लीची (लीची चाइनेनसिस) एक उपोष्णकटिबंधीय सदाबहार फल वृक्ष है। यह सापिनडेसी कुल का फल है जो मूलत दक्षिण चीन के क्वांगटुंग और फुकिएन क्षेत्र से है। इसके फल उत्तर भारत वर्ष में आम तौर पर अप्रैल से जुलाई माह में तैयार होते हैं। लीची का गूदा अपने उत्कृष्ट स्वाद तथा उच्च पोषण के लिए बहुत लोकप्रिय है। इस फल के आकर्षक गुलाबी-लाल रंग, मनोरम स्वाद और पोषक तत्वों के लिए इसे "फलों की रानी" कहा जाता है। चीन, भारत, थाईलैंड, वियतनाम, बांगलादेश, नेपाल, फि लीपिन्स, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, अमेरिका, इस्राइल और मेडागास्कर देशों में लीची की बागवानी की जा रही है। लीची के उत्पादन में चीन और भारत का लगभग 91 प्रतिशत योगदान है। यह मनोरम फल प्रमुख रूप से अपने उत्पादन क्षेत्र के आस-पास के लोगों के खाने के काम में आता है, क्यूंकि तुड़ाई के बाद यह फल बहुत जल्दी खराब होने लगता है एवं इसके छिलके का रंग भी भूरा पड़ने लगता है। इसके विभिन्न भागों का प्रयोग भारतीय और चीन की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली में किया जाता रहा है। लीची की बागवानी भारतवर्ष में मुख्यतः बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तराखंड, ओड़ीशा और हिमाचल प्रदेश में की जाती है। इसके अलावा लीची के बाग जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, सिक्किम, केरल और तमिलनाडु में भी हैं। बिहार में 31.48 हजार हेक्टेयर भूमि में लीची के बाग हैं, जिनसे 2013-14 वर्ष में 234.2 हजार मैट्रिक टन फल का उत्पादन हुआ था। पश्चिम बंगाल में 2013-14 वर्ष में 93.9 हजार मैट्रिक टन लीची का उत्पादन प्राप्त हुआ था। बिहार में लीची की बागवानी मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर, वैशाली, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुर और भागलपुर जिलों में की जाती है। भारत वर्ष से लीची मुख्यतः बांगलादेश और यूनाइटेड किंगडम में निर्यात की जाती है। 2014-15 वर्ष में बांगलादेश और यूनाइटेड किंगडम में क्रमशः 915 मैट्रिक टन और 44.6 मैट्रिक टन लीची भेजा गयाजिससे लगभग 180 लाख रुपए की विदेशी मुद्रा अर्जित की गई। इसमें पिछले वर्ष की अपेक्षा 662.51 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह अप्रत्याशित वृद्धि विदेश में लीची की बढ़ती लोकप्रियता का परिचायक है। हालांकि भारत से ताजे फलों के निर्यात में लीची का 0.17 प्रतिशत योगदान ही है, जिसे और अधिक बढ़ाने के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना होगा।लीची के फल को 2000 ईसा पूर्व से ही चीन में खाया जाता रहा है। यह फल भारत वर्ष के पूर्वोत्तर राज्यों में 17वीं शताब्दी के अंत में बर्मा से आया था। लीची बहुत सारे चीनी सम्राटों का पसंदीदा फल था। लीची एक गैर-क्लाइम्क्टेरिक फल है अर्थात यह फल पूरी तरह से पकने के बाद ही पेड़ से तोड़ा जाना चाहिए। इस फल का अधिकतम स्वाद और पोषण पूरी तरह पकने के बाद ही मिलता है। इसके बीज और छिलके अखाद्य होते हैं। लीची के गूदे में विटामिन सी, विटामिन ई, पोलिफेनोल्स, फ्लेवोनोएड्स जैसे कई एंटीऑक्सीडेंट (ऑक्सीकारक-रोधी) यौगिक पाये जाते हैं। इस फल का उपयोग पारंपरिक चीनी तथा भारतीय चिकित्सा प्रणाली में कई महत्वपूर्ण गुणों तथा कई रोगों से लड़ने के लिए किया जाता रहा है। आधुनिक अनुसंधान ने भी लीची की कई रोगों के प्रति रक्षात्मक क्षमता की पुष्टि की है। लीची में एंथोसायनिन, फिनोलिक्स जैसे कई जैव-सक्रिय यौगिक पाये जाते हैं। अत: लीची के फल हृदय रोगों, मधुमेह, गुर्दा रोग तथा कर्क रोग (कैंसर) से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता देते हैं। लीची की पत्तियों में सूजन, दर्द और ज्वर को कम करने का गुण होता है। लीची के फूल भी ऑक्सीकारक रोधी होते हैं।लीची में सूक्रोज, फ़्रक्टोस और ग्लूकोस तीनों ही पाये जाते हैं। लीची के 100 ग्राम गूदे में 70 मिलीग्राम विटामिन सी होती है जो कि हमारी दैनिक आवश्यकता का लगभग 76 प्रतिशत है। इसके अलावा यह खनिज पोषक तत्वों का भी एक प्रचुर स्रोत है। इसमें बहुत सा और सोडियम होता है। इसके अलावा लीची एनीमिया के रोगियों के लक्षणों में भी सुधार लाता है। शोध कार्यों से पाया गया है किलीची पाचन और रक्त परिसंचरण में भी सुधार लाता लीची का छिलका भी स्वास्थयवर्धक यौगिकों जैसे एंथोसायनिन, विटामिन सी और फ्लावोनोइड का एक खजाना है। निहित उच्च फाइबर तथा एंटीऑक्सीडेंट घटकों के कारण लीची को कैंसर विरोधी गुण मिलता है जिसका शोध कार्यों में काफी वर्णन किया गया है। लीची कैंसर पीड़ित कोशिकाओं के विकास को बाधित करता है। लीची फल में एंटीवायरस, हृदय रक्षक, गुर्दा रक्षक और मधुमेह विरोधी गुण हैं, हालांकि इनकी क्रियाविधि अभी तक पूरी तरह से नहीं समझी गयी है। लीची के श्रेष्ठ पोषण और विभिन्न रोगों से लड़ने के प्रतिरोधक गुणों की वजह से निस्संदेह यह फलों की टोकरी का एक बहुमूल्य रत्न है। लीची के पोषण, औषधीय गुण, उत्कृष्ट स्वाद और अनूठे रूप-रंग इसे यकीनन एक 'सुपर फल' बनाते हैं। पारंपरिक चीनी और भारतीय चिकित्सा प्रणाली में पाचन, रक्त संचार, उत्सर्जन और प्रजनन प्रणाली में लीची फल को ग्रहण करने के कई फायदे बताए गए हैं। समकालीन अनुसंधान ने भी लीची के कई महत्वपूर्ण गुणों को प्रमाणित किया हैलीची के पत्तों में सूजन, बुखार तथा दर्द को कम करने का गुण है। लीची के फूल सूजन, जिगर क्षति और लिपिड के स्तर में कमी करते हैं। अध्ययन से पता चला है कि लीची फल मधुमेह, मोटापा और अन्य उपापचयी क्रियाओं के लिए एक चिकित्सकीय फल के रूप में भी कार्य करता है। लीची अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी है। यह कथन चीन के पुराने दस्तावेजों तथा आधुनिक शोध कार्यों से प्रमाणित है। लीची फास्फोरस, मैग्नीशियम, कॉपर और मैंगनीज का अच्छा स्रोत है इसलिए यह हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है। लीची के फल में लगभग 60 प्रतिशत फल-रस, 8 प्रतिशत रैग, 19 प्रतिशत बीजऔर 13 प्रतिशत छिलका होता है। इसमें 77-83 प्रतिशत पानी होता है।लीची के गूदे का कुल घुलनशील ठोस (टी.एस.एस.) लगभग 14-25डिग्री ब्रिक्स होता है। लीची खांसी और गैस में भी राहत देता है। लीची रक्तचाप और दिल की धड़कन को सामान्य करने में मदद करता है, जिससे स्ट्रोक और हृदय रोग से सुरक्षा मिलती है। लीची के समागत पोलिफेनोल्स हृदय स्वास्थ्य में वृद्धि करते हैं। लीची के ऑक्सीकारकरोधी तत्व प्रतिरक्षा में सुधार लाते हैं, मोतियाबिंद जैसे रोगों को धीमा करने में सहायक होते हैं तथा सभी प्रकार के हृदय रोगों से रक्षा करते हैं। लीची पाचन क्रिया को मजबूत बनाता है। यह शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ाता है। लीची के फाइबर आंत समस्याओं को नियंत्रित करता है। लीची बी कॉम्प्लेक्स विटामिन का एक अच्छा स्रोत है जो कि हमारे शरीर के उचित कार्य करने के लिए जरूरी है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं। लीची एक कम कैलोरी वाला फल है, जिसके निहित फाइबर वजन कम करने में काफी सहायक होते हैं। लीची त्वचा को भी पोषण देता है और कील-मुहांसों को कम करता है। लीची के ऑक्सीकारक-रोधी जैसे विटामिन सी और फ्लावोनोइड्स इत्यादि त्वचा को स्वस्थ और साफ रखने में मदद करते हैं तथा फ्री रेडिकल्स से उत्पन्न त्वचा में विकार को कम करते हैं। सारणी 1: लीची में पाये जाने वाले पोषक तत्व और दैनिक अनुशंसित खुराक का प्रतिशत जो लीची से मिलता है। दैनिक अनुशंसित खुराक का प्रतिशत जो 100 ग्राम लीची के गूदे से मिलता है स्वस्थय पुरुष के लिए वजन 60 किलो (जो मध्यम श्रेणी का काम करता है स्वस्थ्य महिला के लिए वजन 55 किलो (जो मध्यम श्रेणी का काम करती है) ऊर्जा 66 किलोकैलोरी २ .4 2.95 1.5 1.8 प्रोटीन 0.83 ग्राम 1.4 1.5 वसा 0.44 ग्राम 1.5 1.8 कार्बोहाइड्रेट 16.53 ग्राम 12.7 12.7 फाइबर (रेशा) 1.30 ग्राम 3.4 5.2 थाईमिन 0.011 मिलीग्राम 0.8 1.0 राइबोफ्लेविन 0.065 मिलीग्राम 4.1 5.0 नियसिन 0.603 मिलीग्राम 3.4 4.3 विटामिन बी 6 0.10 मिलीग्राम 5.0 5.0 विटामिन सी 71.5 मिलीग्राम 178.8 178.8 विटामिन ई 0.07 मिलीग्राम 0.5 0.5 विटामिन के 0.40 माइक्रोग्राम 0.5 0.5 फोलेट 14.00 माइक्रोग्राम 7.0 7.0 कैल्सियम 5.00 मिलीग्रा 0.8 0.8 आयरन 0.31 मिलीग्राम 2.9 3.2 मैग्नीशियम 10.00 मिलीग्राम 1.8 1.5 फास्फोरस 31.00 मिलीग्राम 4.4 4.4 पोटेशियम 171.00 मिलीग्राम 3.6 3.6 जिंक 0.07 मिलीग्राम 0.6 सोडियम 1.00 मिलीग्राम 0.04 0.04 सारणी 2: लीची फल के विभिन्न भागों में पाये जाने वाले तत्व भाग फल गूदा तत्व फ्लावोनोइड्स, फ्लावनो-3 ओल्स, टेन्निंस, फाइबर, प्रो-एथोंस्यनिडीन, फ्लावनोल्स, फेनोलिक एसिड, ल्यूको-एंथोसायनिन, फेनोलिक्स, ट्राईटरपीनस, विटामिन, अमीनो एसिड, एपीकटेकीन, खनिज तत्व और स्टेरोल्स फूल बीज छिल्का पत्ती एवं छाल फेनोलिक एसिड, स्टेरोल्स, ट्राईटरपीनस बीज एपीकटेकीन, फ्लावनो-3 ओल्स, प्रो-एनथोंस्यनिडीन, फ्लावनोनेस, फ्लावनोल्स, कौमरिंस, सेस्कुइटरपीनस, फैटी एसिड, स्टेरोल्स छिलका एपीकटेकीन, गैलोकटेकीन, गैलोकटेकीन, एपीकटेकीन, ग्लूकोसिड, प्रो-स्यनिडीन, प्रो-एंथोस्यनिडीन, एंथोस्यनिन, फ्लावोनोल्स, फेनोलिक्स , फेनोलिक्स पत्ती एवं छाल स्टेरोल्स, ट्राईटरपीनस, सेस्कुइपिनसपोल बी, सेस्कुइमरोकनोल बी, क्रोमनेस, एपीकटेकीन, क्वेर्सेटिन, प्रो-एंथोस्यनिडीन, टेन्निंस, प्रोस्यनिडीन, केम्प्फेरोल अनियमित दिनचर्या और खान-पान के कारण कब्ज की समस्या होना आम बात है। भोजन के बाद बैठे रहने और रात के खाने के बाद सीधे सो जाने जैसी आदतें कब्ज के लिए जिम्मेदार होती हैं। अगर आपको भी होती है यह समस्याएँ तो हम बता रहे हैं इससे निपटने के 10 घरेलू उपाय सुबह उठने के बाद पानी में नींबू का रस और काला नमक मिलाकर पिएँ। इससे पेट अच्छी तरह साफहोगा और कब्ज की समस्या नहीं होगी। कब्ज के लिए शहद बहुत फायदेमंद है। रात को सोने से पहले एक चम्मच शहद को एक गिलास पानी के साथ मिलाकर पिएँ। इसके नियमित सेवन से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है। सुबह उठकर प्रतिदिन खाली पेट 4 से 5 काजू, उतने ही मुनक्का के साथ मिलाकर खाने से भी कब्ज की शिकायत समाप्त हो जाती है। इसके अलावा रात को सोन से पहले 6 से 7 मुनक्का खाने से भी कब्ज ठीक हो जाता है। प्रतिदिन रात में हरड़ के चूर्ण या त्रिफला को कुनकुने पानी के साथ पिएँ। इससे कब्ज दूर होगा, साथ ही पेट में गैस बनने की समस्या से भी निजात मिलेगी। कब्ज के लिए आप सोते समय अरंडी के तेल को हल्के गर्म दूध में मिलाकर पी सकते हैं। इससे पेट साफ होता है और कब्ज की समस्या नहीं होती। ईसबगोल की भूसी कब्ज के लिए रामबाण इलाज है। आप इसका प्रयोग दूध या पानी के साथ रात को सोते वक्त कर सकते हैं। इससे कब्ज की समस्या बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। फलों में अमरूद और पपीता कब्ज के लिये बेहद फायदेमंद होते हैं। इनका सेवन किसी भी समय किया जा सकता है। इन्हें खाने से पेट की समस्याएँ तो समाप्त होती ही हैं, त्वचा भी खूबसूरत बनती है। किशमिश को कुछ देर तक पानी में गलाने के बाद, इसका सेवन करने से कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है। इसके अलावा अंजीर को भी रातभर पानी में गलाने के बाद उसका सेवन करने से कब्ज की समस्या खत्म होती है। पालक भी कब्ज के मरीजों के लिए एक अच्छा विकल्प है। प्रतिदिन पालक के रस को दिनचर्या में शामिल कर आप कब्ज से आजदी पा सकते हैं, साथ ही इसकी सब्जी भी सेहत के लिए अच्छी होती है, लेकिन अगर आप पथरी के मरीज हैं तो सका इस्तेमाल न करें। कब्ज से बचने के लिए नियमित रूप से व्यायामऔर योगा करना बेहद फायदेमंद होता है। इसके अलावा हमेशा गरिष्ठ भोजन करने से बचना चाहिए।