भारत के प्रत्येक प्रान्त में नीबूवर्गीय पौधों की खेती लगभग प्रत्येक जिले में बड़े या छोटे पैमाने पर खेतों एवं गृहवाटिका में की जाती है। औषधीय गुण होने के कारण इनका प्रयोग किसी न किसी रूप में प्रत्येक दिन किया जाता है। अनेक रोगों एवं कीटों के आक्रमण के साथ मृदा में कई तत्वों के अभाव के कारण इन पौधों में पूरे वर्ष विभिन्न कृषि क्रियाओं को अपनाकर ही भरपूर पैदावार ली जा सकती है। प्रस्तुत लेख में नीबूवर्गीय फलों में वर्षभर की जाने वाली कृषि क्रियाओं का ब्यौरा दिया जा रहा है। जनवरी अगर दिसबंर माह में सूखी हुई टहनियों रोगग्रस्त एवं कीट लगे तनों, छालों आदि की कांट-छांट नहीं की गई हो तो इस महीने अवश्य कर दें। कटे हुए भागों पर ब्लाइटॉक्स का 3.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। गोबर की खाद 2 से 6 टोकरी, सुपर फॉस्फेट 250 ग्राम से 750 ग्राम, पोटाश 100 ग्राम से 150 ग्राम प्रति पौधा तीन वर्ष की अवस्था में व उसके बाद मुख्य तने से 1.0 से 1.5 मीटर दूर डालें। पौधों की आयु को ध्यान में रखते हुए, पौधों की निराई-गुड़ाई व सिंचाई करें। फरवरी इस माह नये पौधों पर लगाए गए छप्पर आदि दूसरे सप्ताह के बाद हटा सकते हैं, क्योंकि मौसम कुछ गर्म होना शुरू हो जाएगा। यूरिया का प्रयोग 50 ग्राम से 600 ग्राम प्रति पौधा करें। नीबू के कैंकर व डाई बैंक की रोकथाम के लिए ब्लाइटॉक्स (300 ग्राम) व 2.0 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन मिलाकर प्रति 100 लीटर घोल की दर से छिड़काव करें। इस दौरान नीबू का सिल्ला, सफेद मक्खी व सुरंगी कीट काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए फूल आने से पहले तथा नया फुटाव आने पर रोगोर (1.0 मि.ली. दवा) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। मार्च हल्की सिंचाई अवश्य करें। अगर हो सके तो प्रत्येक सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करते रहें, ताकि खरपतवार न होने पाए। बड़े पौधे में सिंचाई जरूर करें, ताकि फल न गिरे। अगर नए पौधों में जस्ते व गंधक की कमी दिखाई देती हो तो 3 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट, 2 कि.ग्रा. कॉपर सल्फेट व 1.5 कि.ग्रा. बिना बुझा चूना 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। अप्रैल एक से दो कि.ग्रा. खाद प्रति पौधा डालें, गुड़ाई करें व सिंचाई करते रहें। रस चूसने वाले कीटों व अन्य व्याधियों के निवारण के लिए मोनोक्रोटोफॉस (1.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी) का ब्लाइटॉक्स (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) के साथ छिड़काव करें। अगर पौधों में जस्ते व गंधक की कमी फिर भी दिखाई पड़े तो, मार्च की तरह ही जिंक सल्फेट, कॉपर सल्फेट व बिना बुझे चूने का छिड़काव करें। मई नए पौधों को गर्मी से बचाने के लिए प्रत्येक सप्ताह सिंचाई करें। तुड़ाई से पूर्व फलों को गिरने से रोकने के लिए पेड़ों पर 10 पी.पी.एम.(10 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी) 2,4-डी, 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट व 20 पीपीएम (20 मि.ग्रा. प्रति लीटर पानी) आरियाोफिन्जिन का पहला छिड़काव करें। जून नए पौधों को गर्मी से बचाएं। पौधों के तने पर चूने में ब्लाइटॉक्स को मिलाकर लेप करें, ताकि सूर्य की तेज रोशनी से तनों को हानि न पहुंचे। इसके अतिरिक्त सिंचाई करते रहें। जुलाई अगर वर्षा न हुई हो तो सिंचाई का प्रबंध करें। बरसात के शुरू होते ही ब्लाइटॉक्स (0.3 प्रतिशत) का घोल या बोर्डो मिश्रण (4;4:50) के घोल का छिड़काव करें। पौधों को नीबू का सिल्ला, सुरंगी कीट,पत्ता खाने वाली सूंडी व सफेद मक्खी से बचाने के लिए 250 मि.ली. रोगोर का प्रति 100 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। अगस्त-सितंबर अगस्त के अंत में या सितंबर के शुरू में यूरिया (250 ग्राम प्रति पौधा) का प्रयोग करें। रोगों के फैलाव को रोकने के लिए बाविस्टिन (0.2 प्रतिशत) दवा का छिड़काव करें। फलदार वृक्षों में जिंक, बोरेक्स, मैंगनीज, मैग्नीशियम, तांबा तथा लोहा आदि सूक्ष्म तत्वों की अधिक आवश्यकता होती है। इनकी कमी के कारण पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, जिसके फलस्वरुप पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है। इसके लिए जिंक सल्फेट 500 ग्राम, कॉपर सल्फेट 300 ग्राम, फेरस सल्फेट 200 ग्राम, मैग्नीशियम 200 ग्राम, मैंगनीज 200 ग्राम, बोरेक्स 100 ग्राम और बुझा हुआ चूना 900 ग्राम को 100 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। अक्टूबर इस महीने इन पौधों पर कीटों व रोगों का प्रकोप देखने में आता है। इसलिए जुलाई वाले छिड़काव को इस महीने फिर दोहराएं। पौधों की सिंचाई जारी रखें। नीबू प्रजाति के पौधे में कैंकर रोग की रोकथाम के लिए 300 ग्राम ब्लाइटॉक्स व 2 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन का घोल बनाकर छिड़काव करें। छाल खाने वाले कीटों का आक्रमण हो तो 10.0 मि.ली. मोनोक्रोटोफॉस, 36 डब्ल्यूएससी को 10 लीटर पानी में घोलकर पौधों के चारों ओर लेप करें। नवंबर इस महीने पुराने बागों में मौसमी, माल्टा व किन्नू की तुड़ाई करते समय ध्यान रखें कि फलों पर खरोंच न आए। सूत्रकृमि की रोकथाम के लिए टेमिक या एल्डीकार्ब या कार्बोफ्यूरॉन का प्रयोग करें। दिसंबर पके फलों को इस माह तोड़ लें। बाग में खरपतवार निकाल कर सिंचाई करें। गुड़ाई 4-6 इंच से गहरी न करें। इस माह के अंत तक पौधों में नीचे बताई गई मात्रा के अनुसार गोबर की खाद डालें। पौधे की आयु गोबर की मात्रा प्रति पौधा(कि.ग्रा.) 1-3 वर्ष 5-20 4-6 वर्ष 26-50 7-9 वर्ष 60-90 10 वर्ष से ऊपर 100 बाग की सिंचाई 15-20 दिनों में करें। बाग के पौधों की सूखी हुई व कैंकर ग्रस्त टहनियों को काट दें। कटाई के बाद 300 ग्राम ब्लाइटॉक्स व 2.0 ग्राम स्ट्रैप्टोसाइकलिन का प्रति 100 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पौध गलन या गोंद निकालने वाले भागों को कुरेदकर साफ करें। बोर्डो पेस्ट लगायें और फिर एक सप्ताह बाद दोबारा लगाएं। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), आदित्य- स्नातकोत्तर छात्र (पादप रोग), आर एस जरियाल-वैज्ञानिक (पादप रोग) और जे.एन. भाटिया पादप रोग विज्ञान विभाग, डा. वाई.एस. परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, बागवानी एवं वानिकी महाविद्यालय, नेरी (हमीरपुर-177001), हिमाचल प्रदेश प्रधान वैज्ञानिक, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार-125004 (हरियाणा)