परिचय नवोदित झारखंड प्रांत में अनेक स्थानीय एवं देशी फल बहुतायत में पाये जाते हैं जिनका उत्पादनकेवल उनके प्राकृतिक आवास क्षेत्रों में ही होता है। चिरौंजी, बेल, कमरख, आसाम लेमन, जामुन, कैथा, केंद आदि। इस क्षेत्र के देशी फल हैं जबकि इमली, शरीफा, सपोटा (चीकू) नाशपाती, सतालू, इत्यादि इस क्षेत्र में वर्षो से उगाये जाने के कारण इस क्षेत्र की जलवायु में स्थानीय फलों की तरह ही उत्पादन देते हैं। ये फल स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्यंत ही उपयोगी है। इनमें अनेक खनिज तत्व एवं विटामिन प्रचुर मात्रा में पाये जाते है जिनका विवरण नीचे सारणी में दिया गया है। ये स्थानीय फल यहाँ की भूमि और जलवायु में अच्छी तरह पनपते और उत्पादन देते हैं परन्तु इनकी व्यवसायिक खेती न होने के कारण इन्हें गौण फलों की श्रेणी में रखा जाता है। यदि इनका वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाये तो इनसे अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। उत्पादन बढ़ाने के साथ ही साथ यदि इनके उपयोग एवं परिरक्षण पर भी ध्यान दिया जाये तो इस क्षेत्र के किसानों को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। विभिन्न फलों की आवश्यक जानकारी यहाँ पर दिया जा रहा है जबकि कुछ फल जो दिन प्रतिदिन ज्यादा प्रचलित होते जा रहे है उनके बारे में विस्तृत जानकारी भी देने का प्रयास किया गया है। सारणी 1: विभिन्न स्थानीय फलों में प्रमुख पोषक तत्व फल प्रजाति प्रमुख पोषक तत्व (ग्रा./100 ग्रा.) नमी प्रोटीन वसा खनिज रेशा तत्व शरीफा 70 2.4 1.1 0.10 2.5 बेल 61 2.6 0.4 0.10 2.9 चीकू 74 0.7 1.1 0.5 2.6 जामुन 85 0.7 1.3 0.03 0.9 गुलाब जामुन 90 1.0 0.9 0.02 0.6 चिरौंजी 3 21.6 59.1 0.06 3.8 कमरख 91 0.8 0.1 0.03 0.9 कैथा 64 8.0 3.5 0.01 5.0 केंद 83 2.8 0.2 0.07 1.8 नाशपाती 83 0.4 0.1 0.30 2.1 सतालू 88 0.8 0.1 0.40 2.3 आसाम लेमन 87 0.1 0.1 0.05 0.4 इमली 52 3.1 0.1 0.30 5.6 भूमि का चुनाव स्थानीय फलों के फसल उत्पादन के लिए इस क्षेत्र की टांड एवं उपरवार जमीन अत्यंत उपयुक्त पायी गयी है। इस जमीन में वर्षा ऋतु में मृदा कटाव के कारण ऊपरी उपजाऊ भाग बह जाया करता है। अत: उसमें कन्टूर के अनुसार मेड बना करके छोटे-छोटे खेत बनाकर इन पौधों की खेती की जा सकती है। जहाँ तक संभव हो, किसी स्थान पर उन्हीं स्थानीय फलों की खेती करें जहाँ पर प्राकृतिक जंगलों एवं आस-पास के क्षेत्रों में उसके पौधे उग रहे हो। उदाहरण के लिए नेतरहाट के आस-पास के क्षेत्र सतालू एवं नाशपाती; साहिबगंज, पाकुड़, राँची एवं दुमका का क्षेत्र शरीफा; राँची, पश्चिम सिंहभूम एवं आस-पास का क्षेत्र सपोटा, इमली, केंद बेल, जामुन, गुलाब जामुन, कमरख, कैथा था झारखंड का मध्य एवं पूर्वी भाग आसाम लेमन, चीकू, शरीफा, इमली, चिरौंजी, जामुन, नाशपाती इत्यादि फलों के सफल उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसके अतिरिक्त कुछ देशी फलों जैसे केंद, शरीफा, चिरौंजी,इमली इत्यादि को उनके प्राकृतिक आवास में (स्वस्थान पर ही) रखरखाव करके उनसे अच्छी पैदावार ली जा सकती है। बाग़ लगाने की तैयारी एवं रोपण स्थानीय फलों की लाभदायक खेती के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ अन्य फसलों को पैदा करने में समस्या हो। चुने हुए स्थान को पहले साफ़ करके कन्टूर के अनुसार मेडबंदी कर ले। तत्पश्चात उसमें निश्चित दूरी पर गड्ढा तैयार करके पौध रोपण करना चाहिए। बड़े आकार वाले पौधों जैसे – इमली, केंद, चीकू इत्यादि के 8-10 मी. लाइन से लाइन तथा 8-10 मी. पौधे से पौधे की दूरी पर लगाना चाहिए जबकि छोटे आकार वाले पौधों जैसे – शरीफा, नाशपाती, गंधराज इत्यादि को 5 मी. लाइन से लाइन और 5 मी. पौधे से पौधे की दूरी पर लगाना चाहिए। रेखांकन करने के बाद मई माह में निश्चित दूरी पर 1 x 1 x 1 मी. (बड़े पौधों के लिए) 60 x 60 x 60 सें.