उपोष्ण भारत में गन्ने की कटाई के उपरांत और चीनी मिलों में प्रसंस्करण की प्रक्रिया के दौरान शर्करा में ह्रास, अधिकतर चीनी मिलों की एक गंभीर समस्या है। कटाई के 72 घंटों बाद गन्ने को रखने पर उसमें नमी कम होने के कारण वजन में कमी आने लगती है और शर्करा के इन्वर्जन के कारण गन्ने के रस में शर्करा की मात्रा का ह्रास होने लगता है। कटाई से मिल तक पहुंचने में हुई देरी के अलावा अन्य कारकों जैसे आसपास का तापमान, आर्द्रता, गन्ने की प्रजाति, भंडारण की अवधि, इन्वर्टेज की गतिविधि और परिपक्वता की स्थिति आदि भी चीनी परता में गिरावट के लिए उत्तरदायी हैं। कटाई उपरांत शर्करा की कमी कटाई उपरांत शर्करा ह्रास से तात्पर्य है कि किसी प्रकार का मात्रात्मक या गुणात्मक परिवर्तन जो कि गन्ने की कटाई से प्रसंस्करण के दौरान इसकी संरचना में पाया जाता है। यह कमी गन्ना कटाई के तुरंत बाद शुरू हो जाती है, जो बाद में अधिक तापमान, कटाई से पूर्व जलाने, कटाई के बाद मिल पहुंचने में देरी एवं सूक्ष्मजीवों के प्रकोप से बढ़ती है। कटाई के उपरांत गन्ने के सूखने से इसके भार में 15-17 प्रतिशत का ह्रास पाया गया। गन्ने की कटाई के उपरांत समय के साथ इसकी नमी एवं शर्करा में कमी का प्रतिशत बढ़ता है और रिड्यूसिंग शुगर की मात्रा भी बढ़ती है। इस अवस्था में कुछ सूक्ष्मजीव भी विकसित हो जाते हैं, जो कार्बनिक एसिड एवं डेक्स्ट्रॉन उत्पन्न करते हैं, जिससे गन्ना खट्टा हो जाता है। शर्करा परता में ह्रास एवं गोंद की मात्रा में बढ़ोतरी से जूस का गाढ़ापन बढ़ जाता है। इस प्रकार भौतिक, जैवरासायनिक एवं सूक्ष्मजीवीय विकृतियों के कारण कटा हुआ गन्ना खराब हो जाता है। इसलिए शर्करा परता में सुधार तथा कृषकों एवं चीनी मिल मालिकों की बेहतर आमदनी के लिए आज के परिप्रेक्ष्य में गन्ने के सुचारू प्रबंधन की आवश्यकता है। पेराई में देरी से हानि पेराई में देरी के कारण गन्ने की गुणवत्ता में कमी आती है जिससे गन्ना कृषक व चीनी उद्योग दोनों ही प्रभावित होते हैं। कटे हुए गन्ने की नमी में कमी होने कारण गन्ने के वजन में गिरावट आने से किसानों को हानि होती है, क्योंकि गन्ने का मूल्य वजन के आधार पर मिलता है। उपोष्ण भारत में कटाई के उपरांत 72 घंटे के अंदर 7-10 प्रतिशत गन्ने का ह्रास होता है। कटे हुए गन्ने की चीनी मिल तक पहुंचने में देरी का मुख्य आर्थिक नुकसान किसानों को होता है। उत्तर भारत में प्रचलित राज्य परामर्शी मूल्य (एसएपी) के अनुसार गन्ना उत्पादकों को यह नुकसान 200 रुपये प्रति टन तक हो सकता है। शर्करा क्षति का परिमाण कटाई एवं प्रसंस्करण के बीच की देरी एवं बाह्य तापमान के कारण इन्वर्जन एवं श्वसन तथा कार्बनिक एसिड, डेक्स्ट्रॉन और पॉलीसैकेराइड का बनना शर्करा ह्रास की दर को निर्धारित करने वाले मुख्य कारक हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि ढेर करके रखे हुए गन्ने की पेराई से प्राप्त चीनी की गुणवत्ता में कम-से-कम 12 तथा अधिकतम 50 प्रतिशत तक की कमी होती है। कटाई से प्रसस्ंकरण की अवधि 72 घंटे से अधिक होने पर चीनी परता में 2 प्रतिशत की गिरावट होती है। भारतीय चीनी मिलें पेराई किए गए प्रति टन गन्ने से 5-10 कि.ग्रा. चीनी का नुकसान उठाती हैं। गर्मी के मौसममें मिलें चालू रहने पर यह हानि और भी अधिक बढ़ जाती है। कटाई उपरांत गुणवत्ता ह्रास के मुख्य कारण प्रजातियों का स्वभाव एवं उनका इन्वर्जन व्यवहार (रिंड की कठोरता एवं मोम की मात्रा)। गन्ने में नमी एवं उसकी वास्तविक स्थितिः गंदे, क्षतिग्रस्त एवं भीगे हुए गन्ने की अपेक्षा सूखे हुए गन्ने की गुणवत्ता का धीमी गति से ह्रास होता है। फसल की परिपक्वता का स्तर। कटाई पूर्व पत्तियों जैसे गन्ना जलाना एवं अगौलाविहीन करना। कटाई एवं भंडारण के समय मौसम की स्थिति जैसे अधिक तापमान, आर्द्रता एवं वर्षा। कटाई की विधियां: हाथ या मशीन से। हरे या जले हुए गन्ने की कटाई एवं टुकड़ों का आकार यदि कटाई मशीन द्वारा की गई हो। संग्रहण विधि एवं अवधि-खुले में संग्रहण या गठ्ठर में एवं गठ्ठरों का आकार। कटाई एवं पेराई के बीच का अंतराल। मिल के अंदर तथा बाहर (केन यार्ड) की स्वच्छता की स्थितियां और मिल की प्रसंस्करण क्षमता। कीटों एवं रोगों का प्रकोप। अजैविक कारकों जैसे खारापन/क्षारीयता, अनावृष्टि, जलमग्नता, शीत तथा गन्ने के अधिक समय तक खेत में खड़े होने से फसल की वृद्धि एवं गुणवत्ता प्रभावित होती है। गन्ना ढेर लगाकर रखने के आर्थिक प्रभाव गन्ना कटाई उपरांत उसमें शर्करा की होने वाली कमी के कई गंभीर सामाजिक एवं आर्थिक दुष्प्रभाव होते हैं, जिससे किसान, मिल मालिक, प्रसंस्करणकर्ता, निर्यातक एवं उपयोक्ता प्रभावित होते हैं। नमी में कमी आने से गन्ने के भार में गिरावट आती है और ह्रास हुए गन्ने की पेराई से चीनी परता में अपनी कमी के कारण चीनी उद्योग का आर्थिक नुकसान होता है। इसके अलावा अनेक अवांछनीय यौगिक बनने के परिणामस्वरूप जीवाणुओं की वृद्धि होती है। रासायनिक प्रक्रियाएं शर्करा प्रसंस्करण को प्रभावित करती हैं। ह्रास हुए गन्ने से बनी निम्न गुणवत्ता वाली चीनी से उपभोक्ता एवं निर्यातक बुरी तरह प्रभावित होते हैं। प्रभावित करने वाले जैव-रासायनिक तत्व कटाई उपरांत गन्ने का ह्रास होना मूलतः जैव-रासायनिक प्रक्रिया है, जो गन्ने के कटे हुए सिरों या तनों के क्षतिग्रस्त भागों से जीवाणुओं के आक्रमण द्वारा होती है। गन्ना कटाई के बाद बिना किसी अंदरूनी भौतिक एवं जैव-रासायनिक नियंत्रक प्रणाली के कारण अंतर्जात इन्वर्टेज सक्रिय हो जाता है। पी-एच उत्कृष्टता के आधार पर गन्ने के तने में दो प्रकार के इन्वर्टेज, एसिड इन्वर्टेज (पी-एच 4.8) एवं उदासीन (न्यूट्रल) इन्वर्टेज (पी-एच 7.0) होते हैं। दोनों इन्वर्टेजों का व्यवहार प्रजाति, कटाई से पूर्व जलाने और भंडारण की अवधि से प्रभावित होता है। कटे हुए गन्ने के रस में घुलनशील इन्वर्टेज की गतिविधि मुख्यतः गन्ने की गुणवत्ता में कमी से संबद्ध होती है। प्रजातीय चयन कार्यक्रम के लिए प्रजातीय प्रतिक्रिया पर एसिड इन्वर्टेज/न्यूट्रल इन्वर्टेज (एसएआई/एनआई) अनुपात में अंतर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रतीत होता है। उच्च तापमान पर 24 घंटे तक गन्ना भंडारण करने से शर्करा परता में 0.8 यूनिट की कमी पाई गई। 12 दिनों के गन्ना भंडारण में ताजा वजन के आधार पर शर्करा परता में 13.7 से 7.9 प्रतिशत तक की कमी पायी गई। ढेर लगाकर रखने के दौरान स्टॉर्च के एंज्यमटिक विघटन के कारण डेक्स्ट्रॉन एवं रिड्यूसिंग शर्करा बनाने से गन्ने के रस का आपेक्षिक घनत्व बढ़ता है और शर्करा परता में कमी आती है। मिलिंग प्रक्रिया में देरी से चीनी परता में कमी प्रजाति की परिपक्वता के आधार पर उचित प्रजातीय संतुलन, वैज्ञानिक विधि अनुसार कटाई तथा पेराई की निश्चित अनुसूची का अभाव। गर्मी के महीनों में उच्च परिवेशीय तापमान (40 डिग्री सेल्सियस) से अधिक होने पर भी पेराई सत्र का विस्तार। उपोष्ण भारत में मिल में जाने से पहले गन्ने की 3-5 दिनों पूर्व कटाई तथा कुछ क्षेत्रों में यह अंतर 7-10 दिनों तक रखने की परंपरा का प्रचलन। चीनी मिलों की पेराई क्षमता सीमित होने के फलस्वरूप मिल यार्ड या गन्ना संग्रह केन्द्रों पर गन्ने का जमा होना। किसान के खेत/गन्ना संग्रह केन्द्र से गन्ने को चीनी मिल तक पहुंचने में असामयिक देरी। सफाई व्यवस्था की पूर्णतया कमी तथा कुछ क्षेत्रों में जड़ सहित गन्ने की कटाई, गन्ने को जलाना तथा अगौला को काट देने की परंपरा। बाधित बिजली व्यवस्था एवं श्रमिकों की कमी। गन्ने और मिल के स्वच्छता कार्यक्रम के संबंध में समझ की कमी और मिलिंग प्रक्रिया के दौरान कम गुणवत्तायुक्त बायोसाइड का उपयोग। उचित एवं समयबद्ध आपूर्ति व्यवस्था के बिना जली हुई फसल की यांत्रिक कटाई। कटाई उपरांत गुणवत्ता का ह्रास निम्न दो स्तरों पर होता है जिससे चीनी परता में कमी आती हैः प्राथमिक ह्रास गन्ने की फसल की कटाई या खेत में खड़ा रहने और इसके बाद चीनी मिल तक ढुलाई में देरी से शर्करा इन्वर्जन की प्रक्रिया। द्वितीयक ह्रास गन्ने से निकाले गए जूस में अपर्याप्त एवं अस्वास्थ्यकर प्रसंस्करण की वजह से इन्वर्जन, डेक्स्ट्रॉन, एल्कोहल और एसिड का बनना। सूक्ष्मजीवीय पहलू रखे हुए गन्ने के बाद की अवस्था में एंजाइम, रसायन और श्वसन से संबंधित हानियों के अलावा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि जो कि डेक्स्ट्रॉन एल्कोहल और एसिड उत्पन्न करते हैं, भी शर्करा परता में हानि के लिए बहुत जिम्मेदार हैं। ये सूक्ष्मजीव यथा किण्वक (सक्रोमोइसेस, टोरुला तथा पीचिया), ल्यूकोनास्टॉक, जैन्थोमोनास, एयरोबैक्टर तथा एसिड उत्पादक स्ट्रेप्टोमाइसेस गन्ने के कटे हुए सिरों या कटी हुई जगह पर पाए जाते हैं। जैव विनिष्टीकरण का मुख्य कारण ल्यूकोनास्टाक मेसेंट्राइडस है। ये जीवाणु