कीवी उद्यान स्थापना के प्रारंभ में टी बार ट्रेल्स के कारण अधिक लागत आती है। हिमाचल प्रदेश के उद्यान विभाग द्वारा प्रति हैक्टर लाभ लागत का आंकलन किया गया है। कीवी उत्पादन से लगभग प्रति हैक्टर 10 लाख रुपये की सालाना आय है, जो कि अन्य फलोत्पादन की अपेक्षा सर्वाधिक है। कीवी उत्पादन की नई तकनीकी व क्लस्टर अप्रोच से क्षेत्र के लोगों की आजीविका को बढ़ाने की दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं।वी फल अपने आप में एक विशेष श्रेणी का फल है। इस फल का उत्पत्ति स्थल चीन है, जबकि इसको व्यावसायिक कृषि के रूप में न्यूजीलैंड द्वारा विकसित किया गया। विश्व के संपूर्ण कीवी उत्पादन का 70 प्रतिशत अकेले न्यूजीलैंड में किया जाता है। न्यूजीलैंड के अतिरिक्त दूसरे देशों में इसका उत्पादन 1960 के आसपास शुरू हो गया था। आज अमेरिका, इटली. चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी तथा ऑस्ट्रेलिया में कीवी का भारी मात्रा में उत्पादन होता है। इसका वैज्ञानिक नाम-एक्टीनीडिया डेलीसिओसा है। यह देखने में हल्के भूरे रंग का, रेशेयुक्त छिलके वाला फल है, जो चीकू फल की तरह दिखता है। इसके अंदर का हिस्सा हरे रंग का होता है, जिसमें छोटे-छोटे कोमल गहरे बीज पाये जाते हैं।भारत में भी कीवी का उत्पादन हिमाचल प्रदेश के 128 हैक्टर क्षेत्रफल में और अन्य प्रदेशों जैसे-अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर तथा उत्तराखंड आदि में वर्तमान समय में किया जा रहा है।उपस्थित पोषक तत्वों की मात्रा, फलों की रचना, उसकी प्रजाति, वातावरण तथा परिपक्वता की अवधि पर निर्भर करती है। कीवी में विभिन्न पोषक तत्व पाये जाते हैं। कीवी की विशेषताएं कीवी की बेल तीन वर्ष बाद फल देना शुरू कर देती है तथा 30-40 वर्ष तक उत्पादन देती है। एक पौधा औसतन 50-90 कि.ग्रा. प्रतिवर्ष फल देता है। अधिकांश फल जैसे-सेब, नाशपाती, अखरोट आदि में प्रतिवर्ष फल नहीं आता है। कीवी की बेल प्रतिवर्ष फल देती है तथा फूल मई के प्रथम सप्ताह में खिलते हैं, जो कि परागण के लिए उपयुक्त समय है। इसमें कम कैलोरी व फाइबर होता है। यह जंगली जानवरों से सुरक्षित रहता है। कीवी फल हल्के भूरे रेशों द्वारा ढके रहते हैं, जिसके कारण पक्षियों व बंदरों से भी हानि का खतरा नहीं है। पहाड़ों में बंदरों के कारण अन्य फलदार पौधों की सुरक्षा करना मुश्किल होता है। इसके अलावा इसमें किसी रोग का प्रकोप नहीं रहता है व खास कीटनाशक की जरूरत नहीं होती है। इसलिए इसे व्यावसायिक व इकोफ्रेंडली फल माना जाता है। कीवी फल कमरे के तापमान में एक माह तक रखा जा सकता है तथा कोल्ड स्टोरेज में 4-6 माह तक रखा जा सकता है। बागेश्वर जिले में कीवी फलोत्पादन का परिदृश्यV परियोजना क्षेत्रों के अंतर्गत बागेश्वर (कपकोट) कीवी का फलोत्पादन पूर्व से ही किया जाता रहा है। क्षेत्र समुद्र तल से 1500-2200 मीटर ऊंचाई एवं औसत वर्षा 1500-200 मि.मी. तक है, जो कि कीवी के लिए आवश्यक मापदंडों के अनुकूल है। इनमें कपकोट क्षेत्र के शामा, लीती, नौकुड़ी व बड़ीपन्याली आदि क्षेत्रों में 2009 से कृषकों द्वारा कीवी का उत्पादन किया जा रहा है। कीवी फलोत्पादन के क्षेत्र विस्तार की योजनावर्ष 2016-17 में ग्राम्या-2 परियोजना द्वारा शामा क्षेत्र में पौधों का वितरण किया गयाहै। कृषकों के पूर्व में अनुभवों व फलोत्पादन की रुचि में वृद्धि को देखते हुए ग्राम्य परियोजना द्वारा कृषकों को कीवी क्षेत्र के विस्तार करने व बंजर भूमि का सुधार कर कीवी फलोत्पादन के लिए प्रेरित किया गया। कृषकों को वर्ष 2009 से वर्ष 2018 तक उद्यान विभाग द्वारा कुल 1773 