परिचय गन्ना, सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप में एक मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता रहा है। इसकी खेती 110 से अधिक देशों में होती है। ब्राजील व भारत मिलकर विश्व के कुल गन्ना उत्पादन का 50 प्रतिशत उत्पादन करते हैं। भारत का गन्ना उत्पादन की दृष्टि से विश्व में दूसरा स्थान है। हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार लाने में गन्ने की प्रमुख भूमिका है। चीनी एवं कपास उद्योग के बाद कृषि आधारित दूसरा सबसे बड़ा उद्योग चीनी ही है। गन्ना एवं चीनी उद्योग ने केवल 60 लाख किसानों व उनके परिवारों को रोजगार प्रदान करते हैं, बल्कि उनकी आर्थिक समृद्धि व खुशहाली के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में भी मददगार है। इसके अतिरिक्त चीनी मीलों से रोजगार भी उपलब्ध होता है। देश में वर्ष 2015 -16 में 49.1 लाख हे. क्षेत्र से 69.4 टन/हे. उत्पादकता के साथ 3414.2 लाख टन गन्ने का उत्पादन किया गया। यद्यपि गन्ना की उत्पादन क्षमता 474 टन/हे. आंकी गई है। स्पष्ट है कि उन्नत तकनीक एवं प्रजातियों को अपनाकर गन्ना उत्पादकता में आशातीत वृद्धि की जा सकती है। इससे गन्ना आधारित चीनी उद्योग तथा गन्ना कृषक प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो सकते हैं। गन्ने की उपज में अस्थिरता, बढ़ती उत्पादन लागत, लाभांश में कमी एवं उत्पदकता में गिरावट गन्ना कृषकों के समक्ष प्रमुख चुनौती के मुद्दे बन गए हैं। नवीनतम कृषि अनुसन्धान के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु दशाओं के अनुकूल गन्ने की उन्नत प्रजातियों का विकास किया गया है। इसके अतिरिक्त गन्ना आधारित फसल विविधकरण, उत्पादन तकनीक, श्रमिक लागत में कमी करने के लिए अधिक दक्षता वाले कृषि यंत्रों का विकास, एकिकृत फसल सुरक्षा आदि के समन्वित प्रयोग से कृषकों की वर्तमान आय को आगामी पांच वर्षों में दोगुना कर पाना संभव है। उन्नत गन्ना उत्पादन तकनीक अधिक उत्पादकता एवं लाभ प्राप्त करने हेतु उन्नत प्रजातियों का चयन महत्वपूर्ण है। गन्ने की संस्तुत प्रजातियों में अगेती (10 माह) तथा मध्य पछेती (11 – 12 माह में पकने वाली) का चयन कृषकों को उपज एवं गुणवत्ता के आधार पर करना होता है। गन्ने की अधिक उत्पादकता एवं कृषकों को अधिक लाभ हेतु उन्नत प्रजातियों तथा अन्य गन्ना उत्पादन तकनीक का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत है –: उन्नत प्रजातियाँ उन्नत किस्मों की क्षमता के अनुसार उत्पादन ले पाना तभी संभव है, तब उनके लिए उचित फसल ज्यामिति तथा अनुकूल जल एवं मृदा उपलब्ध हों। गन्ने की आँख के समुचित अंकुरण,जड़ों के विकास तथा फसल की ओज के लिए प्रारंभिक आवश्यकता है कि गन्ना बुआई के समय बीज गन्ना एवं मृदा में उत्तम सम्पर्क हो। जड़ों की मृदा में उत्तम सम्पर्क हो। जड़ों की मृदा के