मसालों की भूमि' भारत, सौंफ का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। इसके अंतर्गत क्षेत्रफल, उत्पादन व उत्पादकता क्रमश: 0.66 लाख हैक्टर, 1.04 लाख टन व 15.75 क्विंटल/हेक्टर है। (वर्ष 2017-18 स्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग) देश के 'बीजीय मसालों का कटोरा' व सबसे बड़े सौंफ उत्पादक राज्यों राजस्थान व गुजरात में क्रमश: 30,720 टन व 96,770 टन सौंफ का उत्पादन होता है। भारत से सौंफ के बीजों (दानों) का निर्यात लगभग 17,300 टन होता है, जिसका मूल्य 16,001 लाख रुपये है। इनका देश के बीजीय मसालों के निर्यात में मात्रात्मक व मूल्य आधार पर क्रमश: 6.82 प्रतिशत व 6.51 प्रतिशत हिस्सा है (भारतीय मसाला बोर्ड, 2015)। सौंफ के बीज में लगभग 9.5 प्रतिशत प्रोटीन, 13.4 प्रतिशत खनिज लवण व विभिन्न विटामिन की भी संतोषजनक मात्रा पाई जाती है। इसे शर्बत, ठंडाई, अचार, सौंफ पानी और शिशुओं की दवा बनाने में इस्तेमाल करते हैं। उन्नत किस्में अजमेर सौंफ-1 अजमेर सौंफ-2 180-190 दिनों में पकाव वाली किस्में, अगेती व सर्दी के मौसम की बुआई के लिए उपयुक्त हैं। इनके बीज आकर्षक व बड़े होते हैं। अगेती फसल व सर्दी की फसल से औसत पैदावार क्रमश: 25.0 व 19.5 क्विंटल प्रति हैक्टर प्राप्त होती है। ये किस्में रामूलेरिया व अगेती झुलसा रोगों के लिए प्रतिरोधी हैं। दानों में वाष्पशील तेल की औसत मात्रा 1.6-1.9 प्रतिशत पाई जाती है। राजस्थान सौंफ-125 जल्दी पकने वाली (120-130 दिनों में) छोटे पौधे, ठोस पुष्पक्रम, लंबे, बड़े दाने व औसत पैदावार 17.3 क्विंटल/ हैक्टर तक है। 29.45 क्विंटल/हैक्टर तक पैदावार क्षमता। राजस्थान सौंफ-101 बड़े पुष्पक्रम, लंबे व बड़े दाने वाली व देर से पकने वाली किस्म (150-160 दिनों) व औसत पैदावार 15.5 क्विंटल/ हैक्टर है। गुजरात सौंफ-1 सूखा सहनशील व अगेती बुआई लिए उपयुक्त, पत्ती धब्बा व अन्य रोगों के लिए मध्यम रूप से सहनशील है। इसके बीज अण्डाकार, बड़े व गहरे भूरे रंग के, देर से पकाव (225 दिन) व औसत पैदावार लगभग 17.0 क्विंटल/हैक्टर। राजस्थान सौंफ-143 दोमट व काली मृदा के लिए उपयुक्त, औसत पैदावार 15 क्विंटल/ हैक्टर। अन्य किस्में आर.एफ.-178, आर. एफ.-281,आर.एफ.-205,आरएफ-145 व गुजरात सौंफ-1 आदि। राजस्थान में भाकृअनुप-राष्ट्रीय बीजीय समसाला अनुसंधान केन्द्र (अजमेर), श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय (जोबनेर) व राजस्थान के अन्य कृषि विश्वविद्यालयों में भी बीजीय मसालों पर अनुसंधान चल रहा है। अजमेर से सौंफ की किस्में-अजमेर सौंफ-1, अजमेर सौंफ-2 व जोबनेर से विकसित किस्में-आरएफ-101, आरएफ-125, आरएफ-205, आरएफ-143 व आरएफ-145भरतपुर जिले में सौंफ की खेती की तरफ किसानों का रुझान बढ़ रहा है। इसकी खेती सिंचित अवस्था में करने पर अन्य फसलों जैसे-गेहूं व सरसों की तुलना में सौंफ की खेती लाभदायक साबित हो रही है। कमजोर भूमि, कम पोषक तत्वों की आवश्यकता तथा पशुओं द्वारा खेत में कोई नुकसान नहीं करना भी किसानों को इसकी खेती की तरफ आकर्षित कर रहा है। कीटों व रोगों का कम प्रकोप, बेहतर पैदावार व अधिक बाजार मूल्य (6,000 से 7,000 रुपये प्रति क्विंटल) होने के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने में सौंफ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कृषि विज्ञान केन्द्र, कुम्हेर, भरतपुर द्वारा वर्ष 2016-17 में रबी मौसम में भरतपुर जिले में उन्नत तकनीकों पर प्रदर्शन लगाये गए। किसानों की परंपरागत तकनीकों की तुलना में प्रदर्शनों में पैदावार 22.30 से 23.80 क्विंटल/हैक्टर, पैदावार में वृद्धि 18.41 प्रतिशत तक व शुद्ध आय 116800 रुपये/हैक्टर तक प्राप्त हुई। सौंफ की उन्नत सस्य क्रियाएं जलवायु इसके लिए शुष्क एवं ठंडा मौसम उपयुक्त रहता है। परन्तु फल अवस्था कम