अमरूद को वैज्ञानिक भाषा में सीजियम ग्वाजावा के नाम से जाना जाता है। इसका उत्पत्ति स्थान अमेरिका है। यह उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु का पौधा है, जो मिर्टेसी कुल से संबंधित है। अमरूद को स्वाद एवं पोषक तत्वों में धनी होने के कारण गरीब आदमी का सेब भी कहा जाता है। इसका फल गूदेदार तथा स्वादिष्ट होता है। इसके फलों का उपयोग खाने एवं प्रसंस्करण उद्योग में मुख्य रूप से जैम, जेली और रस बनाने में होता है। अमरूद में प्रतिकूल जलवायु, अधिक गर्मी, शुष्कता तथा लवणीय भूमि को सहने की अद्भुत क्षमता होती है। इसकी सख्त प्रकृति, कम लागत, लगातार उच्च उत्पादन, अच्छी भंडारण क्षमता आदि के कारण इसका क्षेत्रफल लगातार बढ़ता जा रहा है। फलदार पौधों में वर्ष 2018-2019 के पआंकड़ों के अनुसार क्षेत्रफल की दृष्टि से आम, नीबूवर्गीय फलों व केले के बाद अमरूद सर्वाधिक क्षेत्रफल पर उगाया जाता है। वर्ष 2018-19 के दौरान भारत में अमरूद का कुल क्षेत्रफल लगभग 0.26 मिलियन हैक्टर तथा फल उत्पादन 4.05 मिलियन टन एवं उत्पादकता 15.50 टन प्रति हैक्टर थी। भारत में अमरूद की खेती उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में की जाती है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) जिले में उत्पादित होने वाले फल अपने स्वाद एवं गुणवत्ता के कारण पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। राजस्थान का सवाईमाधोपुर जिला अमरूद उत्पादन में विशिष्ट स्थान रखता है। राजस्थान में सवाई माधोपुर, के अतिरिक्त पाली, कोटा, जयपुर, अजमेर, अलवर, श्रीगंगानगर, जालौर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, झुंझुनू, सिरोही, बीकानेर, बाड़मेर, जोधपुर एवं जैसलमेर जिलों में भी अमरूद की खेती की जा रही है। सारणी 1. अमरूद के फलों का पोषक मान क्र.सं. तत्व मात्रा(प्रतिशत में) 1 जल 76.1 2 प्रोटी 1.5 3 वसा 0.2 4 कार्बोहाइड्रेट 14.5 5 रेशा 6.9 6 कैल्शियम 0.01 7 फॉस्फोरस 0.04 8 लोहा 1.00 9 कैलोरी प्रति 100 ग्राम 66.00 10 विटामिन बी 30 (मि.ग्रा. प्रति100 ग्राम) 11 विटामिन बी 30 (मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम) 12 विटामिन 'सी 260.00 (मि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम) पोषक तत्वों से भरपूर अमरूद अमरूद फल ओमेगा-3, टोमेगा-6 बहु असंतृप्त वसीय अम्ल और विशेष रूप से आहार रेशा से समृद्ध होते हैं। आहार रेशा भोजन पचाने व पाचन तंत्र को मजबूती प्रदान करने में सहयोग करता है, जिससे कब्ज रोग से छुटकारा मिलता है। अमरूद के फलों व पौधे के अर्क का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा जैसे-मलेरिया, उदर गैस, उल्टी, दस्त, पेचिश, घाव, अल्सर, दांत दर्द, खांसी, गले में खराश, मसूड़ों की सूजन आदि रोगों के निवारण में किया जाता है। अमरूद का पोषक तत्व मान सारणी-1 में प्रदर्शित है।पोषण से भरपूर, आकर्षक व स्वादिष्ट अमरूद के फलों की वर्षभर बाजार मांग रहती है। इसकी बागवानी सरल होने के कारण यह किसानों में लोकप्रिय है। इसके बागवानी विस्तार की प्रचुर संभावना है। सरलता से तैयार होता है अमरूद का पौधा अमरूद के पौधों का प्रवर्धन बीज और वानस्पतिक विधियों से किया जाता है। बीज से तैयार पौधे देर से फलन में आते हैं। ऐसे पौधों के फलों की गुणवत्ता भी अनिश्चित होती है। वानस्पतिक विधि से तैयार पौधा जल्दी फलन में आता है और उत्पादित फलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। वानस्पतिक विधियों में वायु दाब विधि से अमरूद आसानी से तैयार किया जा सकता है। वायु दाब से पौधे तैयार करने के लिये एक वर्ष पुरानी या पिछली ऋतु में विकसित हुई शाखा, जिसका , आकार पेंसिल की मोटाई के समान हो, चयन किया जाना चाहिए। चयनित शाखा के आधार से लगभग 10 से 15 सें.मी. दूर, 2.5 से 3 सें.मी. (गर्डलिंग) आकार में छाल कोहटाया जाता है। इस हिस्से को नम मॉस घास न उपयोग कर ढक दिया जाता है। छाल कटान र वाले भाग को मॉस घास के साथ बांधने से । अधिक समय तक बेहतर नमी बरकरार रहने - के कारण इस भाग से आसानी से जड़ निकल - आती है। इसके बाद मॉस घास को पतली | पारदर्शी पॉलीथीन पट्टी से ढककर सुतली र से बांध दिया जाता है। लगभग 2-3 माह , बाद पारदर्शी पॉलीथीन पट्टी से जड़ें दिखाई - देने लगती हैं। अब प्रवर्धित शाखा को 2-3 7 बार में कटान लगाकर मातृ पौधे से अलग न कर देते हैं। इसके बाद पौधशाला में आंशिक छाया में पॉलीथीन हटाकर मृदा या पॉलीथीन ट में लगा दिया जाता है। वायु दाब प्रवर्धन । मुख्यतः जुलाई-अगस्त में करना चाहिए। इस समय वातावरण में अधिक नमी होने से शत-प्रतिशत जड फुटान मिलती है। वायु दाब के लाभ वायु दाब प्रवर्धन से प्राप्त पौधे शत-प्रतिशत मातृ गुणों के समान होते हैं बीजू पौधों की तुलना में जल्दी व अधिक उत्पादक होते हैं। वायु दाब से प्राप्त पौधे आकार में बीजू पौधों की तुलना में छोटे होते हैं, जिससे उद्यानिकी क्रियाओं जैसे-सधाई, कटाई, तुड़ाई इत्यादि में आसानी रहती है। इस विधि द्वारा कम समय में अधिक पौधे तैयार किये जा सकते हैं। वायु दाब की गई शाख से जड़ फुटान की दर लगभग 95-100 प्रतिशत होती है। सावधानियां वायुदाब के लिए मातृ वृक्ष के तौर परअधिक उत्पादन वाले पेड़ का चयन करना चहिए। मातृ पौधा कीट व रोगों से ग्रसित नहीं होना चहिए। वायु दाब वर्षा ऋतु (जुलाईअगस्त) में करना चाहिए। इस समय वातावरण में उपलब्ध प्रचुर नमी के कारण जल्दी व अधिक जडें निकलती है शाखा से छाल निकालते (गर्डलिंग क्रिया) समय इसका ध्यान रखना चाहिए कि छाल पूरी तरह हट जाए। स्फैगनम घास प्रयोग से पहले घास को पानी में रात भर अच्छी तरह से भिगो लेना चाहिये, जिससे वे अच्छी तरह जल चूस लें। स्फैगनम घास लगाने के बाद पॉलीथीन को अच्छी तरह से लपेटकर दोनों तरफ से सुतली से बांधना चहिए, ताकि स्फैगनम बांधे गये स्थान पर बना रहे। वायु दाब वाले स्थान से अच्छी तरह जड़ निकलने के बाद मातृ पौधे से अलग करने के तुरन्त बाद मृदा या पॉलीथीन बैग में लगा देना चहिए। तैयार पौधे पौधशाला में अधिक दिनों तक रखने के कारण इन पौधों की जड़ें भूमि में प्रवेश करने लगती हैं। अतः वायु दाब से तैयार पौधा पौधशाला में 1 वर्ष से अधिक समय तक रखा हो, तो उसे वहां से हटाकर स्थान परिवर्तन कर देना चहिये। पौधों की भूमि में गई हुई जड़ों को काट देना चहिये। उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय, झालरापाटन, झालावाड़-326023 (कृषि विश्वविद्यालय, कोटा, राजस्थान) जितेन्द्र सिंह और सन्दीप कुमार