गहरे संस्तरों तक पहुँच के लिए मृदा का आभासी घनत्व कम तथा जल धारण क्षमता अधिक होनी चाहिए। मृदा के इन भौतिक गुणों में सुधार के लिए प्राथमिक कर्षण क्रिया के तौर पर सब स्वयालर द्वारा एक मीटर के अंतराल पर 45 से 50 सें. मी. गहरी आड़ी – बेड़ी जुताई करने से लगभग 12 प्रतिशत अधिक गन्ना उपज प्राप्त की गई है। इसी क्रम में उपयुक्त बुआई विधियाँ, सूक्ष्म सिंचाई विधियाँ, जल का मितव्ययी उपयोग, सूक्ष्म समेकित पोषक तत्व प्रबंधन एवं गन्ना आधारित विभिन्न फसल प्रजातियों का विकास प्रमुख है। इन पर ध्यान देकर गन्ना उपज में आ रहे ठहराव से ऊपर उठाकर गन्ना उत्पादकों को अधिकतम आय की प्राप्ति संभव है। गन्ना बोने की उन्नत विधियाँ विभिन्न बुआई विधियाँ में कूंड विधि, समतल विधि, गड्ढा विधि, नाली विधि आदि विभिन्न उपज प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की गई है। वर्तमान में नाली विधि द्वारा गन्ना बुआई के अंतर्गत उत्तरोतर वृद्धि हो रही है, क्योंकि इसमें ज्यादा गन्ना उपज के साथ – सस्थ पोषक तव उपयोगी क्षमता एवं लाभ – लागत अनुपात अधिक पाया गया है। इसके अतिरिक्त पेड़ी फसल से भी अधिक उपज प्राप्त होती है। इसमें गन्ने की बुआई 30 सें. मी चौड़ी एवं 30 सें. मी. गहरी नालियों में की जाती है। एक नाली में गन्ने की दो नालियों की केंद्र से दूरी 150 सें. मी. (120:30) रखी जाती है। सिंचाई जल को अधिक समय तक ग्रहण करने के कारण इस विधि से सिंचाई जल में कमी की जा सकती है। जड़ों की गहराई तथा वृद्धि अधिक होने से समतल विधि की अपेक्षा इस विधि से लगभग 30 प्रतिशत तक गन्ने की उपज अधिक प्राप्त होती है। गन्ने के साथ अंत: फसल लेने से आय वृद्धि एवं टिकाऊपन कम अवधि की अधिक आय देने वाली फसलों को गन्ने के साथ अंत:फसल के रूप में उगाकर मृदा की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उत्पादन लागत कम करने और उत्पादन पद्धति के टिकाऊ बनाये रखने में सहायता मिलती है। इस प्रकार फसल विविधकरण में उपलब्ध स्रोतों का समुचित उपयोग कर सीमांत और लघु किसानों के आर्थिक और सामजिक स्तर को उठाया जा सकता है इसके साथ एकल एवं सतत कृषि के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। गन्ने के कुल क्षेत्रफल का 10 प्रतिशत शरदकाल में, 60 – 65 प्रतिशत बसंतकाल में और 20 – 25 प्रतिशत ग्रीष्मकाल में बोया जाता है। उपर्युक्त ऋतुओं में गन्ना क्रमशः 90, 75 एवं 60 सें. मी. की दूरी पर बोया जाता है उत्तर भारत में गन्ना मुख्यतः शरदकाल (अक्टूबर) और बसंतकाल (फरवरी – मार्च) में लगाया जाता है। ग्रीष्मकाल को छोड़कर बाकी दोनों ऋतुओं में गन्ने के साथ अंत: फसल ली जा सकती है। अत: गन्ने में के रूप में विविधकरण पद्धति से दलहनी तथा तिलहनी फसलों को गन्ने के साथ लगाकर इन्किन उत्पादकता भी बढ़ायी जा सकती है। शीतकालीन पेड़ी में चारा अंत:फसलों से चारा उत्पादन में वृद्धि