मुख्य व सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध इस शैवाल में प्रोटीन, अमीनो अम्लों एवं विटामिनों की प्रचुर मात्रा होने के अतिरिक्त यह मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों से भी समृद्ध है। क्षारीय झीलों के समीप रहने वाले लोगों द्वारा भी एक संपूरक आहार के रूप में स्पायरूलिना का उपयोग किया जाता है। ऐसे लोगों में कुपोषण एक गंभीर समस्या है। कानेम क्षेत्र के लेक-चाड़़ में यह शैवाल प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। 'दिहे' के नाम से पहचाने जाने वाले इस पारंपरिक आहार की लेक-चाड़ में पुनः खोज, यूरोप के एक वैज्ञानिक मिशन द्वारा की गई थी। अब विश्वभर में व्यापक रूप से इसका संवर्धन किया जाता है। अप्रफीका के बहुत से भागों में इस शैवाल को प्राकृतिक जलस्रोत से एकत्रित कर सुखा लिया जाता है। प्रोटीन का एक समृद्ध स्रोत होने के कारण मानव आहार के रूप में इसका उपयोग निरंतर बढ़ रहा है। स्पायरूलिना एक बहुकोशिकीय एवं तंतुनुमा नील-हरित शैवाल है। स्वास्थ्य एवं आहार उद्योग के साथ-साथ जल कृषि में यह प्रोटीन एवं विटामिन के संपूरक के रूप में बहुत अधिक लोकप्रिय है। मछली, झींगा और कुक्कुटपालन में जीवों के आहार में संपूरक खुराक के रूप में इसका उपयोग होता है। झींगे की वृद्धि के लिए भी इस सूक्ष्म शैवाल का चीन में उपयोग किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली के सोलहवें सत्र में 'भूख एवं कुपोषण की चुनौती से निपटने और टिकाऊ विकास के लिए स्पायरूलिना का उपयोग', विषय पर एक संशोधित ड्राफ्ट प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था। इसकी महत्ता को इसी बात से समझा जा सकता है। स्पायरूलिना की जैव-रासायनिक सरंचना प्रायः शुष्क भार के आधार पर इसमें लगभग 60 प्रतिशत (51-71 प्रतिशत) प्रोटीन अंश होता है। 15-25 प्रतिशत (शुष्क भार) कार्बोहाईड्रेट होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल शुष्क भार के 4.2-6 प्रतिशत की सीमा में होते हैं। इसमें विटामिन ए, बी (बी 1, बी2, बी3, बी6, बी9), सी, डी एवं ई पाये जाते हैं। यह पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, मैग्नीज, फॉस्फोरस, सोडियम एवं जिंक का भी अच्छा स्रोत है। बीटा केरोटीन, जैंथोफिल, क्लोरोफिल-ए सहित वर्णकों तथा फायकोबिलिप्रोटीन जैसे कि फायकोसायनिन एवं एल्लोफायकोसायनिन का भी अच्छा स्रोत है। नमी स्तर 3-6 प्रतिशत होता है। स्पायरूलिना की उपयोग क्षमता स्पायरूलिना की नम जैव मात्रा एवं इसके प्रसंस्करित उत्पादों का उपयोग कृषि, आहार उद्योग, औषधि निर्माण और जलजीवों के लिए आहार के रूप में किया जाता है। इसमें सूक्ष्मजीवरोधी (विषाणु एवं जीवाणुरोधी गुणों सहित), कैंसररोधी तथा भारी धातुओं (विषाक्त भारी धातुएं यथा कैडमियम, लैड, आयरन और मर्करी आदि) से बचाव करने के गुण होते हैं। इसके साथ ही अपनी रासायनिक संरचना के कारण यह रोगरोधिता, उद्दीपक एवं प्रतिऑक्सीकरक प्रभावयुक्त होता है। स्पायरूलिना-बाजार व्यावसायिक रूप से स्पायरूलिना टेबलेट, कैप्सूल अथवा पाउडर के रूप में उपलब्ध है। इसके उपभोग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी तब हुई जब अमेरिका के एक दैनिक समाचार पत्र में मुखपृष्ठ पर एक लेख छपा जिसमें डाइटिंग कर रहे व्यक्तियों के लिए, भूख में कमी करने वाले रूप में स्पायरूलिना के गुणों को दर्शाया गया था। वर्तमान समय में उच्च गुणवत्तायुक्त स्पायरूलिना का उत्पादन करने वाली कम्पनियां, बाजार में टिके रहने के लिए गुणवत्ता के पहलू पर जोर देती हैं। इसके साथ ही प्राकृतिक रंगों और एंजाइम आदि का उपयोग कर गुणवर्धित उत्पाद भी तैयार कर रही हैं। स्पायरूलिना के प्रमुख उत्पादक एशिया एवं अमेरिका में हैं। वैश्विक उत्पादन के 10 प्रतिशत से अधिक का उत्पादन चीन करता है। विश्व का सबसे बड़ा आर्थोस्पायरा उत्पादन संयंत्र, दक्षिण कैलिफोर्निया में स्थित अर्थराइज न्यूट्रीशनल्स का है, जो प्रतिवर्ष 450 टन का उत्पादन करता है। वर्ष 2016 में स्पायरूलिना का बाजार भाव अमरीकी डॉलर 35/कि.ग्रा. था। भारत की कम्पनियां जैसे कि पैरी, एंटिना, डाबर, एल्जेन बायोटेक, हायड्रोलेना बायोटेक एवं हैश बायोटेक आदि स्पायरूलिना का वृहद स्तर पर उत्पादन एवं विपणन कर रही हैं। संवर्धन स्पायरूलिना जल में उगता है तथा इसको उगाना एवं प्रसंस्करण सरल है। इसे प्रयोगशाला स्तर पर अथवा वृहद स्तर पर संवर्धन इकाइयों में, 28 से +2 या -2 डिग्री सेल्सियस तापमान पर, 16/8 घंटे की प्रकाश एवं अंधकार अवधि में प्रकाश (लगभग 3000-4000 लक्स) के अंतर्गत, 8.5-10.00 क्षारीय पी-एच मान (सामान्यतः NaHCO3 के साथ समायोजित करते हैं) वाले नाइट्रोजन, फॉस्पफोरस, पोटेशियम, सल्फर, मैग्नीशियम, सोडियम क्लोराइड एवं सूक्ष्म पोषक तत्वयुक्त जल में उगाया जाता है। इस शैवाल का उत्पादन फ्लास्क, बोतल, प्लास्टिक ट्रे एवं नलिकाओं में अथवा बड़ी प्रगुणन इकाइयों में किया जा सकता है। यदि औषधीय उपयोग के लिए स्पायरूलिना का संवर्धन करने की आवश्यकता हो तो इसका बड़े परिमाण के फोटोबायोरिएक्टर में भी प्रगुणन किया जा सकता है। संशोधित संवर्धन माध्यम (जैड एम) (जरौक, 1966) सघंटक ग्राम/लीटर सोडियम बाईकार्बोनेट 16.5 डाईपोटेशियम हाइड्रोजन फॉस्फेट 0.5 सोडियम नाइट्रेट 2.5 पोटेशियम सल्फेट 1.0 सोडियम क्लोराइड 1.0 मैग्नीशियम सल्फेट 1.2 कैल्शियम क्लोराइड 0.4 फेरस सल्फेट 0.01 ए5 सूक्ष्मपोषक घोल 1.0 पी-एच मान 9-9.5 ए5 सूक्ष्म पोषक तत्व घोल (ग्राम/लीटर) बोरिक अम्ल मैग्नीज क्लोराइड जिंक सल्फेट सोडियम मॉलिब्डेट कॉपर सल्फेट स्पायरूलिना के अधिक मात्रा में संवर्धन के लिए पोषक तत्व सघंटक (ग्राम/मि.ली.) सोडियम बाईकार्बोनेट 9.0 सुफला (एनःपीःके15:15:15) 1.0 सोडियम क्लोराइड 1.0 मैग्नीशियम सल्फेट 0.1 सिंगल सुपर फॉस्फेट 0.1 पी-एच मान 9.0 संग्रहण एवं शुष्कन यह एक तंतुनुमा शैवाल है, इसलिए इसका संग्रहण स्टेनलैस स्टील के बने स्क्रीन और मसलिन कपड़े़ या नायलॉन से बनी जाली द्वारा आसानी से किया जा सकता है। शैवाल निकालने के बाद शेष जल का पुनः स्पायरूलिना संवर्धन में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार से प्राप्त नम जैवमात्रा स्वच्छ और स्वादिष्ट होती है। शैवाल जैवमात्रा का लगभग एक चौथाई, जो शेष रह जाता है, उसका उपयोग अगली संतति के लिए बीज के रूप में किया जा सकता है। संवर्धन माध्यम से शैवाल निकालने के लिए प्रातःकाल सबसे उपयुक्त समय है, क्योंकि कम तापमान पर कार्य करना सुविधाजनक है। स्पायरूलिना के शुष्कन के लिए अधिक धूप उपलब्ध होती है तथा साथ ही संग्रहित जैवमात्रा में प्रोटीन प्रतिशत भी अधिक रहता है। संग्रह किये गये इस नम शैवाल का सीधे उपयोग कर सकते हैं या उपयोगी फार्मुलेशन तैयार करने के लिए इसे सुखाया जा सकता है। महत्व कुछ रोगों जैसे कि एड्स/एच आई.वी. तथा संधिशोध (आर्थराइटिस) के नियंत्रण में यह शैवाल उपयोगी है। स्पायरूलिना, खिलाड़ियों के लिए पोषक आहार, शरीर की प्राकृतिक रूप से सफाई एवं निराविषीकरण (डिटॉक्सीपिफकेशन), हृदयवाहिका के कार्य एवं अच्छे कॉलेस्ट्राल में सुधार करने, रोगरोधी तंत्र के सुदृढ़ीकरण, जठरांत्र एवं पाचक तंत्र को स्वस्थ रखने तथा प्रतिऑक्सीकारक सुरक्षा के साथ कैंसर का खतरा कम करने वाला माना जाता है। एक स्वस्थ एवं संतुलित खुराक के साथ संयोजन में इसकी की पोषण संबंधी रूपरेखा अत्यधिक प्रभावी है। एक कि.ग्रा. स्पायरूलिना का पोषण की दृष्टि से लाभ लगभग 1,000 कि.ग्रा. सब्जियों के समतुल्य है। धूप में सुखाने के लिए स्पायरूलिना को प्लास्टिक शीट पर फैला दिया जाता है और शुष्क जैवमात्रा, जिसमें लगभग 20 प्रतिशत नमी होती है, को खुरचकर अलग कर लिया जाता है। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), नई दिल्ली, लेखक: सुधीर सक्सेना और डाॅली वातलधर नील-हरित शैवाल संरक्षण एवं उपयोग केन्द्र सूक्ष्मजीव विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012