पौधे व ग्राम्या-2 परियोजना द्वारा वर्ष 2016 से वर्ष 2018 तक कुल 1450 पौधे वितरित किए गए हैं। कीवी उत्पादन बागेश्वर जिले में कपकोट क्षेत्र के 10 किसानों द्वारा लगभग 573 पौधों से लिया जा रहा है। श्री भवान सिंह कोरंगा, जो इस क्षेत्र के प्रगतिशील कृषक हैं, द्वारा वर्ष में लगभग 40 क्विंटल कीवी का उत्पादन किया जाता है। कृषकों को फलोत्पादन तकनीकियों व अधिक उत्पादन के लिए समय-समय पर उद्यान विभाग, कृषि विज्ञान केंद्रों से प्रशिक्षण दिया गया। बागेश्वर (कपकोट) क्षेत्रों में कीवी उत्पादन को बढ़ाने के लिए क्षेत्र के 20 इच्छुक किसानों को डा. वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय, सोलन में 3 दिवसीय प्रशिक्षण/अध्ययन भ्रमण और हिमाचल के स्थानीय कृषकों के साथ क्षेत्र भ्रमण करवाया गया। इसमें कृषकों को कीवी उत्पादन के लिए पौध तैयार करना, रोपण के लिए गड्ढे तैयार करना, खाद-उर्वरकों की मात्रा, कटाई-छंटाई व अन्य तकनीकों पर जानकारियां दी गयी। कृषकों को मिली तकनीकी जानकारी के बाद उत्पादकों के अनुसार कीवी की उत्पादकता व गुणवत्ता में वृद्धि हो रही है। हिमाचल प्रदेश विटामिन 'सी' का उत्तम स्रोत है कीवी के सोलन से ग्राम्य प्रभाग, बागेश्वर द्वारा 1400 कीवी के पौधों की खरीद कर 4 हैक्टर क्षेत्रफल में ग्राम्य परियोजना के योगदान व तकनीकी सहयोग से रोपण कार्य कर लिया गया है। इसमें मुख्य रूप से एलीसन व हैवार्ड प्रजातियों के पौधे हैं। इन पौधों को ग्राम पंचायत लीती व शामा के इच्छुक कृषकों द्वारा लगाया गया है। परियोजना पूर्ण होने तक लगभग 30 हैक्टर क्षेत्र में कीवी फलोत्पादन की विस्तारीकरण की योजना उद्यान विभाग के साथ मिलकर बनाये जाने का लक्ष्य है। नई पौध तैयार करना प्रगतिशील काश्तकारों में शामिल श्री हरीश कोरंगा व श्री भवान सिंह कोरंगा जी द्वारा प्रशिक्षण के बाद स्थानीय स्तर पर ही कीवी की नई पौध तैयार की जा रही है। इसके लिए उन्हें परियोजना से पॉलीटनल, ग्रीन नेट उपलब्ध कराये गये हैं। इसमें उनके द्वारा कीवी की कलम के माध्यम से नई पौध नर्सरी में तैयार की जा रही है, जिसमें प्रत्येक बार नये पौध मंगाने की आवश्यकता नहीं पड़ रही है व समय के साथ-साथ ही धन की भी बचत हो रही है। परियोजना द्वारा कीवी उत्पादकों को हैलनेट वितरण उच्च हिमालयी क्षेत्र होने के कारण यहां समय-समय पर बारिश होती रहती है, जिसके साथ ओले भी गिरते हैं और फल खराब होने का खतरा बना रहता है। इससे फल की अच्छी कीमत मिलना मुश्किल होता है। इस सबसे बचने के लिये ग्राम्या द्वारा कीवी उत्पादकों को एन.टी. हैलनेट दिये गये, जिससे फलों को ओले से होने वाले नुकसान से बचाया जा रहा है। विपणन रणनीति कीवी विपणन की योजना को सफल बनाने व उच्च बाजार व्यवस्था के लिए कीवी उत्पादक समूहों को कृषक संघ से जोड़ा जा रहा है। इस वर्ष कीवी का उत्पादन लगभग 50 क्विंटल है, जो 2022 तक बढ़कर 150 क्विंटल तक हो जायेगा, जिसे कृषक समूहों द्वारा एकत्र कर कृषक संघ के माध्यम से उत्पाद को अलग-अलग श्रेणी कर स्थानीय काश्तकारों द्वारा निर्मित रिंगाल की टोकरी में पैकिंग कर मूल्यवर्द्धन किया जायेगा तथा लोवर ग्रेडिंग से जैम, जैली, स्क्वै श को प्रदेश व देश की राजधानी, राज्य की उच्च स्तरीय मण्डियों, आउटलेट व माल इत्यादि में विक्रय किया जायेगा। इसके लिए किसानों व कृषक संघ के लोगों को परियोजना के माध्यम से प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अक्टूबर 2019 को तीन दिवसीय कीवी प्रसंस्करण, अध्ययन भ्रमण व प्रशिक्षण का आयोजन डा. वाई.एस. परमार, विश्वविद्यालय, सोलन, हिमाचल प्रदेश द्वारा भी दिया।