नाशपाती ऐसा फल है, जोकि लगभग पूरे देश में गर्म आर्द्र उपोष्ण मैदानी क्षेत्रों से लेकर शुष्क शीतोष्ण ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बिना किसी बाधा के उगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। कृषकों को नाशपाती की खेती वैज्ञानिक तकनीक से करनी चाहिए, ताकि उनको इसकी फसल से अधिकतम और गुणवत्तायुक्त उत्पादन प्राप्त हो सके। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के अंतर्गत आलू एवं समशीतोष्ण फल अनुसंधान केन्द्र, मेनपाट, सरगुजा में वर्ष 2017 एवं वर्ष 2018 में नाशपाती की विभिन्न प्रजातियों का परीक्षण एवं मूल्यांकन किया गया है। इसके परिणाम कापफी उत्साहजनक हैं। इसके आधार पर नाशपाती की नवीन प्रजातियों का इस क्षेत्रा में विस्तार किया जा सकता है। समुद्रतल से लगभग 600 मीटर से 2700 मीटर ऊंचाई तक नाशपाती का फल उत्पादन सम्भव है। इसके लिए 500-1500 घण्टे शीत तापमान (7 डिग्री सेल्सियस से नीचे) कम होना आवश्यक है। मृदा का चयन नाशपाती की खेती के लिए मध्यम बनावट वाली बलुई-दोमट तथा गहरी मृदा की आवश्यकता होती है जिसमें जल निकास सरलता से हो। दूसरे पर्णपाती फल पौधों की अपेक्षा नाशपाती के पौधे चिकनी और अधिक पानी वाली मृदा में भी उगाये जा सकते हैं। प्रमुख किस्में पत्थरनाख यह कठोर नाशपाती और फैलने वाली किस्म है। इसके फल सामान्य आकार के गोल और हरे रंग के होते हैं, जिन पर बिंदियां बनी होती हैं। यह प्रजाति जुलाई के आखिरी हफ्ते में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसतन पैदावार 150 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष होती है। पंजाब नख यह कठोर नाशपाती और फैलने वाली किस्म है, जो पत्थर नख से ली गयी है। इसके फल अंडाकार, हल्के पीले रंग के होते हैं, जिन पर बिंदिया बनी होती हैं। इसका गूदा रसभरा और कुरकुरा होता है। पंजाब गोल्ड यह सामान्य नरम नाशपाती वाली किस्म है। यह प्रजाति जुलाई के आखिरी हफ्ते में पककर तैयार हो जाती है। यह किस्म कई और उत्पाद बनाने के लिए भी उचित मानी जाती है। पंजाब नेक्टर यह सामान्य नरम नाशपाती वाली किस्म है। इसके फल सामान्य से बड़े आकार के, पीले-हरे रंग के और सफेद गूदे वाले होते हैं। पकने के समय ये बहुत रसीले हो जाते हैं। पंजाब ब्यूटी यह सामान्य नरम नाशपाती वाली किस्म है। इसके फल सामान्य से बड़े आकार के पीले-हरे रंग के और सफेद गूदे वाले होते है। यह ज्यादा रसीली और मीठी प्रजाति होती है। बागुगोसा यह सामान्य नरम नाशपाती वाली किस्म है। इसके फल अगस्त के प्रथम सप्ताह तक पककर तैयार हो जाते हैं। यह दूरी वाले स्थानों पर ले आने के लिए अनुकूल किस्म है। बगीचे की रूपरेखा और पौध रोपण सामान्य तौर पर नाशपाती के पौध का रोपण जनवरी से फरवरी में करना चाहिए। पौध रोपण के लिए एक वर्ष पुराने पौधे का उपयोग करना चाहिए। नाशपाती की खेती के लिए सामान्य रूप से बीजू मूलवृंत पर तैयार किये गये पौधों के बीच 5ҳ5 मीटर की दूरी और क्लोनल मूलवृंत में यही दूरी 3ҳ3 मीटर तकरखी जाती है। जहां पहाड़ी क्षेत्रा हो, वहां कंटूर या ढलान विधि का प्रयोग करना चाहिए। खाद और उर्वरक खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करने के लिए पहले पौध रोपण के लिए गोबर की खाद, सिंगल सुपर फॉस्फेट और म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा दिसम्बर में डालनी चाहिए। यूरिया की आधी मात्रा फूल निकलने से पहले फरवरी के प्रथम सप्ताह में और बाकी की आधी मात्रा फल निकलने के बाद अप्रैल में डालनी चाहिए। कटाई-छंटाई आपस में उलझी हुई, सूखी, टूटी तथा रोगग्रस्त शाखाओं को पेड़ों से अलग कर दें सुषुप्तावस्था में शाखाओं के ऊपर का एक चौथाई भाग काट दें, ताकि अधिक वानस्पतिक वृद्धि न हो। खरपतवार नियंत्रण इसके लिए पौधों के बीच में ग्लाइफोसेट 1.2 लीटर प्रति एकड़ और पैराक्वेट 1.2 लीटर को 200 लीटर पानी में मिला के प्रति एकड़ में छिड़काव करना चाहिए। सिंचाई इसकी खेती के लिए पूरे वर्ष में 800-1250 मि.