाइट्रोजन संचय करने की क्षमता खेजड़ी के वृक्ष की जड़ों में उपस्थित ग्रंथियों में नाइट्रोजन संचित करने वाले सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। ये वातावरण की अनुपलब्ध नाइटोजन को बदलकर पौधों व जमीन के लिए अवशोषित करने योग्य बना देते हैं, जिससे भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ जाती है। खेजड़ी वृक्ष की रोपण विधि खेजड़ी वृक्ष प्राकृतिक तौर पर और स्वतः सफलतापूर्वक रोपित होने वाला वृक्ष है। इस वृक्ष की फलियां बीजसहित शुष्क क्षेत्रों में पशु (भेड़, बकरियां इत्यादि) खा लेते हैं। प्राकृतिक रूप से बीज का उपचार (क्योंकि बीज सख्त आवरण सहित होता है) पशुओं के पेट में मौजूद अम्लों से हो जाता है व जैसे ही पशु खेतों में गोबर करते हैं, तो उपचारित बीज खेतों में उगने के लिए तैयार हो जाते हैं। अतः किसान भाई इस कल्पवृक्ष को बचाने एवं देखभाल करने का संकल्प करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह सुरक्षित रह सके। खेजड़ी वृक्षों का बचाव एवं देखभाल रोपाई के प्रथम वर्ष बरसात के मौसम में खेजड़ी के पौधों को तीन से चार बार पानी देना चाहिए। दो-तीन वर्षों के बाद नीचे की शाखाओं को कटाई-छंटाई करने से पौधा सीधा बढ़ता है। ट्रैक्टरों के बढ़ते प्रचलन के कारण खेतों में नए वृक्ष बराबर नहीं उग पाते हैं। इसलिए ट्रैक्टर से जुताई के समय प्राकृतिक रूप से उगे हुए पौधों को बचाना चाहिए। प्राकृतिक रूप से उगने वाला पौधा हमेशा उस क्षेत्र विशेष के अनुसार ही जन्म लेता है। इसके जीवित रहने और बढ़ने के आसार कृत्रिम रूप से लगाए पौधे से अधिक होते हैं। खेजड़ी की छंटाई करते समय उस पर 3 या 4 शाखाओं को छोड़ना अत्यन्त आवश्यक है। वर्षा ऋतु के समय वृक्ष के चारों ओर 4 मीटर x 50 सें.मी. x 50 सें.मी. खाई बनाकर वर्षा जल को संरक्षित करें, ताकि लंबे समय तक जल की आपूर्ति बनी रहे। जहां खेजड़ी वृक्ष सूखने का प्रकोप हो, वहां वर्षा ऋतु में वृक्षों की जड़ों में क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 15 मि.ली., कार्बेडाजिम 50 डब्ल्यूपी 20 ग्राम और कॉपर ऑक्सिक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी 20 ग्राम प्रति वृक्ष चारों ओर पानी के साथ डालें। खेजडी में फरवरी-मार्च में फल आते हैं और अप्रैल व मई में फलियां बनती हैं। इसकी जड़ें गहरी तथा नाइटोजन संग्रहण की क्षमता रखती हैं। इस पेड़ की जड़ें जमीन को कार्बनिक पदार्थों से भरपर रखती हैं। इसके कारण इस वक्ष के साथ सभी फसलों की पैदावार अधिक होती है। शुष्क क्षेत्रों में वनस्पतियां कम होने की वजह से खेजडी की छंटाई प्रतिवर्ष की जाती है। इसके परिणामस्वरूप खेजड़ी बीज का उत्पादन न के बराबर होता है। अगर यही दशा रही तो वह दिन दूर नहीं जब इ. तरह से विलुप्त हो जाएगा। इसलिए हमें खेजड़ी की छंटाई, उचित प्रबंधन और समुचित देखभाल करनी चाहिए। किसानों को अपने खेत में लगे खेजड़ी के पेड़ों को तीन समान भागों में बांट लेना चाहिए। पहले भाग के वृक्षों की छंटाई पहले वर्ष करें, दूसरे भाग के वृक्षों की छंटाई दूसरे वर्ष में करें तथा तीसरे हिस्से के वृक्षों की छंटाई तीसरे वर्ष करें। इस तरह से छंटाई करने से प्रत्येक वृक्ष की छंटाई तीन वर्ष बाद होगी और इस प्रकार चारे व ईंधन की पैदावार 40 प्रतिशत बढ़ जाती है। जिन दो वर्षों के दौरान छंटाई नहीं की जाती, उन वर्षों में बीज का उत्पादन बहुत अच्छा होता है। छंटाई के लिए नवंबर का महीना सबसे अच्छा रहता है। छंटाई तीन वर्ष बाद करने से तने की बढ़वार भी दोगुनी अधिक होती है भाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, सेवर, भरतपुर, (राजस्थान),विवेकानन्द ग्लोबल विश्वविद्यालय, जगतपुरा, जयपुर, (राजस्थान),राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान) नरपत सिंह ,चेतन कुमार दौतानिया, सुचित्रा, और प्रवेश सिंह चौहान