गन्ने के तने के कटे हुए क्षतिग्रस्त सिरों द्वारा मिट्टी से प्रवेश करते हैं। मिल के कोनों, नालियों, पाइप लाइनों और रस की टंकी में ये बहुगुणित होते हैं। ये सूक्ष्मजीव एंजाइम डेक्स्ट्रॉनसुक्रेज या बहिर्जात इन्वर्टेज के द्वारा सुक्रोज को पॉलीसैकेराइड जैसे कि डेक्स्ट्रॉन में परिवर्तित करते हैं। यहां तक कि डेक्स्ट्रॉन की बहुत कम मात्रा होने से छानने, सपफाई, क्रिस्टल के बनने और चीनी के दानों के आकार को बदलने में समस्या पैदा करते हैं, जिससे चीनी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बहुत से बहिर्जात सूक्ष्मजीवों के अतिरिक्त गन्ने के तने में एक अंतर्जातीय सूक्ष्मजीवीय जगत होता है। इसमें एसिटोबैक्टर, स्यूडोमोनास, एयरोमोनास, विब्रिओ, बैसिलस तथा लैक्टिक एसिड उत्पादक बैक्टीरिया होते हैं। ये रखे हुए गन्ने की अवधि में कई गुना वृद्धि करते हैं और रस की गुणवत्ता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। कटे हुए गन्ने की गुणवत्ता के मूल्यांकन के मापदंड बाह्य संकेतकः खट्टी महक, सिरके जैसी गंध और रस का पीला भूरा रंग रखे हुए गन्ने में चीनी प्रसंस्करण पर हानिकारक प्रभाव चीनी परता में कमी। रिड्यूसिंग शर्करा का अधिक बनना। डेक्स्ट्रॉन के अधिक बनने से प्रसंस्करण एवं स्वच्छता में समस्या। पारदर्शिता की धीमी गति, खराब विशुद्धीकरण तथा गंदगी स्थिर होने की धीमी दर। चीनी के कणों की लंबाई बढ़ने से इसका बाजार भाव प्रभावित होता है। गोंद की मात्रा बढ़ने से गन्ने के जूस का गाढ़ापन बढ़ता है। कार्बनिक अम्लों के बढ़ने से रस जलाने की समस्या आती है और गर्म करने में अधिक समय लगता है। गन्ने के वजन में कमी होने से किसानों पर असर पड़ता है। मिलिंग की प्रक्रिया जैसे कि गन्ने पेराई की तैयारी और रस के निकालने आदि के दौरान रखे हुए गन्ने की गुणवत्ता में और भी खराबी आती है। मिल की स्वच्छता तथा प्रभावी रोधक जैवनाशियों की कमी के कारण प्रसस्ंकरण क्षमता एवं चीनी परता में निम्न तरीकों से कमी आती हैः सन्निहित इन्वर्टेज के द्वारा चीनी परता में 13 प्रतिशत की सीधी कमी तथा उपापचयी पदार्थों जैसे कि डेक्स्ट्रॉन, इथेनॉल, पॉलीसैकराइड, एसिड आदि के बनने से शर्करा का 25 प्रतिशत ह्रास। गन्ने के रस में बढ़ रहे सूक्ष्मजीव इसमें उपस्थित 62 प्रतिशत शर्करा का उपभोग करते हैं। रस का गाढ़ापन। शुद्धता में गिरावट और पाले विचलन=रस का पोल-(1.25 ब्रिक्स -7.32) इंक्टट्रोन की मात्रा। ओलिगोसैकराइड। रिड्यूसिंग शर्करा। कार्बनिक अम्ल। गन्नों के टुकड़ों का विश्लेषण। इथेनॉल का बनना। टाइट्रेबिल अम्लता और गोंद की मात्रा। एसिड इन्वर्टेज की सक्रियता में बढ़ोतरी। चीनी उद्योग ह्रास हुए गन्ने के कारण चीनी परता में कमी से चीनी उद्योग को आर्थिक हानि होती है। एक 5000 टीसीडी क्षमता वाली चीनी मिल को 72 घंटे से अधिक समय तक रखे हुए गन्ने के प्रसंस्करण से चीनी परता में कमी के कारण लगभग 