के साथ – साथ गन्ना पेड़ी में आँखों के प्रस्फूटन में बढ़ोतरी संभव है। फर्ब विधि द्वारा गेहूं + गन्ना फसल पद्धति पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकतर किसान गन्ने की बुआई गेहूं की फसल होने लेने के बाद करते हैं। गेहूं की फसल के बाद लगाये गये गन्ने से लगभग 35 से 50 प्रतिशत की कमी हो जाती है। फर्ब विधि द्वारा रेज्ड बेड पर, जो कि लगभग 50 सें. मी. चौड़ी होता हैं गेहूं की तीन पंक्तियों की बुआई 17 सें. मी. की दूरी पर बुआई के उपयुक्त समय नवंबर या दिसंबर के प्रथम सप्ताह में की जाती है। रेज्ड बेड, नालियां बनाने के लिए ट्रैक्टरचलित रेज्ड बेड मेकर कम फर्टी सीड ड्रिल का प्रयोग किया जा सकता है। गन्ने की बुआई भी नवंबर में 80 सें. मी. दूरी पर स्थित नालियों में गेहूं बोने के तुरंत बाद दी जाने वाली हल्की सिंचाई के साथ कर देते हैं। गन्ने के टुकड़ों को सिंचित के साथ कर देते हैं। गन्ने के टुकड़ों को सिंचित नालियां में डालते हुए पैर से दबाते हुए चलते है दिसंबर में बोई जाने वाले गेहूं की दशा में गन्ने की बुआई गेहूं की खड़ी फसल में 80 सें. मी. दूरी स्थित नालियों में फरवरी में की जाती है। यह उपोष्ण कटिबंधीय भारत में बसंतकालीन गन्ना बोने का उपयुक्त समय है। गन्ने की बुआई गेहूं में सिंचाई के साथ की जाती है। गेहूं में सिंचाई सायंकाल में की जाती है। दुसरे दिन जब मिट्टी फूल जाती है तथा हल्का पानी नालियां में रहता है तब गन्ने के दो या तीन आँखों वाले टुकड़ों को डाल कर पैरों से कीचड़युक्त नालियों में दबाते हुए चलते हैं। बीज गन्ना की मितव्ययी एवं शीघ्र बहुगुणन परंपरागत विधियों द्वारा बुआई करने बीज गन्ने की प्रयुक्त मात्रा (6 – 8 टन/हे.) को कम करने तथा उन्नत बीज गन्ना के त्वरित बहुगुणन के उद्देश्य से विकसित की गयी गांठे एक अच्छा विकल्प साबित हो रही हैं। इसमें बीज गन्ना की मात्रा 1.5 से 2 टन ही एक हे. के लिए पर्याप्त होती है। इस विधि में सिर्फ गन्ने की एक गांठ ही बीज के रूप में प्रयोग होती है। पोषक तत्व प्रबंधन गन्ना, एक बहुवर्षीय व्यावसायिक फसल है और यह काफी अधिक मात्रा में जैव – पदार्थ उत्पादित करता है। इसलिए गन्ना आधारित फसल उत्पादन प्रणाली में पोषक उत्पादक में पोषक तत्व प्रबंधन एक प्रमुख पहलू है। गन्ने की फसल से 100 टन/हे. उपज प्राप्त करने के लिए नाइट्रोजन 20 8 किलो, 55 किग्रा. फास्फोरस, 280 किग्रा. पोटेशियम, 30 किग्रा., सल्फर, 3.5 किग्रा. लौह तत्व, 1.2 किग्रा. मैंगनीज ताथा 0.6 किग्रा. जिंक मृदा से अवशोषित होता है। इन तत्वों की मृदा में लगातार प्रतिपूर्ति करते रहना आवश्यक है। समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन प्रणाली में हरी खाद के रूप में ढैंचा तथा अंत:फसली खेती में दलहनी फसलों को समावेश किया जाना चाहिए। जैव उर्वरक (नाइट्रोजन स्थिरिकारक, फॉस्फेट विलायक जीवाणु तथा पोटेशियम