फूल – फसलों की खेती भारत में फूलों की खेती धीरे-धीरे लोकप्रियता प्राप्त कर रही है और इससे होने वाले मुनाफे से लोग इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। जिससे इससे जुड़ी छोटी-छोटी जानकारियों की मांग जैसे कैसे शुरु किया जाए,मिट्टी की जांच एवं उसके अनुसार कौन से फूलों की खेती उपयुक्त है आदि की जानकारी दी गयी है| महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में विभिन्न फूलों की खेती अपनाई गई है और सफलतापूर्वक की जा रही है। गुलाब किस्में : हैप्पीनेस, ग्लेडियेटर, अर्जुन, रक्तगंधा, रक्तिमा, पूसा अजय, पूसा शताब्दी, पूसा मुस्कान, मदर टेरेसा नर्सरी तैयार करना : नर्सरी में तैयार कट्रिग से बने पौधों के रूट स्टॉक में ‘T’ तथा ‘┴’ आकार की कलिकायन विधि से पौधे तैयार कर लिये जाते हैं । सस्य क्रियाएँ : तैयार खेत में 60x60 सें.मी. की दूरी पर गड्ढे खोद कर उसमें उचित मात्रा में खाद व उर्वरण डाल कर तैयार कर लेते हैं। पौध रोपक : अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में पौधों की रोपाई शुरु कर देते हैं| उर्वरण व खाद : 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद व 400:200:200 नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण : वर्ष में 5-6 बार । कटाई : फूलों के आधा खिलने पर उनकी कटाई कर ली जाती है। कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी डण्डी एवं फूलों के रंग के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत करें। 20:25 डंडियों के बंडल मनाकर बक्सों में पैक करें। 1-2 डिग्री से. तापमान व 90-95 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर भण्डारित करें। उपज : 100 से 125 हजार कटे फूल प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष कीट प्रकोप एवं प्रबंधन चेपा (एफिड) चेपा के शिशु वयस्क दोनों ही पौधों के मुलाशम कोपलों, कलियों व गुणों से रस चूसते हैं। फलस्वरूप फसल को हानि होती है। प्रमुख रोग एवं नियंत्रण रोग लक्षण नियंत्रण चूर्णिल आसिता पत्तियों पर उभरे चूर्ण की तरह तथा कभी-कभी लाल दाग दिखते हैं। सफ़ेद धब्बे पत्तों के ऊपर आ जाते हें जिससे पत्तियाँ मुड़ जाती हैं। फूलों और कलियों पर भी रोग के लक्षण दिखाई पड़ते हैं| बेनोमिल एवं ट्रीफोरिन कवकनाशी का प्रयोग करें | काले धब्बे/पर्ण चित्ती पत्तों के ऊपरी भाग पर काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं, पत्त्यिाँ पीली हो जाती हें। रोगग्रस्त पत्तियों को जलाकर नष्ट कर देना चाहिए। फेरवाम (0.1 प्रतिशत), 15 दिन के अन्तराल पर बेन्लेट या बैलेटोन (0.1 प्रतिशत) लक्षण के दिखाई देने पर उपयोग करें। डाई बैक (बौट्रिडिप्लोडिआ थिओब्रोमै, कॉलेटोट्रिकम ग्लिओस्पोरोइडिस) पेड़ ऊपर से नीचे की ओर मरने लगते हैं। शाखाओं के ऊपरी भाग से रोग शुरू होता हैं। काली या भूरी रंग की शाखएँ दिखाई देती हैं। फिर धीरे-धीरे जड़ की तरफ बढ़कर पूरे पेड़ को ग्रसित करती हैं और पेड़ मर जाता है। कवकनाशी कार्बोनेट : लाल * * लेड; लिसिड तेल (4 : 4 : 5) के मिश्रण का लेप लगाना चाहिए| * मिटटी को 2 ग्राम प्रति वाबिस्टिन, बेनोमिल एवं डेनोसन से उपचारित करें| बॉट्रिटिस झुलसा (बॉट्रिटिस पत्तियों पर जल शोषित निशान बनते हैं। फूलों पर भी ये निशान दिखाई पड़ते हैं जो बाद में फूलों के रंग को कम कर देते हैं तथा फूलों के झड़ने की वजह होते हैं| वाबिस्टिन, बेनोमिल एवं रोभराल का छिड़काव करें। रोगग्रस्त भागों को नष्ट करें| रोकथाम 1. परजीवों जैसे लेडी बर्ड भृंगों का संरक्षण करें। 2. डाइमेथेएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या क्विनलफॉस 25 ई.सी. 2 मिलि./लिटर या इमिडाक्लोप्रिड 17. 8 एस.एल. 1 मि.लि./4 लिटर का प्रयोग करें। 2. शल्क कीट (स्केल कीट) ये लाल और भूरे रंग के कीट मुलायम तने को ढंक लेते हैं और पौधों का रस चूसकर दसे कमजोर बना देते हैं। इसके नियंत्रण के लिए एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या डाइमेथेएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर छिड़काव करें। कीटनाशी के छिड़काव से पहले तनों पर सामुन वाले घोल का छिड़काव करें। 3. पत्ती भक्षी भृंग (डीफोलिएटिंग बीटल) भृंगों के शिशु की तड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं। अधिक प्रकोप की अवस्था में पौधे सूख जाते हैं। वयस्क भृंग रात में निकलकर पत्तियों को खते हैं। इनके अधिक प्रकोप से पौधे पत्तीरहित हो जाते हैं। वयस्कों के नियंत्रण के लिए एन्डोसल्फान 2 मि.लि./लिटर पानी या डाइमेथेएट 2 मि.लि./लिटर का छिड़काव करें । शिशुओं के नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरान 3 जी 5 ग्राम/वर्ग की. प्रयोग करें। थ्रिप्स फूलों को किसी कागज या हाथ पर झाड़ने से जो छोटे-छोटे काले रंग के कीट नजर आते हैं वे थ्रिप्स होते हैं। इनके शिशु व वयस्क दोनों ही पत्त्यिों, कलियों व पंखुड़ियों से रस चूसकर पौधों को हानि पहुँचाते हैं। गेंदा किस्में : पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसन्ती गेंदा तथा पूसा अर्पिता नर्सरी तैयार करना : ऊँची उठी क्यारी में बीज की बुवाई करके नर्सरी तैयार की जाती है। सस्य क्रियएँ : 2-3 बार गहरी जुताई कर खेत तैयार करके क्यारियों में विभाजित कर लेना चाहिए। बीज की मात्रा : 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरण व खाद : 6-8 टन सड़ी गोबर की खाद 80 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. फास्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश सिंचाई : 6-8 बार खरपतवार नियंत्रण : 2-3 बार निराई-गुड़ाई कटाई व उपज : जब गेंदे के फूल पूर्ण विकसित हो जाते हैं तब उनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए। लगभग 8-10 टन ताजे फूल शरदकालीन फसल से मिल जाते हैं। तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी पूर्ण विकसित फूलों की सुबह या शाम के समय तुड़ाई करें। तुड़ाई के बाद फूलों को कुछ समय के लिए ठण्डे पानी में डालें। पानी सूखने के बाद फूलों को 200 ग्रा. क्षमता वाली पॉलीथीन की थैलियों में पैक करें। 1-2 डिग्री सें. तापमान व 80-90 प्रतिशत आर्द्रता पर भण्डारित करें। प्रमुख रोग एवं नियंत्रण रोग लक्षण नियंत्रण पर्ण चित्ती एवं कलिया सडन पत्तियों पर छोटे, गोलाकार, काले-भूरे दाग दिखाई पड़ते हैं। रोग के प्रकोप से फूल कलियाँ आदि सड़ने लगते हैं। इससे बीज की उत्पत्ति और फूलों के गुण में कमी आ जाती है। * मैकोजेब ( 0.2 प्रतिशत) या कार्बेडाजिम (0.05 प्रतिशत ) का रोग के प्रथम लक्षण पर तथा हर 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। जड़ तालन (राइनोक्टोनिया सोलानी, स्वलेरासियम रोल्फसाई, पिथियम, ऑल्टिमम्, फाइओप्थेरा ) जड़ में रोग का प्रथम लक्षण दिखलाई पड़ता हे। जड़ सड़ जाती है। पत्तियाँ झड़ जाती हें और अंत में पेड़ मर जाता है। मिट॒टी को कार्बेन्डाजिम और मेटालाक्सिल से उपचारित करें। कीट प्रकोप एवं प्रबंधन चेपा (एफिड) पीले रंग के चेपा के शिशु व वयस्क दोनों ही कलियों व फूलों की डंडियों से रस चूसकर पौधों को हानि पहुँचाते हैं। इनके नियंत्रण के लिए गुलाब के अंतर्गत दर्शाए गए तरीके का उपयोग करें। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान कैसें करें फूलों की खेती : देखिए इस विडियो में