3-5 लाख रुपये प्रतिदिन का नुकसान हो सकता है। यही नुकसान बाद में और भी बढ़ सकता है, जो कि गन्ने की प्रजाति, कटाई से पेराई में देरी तथा आसपास के तापमान पर निर्भर करता है। इसके साथ ही रासायनिक एवं सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कारण गन्ने के ह्रास होने की अवधि में अनेक अवांछनीय यौगिक बनते हैं, जो शर्करा प्रसंस्करण को और भी कठिन बनाते हैं और शर्करा विनिर्माण को अनुपयोगी बना देते हैं। कटाई उपरांत शर्करा ह्रास का प्रबधंन खेत/कटाई स्तर पर कटाई 3 दिनों पहले 0.1 प्रतिशत पोटेशियम परमैग्नेट तथा 1 प्रतिशत सोडियम मेटासिलिकेट के संयुक्त घोल का अनुप्रयोग इन्वर्टेज की सक्रियता को कम करता है। इससे कटाई उपरांत ह्रास रुकने के साथ रस की गुणवत्ता भी बनी रहती है। गन्ने के ढेर पर क्वाट आधारित निरूपण तथा इन्वर्जन प्रतिराधेक रसायन (सोडियम मेटासिलिकेट के छिड़काव और उसको पत्तियों से ढ़कने से सीसीएस में1.37, 2.90 तथा 2.62 यूनिट की बचत होती है। कटे हुए गन्ने पर जीवाणु प्रतिरोधक तथा इन्वर्जन प्रतिरोधक रसायन (बीकेसी+एसएमएस) के प्रयोग से शर्करा परता में सुधार हुआ है। सोलोमन आदि (2006) ने गन्ने की कटाई के बाद होने वाली शर्करा की हानि को न्यूनतम करने में कुछ रासायनिक निरूपणों जीवाणु प्रतिराधेक (क्वाटरनरी अमोनियम यौगिक/थायोकार्बोमेट) एवं इन्वर्जन प्रतिरोधक रसायन (सोडियम मेटासिलिकेट/सोडियम लाउरिल सल्फेट) की दक्षता को दिखाया है। ताजे कटे हुए गन्ने (संपूर्ण तनों और ढेर) पर निरूपणों का जलीय छिड़काव करने के साथ इसे गन्ने की सूखी पत्तियों (ट्रैश) से ढकना। बेंजल्कोनियम क्लोराइड (बीकेसी+सोडियम मेटा सिलिकेट की मात्रा से युक्त रासायनिक निरूपण को सर्वाधिक प्रभावी पाया गया और इससे चीनी परता में 0.5 यूनिट का सुधार हुआ। इस विधि से गन्ने की किसी भी प्रजाति एवं तापमान पर गन्ना कटाई से एक सप्ताह बाद तक शर्करा ह्रास को कम किया गया। घुलनशील एसिड इन्वर्टेज जीन की अभिव्यंजना पर आधारित हाल में हुए अनुसंधान से संकेत मिले हैं कि गन्ने की गुणवत्ता नष्ट होने में सॉल्युबल एसिड इन्वर्टेज (एसएआई) एंजाइम की अहम भूमिका है। गन्ना की कटाई के बाद आरएनएआई तरीके को अपनाकर सॉल्युबल एसिड इन्वर्टेज (एसएआई) जीन की अभिव्यंजना को नियंत्रित करने के लिए स्थाई स्थिर निवारण की दिशा में अनुसंधान पर बल दिया गया है। मिल/प्रसंस्करण स्तर पर मिल की स्वच्छताः नियमित एवं संपूर्ण धुलाई तथा गर्म पानी से वाष्पीकरण। बायोसाइड किलबैक्ट टीएम का 20 पीपीएम सान्द्रता के साथ अनुप्रयोग। डेक्स्ट्रॉन को हटाने के लिए डेक्स्ट्रॉनेज एंजाइम का उपचार। स्त्रोत: खेती पत्रिका(आईसीएआर) राधा जैन, चन्द्र पाल सिंह, अमरेश चन्द्रा, पुष्पा सिंह, सुशील सोलोमन और अश्विनी दत्त पाठक भाकृअनुप-आईआईएसआर, लखनऊ-226002 (उत्तर प्रदेश) चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर-208002 (उत्तरप्रदेश)