विलायक) आदि का प्रयोग करने से अकर्बिक खादों के प्रयोग में कमी की जा सकती है तथा इससे गन्ना उपज भी प्रभावित नहीं होती। दलहनी फसल, गन्ने की खेती में हरी खाद/दाल/चारा हेतु या तो अनुक्रम में या अंत:फसल के रूप में उगाई जाती है। मृदा उत्पादकता बढ़ाने के लिए शरदकालीन गन्ने के साथ मटर, मसूर, मेथी और बसंतकालीन गन्ने के साथ मूंग, लोबिया, उड़द आदि अंत:फसल के रूप में अच्छे विकल्प है। गन्ने से पूर्व हरी खाद हेतु ली गई दलहनी फसल 19 से 43 प्रतिशत गन्ने की पैदावार बढ़ा देती है और 41 से 85 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टर मृदा में जमा कर देती है। जैविक खाद जैसे गोबर, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, प्रेसमड, हरी खाद आदि सभी मुख्य एवं सूक्ष्म – मात्रिक पोषक तत्वों के स्रोत हैं। गन्ने की फसल में किल्ले बनने की अवस्था में खरपतवारों की मौजदूगी से मिल योग्य गन्नों की संख्या तथा वजन में कमी आती है जिससे गन्ना उपज घट जाती है। खरपतवार प्रबंधन क्रियाओं में पाया जाता गया है कि एट्राजीन नामक रसायन की 2 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हे. (जमाव पूर्व) मात्रा के प्रयोग के पश्चात् 2, 4 – डी की 1 किलोग्राम सक्रिय तत्व मात्रा (जमाव पश्चात्) का प्रयोग करने और एक बार अच्छी प्रकार से निराई – गुड़ाई करने से प्रभावी रूप से खरपतवार नियंत्रण हो जाता है। इससे गन्ना उपज में आशातीत वृद्धि होती है। पेड़ी गन्ने में पताव बिछावन से भी प्राकृतिक रूप से खरपतवार नियंत्रण हो जाता है। अधिक उपज वाली मुख्य गन्ना किस्में एवं विशेषताएं अगेती किस्में को – 022 38 (करन – 4)- यह गन्ना माध्यम मोटी तथा धूसर भूरे रंग की होती है। यह लाल सड़न रोग की प्रतिरोधी किस्म है। इसकी गन्ना उपज 80 तन प्रति हे. तथा इसमें शर्करा 18 पाई गयी है। को – 0237 (करन – 8) – इसका गन्ना माध्यम मोटा तथा पीले रंग का होता है। यह लाल सड़न रोग की प्रतिरोध किस्म है। 70 टन प्रति हे. उपज क्षमता के साथ इसमें 18 .75 प्रतिशत शर्करा होती है। को पीके 05191 – यह गन्ना माध्यम मोटाई का होता है। यह किस्म लाल सड़न रोग के प्रति मध्यम अवरोधी है। यह सूखा एवं जलप्लावित क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त पाई गई। इसकी उपज 85 – 90 टन प्रति हे. तथा शर्करा 17 प्रतिशत है। कोलेख 94184 – शीघ्र पकने वाली यह गन्ना प्रजाति पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार प्रांत में जलप्लावन की स्थिति के लिए सहनशील होने के कारण गन्ना उपज में कमी नहीं आने देती तथा इसकी पेड़ी भी अच्छी प्राप्त होती है। कोशा – 8272 – उत्तर भारत के लिए यह शीघ्र पकने वाली प्रजाति बावक फसल में 84 से 87 टन प्रति हे. गन्ना उपज देने में सक्षम है। मध्य देर से पकने वाली गन्ना किस्में को पंत – 97222 – इसका गन्ना माध्यम मोटाई तथा