मी. वितरित वर्षा की जरूरत होती है। रोपाई के बाद इसको नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। गड्ढा तैयार करना नाशपाती के पौधरोपण के लिए ९०.९०.90 सें.मी. आकार के गड्ढे नवंबर में ऊपर वाली मिट्टी भरकर छोड़ देने चाहिए एवं आखिरी समय में पौध लगाने से पहले 10-15 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 1 कि.ग्रा. केंचुआ खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और क्लारोफोयरीफॉस 50 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी में डालना चाहिए। पौध संरक्षण-कीट की रोकथाम सैंजो स्केल इस रोग में मई में पौधों की छाल पर छोटे-छोटे सुई की नोक जैसे भूरे रंग के धब्बे नजर आते हैं। अधिक प्रभावित पौधों पर यही धब्बे एक दूसरे से मिलकर ऐसे दिखाई पड़ते हैं जैसे पौधे पर राख का छिड़काव किया गया हो। इससे पौधों की बढ़ोतरी रुक जाती है और पौधे सूखने लगते हैं। रोकथाम इसके लिए क्लोरपाइरीफॉस 0.04 प्रतिशत, 400 मि.ली. 20 ई.सी. या डाइमेथोएट 30 ई.सी. 0.03 प्रतिशत 200 मि.ली. का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। व्हाईट स्केल यह कई क्षेत्रों में नाशपाती वृक्ष की छोटी शाखाओं, बीमों और फल के बाहरी दलपुंज में देखा जाता है। इसके प्रकोप से पौधे के भाग प्रायः सूख जाते हैं। रोकथाम प्रभावित पौधों पर सितम्बर और अक्टूबर में फल तोड़ने के बाद क्लोरपाइरीफॉस का छिड़काव करें। चेपा और थ्रिप्स यह नाशपाती पौधे के पत्तों का रस चूसते है, जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं। रोकथाम फरवरी के आखिरी हफ्ते जब पत्ते झड़ना शुरू हों तो इमिडाक्लोप्रिड दवा का छिड़काव करना चाहिए। रोग की रोकथाम जड़ का गलना इस रोग के प्रकोप से पौधे की छाल और लकड़ी भूरे रंग की हो जाती है और इस पर सफेद रंग का पाउडर दिखाई देता है। प्रभावित पौधे सूखना शुरू हो जाते हैं और पत्ते जल्दी झड़ जाते हैं। रोकथाम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर मार्च में छिड़काव करें। जून में दोबारा छिड़काव करें। कार्बेन्डाजिम 10 ग्राम एवं कार्बोक्सिन (वीटावैक्स) 5 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर, इस घोल से पूरे वृक्ष को दो बार तर कर दें। फल तुड़ाई नाशपाती के बागान से फल जून के प्रथम सप्ताह से सितम्बर के मध्य तोड़े जाते हैं। नजदीकी मंडियों में फल पूरी तरह से पकने के बाद और दूरी वाले स्थानों पर ले जाने के लिए हरे फल तोड़े जाते हैं। अंतर-फसलें जब तक बाग में फल न लगने लगे, खरीफ ऋतु में उड़द, मूंग, तोरिया जैसी फसलें और रबी में गेहूं, मटर, चने या सब्जियां आदि फसलें अंतर-फसलों के रूप में ली जा सकती हैं। आलू एवं समशीतोष्ण फल अनुसंधान केन्द्र, मेनपाट में तीन वर्ष के प्रयोग के आधार पर रबी के मौसम में आलू, मटर, बरबट्टी, प्याज, टाऊ, गेहूं, हल्दी एवं अदरक की फसल बहुत आसानी से ली जा सकती है। पैदावार साधारणतः नाशपाती के एक वृक्ष से 1 से 2 क्विटंल तक फल प्राप्त हो जाते हैं, अतः प्रति हैक्टर क्षेत्र से 400 से 750 क्विंटल फल उत्पादित हो सकते हैं। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर) पी.सी. चौरसिया, सहायक प्राध्यापक (उद्यानिकी), इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, महासमुंद(छत्तीसगढ़)।