तापमान से प्रभावित होती है। फूल आते समय लंबे समय तक बादल व अधिक नमी से रोगों का प्रकोप अधिक होता है। भूमि व खेत की तैयारी जीवांशयुक्त सभी प्रकार की भूमि, बलुई दोमट, जिसका जल निकास ठीक हो, उपयुक्त रहती है। नमी की कमी होने पर सिंचाई कर खेत की जुताई व पाटा चलायें। खाद एवं उर्वरक खेत की तैयारी से पहले 10-15 टन/ हैक्टर अच्छी तरह सडी हई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मृदा में मिलाते हैं। मृदा की जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश की मात्रा क्रमश: 90, 60 व 60 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से देते हैं। 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व सम्पूर्ण फॉस्फोरस व पोटाश मशीन द्वारा अंतिम जुताई के साथ देते हैं। 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन बुआई के 45 दिनों बाद व 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन फूल आने के समय सिंचाई के साथ देते हैं। आवश्यकता होने पर सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक सल्फेट, फेरस सल्फेट व कैल्शियम सल्फेट प्रत्येक तत्व 0.5 प्रतिशत की दर से छिडकाव करते हैं। बीज की मात्रा व बुआई सौंफ की सीधी बुआई के लिए 8-10 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर को फफूंदीनाशक दवा कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम या जैविक ट्राइकोडर्मा 6-8 ग्राम बीज की दर से उपचारित करते हैं। सीडड्रिल मशीन से 45 सें.मी. की दूरी पररोपाई के एक महीने बाद करते हैं। कीटों | से बचाव के लिए नर्सरी को 40 मेस के | नाइलोन जाल से ढकते हैं।पंक्तियों में 2 सें.मी. गहराई पर बआई करने से सिंचाई के पानी की बचत व अधिक पैदावार मिलती है। बुआई सितंबर-अक्टूबर में करते हैं। रोपण विधि से पौधे तैयार करने के लिए 3-4 कि.ग्रा. बीज को 100 वर्गमीटर नर्सरी क्षेत्र में जलाई-अगस्त में बुआई करने से एक हैक्टर में रोपाई के लिए पौध तैयार हो जाती है। 7-8 दिनों में बीजों का अंकुरण हो जाता है। अंकुरण से पूर्व आवश्यकता होने पर बहुत हल्की सिंचाई भी कर सकते हैं। 7-8 सप्ताह की पौध रोपाई योग्य हो जाती है। रोपाई 45 सें.मी. की दूरी पर बनी पंक्तियों में 20-25 सें.मी. पौधों के बीच की दूरी रखते हुए करते हैं। रोपाई कर हल्की सिंचाई अवश्य करें। सिंचाई जड़ें गहरी होने के कारण निराई-गुड़ाई कर, हल्की सिंचाई कर पानी की बचत कर सकते हैं। मृदा में नमी कम होने पर बुआई के 3-4 दिनों बाद हल्की सिंचाई करें, क्योंकि पानी का बहाव तेज होने पर बीज बहकर किनारे पर इकट्ठे हो जायेंगे। बीजों का अंकुरण पूर्ण होने के लिए दूसरी सिंचाई बुआई के 12-15 दिनों बाद करनी चाहिए। फूल आने के बाद फसल को पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। भूमि व जलवायु को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार 25-30 दिनों के अंतर पर 4-5 सिंचाइयां करते हैं। खरपतवार नियंत्रण गर्मियों में गहरी जुताई करें। खाद की अच्छी तरह से कम्पोस्ट बनायें, जिससे खाद के अंदर खरपतवारों के बीज मर जाएं। सौंफ की बुआई के 25 व 50 दिनों बाद दो बार हाथ से निराई-गुड़ाई करें। सघन स्थानों से पौधे उखाडकर विरल स्थानों पर लगा सकते हैं। बुआई के तुरन्त बाद खरपतवारों के उगने से पहले मृदा में नमी की उपस्थिति में खरपतवारनाशी ऑक्सीफ्लूरोफेन 0.5 कि.ग्रा. या पेन्डीमिथेलीन (स्टाम्प) 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। फसल संरक्षण कीट प्रबंधन सफेद मक्खी, मोयला व मकड़ी कीट पौधे के कोमल भागों से रस चूसते हैं। थ्रिप्स ये छोटे आकार के कीट, कोमल एवं नई पत्तियों से हरा पदार्थ खुरचकर खाते हैं। इससे पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं तथा पत्ते पीले होकर सूख जाते हैं।प्रबंधन के लिए फसल पर डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मैलाथियॉन 50 ई.सी. की एक मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कें। आवश्यकतानुसार 15-20 दिनों बाद छिड़काव दोहरायें। नीम के बीजों केसत का 5 प्रतिशत की दर से छिडकाव कर सकते हैं। प्रबंधन राजस्थान में सौंफ की बुआई सितंबर के तीसरे सप्ताह में करने पर अक्टूबर व नवंबर की बुआई की तुलना में कीटों से नुकसान कम पाया गया है। अकेली फसल की तुलना में सूवा के साथ सौंफ की अंतरासस्यन 2:1 व 3:1 के अनुपात में करने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। जैविक कीटनाशी करंज या नीम खली 500 कि.ग्रा./हैक्टर बुआई के समय मृदा में मिलायें और तीन बार नीम बीज सत या करंज बीज सत 5 प्रतिशत या फ्रेनवेलनेट 0.01 प्रतिशत का पुष्पण आरंभ होने पर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें। रोग छाछ्या (पाउडरी मिल्ड्यू) इस रोग की शुरुआत में पत्तियों एवं टहनियों पर सफेद चूर्ण (फफूंद) दिखाई देते हैं, जो बाद में पूरे पौधे पर फैल जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए कैराथेन 0.1 प्रतिशत या घुलनशील गंधक (80 प्रतिशत) 0.25 प्रतिशत की दर से छिड़कें। जड़ व तना गलन रोगी पौधों का तना नीचे से मुलायम हो जाता है और जड़ें गल जाती हैं। जड़ों पर छोटे-बड़े काले रंग के स्कलेरोशिया दिखाई देते हैं। बुआई पूर्व कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा से बीजोपचार करें। बुआई से पूर्व ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद (जैविक) की 4-5 कि.ग्रा. मात्रा को 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर 4-5 दिनों तक छाया में रखने के बाद सांयकाल में खेत में बिखेरकर जुताई करें। हल्की सिंचाई करें व जल निकास की व्यवस्था करें। रामूलेरिया ब्लाइट बुआई के 60-70 दिनों बाद नीचे की पुरानी पत्तियों पर गहरे भूरे धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में धीरे-धीरे पूरे पौधे पर फैल जाते हैं। अल्टरनेरिया ब्लाइट फूलों की कलियां पीली-भूरी होकर सूख जाती हैं।रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत या डाइथेन एम. 45-0.2 प्रतिशत के घोल का 15 दिनों के अंतर पर 2-3 छिड़काव करें। चीलस सवकल रोग जेसिड कीट द्वारा फैलने वाले माइकोप्लाज्माजनित इस रोग में पत्तियों के गुच्छे बन जाते हैं। प्रबंधन के लिए अंतरासस्यन पद्धति में सौंफ व मूंग (1:1 अनुपात) लगाते हैं। मूंग की बुआई मानसून के शुरू होने पर व सौंफ की रोपाई 15 अगस्त के आस-पास करें। रोपाई के समय पौधों की जड़ों को 0.04 प्रतिशत इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. के घोल में | 10 मिनट डुबोकर रोपाई करते हैं। एक छिडकाव इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. की 0.3 मि.ली./लीटर पानी की दर से नाइलोन जाल से ढकते हैं कटाई सौंफ की फसल के दानों के गुच्छे एक साथ नहीं पकते हैं। जब पूर्ण आकार के दानों का रंग हरे से पीला होने लगे तो गुच्छों को तोड़ लेना चाहिए, क्योंकि इस समय दानों में वाष्पशील तेल की मात्रा अधिक होती है। काटने के बाद सूखते समय फसल को बार-बार पलटते रहना चाहिए, जिससे फफूंद न लगे। जब दानों का आकार पूर्ण विकसित दानों की तुलना में आधा होता है, तभी गुच्छों की कटाई कर साफ जगह पर छाया में फैलाकर सुखाना चाहिए। इसके लिए 10-15 दिनों के अंतराल पर 3-4 बार कटाई कर सकते हैं। सामान्यतः इसकी कटाई अप्रैल में शुरू हो जाती है। बुआई हेतु बीज प्राप्त करने के लिए मुख्य छत्रकों (गुच्छो) के दाने जब पूर्णतः पककर पीले पड़ने लगेंतभी कटाई करनी चाहिए। स्त्राेत : सहायक प्राध्यापक (उद्यान), कृषि विज्ञान केन्द्र, कुम्हेर, भरतपुर (राजस्थान), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), नई दिल्ली।