हल्के हरे रंग का होता है। यह लाल सड़ न के प्रति माध्यम रोगरोधी है। इसकी उपज 80 – 85 टन प्रति हे. तथा शर्करा 17 प्रतिशत है। को – 128 – यह किस्म लाल सड़न रोग के प्रति माध्यम अवरोधी है तथा इसकी पेड़ी उत्तम होती है। इसकी उपज 80 – 85 टन प्रति हे. तथा शर्करा 16.5 – 17.5 प्रतिशत है। को – 05011 (करन – 9) - इसका गन्ना माध्यम मोटाई का होता है। यह किस्म लाल सड़न रोग के प्रति माध्यम अवरोधी है। इसकी पेड़ी बहुत उत्तम होती है। इसकी उपज 75.8 तनटन प्रति हे. तथा इसमें शर्करा 17 – 18 प्रतिशत मिलती है। जल प्रबंधन गन्ने की फसल की जल मांग लगभग 1400 से 2300 मिमी. उपोष्ण तथा 2000 से 3500 मि.मी. उष्ण क्षेत्र में होती है। शोध कार्यों में पाया गया कि पताव बिछावन, एकांतर नाली विधि तथा चिन्हित की गई विभिन्न क्रांतिक अवस्थाओं में जल उपलब्धता के अनुसार सिंचाई करने से गन्ना उपज में वृद्धि होती है तथा जल उपयोग क्षमता भी अच्छी रहती है। इसके अतिरिक्त सूक्ष्म सिंचाई विधियों में टपक सिंचाई विधि से काफी अच्छे परिणाम मिले हैं। इसी के साथ उचित पोषक तत्वों को बी पौधों में दिया जा सकता है। इस विधि से पेड़ी की फसल बहुत अच्छी होती थी तथा जल एवं पोषक तत्वों की हानि नहीं होती है। सतह एवं उपसतह पर टपक सिंचाई विधि गन्ने में 40 प्रतिशत तक पानी कोई बचत के साथ 20 प्रतिशत तक गन्ना उपज में वृद्धि पायी गई है। टपक सिंचाई विधि द्वारा नाइट्रोजन देने पर 25 प्रतिशत बचत आंकी गई है। गहरी नाली में दो पंक्ति विधि द्वारा बुआई करने पर टपक सिंचाई विधि अपनाने से बावक गन्ने की उपज एवं पेड़ी उपज में वृद्धि पाई गई शरद कालीन गन्ने में अंत:फसली खेती शरदकालीन गन्ने की पैदवार बंसतकालीन गन्ने की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत तथा चीनी का परता 0 .5 प्रतिशत अधिक होता है। गन्ना + आलू की अंत:फसली खेती से आलू – गन्ना क्रमबद्ध पद्धति की तुलना में दोनों फसलों की उपज में बढ़ोतरी के साथ – साथ उर्वरक में भी बचत होती है। इसी तरह गन्ने की पैदावार पर सकरात्मक प्रभाव पड़ता है। शरदकालीन गन्ने की पंक्तियों के बीच मसूर की दो पंक्तियों के बीच मसूर की दो पंक्तियों की अंत: फसली बुआई पद्धति में 150 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हे. एजोस्पिरिलम के साथ प्रयोग करने से गन्ना समतुल्य उपज में वृद्धि के साथ – साथ 37.5 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हे. की बचत भी पायी गयी है। शरदकालीन गन्ने में सरसों की 1:1 पद्धति से शुद्ध लाभ में वृद्धि होती है। इसी प्रकार सरसों की दो पंक्तियों की अंत:फसल (1:2) को लिया जा सकता है। बसंत कालीन गन्ने के साथ अंत:फसली खेती बसंतकालीन गन्ना – पेड़ी फसल पद्धति में कार्बेनिक पदार्थों का संरक्षण एवं खरपतवार नियंत्रण मुख्य मुद्दा है। इसका समाधान दलहनी अतं:फसलों के चयन द्वारा किया जा सकता है। बंसत कालीन गन्ने के साथ मूंग और उड़द की अंत:फसली खेती मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में की जाती है। द्विउद्देश्यीय दलहनी फसलों के समावेश से गन्ना + लोबिया व गन्ना + मूंग पद्धति द्वारा शुद्ध लाभ में वृद्धि की जा सकती है। इन फसलों की फली तोड़ने के बाद पौधों को हरी अवस्था में ही गन्ने की दो पंक्तियों के बीच भीम में पलट कर दबा देने से 30 से 40 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हे. की बचत होती है। लोबिया और मूंग की सह्फ्ली पद्धति से प्रति हे. क्रमश: 70.6 और 48.1 किग्रा. नाइट्रोजन का योगदान होता है\ बंसतकालीन गन्ने की पंक्तियों के बीच के स्थान पर हरी खाद के लिए ढैंचा की सघन बुआई से खरपतवार का नियंत्रण प्रभावी ढंग से हो जाता है। ढैंचा के सड़ने की प्रक्रिया में निकलने वाले रसायन (एलिलोपैथी), मोथा जैसे खरपतवार के जमाव को रोकते है। इसके साथ – साथ मृदा में तत्वों को संतुलित रखते हैं। शीतकालीन पेड़ी आधारित अंत:फसली खेती जाड़े में शुरू की गई पेड़ी में अधोभूमिगत स्थित गन्ने की आँखों का न जमना फसल के असफल होने का मुख्य कारण है। गन्ने की अधिक शर्करायुक्त शीघ्र पकने वाली प्रज्तियों के साथ यह एक विशेष समस्या है। उपयुक्त तापमान आने तक इन अधोभूमिगत आँखों की दैहिक क्रियाओं को सक्रिय अवस्था में लाकर इस समस्या का समाधान संभव है। सघन तथा जल्दी बढ़ने वाली चारा फसलों जैसे – बरसीम एवं सेंजी की बुआई कर जाड़े के प्रभाव में कम करके पेड़ी में अच्छा फुटाव प्राप्त किया जा सकता है। ये चार की फसलें पेड़ी में जीवंत अवरोध परत के रूप में जड़ क्षेत्र का ताप नियंत्रण तथा भूमिगत स्थित आँखों को पाले के कुप्रभाव से बचाव करती हैं। इससे बसंत आने पर पेड़ी में उपयुक्त फुटाव हो जाता है और गन्ना – पशु पद्धति को बल मिलता है। मिट्टी चढ़ाना व बंधाई करना गन्ने की बढ़ी हुई फसल को गिरने से बचाने के लिए जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के प्रथम सप्ताह में गन्ने की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं। अगस्त में पहली बंधाई पंक्तियों में खड़े प्रत्येक थान की अलग – अलग करें। दूसरी बधाई सितंबर में दो आमने – सामने के थानों को आपस में मिलाकर करें। ऐसा करने से वर्षा ऋतु में तेज हवा के बहाव के बावजूद भी गन्ना कम गिरेगा और उपज तथा शर्करा परतों में कमी नहीं आएगी। सारणी 1. गन्ना खेती से कूल एवं वास्तविक आय (2014 – 15) प्रान्त कुल आय (रूपये/हे.) शुद्ध आय (रूपये/हैक्टर) आंध्र प्रदेश 84982 35156 हरियाणा 109910 54825 कर्नाटक 108117 65338 महाराष्ट्र 108940 59452 तमिलनाडु 112851 76806 उत्तर प्रदेश 101864 62116 उत्तराखंड 977891 64987 अखिल भारत 104127 61810 स्रोत :- सीएसपी रिपोर्ट 2017 -18 सारणी 2 – प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में जनपद स्तर पर गन्ना उपज प्रतिशत 2013 -14 गन्ना उत्पादक प्रदेश गन्ना उपज 50 टन/हे.