<h3 style="text-align: justify;">भारत प्रमुख आयातक देश</h3> <p style="text-align: justify;">पिस्ता जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि पिस्ता सभी सूखे मेवों का राजा माना जाता है। पिस्ता एक ड्राई फ्रूट है जिसके बिना मेवे अधूरे हैं। पिस्ता की व्यावसायिक खेती भारत में दक्षिण में शुरू की गई है, लेकिन प्रतिकूल जलवायु के कारण, यह उतनी गुणवत्ता वाली पिस्ता नट्स का उत्पादन करने में सक्षम नहीं है। भारत को पिस्ता फल का एक प्रमुख आयातक माना जाता है, ज्यादातर पिस्ता नट्स को अमेरिका, ईरान, तुर्की और अफगानिस्तान से आयात किया जाता है। अब तक, भारत में कुल खपत का 2 प्रतिशत उत्पादन नहीं हुआ है और पूरा व्यापार आयात पर आधारित है। </p> <h3 style="text-align: justify;">आवश्यक जलवायु</h3> <p style="text-align: justify;">पिस्ता को 4 डिग्री से 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान की आवश्यकता होती है, जिसमें अच्छे उत्पादन के लिए पिस्ता के पौधे को 5 से 3 ℃ तक कम से कम 50 दिनों के तापमान की आवश्यकता होती है, और अच्छे फूलों और फलों के लिए 45 अधिकतम तक का तापमान आवश्यक होता है। जिससे अच्छे फल के रूप में पिस्ते का विकास होता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">पिस्ता की खेती के संभावित राज्य</h3> <p style="text-align: justify;">कॉफी बोर्ड के पूर्व सदस्य डॉ विक्रम शर्मा, कृषि और बागवानी पर पिछले 20 वर्षों से हिमालयी क्षेत्र के लिए अनुसंधान और विकास कार्य में लगे हुए हैं, उनके अनुसार कि पिस्ता के बागानों की व्यावसायिक खेती के संदर्भ में, हमारा हिमालयी क्षेत्र जो कि बहुत विस्तृत है जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर पूर्व के लिए उत्तराखंड क्रॉसिंग पिस्ता की व्यावसायिक खेती के लिए बहुत अच्छा साबित होगा । उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में पिस्ता के लिए सभी पर्यावरणीय आवश्यकताओं को पूरा करने की भरपूर क्षमता है, जो किसानों और बागवानों के लिए इन क्षेत्रों में व्यावसायिक रूप से पौधे लगाने के लिए एक वरदान साबित हो सकता है। डॉ. शर्मा के अनुसार इस वर्ष उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता के तहत किसानों और युवाओं के लिए पिस्ता के 5000 पौधे मंगवाए हैं जो जल्दी ही हिमालयी क्षेत्र के जागरूक किसानों और युवाओं को वितरित किए जाएगें। </p> <h3 style="text-align: justify;">अन्य उपयोगी फसलें</h3> <p style="text-align: justify;">डॉ. विक्रम के अनुसार पिस्ता एक बहुत ही हार्डी पौधा है जिसे मादा और नर पौधों के रूप में तैयार किया जाता है, केवल मादा पौधा ही फल देता है तथा नर केबल पॉलिनाशन के लिए लगाया जाता है, इसकी खेती हिमालयी क्षेत्रों के अधिकांश हिस्सों में आसानी से की जा सकती है। शर्मा ने कहा कि पिस्ता के साथ-साथ दालचीनी, अंजीर, कॉफी, लाल ग्लोब अंगूर, कीवी फल, एवोकाडो, हींग जैसी अन्य व्यावसायिक फसलें भी हिमालयी बेल्ट में आसानी से उगाई जा सकती हैं। डॉ. विक्रम के अनुसार हिमाचल प्रदेश में वर्ष 1999 में कॉफी उगाना शुरू हुी, जो बहुत सफल रही। उनके अनुसार यहां की कॉफी अन्य भारतीय क्षेत्रों या देशों की कॉफी की तुलना में अधिक शानदार और सुगंधित है क्योंकि तापमान भिन्नता व पर्यावरण का