नई ट्रेंच विधि से किसान अगर गन्ने की बुआई करें, तो सामान्य विधि के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होगी। इस विधि से बुआई शरद, वसन्त व देर वसन्त में सफलतापूर्वक की जा सकती है। इस तकनीक में खेत तैयार करने के बाद ट्रेंच ओपनर से एक फीट चौड़ी और लगभग 25-30 सें.मी. गहरी क्यारी बनाते हैं। एक क्यारी से दूसरी क्यारी के बीच की दूरी 120 सें.मी होती है। क्यारी बनाने के बाद सबसे नीचे खाद डालते हैं। खाद की मात्रा एक हैक्टर में 180 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 60 कि.ग्रा. पोटाश और 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट पर्याप्त होती है। इसमें बुआई के समय नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा का प्रयोग करते हैं, बाकी फॉस्फोरस, पोटाश और जिंक सल्फेट डालकर बुआई करते हैं। गन्ने के बीज के लिए ऐसे गन्ने का चुनाव करना चाहिए, जो लगभग 8 से 10 महीने का हो और रोग व कीट न लगे हों। इसके अलावा ध्यान रखना चाहिए कि बीज के लिए ऐसे ही गन्ने का चुनाव करें, जिसमें पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व दिया गया हो और गन्ना गिरा हुआ व बहुत पतला न हो। बीज उपचार गन्ने के बीज की बुआई करने से पहले उसे उपचारित करना बहुत जरूरी होता है। बीज को उपचारित करने के लिए बाविस्टीन के 0.1 प्रतिशत घोल (112 ग्राम दवा को 112 लीटर पानी में मिलाकर) में पांच मिनट डुबोना चाहिए, उसके बाद बुआई करनी चाहिए। बीज दर प्रति हैक्टर गन्ने की बुआई के लिए लगभग 70-75 क्विंटल गन्ने की आवश्यकता होती है। क्यारी में दो आंख के 10 गन्ने के टुकड़े प्रति मीटर की दर से डालने चाहिए। गन्ना बुआई व भूमि उपचार क्यारी में दो आंख के उपचारित 10-12 गन्ने के टुकड़े प्रति मीटर की दर से सीढ़ीनुमा इस प्रकार डालें कि उनकी आंखें आसपास हों। दीमक व अंकुरबेधक नियंत्रण के लिए गन्ने के टुकड़ों के ऊपर रीजेन्ट 20 कि.ग्रा. या फोरेट 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर का छिड़काव या क्लोरपाइरीफॉस 5 लीटर प्रति हैक्टर का 1875 लीटर पानी के साथ छिड़काव करना चाहिए। गन्ने के टुकड़ों की ढकाई सावधानीपूर्वक इस प्रकार करें कि इनके ऊपर 2-3 सें.मी. से अधिक मिट्टी न पड़े। गन्ना जमाव गन्ना का एक सप्ताह में जमाव शुरू हो जाता है तथा एक माह में पूरा हो जाता है। जमाव 80-90 प्रतिशत तक होता है, जबकि सामान्य विधि से 40 से 50 प्रतिशत तक ही होता है। जमाव अधिक व समान रूप से होने तथा गन्ने के टुकड़ों को क्षैतिज रखने से क्यारी में दोहरी पंक्ति की तरह जमाव दिखता है, जिसके कारण कोई रिक्त स्थान नहीं होता और पेड़ी की पैदावार भी पौधा गन्ने के समान होती है। सिंचाई बुआई के समय नमी की कमी या देर वसन्त की दशा में पहली सिंचाई बुआई के तुरंत बाद करें। पर्याप्त नमी की दशा में बुआई की गई हो तो पहली सिंचाई 2-3 दिनों पर भी कर सकते हैं। मृदा के अनुसार ग्रीष्मकाल में पर्याप्त अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक है। वर्षाकाल में 20 दिनों तक वर्षा न होने की दशा में सिंचाई अवश्य करें। क्यारी में सिंचाई करने से प्रति सिंचाई 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है। क्यारी में सिंचाई करने से केवल 2.5-3 घंटा प्रति हैक्टर का समय लगता है, जिससे ईंधन/ डीजल की बचत होती है। सुझाव बुआई का समय वसन्त 15 पफरवरी से मार्च तक देर वसंत अप्रैल से 15 मई तक शरद 15 सितंबर से अक्टूबर तक खरपतवार नियंत्रण क्यारी में गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण करना कठिन है, इसलिए मेट्रीब्युजीन 725 ग्राम प्रति हैक्टर तथा 2,4-डी सोडियम साल्ट 1.25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर का 1000 लीटर पानी में आवश्यकतानुसार 30 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए। छोटे किसान खुरपी से भी खरपतवार नियंत्रण कर सकते हैं। मिट्टी चढ़ाना जून के आखिरी सप्ताह में बैलचालित ट्रैंच ओपनर से जड़ों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए। इससे क्यारी की जगह पर मेड़ तथा मेड़ की जगह पर क्यारी बन जाती है। यह जल निकास का काम करती है। ट्रेंच विधि के लाभ इस विधि से फसल का जमाव 80-90 प्रतिशत तक होता है, जबकि सामान्य विधि में 35-40 प्रतिशत तक होता है। प्रति सिंचाई 60 प्रतिशत पानी की बचत। उर्वरकों की बर्बादी नहीं होती। गन्ना अपेक्षाकृत कम गिरता है। मिल योग्य गन्ने समान मोटे व लंबे होते हैं, जिसके कारण परंपरागत विधि की तुलना में 35-40 प्रतिशत अधिक उपज व 0.5 इकाई अधिक चीनी परता प्राप्त होती है। सामान्य विधि की तुलना में इस विधि से पेड़ी गन्ने की पैदावार 20-25 प्रतिशत अधिक होती है। भूमिगत कीट, व्हाइट ग्रब एवं दीमक का आपतन कम होता है। इस विधि द्वारा गन्ने के बाद के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है, क्योंकि पेड़ी के बाद जहां गन्ना नहीं होता, वहां पर गन्ने की बुआई की जाती है। उत्तर भारत में उपज क्षमता व वास्तविक उपज में 35-40 प्रतिशत का अंतराल है, जिसे इस विधि द्वारा आसानी से पूरा किया जा सकता है। क्षेत्रफल में बिना वृद्धि किये गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने में किसानों के लिए यह सुलभ एवं उपयुक्त विधि है। स्त्राेत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.), रजत देशवाल-सहायक प्रोफेसर, कीटविज्ञान विभाग, तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद-244001 (उत्तर प्रदेश), नितिन कुमार-एग्रोनॉमिस्ट, उत्कल ट्यूबर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु (कर्नाटक), अंकित शोध विद्यार्थी, पादप रोग विज्ञान विभाग, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ (उत्तरप्रदेश)