से कम गन्ना उपज 50 से 80 टन/हे.से कम गन्ना उपज 50 टन/हे.से अधिक जनपदों की संख्या गन्ना क्षेत्र (प्रतिशत) जनपदों की संख्या गन्ना क्षेत्र (प्रतिशत) जनपदों की संख्या गन्ना क्षेत्र (प्रतिशत) उत्तर प्रदेश (41.4 प्रतिशत) 13 2.9 62 97.1 0 0.0 महारष्ट्र (23.0 प्रतिशत) 0 0.00 15 30.3 13 69.7 कर्नाटक (11.7 प्रतिशत) 0 00.0 4 14.1 21 85.9 तमिलनाडु (8.4 प्रतिशत) 0 0.0 3 12.9 19 87.1 स्रोत : सीएसपी रिपोर्ट 2017 -18 नोट - कोष्ठक में दर्शाए गये आंकड़ें अखिल भारतीय स्तर पर गन्ना उत्पादन में प्रतिशत भागीदारी दर्शाते हैं। सारणी – 3. अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (गन्ना) द्वारा विकसित प्रमुख गन्ना किस्में परिक्षेत्र अगेती पछेती प्रायद्वीपीय को 85004, को 94008, को 0403, कोशंक 05103 को 86032, को 87025, को 87044, को 8371, कोएम 88121, को 91010, को 99004, को 2001-13, को 2001-15, को 0218, को 06027, कोशंक 05104 पूर्वी तटीय परिक्षेत्र कोसी 01061, कोउ 03151 को 86249, को 06030 उत्तर – पश्चिमी परिक्षेत्र कोएच 92201, कोशा 95255, को 98014, कोशा 96268, को 0118, को 0238, को 0237, कोपीके 05191, को 05009 कोशा 91230, कोपंत 90223, कोशा 94270, कोएच 119, कोपंत 97222, कोजे 20193, कोएस 96275, को 0124, कोएच 128, को 05011, को 06034 उत्तरी मध्य एवं उत्तर – पूर्वी परिक्षेत्र को 87263, को 87268, को 89029, कोसे 95422, कोसे 96234, कोलक 94184, कोसे 01421, को 0232 बीओ 128, कोसे 92423, को 0233, कोपी 06436 (कोपी 2061) पेड़ी गन्ना प्रबंधन देश के कूल गन्ना क्षेत्र के लगभग आधे भाग में पेड़ी के रूप में अच्छादित रहता है।कम लागत के अतिरिक्त पेड़ी गन्ने का मुख्य योगदान, प्रांरभिक पेराई सत्र के समय पर्याप्त चीनी परता देना एवं पेराई सत्र को शीघ्र चालू कराने के रूप में है। पेड़ी गन्ने की उत्पदकता बढ़ाने के लिए संस्तुत की गयी अच्छी पेड़ी उपज वाली प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए। इसके अलावा गहरी जुताई द्वारा तैयार खेत में नाली विधि द्वारा समय पर बुआई एवं बावक फसल की समय पर एक साथ कटाई करनी जरूरी है। आरएमडी यंत्र द्वारा आवश्यक कर्षण क्रियाएँ सम्पन्न करने के पश्चात पोषण एवं जल प्रबंधन के समन्वित प्रयास किये जाने चाहिए। संस्तुत किफायती विधियों जैसे टपक सिंचाई विधि द्वारा सिंचाई के पानी के साथ घुलनशील खादों एवं अन्य दवाओं आदि को पौधों के सक्रिय मूल क्षेत्र में अनुकूल समय पर देना भी जरूरी है। पर्याप्त फसल सुरक्षा हेतु जैव नियंत्रक विधियों एवं रासायनिक तत्वों का उचित समय पर संस्तुत विधियों के अनुसार उन्नत पेड़ी प्रबंधन करने से उपज में पर्याप्त वृद्धि प्राप्त की जा सकती है। सारणी 4. गन्ने के साथ अंत: फसली खेती किस सस्य क्रियाएँ अंत:फसल