बदलाव, सुद्धता इसे और अधिक सुगंधित कर देती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">हींग के खेती का सफल उदाहरण </h3> <p style="text-align: justify;">लगभग 5 साल पहले भारत की धरती पर कीमती मसाले जैसे हींग (असफोटिडा) के उत्पादन का अनुसंधान और विकास शुरू करने का श्रेय कॉफी बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विक्रम शर्मा को जाता है। उन्होंने अपने स्तर पर ट्राइल भी किए और इस पर अलग अलग जगह पर भी ट्राइल करवाए और हींग के लिए ऊपरी हिमालयी क्षेत्र उपयुक्त पाया गया। आज राष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान संस्थानों ने इस पर काम करना शुरू कर दिया है,जिसमे IHBT पालमपुर, कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर भी शामिल हैं। आज हिमालयी क्षेत्र में, भारत में पहली हींग की खेती हिमाचल प्रदेश राज्य से शुरू की गई है।</p> <p style="text-align: justify;">डॉ. शर्मा के अनुसार हींग हमारे देश में नहीं उगाई जाती थी, लेकिन इसकी जंगली प्रजातियाँ / पारिवारिक पौध कश्मीर के कारगिल, लेह और लद्दाख, लाहौल स्पीति, हिमाचल के किन्नौर और उत्तर पूर्व में अरुणाचल में पाए गए हैं, हालांकि फेरूला हींग की प्रजातियाँ कारगिल क्षेत्र में छोटी मात्रा में मिली हैं। यह जंगली रूप में भी बहुत हिमालयी क्षेत्रों में देखने को मिलती है, लेकिन आज तक किसी ने इस मुख्य औषधीय मसाले पर शोध नहीं किया और न ही किसी संस्थान ने इस पर ध्यान दिया है। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की किसानों की आय और आर्थिक स्वतंत्रता की नीति के अंतर्गत कृषि-बागवानी अनुसंधान को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने के प्रयास निरंतर जारी है। </p> <h3 style="text-align: justify;">हिमालयी क्षेत्र- संभावनाओं से भरपूर </h3> <p style="text-align: justify;">वाणिज्यिक फसलों के संदर्भ में, हिमालयी क्षेत्र दुनिया में सबसे अच्छा और उन्नत व प्रकृति के रस से भरपूर क्षेत्र है जो बागवानी और कृषि क्षेत्र में पूरे विश्व में बेहतरीन क्षेत्रों में गिना जाएगा, यहाँ किसी भी वैश्विक मांग की अति संवेदनशील व सबसे अच्छी फसल सफलतापूर्वक उगाने की संभावनाएं हैं। </p> <h3 style="text-align: justify;">आर्थिक आत्मनिर्भरता</h3> <p style="text-align: justify;">इसकी खेती का उद्देश्य अगली पीढ़ी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है जिससे ड्रग्स व नशे जैसी विनाशकारी लत से आगामी पीढ़ी को स्वावलंबी बना कर, आर्थिक सुदृढ़ता के साथ राष्ट्र उत्थान से जोड़ा जाना बहुत जरूरी है ताकि युवा पीढ़ी नशे की गंदी लत से दूर रहें, जिसे आज के युवा बिना रोज़गार व खाली समय व कोई सार्थक कार्य न होने की बजह से अपना रहे हैं। पिस्ता के पौधों किसानों और युवाओं के बीच वितरण किया जाएगा ताकि किसान और युवा उच्च वैश्विक मांग की फसलों को उगा सकें और आत्मनिर्भर होकर इनकी बेहतरीन खेती कर सकें। उत्पादन के बाद वैश्विक बाजार में उत्पादों को वितरित करने के लिए किसानों के साथ सहयोग जारी रहेगा जिससे किसानों को सही कीमत मिल सके। अगली ऋतु में कॉफ़ी पौध का मुफ्त वितरण भी किया जाएगा। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : डॉ. विक्रम शर्मा, पूर्व सदस्य, इडियन कॉफी बोर्ड। </p>