<h3 style="text-align: justify;">गन्ना उत्पादों की बिक्री से मालामाल</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की खेती का हृदय स्थल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसान, फसल विविधीकरण-एवं गन्ना उत्पाद संर्वधन को आत्मसात करके अपने गांव 'बधाई' के नाम से ब्रांड बनाकर, मूल्य संवर्धित गुड़, शक्कर, सहफसलों से दालें, बेसन, मसाले आदि की मार्केटिंग करके श्री अरविन्द मलिक, गांव बधाई कलां, मुज्जफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश ने क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। संस्थान के करनाल केन्द्र के वैज्ञानिकों के परामर्श से उन्होंने चौड़ी पंक्ति विधि पर गन्ने की खेती करना शुरू किया। गन्ने में अंतःफसल के रूप में चना, मसूर, मूंग, उड़द, धनिया, आलू, गेहूं आदि सहफसलों की खेती की। चने को बाजार में न बेचकर चने का बेसन बनाकर बेचा व चने के छिलके को पशुओं के आहार के रूप में बिक्री की और मुनाफा कमाया। गन्ने की फसल चीनी मिल में न बेचकर गुड़, खांड, शक्कर आदि का उत्पादन किया। स्वयं की एक कम्पनी बनाई, जिसे एफ.एस.एस.सी.आई. में पंजीकरण कराया। इन्होंने अपने उत्पाद को 'बधाई' उत्पाद के नाम से पंजीकृत करवाया और मुनाफा कमाया।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="161" height="141" /></p> <h3 style="text-align: justify;">प्रति एकड़ 200 टन गन्ना उत्पादन का लक्ष्य </h3> <p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र के सांगली जिले की वालवा तहसील के गांव आष्टाके श्री संजीव माने वर्ष 1988 से केवल गन्ने की ही खेती करते हैं। जब उन्होंने खेती करना शुरू किया, तो उनकी फसल की उपज 22-23 टन प्रति एकड़ थी। अपने गांव के एक बुजुर्ग किसान से शिक्षा लेकर श्री माने ने 40-45 टन प्रति एकड़ उपज प्राप्त करना शुरू किया। पिफर वे गन्ना अनुसंधान केन्द्र, पाड़े गांव से जुड़े और गन्ना किस्म को.-86011 का बीज प्राप्त किया तथा वर्ष 1994 में प्रति एकड़ 86 टन गन्ना पैदावार प्राप्त की। ये उनके लिए एक सुखद अनुभव था, अब उनका लक्ष्य एक एकड़ से 100 टन गन्ना पैदा करना था। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="143" height="125" /></p> <p style="text-align: justify;">सौभाग्य से कोयंबटूर की गन्ना किस्म को.-86032 (नीरा) का बीज उन्हें प्राप्त हो गया। वर्ष 1997-98 में पहली बार वे 100 टन प्रति एकड़ के लक्ष्य के लगभग पहुंचे। तीन फीट पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर जुड़वां पंक्ति से गन्ने की बुआई की तथा टपक सिंचाई विधि से पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक सिंचाई की। प्रति एकड़ 98.5 टन की पैदावार प्राप्त करने में सफल रहे। तब से लेकर आज तक उनके खेतों की पैदावार 100 टन प्रति एकड़ से कम कभी नहीं हुई। उन्होंने अपना अगला लक्ष्य 150 टन प्रति एकड़ गन्ने की उपज लेने का रखा, पिछले कुछ वर्षों के दौरान वे गन्ना किस्म को.-86032 से 4.5 पफीट पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर, गन्ना पौध रोपण तकनीक से 130 टन, 140 टन व 148 टन प्रति एकड़ तक उपज प्राप्त करने में सफल रहे। अब वे प्रति एकड़ 200 टन गन्ना उत्पादन करने के महत्वकांक्षी मिशन पर कार्य कर रहे हैं। इसके लिए गन्ना फसल को अनुकूल जलवायु उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न ऊंचाई पर पफाॅगरस लगाकर नमी वाला वातावरण तैयार किया है तथा टपक सिंचाई विधि से सिंचाई कर रहे हैं। इन्होंने गन्ना किस्म को.-86032 से पिछले वर्ष एक एकड़ में 167 टन गन्ने की उपज प्राप्त की तथा वे आशावान हैं कि एक दिन प्रति एकड़ 200 टन गन्ना उपज प्राप्त करने में भी सफल रहेंगे।</p> <h3>गन्ना प्रजनक बीज उत्पादन से आय</h3> <p style="text-align: justify;">श्री सुमेर चंद मोहन वर्मा गांव पंजोखरा इंद्री करनाल हरियाणा के मजिस्ट्रेट कोर्ट में एक प्रसिद्ध वकील हैं। उनकी गांव बुढ़नपुर में पैतृक भूमि है। खेती के प्रति लगाव होने के कारण वे खुद को खेती में शामिल करने से नहीं रोक सके।वर्ष 2009 से भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्राीय केंद्र करनाल के गन्ना बीज कार्यक्रम से जुड़े प्रगतिशील किसानों में से ये एक हैं। प्रत्येक वर्ष भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्राीय केंद्र करनाल की बीज टीम की देखरेख में वे महत्वपूर्ण गन्ना किस्मों का हजारों क्विंटल स्वस्थ प्रजनक बीज का उत्पादन और आपूर्ति कर रहे हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="126" height="194" /></p> <p style="text-align: justify;">खेती के लिए कम समय की उपलब्धता के कारण वे गन्ने की परंपरागत खेती पद्धति का पालन करते थे। विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों से प्रेरणा और चौड़ी पंक्ति रोपण से अधिक उपज की संभावना को महसूस करके उन्होंने वर्ष 2016-17 में प्रो-ट्रे में गन्ने की पौध उगाई एवं उनका शरद ऋतु के दौरान 4 पफीट पंक्ति से पंक्ति तथा 1.5 फीट पौधे से पौधे की दूरी पर प्रत्यारोपण किया। गन्ने में सरसों को अंतःफसल के रूप में लिया जिसकी बिक्री से 35,000 रुपये अर्जित हुए। गन्ना पफसल को बीज के रूप में बेचने से उन्होंने प्रति एकड़ 1,98,000 रुपये आय अर्जित की। भूमि की पट्टे की दर और अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए उनका शुद्ध लाभ 1,63,000 रुपये प्रति एकड़ था जो कि गन्ना की चीनी मिलों को आपूर्ति के लिए पारंपरिक खेती से लगभग तीन गुना अधिक है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), रविन्द्र कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक (पादप प्रजनन), प्रधान अन्वेषक बीज परियोजना,एम.आर. मीना गन्ना वैज्ञानिक (पादप जनन), पूजा, वैज्ञानिक (पादप कार्यिकी), एम.एल. छाबड़ा, प्रधान वैज्ञानिक (पादप रोग विज्ञान), एस.के. पाण्डेय, प्रधान वैज्ञानिक(कीट विज्ञान), भाकृअनुस-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केंद्र, करनाल और बक्शी राम निदेशक, भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर</p>