<p style="text-align: justify;">ट्राईकोडर्मा <a href="../../../../../../../agriculture/crop-production/91c94893593f915-916947924940/93993f92e93e91a932-92a94d930926947936-92e947902-91c94893593f915-916947924940/91c94893593f915-916947924940">जैविक खेती</a> में उपयोगी एक हफरनमौला मित्र कवक है । ‘एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा' ट्राईकोडर्मा विरिडे स्ट्रेन ‘एनआरसीएल टी-01' आधारित एक जैविक फफूंदनाशी/कवकनाशी उत्पाद है जिसे भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर ने विकसित किया है । यह स्ट्रेन उच्च मृदा लवणता (पीएच.) और तापमान के प्रति सहिष्णु है । यह मिट्टी से उत्पन्न होने वाले रोगों विशेष रूप से विल्ट रोग (पौधा सूखनेवाला रोग/उकठा रोग/म्लानि रोग) के लिए एक कुशल जैविक नियंत्रक के रूप में कार्य करता है। इसके साथ ही, यह जैव-उर्वरक के रूप में भी काम करता है जिससे उत्कृष्ट पौध वृद्धि होती है। क्षेत्रीय परीक्षणों में, यह लीची, शीशम, अर्जुन और पपीता के म्लानि रोग को नियंत्रित करने में रामबाण साबित हुई है । यह सभी खेत की फसलों, फलों, सब्जियों और फूलों में इस्तेमाल किया जा सकता है। 2016 में एनआरसीएल के 'स्थापना दिवस' के शुभ अवसर पर इसे 'एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा' के नाम से विमोचित किया गया था। इसका परीक्षण-पैक (ट्राइल पैक) किसानों द्वारा क्षेत्र-प्रदर्शन के उद्देश्य से केंद्र पर उपलब्ध है।</p> <h3 style="text-align: justify;">एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा के प्रयोग से लाभ </h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>यह रोगकारक जीवों की वृद्धि को रोकता है या उन्हें मारकर पौधों को रोग मुक्त करता है। यह पौधों के रासायनिक प्रक्रियाओंको परिवर्तित कर पौधों में रोग-रोधी क्षमता को बढ़ाता है। अतः इसके प्रयोग से रसायनिक दवाओं, विशेशकर कवकनाशी पर निर्भरता कम होती है।</li> <li> यह पौधों में रोगकारकों के विरूद्ध तंत्रगत अधिग्रहित प्रतिरोधक क्षमता (सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेसिस्टेन्स) की क्रियाविधि कोसक्रिय (ट्रिगर) करता है।</li> <li> यह मृदा में कार्बनिक पदार्थों के अपघटन की दर बढ़ाता हैं अतः यह जैव उर्वरक की तरह काम करता है ।</li> <li> यह पौधों में एंटी ऑक्सिडेंट गतिविधि को बढ़ाता है । टमाटर के पौधों में ऐसा देखा गया कि जहाँ मिट्टी में ट्राईकोडर्मा डालागया उन पौधों के फलों की पोशक तत्वों की गुणवत्ता, खनिज तत्व और एन्टिऑक्सीडेंट गतिविधि अधिक पाई गई।</li> <li> यह पौधों की वृद्धि को बढ़ाता है क्योंकि यह फॉस्फेट एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों को घुलनशील बनाताहै। इसके प्रयोग से घासऔर कई अन्य पौधों में गहरी जड़ों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जो उन्हे सूखाड़ में भी बढ़ने की क्षमता प्रदान किया।</li> <li> ये कीटनाशकों, वनस्पतिनाशकों से दूशित मिटटी के जैविक उपचार (बॉयोरिमेडिएसन) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमेंविविध प्रकार के कीटनाशक जैसे-ऑरगेनोक्लोरिन, ऑरगेनोफॉस्फेट एवं कार्बोनेट समूह के कीटनाशकों को नष्ट करने की क्षमता होती है ।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा के प्रयोग की विधि</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li> <strong>बीजोपचार : </strong>बीजोपचार के लिए प्रति किलो बीज में 5-10 ग्राम ट्राईकोडर्मा पाउडर (फार्मूलेशन) जिसमें 2X10° सी.