पंक्ति समायोजन बीज दर खाद एवं उर्वरक उपज/आर्थिक आय शरद कालीन गन्ना + राजमा 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. राजमा – 80 किग्रा./हे. गन्ना 20:80:60 राजमा 80:40:40 गन्ना 85 टन/हे. राजमा 18 क्विंटल/हे. शुद्ध लाभ रूपये 313200/- गन्ना + मक्का 1:1 या 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. मक्का – 20 किग्रा./हे. गन्ना 200:80:60 मक्का 120:60:40 गन्ना 80 टन/हे. मक्का हरा भुट्टा 80,000/he. शुद्ध लाभ रूपये 352257/- गन्ना + आलू 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. आलू – 20 किग्रा./हे. गन्ना 200:80:60 आलू 120:60:100 गन्ना 90 टन/हे. आलू 27.5 क्विंटल/हे. शुद्ध लाभ रूपये 413735/- गन्ना + मसूर 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. मसूर – 20 किग्रा./हे. गन्ना 200:80:60 मसूर 20:40:20 गन्ना 75 टन/हे. मसूर 12 क्विंटल शुद्ध लाभ रूपये 198805/- गन्ना + सरसों 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. सरसों – 4 किग्रा./हे. गन्ना 200:80:60 सरसों 80:40:30 गन्ना 75 टन/हे. सरसों 15 क्विंटल शुद्ध लाभ रूपये 417376/- बंसत कालीन गन्ना + मूंग 1:2 गन्ना – 7 टन/हे. मूंग – 20 किग्रा./हे. गन्ना 180:80:60 मूंग 18:46:0 गन्ना 75 टन/हे. मूंग 7 क्विंटल/हे. शुद्ध लाभ रूपये 145670/- गन्ना+उड़द 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. उड़द – 20 किग्रा./हे. गन्ना 180:80:60 उड़द 18:46:0 गन्ना 75 टन/हे. उड़द 4 क्विंटल/हे. शुद्ध लाभ रूपये 103150/- गन्ना+लोबिया 1:2 गन्ना – 6 टन/हे. लोबिया – 20 किग्रा./हे. गन्ना 180:80:60 लोबिया 18:46:0 गन्ना 75 टन/हे. लोबिया (हरी फली) 29. क्विंटल/हे. शुद्ध लाभ रूपये 148734/- शरदकालीन पेड़ी पेड़ी+रिजका 1:3 गन्ना-15 किग्रा./हे. गन्ना 200:80:60 रिजका 20:60:60 गन्ना 72 टन/हे. रिजका 41 टन/हे. हरा चना शुद्ध लाभ रूपये 321148/- पताई बिछाना गन्ने का पूर्ण जमाव होने के बाद दो पंक्तियों के बीच गन्ने की सूखी पत्तियों की 8 – 10 सें. मी. मोटी तह बिछानी चाहिए। सूखी, पत्तियों पर क्लोरोपाइरीफास की 5 लीटर (1 लीटर सक्रिय तत्व/हे.) मात्रा का 1500- 1800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। इससे दीमक व सैनिक कीट से बचाव हो सकता है। पत्तियां बिछाने से भूमि द्वारा जल का वाष्पीकरण कम होता है और खरपतवार बिल्कूल ही नहीं निकलते हैं। वर्षाऋतु में यही पत्तियां सड़ – गल कर खेत को उर्वराशक्ति प्रदान करती हैं। कटाई गन्ने की कटाई जमीन की सतह से करनी चहिए। ऐसा करने से गन्ना उपज में ह्रास नहीं होता। यदि गन्ने की कटाई में एक इंच गन्ना रह जाए तो प्रति हे. 10 क्विंटल का नुकसान होता है तथा पेड़ी की फसल भी अच्छी नहीं होती है। लेखन : सुधीर कुमार शुक्ला, गया करन सिंह स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार