पान को कई नामों से जाना जाता है जैसे-पक्कू, ताम्बुल, नागवल्लरी, व्रणलता, नागिनी, सप्तशिरा, मुखभूषण। अंग्रेजी में इसे बीटल कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम पाइपर बीटल है, जो कि पाइपरेसी कुल का सदस्य है। डिकैन्डाल (वर्ष 1884) के अनुसार पान की जन्मभूमि मलाया प्रायद्वीप समूह है, जहां लगभग 2000 वर्षों से इसकी खेती की जाती है। वक्र हिल (वर्ष 1966) का मत है कि पान मध्य तथा पूर्वी मलेशिया का पौधा है। भारत में पान के उद्गम का स्रोत तथा खेती कब शुरू हुई इसका अनुमान कठिन है। पिफर भी ऐसा सिद्ध हुआ कि यह भारत के पश्चिमी भाग में सर्वप्रथम दक्षिण एशिया से आया है। पान की व्यावसायिक खेती 700 पूर्वी से 1300 देशान्तर और 120 दक्षिण से 250 उत्तर अक्षांश के बीच की जाती है। सुदूर उत्तर-पश्चिमी भागों को छोड़कर पूरे भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, थाईलैण्ड, सिंगापुर, मालद्वीप, पिफलीपीन्स, पपुआ,-न्यूगिनी और दक्षिण अप्रफीका में पान की खेती की जाती है। पान के लिये उष्णकटिबंधीय जलवायु आवश्यक है, जहां विस्तृत छायादार और नम वातावरण उपलब्ध होता है। अपने देश के पूर्वी तथा पश्चिमी भागों के उन क्षेत्रों में जहां वर्षा ज्यादा तथा सामान्य रूप से होती है, वहां इसकी पैदावार अच्छी है। देशावरी इसकी खेती सामान्यतः उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में की जाती है। इसका पत्ता कुछ अंडाकार, लंबा अग्रभाग एक तरपफ मुड़ा हुआ और आधार का कटाव बहुत कम विकसित होता है। इसमें 5-6 शिरायें होती हैं, लेकिन बंगला पत्ती के समान पफैली नहीं होती हैं। इसका रंग हरा हातेा है तथा स्वाद में तीखापन आरै मिठास होती है। पके पत्ते बड़े नाजुक होते हैं और मुंह में रखते ही घुल जाते हैं। हमारे प्रमुख कृषि व्यवसायों में पान की खेती का एक प्रमुख स्थान है। कुछ इलाकों में यह उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि खाद्य या दूसरी नगदी पफसलें। आजकल पान लगभग 40 हजार हैक्टर में उगाया जाता है और ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तमिलनाडु और केरल में लाखों लोग इसी व्यवसाय में लगे हैं। प्रत्येक वर्ष अनुमानतः आठ सौ करोड़ रुपये के मूल्य के पान का उत्पादन होता है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जहां जलवायु अनुकूल नहीं है, गर्मी और शुष्क हवाओं तथा जाड़ों में तेज ठंडक तथा पाले के कारण इसकी खेती भीट (बरेजा) में करते हैं। उत्तर प्रदेश में व्यावहारिक दृष्टि से इसे वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ, महोबा, ललितपुर आदि जिलों में उगाया जाता है। वाराणसी का ‘मगही’ पान अत्यन्त प्रसिद्ध है। पान की बेल प्रत्येक प्रकार की मृदा उगायी जाती है। परन्तु अच्छी उपज के लिए लाल मृदा मिली हुई दाेमट मृदा अच्छी रहती है। इसकी खेती में भूमि का ढालू हाेना आवश्यक है। ताकि वर्षा का पानी रुक न सके। पान बरेजा निर्माण हेतु सर्वप्रथम पतली रस्सी लेकर चिन्हित करते हैं। पारियों की संख्या निश्चित हो जाने पर पंक्तियों में एक मीटर पर बांस लगाए जाते हैं। बरेजा में 5 पारी के अंतर पर 2 पारियों में फंसता हुआ झीका बनाना चाहिए। इसे सागौन की बल्लियों से बनाते हैं। चारों तरफ से दीवार रूपी एग्रोशेडनेट जाली लगानी चाहिए व छत को भी जाली से ढकना चाहिए। पान की खेती के लिए भूमि की तैयारी के अंतर्गत खेत में प्रथम