एफ.यू. प्रतिग्राम होता है, को मिश्रित कर छाँव में सूखा लें फिर बुआई करें ।</li> <li> <strong>कंद उपचारः </strong>10 ग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति लीटर पानी में डालकर घोल बना लें फिर इस घोल में कंद (बल्व) को 30 मिनट तकडुबा कर रखें। फिर इसे छाया में आधा घंटा रखने के बाद बुआई करें।</li> <li> <strong>सीड प्राइमिंग : </strong>बीज बोने से पहले खास तरह के घोल में बीजों को लथ-पथ कर छाये में सूखाने की क्रिया को 'सीड प्राइमिंग'कहा जाता है। ट्राईकोडर्मा से सीड प्राइमिंग करने हेतु सर्वप्रथम गाय के गोबर का गारा (स्लरी) बनायें। प्रति लीटर गारे में 10 ग्राम ट्राईकोडर्मा उत्पाद मिलाएँ और इसमें लगभग एक किलो बीज डुबो कर 12 घंटे के लिए रखें । उसके बाद बीज बाहर निकाल कर छाये में थोड़ी देर सूखने दें फिर बुआई करें। ये प्रक्रिया खासकर अनाज, दलहन और तिलहन फसलों की बुआई सेपहले करना उपयुक्त होता है।</li> <li><strong> सीड प्राइमिंग का दूसरा तरीका : </strong>बीज बोने के पूर्व बीज को पानी में भिंगो कर 12 घंटे के लिए लथ-पथ करके रखें/ सोखें। इसके बाद ट्राईकोडर्मा उत्पाद 10 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से मिलाएँ । फिर, बीज को एक ढेर के रूप में रखें। उच्च आर्द्रता को बनाए रखने के लिए एक नम जूट बोरी के साथ ढेर को कवर करें/ ढंक दें । इस तरह 48 घंटे के लिए लगभग 25-32 डिग्री सेल्सियस तापक्रम और उच्च आर्द्रता में बीज को सेते हैं। इससेट्राईकोडर्मा का बीज की सतह पर चारों ओर एकसुरक्षात्मक परत बन जाता है । अब बीज नर्सरी में बोने के लिए तैयार है ।</li> <li> <strong>मृदा शोधन : </strong>एक किलोग्राम ट्राईकोडर्मा पाउडर को 25 किलो कम्पोस्ट (गोबर की सड़ी खाद) में मिलाकर एक सप्ताह तकछायादार स्थान पर रख कर उसे गीले बोरे से ढकें ताकि इसके बीजाणु अंकुरित हो जाएँ। इस कम्पोस्ट को एक एकड़ खेत मेंफैलाकर मिट्टी में मिला दें फिर बुआई/रोपाई करें ।</li> <li> <strong>नर्सरी उपचार : </strong>बुआई से पहले 5 ग्राम ट्राईकोडर्मा उत्पाद प्रति लीटर पानी में घोलकर नर्सरी बेड को भिगोएं।</li> <li><strong>कलम और अंकुर पौधों की जड़ डुबकी (कटिंग एंड सीडलींग रूट डिप):</strong> एक लीटर पानी में 10 ग्राम ट्राईकोडर्मा घोललें और कलम एवं अंकुर पौधों की जड़ों को 10 मिनट के लिए घोल में डुबाकर रखें, फिर रोपण करें | </li> <li> <strong>पौधा उपचार : </strong>प्रति लीटर पानी में 10 ग्राम ट्राईकोडर्मा पाउडर को घोलकर पौधों के जड़ क्षेत्र को भिगोएँ। </li> <li> <strong>पौधों पर छिड़काव :</strong> कुछ खास तरह के रोगों जैसे पर्ण चित्ती, झुलसा आदि की रोक-थाम के लिए पौधों में रोग के लक्षणदिखाई देने पर 5-10 ग्राम ट्राईकोडर्मा पाउडर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। </li> <li> <strong>फलदार वृक्ष (जैसे-लीची और आम) में प्रयोग :</strong> पेड़ के क्षत्रक की बाहरी सीमा से लगभग एक फीट अंदर की तरफ मिट्टीमें 100-200 ग्राम/पेड़ (उम्र के हिसाब से) ट्राईकोडर्मा उत्पाद को 2-4 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद/कम्पोस्ट या वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर पेड़ के चारो तरफ 30 सेंटीमीटर की चौड़ाई में छिड़क दें और उसे कुदाल से मिलाएँ। मिट्टी में नमीकी मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। अगर नहीं हो, तो ट्राईकोडर्मा डालने के बाद हल्की सिंचाई कर दें।</li> <li> <strong><a href="../../../../../../../agriculture/crop-production/92e94392693e-93894d93593e93894d92594d92f/हरी-खाद">हरी खाद</a> (ग्रीन मेन्यूरिंग) के लिए : </strong>अच्छी हरी खाद के लिए सनई (सन हेम्प) या ढइंचा को मिट्टी में पलटने के बाद 5किग्रा ट्राईकोडर्मा पाउडर प्रति हेक्टेयर की दर से डालकर जुताई कर दें।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा संवर्धित खाद</h3> <p style="text-align: justify;"> इस विधि से किसान ट्राईकोडर्मा उत्पाद की छोटी मात्रा से पर्याप्त मात्रा अपने स्तर पर बनाकर न केवल बड़े क्षेत्र में प्रयोग कर सकते हैं बल्कि अपने ही स्तर पर इसे गुणित कर ज्यादा से ज्यादा फसलों में भी प्रयोग कर सकते है। पर, ध्यान रखें की यह लंबी अवधि के लिए न करें | 100 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट या नीम की खल्ली लें। इसे किसी छायेदार शेड में फैलाकर रखें। 7. फिर इसके ऊपर एक किलोग्राम ट्राईकोडर्मा उत्पाद बुरक दें और कुदाल या फावड़ें से अच्छी तरह मिलाएं। अगर ये सूखी लगे तो हल्की पानी के छींटे दे दें। इसके बाद इसे पॉलीथीन से ढक दें। हर 7 दिन के अंतराल पर मिश्रण को मिलाएं। लगभग 20 दिन में खाद ट्राईकोडर्मा संवर्धित हो जायेगी जिसे खेतों में विस्तारित कर अथवा जोत-गड्डे में डालकर फसल लगाएं। बागवानी पेड़ों जैसेआम, लीची इत्यादि में रिंग बेसिन बनाकर संवर्धित खाद डाला जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा के प्रयोग में सावधानियाँ </h3> <ol style="text-align: justify;"> <li> कल्चर/ फार्मूलेशन छ: महीने से ज्यादा पुराना न हो ।</li> <li> बीज/पौधे उपचारण का कार्य छायेदार एवं शुष्क स्थान पर करें।</li> <li> ट्राईकोडर्मा के साथ-साथ कवकनाशी रसायनों का प्रयोग न करे।</li> <li> ट्राईकोडर्मा के प्रयोग के 4-5 दिनों के पश्चात् तक रासायनिक कवकनाशी का प्रयोग न करें।</li> <li> सूखी मिट्टी में ट्राईकोडर्मा का प्रयोग न करें। नमी इसके विकास और बचे रहने के लिए एक अनिवार्य पहलू है।</li> <li> ट्राईकोडर्मा उपचारित बीज को सीधी सूर्य की किरणें न लगने दें। कार्बनिक खाद में मिलाने के बाद इसे लंबी अवधि के लिए न रखें।</li> </ol> <h3 style="text-align: justify;">एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा उत्पाद का रख-रखाव </h3> <p style="text-align: justify;">ट्राईकोडर्मा एक कवक है, अतः सामान्य से तीन-चार महीने तक इसकी संख्या में विशेष गिरावट नहीं आती है पर समय बढ़ने के साथ इसकी प्रति ग्राम संख्या कम होने लगती है जिससे इसकी गुणवत्ता पर बहुत असर आता है, इसलिए पैकेट को अधिक दिन तक रखने के लिए 8 से 10 डिग्री सेल्सियस तापमान पर संग्रहित करना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">एनआरसीएल ट्राईकोडर्मा की संगतता (कम्पैटीविलीटी) </h3> <p style="text-align: justify;">यह जैविक/कार्बनिक खाद और अन्य जैवउर्वरक (बायोफर्टीलाइजर) जैसे-राइजोबियम, एजोस्पिरिलम, वैसिलस सब्टिलिस एवं फॉस्फोबेक्टिरिया के साथ संगत है। ट्राईकोडर्मा रासायिनक कवकनाशी मेटालेक्सिल और थिरम द्वारा उपचारित बीज के साथ प्रयोग किया जा सकता है पर अन्य किसी भी रासायनिक कवकनाशी (फंजीसाइड्स) के साथ नहीं ।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : डॉ. विनोद कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक (पौधा रोग), राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर-842002। </p>