<h3>वैज्ञानिक विधि से गन्ने की खेती</h3> <p style="text-align: justify;">भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्राीय केंद्र, करनाल के मार्गदर्शन में श्री उमेश कुमार, गांवः तितावी, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश वैज्ञानिक विधि से <a href="../../../../../../../agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/93594d92f93593893e92f93f915-92b938932947902/गन्ने-की-खेती/92a93e928-915940-916947924940">गन्ने की खेती </a>कर रहे हैं। वह परंपरागत गन्ना खेती की तुलना में तीन गुना अधिक आय प्राप्त करने में सफल हो सके। श्री कुमार गन्ना की खेती का हृदय स्थल कहे जाने वाले क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हैं। उनका परिवार क्षेत्र के अन्य किसानों की तरह पीढ़ियों से गन्ने खेती करता आ रहा है। जहां अन्य किसानों की उत्पादकता 70-80 टन प्रति हैक्टर के आसपास होती है, वहीं उन्होंने वर्ष 2017-18 में 220 टन/हैक्टर (राज्य औसत के 3.5 गुना से अधिक) की रिकार्ड उच्च उत्पादकता व 7.5 एकड़ गन्ना फसल से 193.5 टन/हैक्टर की औसत उत्पादकता हासिल की है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="152" height="133" /></p> <h3 style="text-align: justify;">उचित फसल प्रबंधन </h3> <p style="text-align: justify;">अन्य प्रजातियों के 65-70 टन/हैक्टर की तुलना में उचित फसल प्रबंधन के साथ को.-0238 को अपनाने के बाद उन्हें 90-105 टन/हैक्टर उत्पादन मिलने लगा, लेकिन वह उत्पादकता के इस स्तर से संतुष्ट नहीं थे। उनकी अधिक गन्ना पैदा करने की ललक ने उन्हें देश के विभिन्न प्रगतिशील किसानों और शोध संस्थानों से संपर्क करने के लिए प्रेरित किया। भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्राीय केंद्र, करनाल में चौड़ी पंक्ति रोपण खेत में को.-0238 प्रजाति की गन्ना मोटाई और एकल गन्ना वजन देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। उनके खेतों में इस प्रजाति की गन्ना मोटाई लगभग आधी थी, जिसका कारण संकीर्ण पंक्ति से पंक्ति अंतर था, जो इस क्षेत्र की एक आम प्रथा है।</p> <p style="text-align: justify;">उन्हें भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केंद्र, करनाल में गन्ना खेती के लिए उचित प्रशिक्षण दिया गया। वह समझ गये कि गन्ना खेती में तीन चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं</p> <ol> <li style="text-align: justify;"><strong>अच्छी किस्म का चयन, </strong></li> <li style="text-align: justify;"><strong>अच्छा और एकसार अंकुरण और </strong></li> <li style="text-align: justify;"><strong>प्रति हैक्टर उचित पेराई योग्य गन्नों की संख्या यानि 1.25 से 1.5 लाख प्रति हैक्टर। </strong></li> </ol> <p style="text-align: justify;">उन्होंने को.-0238 प्रजाति का 4 फीट तथा 5 फीट पंक्ति से पंक्ति दूरी पर रोपण किया। शरद ऋतु (3 एकड़), वसंत ऋतु (2 एकड़) और ग्रीष्म ऋतु (2 एकड़) के दौरान फसल लगाई। खाद और उर्वरक मृदा स्वास्थ्य कार्ड रिपोर्ट के आधार पर प्रयोग किये। स्वस्थ गन्नों के एकल आंख बीज टुकड़ों को बीजोपचार के बाद टुकड़े से टुकड़े के बीच 50 सें.मी. की दूरी पर लगाया तथा लगभग 1-1.5 इंच मिट्टी से ढककर तुरंत हल्की सिंचाई दी गई। शरद ऋतु में प्रत्येक अंकुरित कली ने 4 फीट तथा 5 फीट पंक्ति से पंक्ति दूरी पर रोपाई की। फसल में औसतन क्रमशः आठ तथा दस पेराई योग्य गन्नों का उत्पादन किया, जिनकी औसत गन्ना ऊंचाई 15 फीट थी और औसत एकल गन्ना वजन 2 कि.ग्रा. था।</p> <p style="text-align: justify;">श्री उमेश कुमार अपनी सात एकड़ जमीन से प्रति एकड़ 600 क्विंटल से लेकर 920 क्विंटल तक उपज प्राप्त करने में सफल रहे। उनकी औसत गन्ना उपज 744 क्विंटल/एकड़ रही। भूमि पट्टे की दर (रुपये 30000/एकड़) को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक विधि के तहत उनका औसत व्यय 84,550 रुपये तथा वैज्ञानिक विधि के तहत 94,428 रुपये था। वैज्ञानिक विधि में उच्च व्यय मुख्य रूप से अधिक उत्पादन के कारण अतिरिक्त गन्ना काटने, लोड करने और परिवहन शुल्क के कारण था।</p> <h3 style="text-align: justify;">दाेनाें विधियाें में लाभ का अंतर</h3> <p style="text-align: justify;">खेती की पारंपरिक विधि द्वारा प्रति एकड़ शुद्ध लाभ 52,300 रुपये एवं वैज्ञानिक विधि द्वारा 1,75,430 रुपये था, जो 3.35 गुना अधिक था। उनकी उच्चतम आय (गन्ना से 2.99 लाख रुपये और अंतःपफसली से 32000 रुपये) 5 फीट पंक्ति से पंक्ति दूरी पर थी, जिसमें उन्हें 2.22 लाख रुपये का शुद्ध लाभ मिला। यह पारंपरिक गन्ना की खेती की तुलना में 4.25 गुना अधिक था। वर्ष 2018 में उन्होंने केला व पपीता की फसल, गन्ना फसल (10 फीट युग्मित पंक्ति रोपण) में अंतःफसली के रूप में लगाई। पपीते की अंतःफसल लेने पर 300 क्विंटल पपीता एवं 400 क्विंटल गन्ना प्रति एकड़ की दर से प्राप्त किया। इससे उन्हें शुद्ध मुनाफा 3 से 5 लाख रुपये का प्राप्त हुआ। उनको देखकर आसपास के लगभग 70 प्रतिशत किसानों ने गन्ना की चैड़ी पंक्ति रोपण विधि अपनाई है। वे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सैकड़ों किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), रविन्द्र कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक (पादप प्रजनन), प्रधान अन्वेषक बीज परियोजना,एम.आर. मीना गन्ना वैज्ञानिक (पादप जनन), पूजा, वैज्ञानिक (पादप कार्यिकी), एम.एल. छाबड़ा, प्रधान वैज्ञानिक (पादप रोग विज्ञान), एस.के. पाण्डेय, प्रधान वैज्ञानिक(कीट विज्ञान), भाकृअनुस-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केंद्र, करनाल और बक्शी राम निदेशक, भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर</p>