पपीते की खेती भारत के किसानों में बहुत लोकप्रिय हो रही है। सटीक ज्ञान व मार्गदर्शन से किसान एक एकड़ क्षेत्रफल में पपीता उगाकर लाखों रुपये तक की आय प्राप्त कर सकते हैं। पपीता, भारत की भौगोलिक स्थितियों के आधार पर ज्यादातर राज्यों में उगाया जा सकता है। प्रस्तुत लेख में पपीते की खेती से संबंधित गतिविधियों बिंदुवार वर्णन किया गया है। पपीता का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है। यह कैरिकेसी परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य है। पपीता बहुत ही पौष्टिक एवं गुणकारी फल है। यह बहुत ही जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है। पपीता एक वर्ष में ही फल देने लगता है और शीघ्र पकने वाले फलों में अत्यंत उत्तम है। यह विटामिन ‘ए’ व विटामिन ‘सी’ का अच्छा स्रोत है। इसका मुख्य तौर पर दो अवस्था में उपयोग किया जाता है। कच्ची अवस्था में यह हरे रंग का होता है और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। कच्चे फलों से दूध भी निकाला जाता है, जिससे पपेन तैयार किया जाता है। सौन्दय तथा उद्योग जगत में इसका व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। भारत में इसकी सफलतापूर्वक बागवानी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, असोम, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा इत्यादि प्रदेशों में की जाती है। मृदा एवं जलवायु पपीते की खेती के लिए न्यूनतम तापमान 5 डिग्री और अधिकतम 38 से 44 डिग्री सेल्सियस तक होना अनिवार्य है। इसकी खेती के लिए हल्की दोमट या दोमट मृदा, उपजाऊ, कार्बनिक पदार्थों से भरपूर और अच्छे जल निकास वाली मृदा 6.5 से 7.5 तक पी-एच मान वाली मृदा सबसे अच्छी मानी जाती है। किस्में और उत्पादन पपीते की कई देसी और विदेशी संकर किस्मों का चयन करके पपीते की खेती से अच्छी पैदावार ली जा सकती है। इसकी मुख्य किस्मों का विवरण सारणी में दिया गया है। बुआई पपीते का बीज बोने का समय जुलाई से सितम्बर और पफरवरी-मार्च होता है। बीज अच्छी किस्म के व स्वस्थ पफलों से लेने चाहिए। नई किस्म संकर प्रजाति की होने पर हर बार इसका नया बीज ही बोना चाहिए। बीजों को क्यारियों, लकड़ी के बक्सों, मिट्टी के गमलों व पॉलीथीन की थैलियों में बोया जा सकता है। पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए। बीजों को भी 0.1 फीसदी कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए। रोपण दूरी यदि हम पपीते की पौधे से पौधे और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 2 × 2 मीटर रखते हैं, तो एक हैक्टर में 2500 पौधे लगेंगे। खाद व उर्वरक का प्रयोग पपीते की खेती में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फॉस्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा प्रति वर्ष देना चाहिए। फॉस्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष प्रति पौधा 20-25 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद, एक कि.ग्रा. बोनमील और एक कि.ग्रा. नीम की खली की जरूरत पड़ती है। खाद की इस मात्रा को समान अनुपात में एक वर्ष में तीन बार मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्टूबर में देना चाहिए। रोग प्रबंधन पपीते में मुख्य तौर पर कीटों से रोग फैलते हैं। इसमें लगने वाले रोग निम्न हैं: डेम्पिंग ऑफ नर्सरी में ही पपीते के छोटे पौधे नीचे से गलकर मर जाते हैं। इससे बचने के लिए बीज बोने से पहले सेरेसान एग्रोसन जी.एन. से तथा सीडबेड को 2.5 प्रतिशत फार्मेल्डिहाइड घोल से उपचारित करना चाहिए। मोजेक इस रोग में पत्तियों का रंग पीला हो जाता है व डंठल छोटा और आकार में सिकुड़ जाता है। इसक लिए 250 मि.ली मैलाथियान 50 इ.सी. 250 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना काफी फायदेमंद होता है। तना तथा जड़गलन रोग इस रोग से प्रभावित पौधों की जड़ें गलने लगती हैं, पत्तियां सूख जाती हैं, तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है और पौधा मर जाता है। इस रोग का प्रमुख कारण जल का अधिक समय तक ठहराव होना है। इसकी रोकथाम के लिए पौधों पर एक प्रतिशत बोरडॉक्स मिश्रण या काॅपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। सिंचाई व खरपतवार नियंत्रण पानी की कमी होने से पपीते के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। पपीते में गर्मियों में 6-7 दिनों के अंतराल पर और सर्दियों में 10-12 दिनों के अंदर सिंचाई करनी चाहिए। पपीते के बगीचे में तमाम खरपतवार उग जाते हैं। इससे पौधे की बढ़वार व उत्पादन पर उलटा असर पड़ता है। खरपतवारों से बचाव के लिए जरूरत के मुताबिक निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। पपीते की खेती से कमाई पपीते की खेती से कमाई करने के मामले में पिछले कुछ वर्षों में पपीते की खेती की तरफ किसानों का रुझान बढ़ रहा है। हाल के दौर में बाजार में आई संकर किस्मों के कारण पपीते से कमाई करना पहले से ज्यादा आसान हुआ है। उपज पपीते की खेती अच्छी तरह वैज्ञानिक तरीके से करने पर और उन्नत किस्मों के प्रयोग से प्रति पौधा 40-50 कि.ग्रा. उपज प्राप्त हो जाती है। 2500 × 50 = 125,000 कि.ग्रा./हैक्टर। यदि सामान्य थोक दर 10 रुपये कि.ग्रा. रहे तो एक हैक्टर में 1,25,000 × 10 = रु. 12,50,000 इसमें कुल खर्च एक हैक्टर में औसतन 1.5-2.0 लाख रुपये अधिकतम होता है। 2 × 2 मीटर की दूरी पर पौधे लगाने पर शुद्ध आय 12,50,000-2,00,000 =रु. 10,50,000 यदि और भी कोई समस्या आ जाये या दाम कम मिले तब भी हमें 10,50,000 रुपये का लाभ मिल जाता है, जो कोई भी परंपरागत फसल नहीं दे सकती है। अतिरिक्त लाभ पपीते की खेती के साथ-साथ हम इसके नीचे खाली जगह में कुछ छोटे आकारके पौधे वाली सब्जियों का उत्पादन भी कर सकते हैं। जैसे-प्याज, मेथी, पालक, धनिया इत्यादि। ये सान के लिए बोनस के तौर पर उनकी आय बढ़ने में कारगर सिद्ध होंगी। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),सुरेंदर कुमार’, कर्म वीर’, अंजीत कुमार’, प्रदीप कुमार’, नबीन कुमार दास’ और एम. मधु’ ’भाकृअनुप-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, अनुसंधान केंद्र, सुनबेड़ा, कोरापुट (ओडिशा)।