उत्पादन की दृष्टि से भारत को मसालों का देश कहा जाता है। देश में मसालों की उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों में लहसुन, प्याज, अदरक, हल्दी, काली मिर्च, इलायची, केसर, मिर्च, पुदीना, अजवायन, जावित्री, लौंग, सौंफ, धनिया, मेथी, जीरा व राई का नाम लिया जा सकता है। ये उपयोगिता और महत्वपूर्ण स्वाद के लिए भी उगाई जाती हैं। विभिन्न प्रकार के मसालों का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। हमारे देश में मसाला फसलें बड़े पैमाने पर खरीफ, रबी एवं जायद में उगाई जाती हैं। मसाला नगदी फसल है। इसकी व्यावसायिक खेती कर अधिक लाभ कमाया जा सकता है। प्याज का उपयोग सलाद, सब्जी, अचार तथा मसाले के रूप में किया जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से मिर्च में पर्याप्त मात्रा में विटामिन 'ए' व 'सी' पाए जाते हैं एवं कुछ लवण भी होते हैं। ये हमारे भोजन के प्रमुख अंग हैं। इनकी विभिन्न प्रजातियों को सब्जी, मसालों और अचार के रूप में काम में लिया जाता है। बदलते मौसम एवं जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार मसाला फसलों के उत्पादन में कमी होती जा रही है। इसका प्रमुख कारण विभिन्न प्रकार के कीट हैं। इनका नियंत्रण करना अति आवश्यक है। नियंत्रण के लिए समन्वित कीट प्रबंधन (आईपीएम) पद्धति का चयन कर कम लागत में कीटों का प्रबंधन कर सकते हैं। प्याज के प्रमुख कीट प्याज की मक्खी यह प्याज की फसल में लगने वाला प्रमख कीट है। प्याज की मक्खी का आक्रमण तापमान में वृद्धि के साथ तीव्रता से बढ़ता हैऔर मार्च में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगता है। इसके द्वारा रस चूसने से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं। आक्रमण के स्थान पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं। नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. का एक मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। आवश्यक हो तो 15 दिनों बाद छिडकाव दोहरायें। धनिया के प्रमुख कीट माहूं यह धनिया को क्षति पहुंचाने वाला प्रमुख कीट है। माहूं छोटे-छोटे जू आकार के पंखदार व पंखरहित कीट होते हैं। इनके प्रौढ़ एवं शिशु, पौधों की पत्तियों व कोमल तनों का रस फूलों से चूसकर कमजोर कर देते हैं। ये कीट झुंड में रहते हैं। चूसक कीट इस कीट की शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही अवस्थाएं मुलायम पत्तियों का रस चूसकर हानि पहुंचाती हैं। इनके मुखांग रस चूसने वाले होते हैं, जो कि सैकड़ों की संख्या में पौधों की पत्तियों के अंदर छिपे रहते हैं। ये कीट सफेद भूरे या हल्के पीले रंग के होते हैं। इससे प्रभावित पत्तियां सिकुड़ जाती हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। प्रभावित पौधों के कंद छोटे रह जाते हैं। इससे उपज कम हो जाती है। प्रबंधन प्रकोप की प्रारम्भिक अवस्था में माह से ग्रसित भागों को तोड़कर नष्ट कर दें। फसल में नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग न करें। आक्रमण होने पर परभक्षी कीट क्राइसोपा क्रानिया 5000 अंडे प्रति हैक्टर की दर से छोड़ना चाहिए। नीम का अर्क 5 प्रतिशत या नीम का तेल 100 मि.ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 5 मि.ली. प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। ट्रोइएजोफॉस 2-5 मि.ली. का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. का 2 मि.ली. पानी की दर छिड़काव करना चाहिए। दवा का छिड़काव सुबह और शाम को करना चाहिए, जब मधुमक्खियों की संख्या खेत में कम हो। मिर्च के प्रमुख कीट मिर्च का फलभेदक यह एक बहुभक्षी कीट है, जो कि मिर्च के अलावा अन्य सब्जियों एवं फसलों को भी अत्यधिक क्षति करता है। इसकी हानिकारक अवस्था सूंडी होती है, जो हल्के हरे-भूरे रंग की होती है। इसके शरीर के ऊपरी भाग पर भूरे रंग की धारियां पाई जाती हैं। वानस्पतिक अवस्था में सूंडी पत्ती एवं शाखाओं को खाती है। इसके अलावा यह कली तथा फलियों में छेद करके नुकसान पहुंचाती है। फली को खाते समय प्रायः इसका आधा शरीर फली के बाहर रहता है। एक सूंडी 30-40 फलियों को नुकसान पहुंचाती है। सफेद मक्खी ये कीट पौधों की पत्तियों व कोमल शाखाओं का रस चूसकर कमजोर कर देते हैं। इनके प्रकोप से उत्पादन घट जाता है। नियंत्रण के लिए मैलाथियन 50 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. एक मि.ली. इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। 15-20 दिनों बाद पुनः छिड़काव करें। पर्णजीवी यह बहभक्षी कीट है। पर्णजीवी मिर्च के पौधों की पत्तियों व कोमल शाखाओं और फूलों में लगने वाला प्रमुख कीट है। इसका रंग काला होता है। यह कीट फूलों को खरोंच देता है तथा उससे निकले रस को चूसता है। फलस्वरूप फूल कमजोर होकर झड़ जाते हैं। नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. एक मि.ली. इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। 15-20 दिनों बाद पुनः छिड़काव करें। लाल मकड़ी कटुआ कीट यह एक बहुभक्षी कीट है, जो छोटे-छोटे पौधे में अत्यधिक क्षति करता है। इसका वयस्क भूरे रंग का भारी शरीर वाला होता है। अगले पंख हल्के भूरे रंग के होते हैं। यह कीट भूमि के अंदर दरारों में छिपा रहता है। अवस्था प्रौढ़ अवस्था पहचान ये चतुष्पदीय कीट मुख्यतः लाल रंग के और छोटे आकार के होते हैं। ये समूह में पाए जाते हैं। ये पत्तियों एवं तने में जाल बनाकर उससे रस चूसते हैं और इनके कारण लाल से धब्बे दिखाई देते हैं। समन्वित कीट प्रबंधन सर्वप्रथम खेत की ग्रीष्मकालीन जुताई करें और कीटग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर दें। इससे जमीन में छिपे कीट एवं उनकी अन्य आवश्य अवस्थाएं नष्ट हो जाती हैं। खेत को खरपतवार से मुक्त रखें। इससे कीटों का प्रकोप कम होता है। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें। नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग करने से फसल, कीटों तथा रोगों के प्रति सुग्राही होती है। कीट प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए। फसल में 5 प्रतिशत नीम की गिरी के सत का छिड़काव करने से कीटों का प्रकोप कम होता है। रस चूसने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड को 2 ग्राम/कि.ग्रा. बीज में मिलाकर इनका उपचार करना चाहिए। खड़ी फसल में रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड के 0.025 प्रतिशत का जलीय घोल या थायोमेथाक्जैम का 100 ग्राम प्रति हैक्टर या एसिटामिप्रिड का 100 ग्राम/हैक्टर की दर से, किसी एक का, छिड़काव करें। एक रसायन का प्रयोग बार-बार न करें, क्योंकि इससे कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। थ्रिप्स और सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए पीला चिपचिपा जाल प्रति एकड 15 सें.मी. ऊपर चंदवा 4-5 जाल प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए। पीएचडी छात्र, कीट विज्ञान स.व.प.कृ.प्रौ.वि. मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश) वैज्ञानिक, कीट विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली