जूट की खेती हेतु गर्म तथा नम जलवायु की आवश्यकता होती है। 100 से 200 से.मी. वर्षा तथा 24 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम उपयुक्त है। जूट के रेशे से ब्रिग बैग्स कनवास टिवस्ट एवं यार्न के अलावा कम्बल दरी कालीन ब्रुश एवं रस्सियां आदि तैयार की जाती हैं। जूट के डंठल से चारकोल एवं गन पाउडर बनाया जाता है। भूमि का चुनाव ऐसी भूमि जो समतल हो जिसमें पानी का निकास अच्छा हो साथ की साथ पानी रोकने की पर्याप्त क्षमता वाली दोमट तथा मटियार दोमट भूमि इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त रहती है। भूमि की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई तथा बाद में 2-3 जुताइयां देशी हल या कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर भूमि को भुरभुरा बनाकर खेत बुवाई के लिए तैयार किया जाता है। चूंकि जूट का बीज बहुत छोटा होता है इसलिए मिट्टी का भुरभुरा होना आवश्यक है ताकि बीज का जमाव अच्छा हो। भूमि में उपयुक्त नमी जमाव के लिए अच्छी समझी जाती है। संस्तुत प्रजातियां एवं बुवाई का समय जूट की दो प्रमुख किस्में होती हैं। प्रत्येक किस्म की प्रजातियां निम्नवत् हैं 1. कैपसुलेरिस इसको सफेद जूट या कहीं-कहीं ककिया बम्बई भी कहते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में कडुवी होती हैं। इसकी बुवाई फरवरी से मार्च में की जाती है। भूमि के आधार पर निम्न प्रजातियों की संस्तुति की गयी है। जे.आर.सी.-321 यह शीघ्र पकने वाली जाति है। जल्दी वर्षा होने तथा निचली भूमि के लिए सर्वोत्तम पाई गई है। जूट के बाद लेट पैडी (अगहनी घान) की खेती की जा सकती है। इसकी बुवाई फरवरी-मार्च में करके जुलाई में इसकी कटाई की जा सकती है। जे.आर.सी.-212 मध्य एवं उच्च भूमि में देर से बोई जाने वाली जगहों के लिए उपयुक्त है। बुवाई मार्च से अप्रैल में करके जुलाई के अन्त तक कटाई की जा सकती है। यू.पी.सी.-94 (रेशमा) निचली भूमि के लिए उपयुक्त बुवाई फरवरी के तीसरे सप्ताह से मध्य मार्च तक की जाए 120 से 140 दिन में कटाई योग्य हो जाती है। जे.आर.सी.-698 निचली भूमि के लिए उपयुक्त इस प्रजाति की बुवाई मार्च के अन्त में की जा सकती है। इसके पश्चात् धान की रोपाई की जा सकती है। अंकित (एन.डी.सी.) निचली भूमि के लिए उपयुक्त इस प्रजाति की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तक की जा सकती है। सम्पूर्ण भारत के लिए संस्तुत। एन.डी.सी..9102 पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए संस्तुत। 2. ओलीटोरियस इसको देव या टोसा जूट भी कहते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में मीठी होती हैं। इसका रेशा केपसुलेरिस से अच्छा होता है। उच्च भूमि हेतु अधिक उपयुक्त हैं। इसकी बुवाई अप्रैल के अन्त से मई तक की जाती है। जे.आर.ओ.- 632 यह देर से बुवाई और ऊची भूमि के लिए उपयुक्त है। अधिक पैदावार के साथ-साथ उत्तम किस्म को रेशा पैदा होता है। इसकी बुवाई अप्रैल से मई के अन्तिम सप्ताह तक की जा सकती है। जे.आर.ओ.-878 यह प्रजाति सभी भूमियों के लिए उपयुक्त है। बुवाई मध्य मार्च से मई तक की जाती है। यह समय से पहले फूल आने हेतु अवरोधी है। जे.आर.ओ.-7835 इस जाति में 878 के सभी गुण विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त अधिक उर्वरा शक्ति ग्रहण करने के कारण अच्छी पैदावार होती है। जे.आर.ओ.-524 (नवीन) उपरहार एवं मध्य भूमि के लिए उपयुक्त बुवाई मार्च तृतीय सप्ताह से अप्रैल तक की जाये। 120 से 140 दिन में कटाई योग्य हो जाती है। जे.आर.ओ.-66 यह प्रजाति मई जून में बुवाई करके 100 दिन में अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।