जुताई मई-जून में किसी भी मिट्टी पलटने वाले हल से कर देनी चाहिए, ताकि सूर्य की कड़ी धूप में मृदा में उपस्थित हानिकारक कीट-पतंगे व खरपतवार नष्ट हो जायें। बरेजा निर्माण करने में 25 दिनों पूर्व फावड़े से गुड़ाई करके व देसी हल से अन्तिम जुताई करके मृदा भुरभुरी कर दी जाती है। इसके बाद 0.25 प्रतिशत बोर्डेक्स मिश्रण पंक्तियों में डालते हैं। इसके साथ ही गोब की खाद व ट्राइकोडर्मा विरिडी पाउडर भी डाला जाता है। ऐसा करने से पान के भूमिजनित रोगों का प्रबंधन हो जाता है एवं उसकी पैदावार भी अच्छी होती है। पान बेल रोपाई का कार्य प्रातः से 10 बजे तक तथा सायं 3 बजे के बाद करना चाहिए। एक गांठ तथा एक पत्ती वाली बेल क्रमशः 10-15 सें.मी. और 50-55 सें.मी. की दूरी रखते हैं। प्रत्येक पंक्ति पर रोपी गयी पान बेलों पर पतली घास की मल्चिंग करते हैं, जिससे कि मृदा में नमी बनी रहे। बरसात में सिंचाई की विशेष आवश्यकता नहीं रहती है। मौसम के अनुसार 3-4 दिनों में अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई हजारा या स्प्रिंक्लर से फव्वारे के रूप में करने से अधिक लाभ होता है। पान की खेती में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश उर्वरकों की आवश्यकता पड़ती है। उपरोक्त उर्वरकों की पूर्ति के लिए नीम, सरसों, अरंडी एवं तिल की खली का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा मटका खाद (संजीवनी खाद) का प्रयोग भी पान उपज में वृद्धि एवं निरोग पान उत्पादन में सहायक होता है। पान की बेल को सहारा देने के लिए सनौआ का प्रयोग करते हैं। इसी के सहारे जब पौधे 15 सें.मी. के हो जाते हैं तो क्राॅस की सहायता से बंधाई का कार्य करते हैं। पान की नियमित बंधाई से इसका उत्पादन बढ़ता है। पान की बुआई के लगभग दो माह बाद पान पत्ती मिलने लगती है। बुआई के समय कटिंग के साथ जो पत्ते लगे रहते हैं, उन्हें सर्वप्रथम तोड़ा जाता है, जिन्हें पेड़ी का पान कहते हैं। इसके बाद आवश्यकतानुसार नीचे से पान की तुड़ाई की जाती है। तुड़ाई के बाद पान पत्तों की सफाई और धुलाई की जाती है। सांची यह पान देश के पूरे दक्षिण तथा उत्तरी भागों में समान रूप से उगाया जाता है। इसके पत्ते संकरे अंडाकार होते हैं। पूर्ण विकसित 6-8 शिराएं होती हैं। पत्ते के डंठल छोटे तथा तने के साथ चिपके हुए बढ़ते हैं। सांची पान के स्वाद में तीखापन होता है। पान की ढोली/सैकड़ा बनाकर क्रमबद्ध तरीके से इसे बांस की टोकरियों में कपड़ा बिछाकर रखते हैं तथा ऊपर से घास व कपड़े से ढक देते हैं। इस बात का ध्यान रखते हैं कि पान में पर्याप्त नमी बनी रहे। इसके लिए ऊपर से पानी छिड़ककर नमी का प्रबंध करते हैं। फिर इन टोकरियों को मण्डी ले जाकर पान की बिक्री की जाती है। भारत में पान की 100 से अधिक किस्में हैं। वैअैाअप-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के पान विशेषज्ञोें ने भारत के विभिन्न भागों से संग्रह करके पान के 85 नमूनों का परीक्षण करके केवल पांच प्रमुख किस्मों-बंगला, देशावरी, कपूरी, मीठा तथा सांची की पहचान की है, जिनका विवरण लेख में दिया गया है। बंगला ये पान हृदयाकार तथा गोल होते हैं। इनका अग्रभाग छोटा और नुकीला और आधार पर कटाव पूर्ण-विकसित होता है तथा इसमें पफैली हुई 5-7 शिरायें होती हैं। पान का रंग हरा, स्वाद में तीखापन तथा लवण की वास जाती है। अधिक पैदावार के लिए बंगला पान मुख्य रूप से उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल और ओडिशा में उगाया जाता है। मीठा यह पान मुख्यतः पश्चिम बंगाल के मिदिनापुर और हावड़ा जिलों में उगाया जाता है। इसकी आकृति गाेल, अग्रभाग छाेटा, किनारे में लहर होती है और ये सुडौल नहीं होते हैं। इनका रंग गहरा हरा होता है, जैसा कि नाम से ज्ञात है। इसका स्वाद मीठा होता है एवं सौंफ की गंध आती है। पान प्रायः भारत के सभी भागों में खाया जाता है। इसके अतिरिक्त बर्मा, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया और थाईलैण्ड आदि में भी इसे खाया जाता है। भारत में तो पान यहां की संस्कृति से जुड़ा है। यहां इसको आदर, सत्कार व परस्पर प्रेम का प्रतीक माना गया है। अधिकतर लोग खाना खाने के बाद मुंह का स्वाद ठीक करने व सांस को सुगन्धित बनाने के लिये पान खाते हैं। पान की पत्तियों में जरपरापन उसमें विद्यमान फिनोल अवयवों के कारण होता है। कैटिकोल एलाईड, कैटिकोल, जैबिकोल और यूजिनाॅल आदि मुख्य फिनोलिक अवयव हैं, जो पान की पत्तियों में पाये जाते हैं। पान की गंध, पत्तियों में उपस्थित तेल के कारण होती है, जो वाष्पशील है। कपूरी यह पान भी अंडाकार और लंबा होता है। इससे मध्य शिरा के समानान्तर 5-6 शिराएं होती हैं। आधार का कटाव लगभग नहीं होता है। इनका रंग हरा-पीला होता है। इसके स्वाद में तीखापन बहुत कम होता है और कपूर की गंध आती है। कपूरी पान कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र आदि में उगाया जाता है। सांस्कृतिक महत्व के अलावा पान के अन्य कई लाभ भी हैं। यह पाचन में सहायक होता है। पान, पाचन क्रिया के लिए फायदेमंद होता है। यह सैलाइवरी ग्लैंड को सक्रिय करके लार बनाने का काम करता है, जो कि खाने को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने का काम करता है। कब्ज की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए भी पान का पत्ता चबाना लाभदायक होता है। संक्षेप में पान भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। इसके सम्यक उपयोग से हमें कई लाभ प्राप्त होते हैं। बस जरूरत है इसके सांस्कृतिक, आर्थिक एवं औषधीय महत्व को समझने की। औषधीय लाभ पान के पत्ते में कई तत्व ऐसे होते हैं, जो बैक्टीरिया के प्रभाव को कम करने में सहायक होते हैं। जिन लोगों के मुंह से दुर्गन्ध आती है, उनके लिए इसका सेवन काफी लाभदायक है। इसमें प्रयोग होने वाली सामग्री जैसे-लौंग, कत्था, इलायची और सौंफ भी मुंह को फ्रेश एवं सुवासित रखने में सहायक होती हैं। इससे मुंह का स्वास्थ्य ठीक बना रहता है। पान बलगम को भी हटाता है। मसूड़े में गांठ या फिर सूजन हो जाने पर इसका इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है। पान में पाये जाने वाले तत्व सूजन को कम करते हैं। सोने से पहले पान को नमक व अजवायन के साथ मुंह में रखने से नींद अच्छी आती है। अगर आपको सर्दी-जुकाम हो तो ऐसे में पान का प्रयोग लाभकारी होता है। इसे शहद के साथ मिलाकर खाने से सर्दी-जुकाम में फायदा होता है। इसके साथ ही पान में विद्यमान एनलजेसिक गुण सिरदर्द में भी आराम प्रदान करते हैं। चोट लगने पर पान का सेवन घाव को भरने में मदद करता है। यही नहीं यह सूखी खांसी में भी लाभकारी होता है। स्त्रोत : फल फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),दीपक काेहली, 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ-22601 (उत्तर प्रदेश)।