<p style="text-align: justify;">पपीते को मुख्य रूप से इसके फलों को खाद्याहार के तौर पर प्रयोग करने के लिए उगाया जाता है। भारत में ज्यादातर लोग ये तो मानते हैं कि पपीता एक स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक एवं पाचक फल है, परन्तु लोग ये नहीं जानते कि यह इतना पाचक क्यों है? इसका कारण पपीते में पाया जाने वाला एंजाइम पपेन है। पपीते में प्रचुर मात्रा में विटामिन ‘ए’ पाया जाता है। इसमें जो एंजाइम पपेन, पाया जाता है, इसका उपयोग दवाइयां बनाने, बीयर उद्योग, चॉकलेट, मांस गलाने, च्वूइंगम, पनीर, चमड़ा उद्योग, बिस्कुट एवं सांदैर्य प्रसाधन आदि में किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">पपीते में दो तरह के फूल पाए जाते हैं। मादा फूल बड़े होते हैं एवं इनसे फल बनते हैं। नर फूल लंबी तथा पतली-पतली लटकती हुई शाखाओं में पाये जाते हैं। ये कभी-कभी गुच्छों में निकलते हैं। नर तथा मादा दोनों ही फूल हल्के पीले, सुगन्धित और मांसल होते हैं। पपीते के पके फलों से जैम तथा कैंडी बनाई जाती है।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>नर्सरी तैयार करना</h3> <p style="text-align: justify;">अच्छी किस्म के पपीते की प्रजाति के बीज का चयन कर लेने के बाद पौधा लगाने के दो महीने पहले नर्सरी तैयार की जाती है। लगभग सभी प्रजातियों में 400 से 500 ग्राम बीज प्रति हैक्टर की दर से नर्सरी में बोया जाता है, जबकि मादा पपीते के लिए 200-250 ग्राम बीज प्रति हैक्टर बोया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="285" height="114" /></p> <p style="text-align: justify;">पौधशाला की मृदा तैयार करने के लिए एक भाग गोबर की खाद (25 कि.ग्रा.), एक भाग बालू ;25 कि.ग्रा.द्ध और तीन भाग मृदा में मिलाकर जमीन से 15 से 20 सें.मी. ऊंची क्यारियां बना लेते हैं। एक क्यारी एक मीटर चैड़ी और 3 मीटर लंबी होती है। एक क्यारी में 75 से 100 ग्राम बीज बोया जाता है। प्रत्येक क्यारी में 100 ग्राम फालिडोल धूल मिला देनी चाहिए। क्यारी को भुरभुरा बना लेना चाहिए तथा बीज को बोने से पहले 12 घंटे पानी में भिगो देना चाहिए। इसके बाद 5 ग्राम बाविस्टीन प्रति लीटर पानी में मिलाकर बीज को 10 मिनट तक डुबोकर रखना चाहिए। इससे कवक रोग न लगने पाए। पिफर क्यारी में 10-10 सें.मी. की पंक्ति बनाकर बीज की 1 से 2 सें.मी. की गहराई में बुआई कर दें। तुरंत हजारे से सिंचाई करके ऊपर से पुआल डाल दें। 9 से 10 दिनों के बाद पुआल को हटा देना चाहिए। 10 से 15 दिनों में सभी पौधे अंकुरित हो जाएंगे। अंकुरण के के बाद तूतिया चूना एवं पानी का 1ः1ः100 (100 ग्राम तूतिया, 100 ग्राम चूना, 10 लीटर पानी) का घोल बनाकर हजारे से छिड़काव अवश्य करना चाहिए।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">सस्य क्रियाएं </h3> <p style="text-align: justify;">अन्य फसलों की तुलना में पपीते की खेती से कापफी अधिक लाभ कमाया जा सकता है, बशर्ते इसकी खेती आधुनिक ढंग से की जाए। अच्छे बीजों का चयन, समय पर सिंचाई, समय पर खाद एवं निराई-गुड़ाई करने पर पपीते की फलसल से काफी अधिक लाभ कमाया जा सकता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">मृदा </h3> <p style="text-align: justify;">पपीते को सभी प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। इसे दोमट एवं बलुई दोमट मृदा में आसानी से उगाया जा सकता है। काली मृदा भी इसके लिए उपयुक्त है, बशर्ते क्षेत्रा ढालू हो। 6.5-7.5 पी-एच मान वाली मृदा इसकी खेती के लिए बहुत अच्छी होती है। इसकी खेती के लिए आवश्यक बात यह है कि मृदा में अच्छे जल निकास का प्रबंध हो। प्रजाति पपीते का उपयोग खाने के अलावा पपेन उत्पादन में भी किया जाता है, इसलिए उपयोग के आधार पर इसको तीन भागों में बांटा जा सकता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">पकाकर खाने वाली किस्में </h3> <p style="text-align: justify;">कोयम्बटूर 1, 3, 4, पेन-1, पीके-10, 11, 12, पूसा नन्हा, पूसा ड्वार्फ, पूसा ज्वाइंट, पूसा डेलिसियस, हनीड्यू फलर्म सेलेक्सन, पूसा मेजिस्टी आदि। </p> <h3 style="text-align: justify;">फल एवं पपेन के लिए किस्में</h3> <p style="text-align: justify;">पेन-1, पीके-12, कोयम्बटूर-6 एवं पूसा मेजिस्टी आदि। पॉलीथीन की थैलियों में स्थानांतरण जब पौधा एक माह का हो जाये तो 6*4 इंच के आकार की पॉलीथीन में 5-6 छेद कर देने चाहिए। पॉलीथीन में आधा भाग गोबर की खाद एवं आधा भाग मृदा को मिलाकर भरना चाहिए तथा पॉलीथीन में पौधे लगाकर हजारे से सिंचाई कर देनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">खेत की तैयारी </h3> <p style="text-align: justify;">ऐसी मृदा, जिसमें जल निकास का अच्छा प्रबंध हो तथा जो दक्षिण-पश्चिम तेज हवाओं से सुरक्षित हो, पपीते की खेती के लिए अच्छी होती है। खेत की कम से कम तीन-चार जुताई करनी चाहिए। पपीते के पौधे तैयार गड्ढों में लगाये जाते हैं। पौधों के बीच की दूरी मृदा की उर्वराशक्ति, सिंचाई की सुविधा, स्थान और वहां की जलवायु पर निर्भर करती है। इसके अतिरिक्त बगीचे में कृषि यंत्रों के प्रयोग का भी पौधों के बीच की दूरी निर्धारण पर प्रभाव पड़ता है। अगर हम पौधे घने लगाएंगे तो फलल छोटे होंगे। </p> <h3 style="text-align: justify;">गड्ढे खोदकर पौध लगाना </h3> <p style="text-align: justify;">खेत में 2 मीटर की दूरी पर 45न2 सें.मी. के आकार के गड्ढे खोदकर एक सप्ताह के लिए खुला छोड़ दिया जाता है, ताकि मृदा में अच्छी तरह से धूप लग जाए, जिससे कीटों और रोगों का प्रकोप कम हो जाये। इसके बाद 15-20 कि.ग्रा. मृदा में गोबर की सड़ी खाद मिलाकर गड्ढे को भर देते हैं। पौध लगाने के तुरंत बाद पानी जरूर देना चाहिए। लगभग 4-5 माह बाद जब पौधों पर फूल आने लगें, तो पूरे खेत में केवल 10 प्रतिशत नर पौधे छोड़कर समस्त नर पौधे काट देने चाहिए। यदि किसान ने केवल उभयलिंगी मादा किस्म का पौधा लगाया है, तो उसमें नर पौधे अपने आप ही नहीं आएंगे। अतः कोई पौधा काटने की आवश्यकता नहीं होगी। </p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई </h3> <p style="text-align: justify;">पपीते की खेती में सिंचाई करने की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती। सर्दियों में 10-12 दिनों के अंतराल पर और गर्मियों में 4-5 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। संभव हो तो पानी को थाला बनाकर दें, पपीता ज्यादा पानी नहीं सहन कर पाता है। पपीते के आसपास पानी भराव ज्यादा न होने दें। इससे पेड़ एवं तने पर गलन रोग होने की आशंका हो सकती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">निराई एवं गुड़ाई </h3> <p style="text-align: justify;">पपीते की खेती में अधिक मात्रा में सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। बार-बार पानी देने से मृदा की सतह कड़ी हो जाती है, जिससे पौधे की वृद्धि पर कुप्रभाव पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक चार सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई जरूर कर देनी चाहिए। पपीते के बगीचे को साफ-सुथरा रखना चाहिए। खरपतवार को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए, जिससे फलसल अच्छी होती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक </h3> <p style="text-align: justify;">इसकी मात्रा पौधे की किस्म, वर्षा, सस्य क्रियाओं और पौधे की आयु के अनुसार निश्चित की जाती है। इसलिए इसके लिए पोषक तत्वों की भी जरूरत पड़ती है। आमतौर पर रोपाई के बाद प्रति पौधा 3-4 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद, 50 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम सुपर फॉस्फेट एवं 10 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश देने से फसल अच्छी होती है। उर्वरक, तने से दो फीट की दूरी पर 3-4 इंच गहरी मृदा खोदकर अच्छी तरह मिलाकर देना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">कांट-छांट </h3> <p style="text-align: justify;">सीधे बोए गए पपीते के पौधों को खेत में लगाने के दो महीने बाद देख लेना चाहिए कि कौन से पौधे अच्छे चल रहे हैं या कौन से नहीं। यदि पौधे कमजोर हों, तो उनको गड्ढों से हटा देना चाहिए और नए पौधे लगा देने चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">उपज </h3> <p style="text-align: justify;">पपीते की भिन्न प्रजातियों से अलग-अलग उपज प्राप्त होती है। सामान्यतः पपीते के प्रति पौधे से लगभग 40 से 60 कि.ग्रा. फल प्राप्त होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर),कुमारी आशा, कृष्णा यादव और सरोज चौधरी लोकभारती, ग्राम-विधपीठ, सनोसरा, तहसील-सीहारे, जिलाः भावनगर (गुजरात)-364230</p>