मी. (छोटे पौधों के लिए) आकार के गड्ढे तैयार कर लेना चाहिए। 15 दिन खुला छोड़ने के पश्चात गड्ढे को उसके ऊपरी भाग की मिट्टी में 25-30 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद की दर से मिलाकर भर देना चाहिए। जब गड्ढे की मिट्टी 1 या 2 बरसात के बाद अच्छी तरह दब जाये तब जून-जुलाई के महीने में गड्ढे के बीचो-बीच पौधों के पिण्डी के आकार का गड्ढा बनाकर पौधों को लगाने के अच्छी सफलता मिलती है। पौधा लगाने के बाद उसके चारो तरफ की मिट्टी को अच्छी तरह से दबाकर एक थाला बना देना चाहिए। इन थालों में 1 सप्ताह तक प्रति दिन एक बाल्टी पानी देते रहना चाहिए। यदि बरसात हो रही हो तो पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। पौधा तैयार करना गौण फलों की अधिकांश प्रजातियों के पौधे बीज द्वारा ही तैयार किए जाते हैं परन्तु पूर्ण सत्यरूपता के लिए वानस्पतिक विधि से पौधा तैयार करना चाहिए। आसाम लेमन का पौधा दाब कलम या अर्द्धकठोर कलम विधि से तैयार किया जा सकता है जबकि नाशपाती और सतालू का पौधा कठोर विधि द्वारा तैयार कर सकते हैं। इमली के बीजू में फलन देर से आती है अत: जल्दी फलन के लिए कलिकायन विधि द्वारा पौधा तैयार कर सकते है। शरीफा के पौधों को फरवरी-मार्च में एक साल पुराने बीजू पौधों पर ग्राफ्टिंग विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है। इसके बीजू से भी तीसरे वर्ष फल मिलना प्रारंभ हो जाता है। विभिन्न स्थानीय फलों के पौधों को तैयार करने की विधि एवं उचित समय का विवरण निम्न सारणी में दिया जा रहा है। स्थानीय फलों के पौधे तैयार करने की विधि एवं समय फल प्रजाति पौधा तैयार करने की विधि पौधा तैयार करने का उचित समय शरीफा बीज, ग्राफ्टिंग जून-अगस्त, फरवरी-मार्च बेल बीज, कलिकायन जून-अगस्त चीकू बीज, ग्राफ्टिंग जून-अगस्त जामुन बीज, कलिकायन जून-अगस्त गुलाब जामुन गुटी, बीज जुलाई-अगस्त चिरौंजी बीज, ग्राफ्टिंग जून-जुलाई कमरख गूटी, बीज, जड़ कलम जून-अगस्त कैथा बीज जुलाई-अगस्त केंद बीज, ग्राफ्टिंग, जड़ कलम जुलाई-अगस्त नाशपाती कठोर कलम फरवरी-मार्च सतालू ग्राफ्टिंग, कलिकायन फरवरी-मार्च आसाम लेमन दाब कलम, अर्द्धकठोर कलम जुलाई-अक्टूबर इमली बीज, कलिकायन जून-अगस्त किस्मों का चुनाव देशी फलों के उन्नत किस्मों के चयन एवं सुधार का काम बागवानी एवं वानिकी शोध कार्यक्रम, प्लांडू, राँची में किया जा रहा है। उत्पादकता एवं गुणवत्ता के आधार पर केंद्र ने बेल, शरीफा, इमली एवं गंधराज की कुछ अच्छी किस्मों का पता लगाया है। नाशपाती की नेतरहाट लोकल तथा नख पीयर सतालू की प्रताप, शान-ए-पंजाब एवं प्रभात तथा चीकू काली पत्ती, पी.के.एम.1, डी.एस.एच.2 की क्रिकेट बाल एवं भूरी पत्ती इस क्षेत्र की सफलतम किस्में हैं। इस क्षेत्र के लिए विभिन्न स्थानीय एवं देशी फलों की उपयुक्त किस्मों का विवरण निम्न सारणी में दिया जा रहा है। झारखंड के लिए स्थानीय फलों की प्रमुख किस्में फल प्रजाति उपयुक्त किस्में शरीफा सी.एच.इ.एस. सेलेक्सन, बालानगर, अर्का सहन बेल नरेन्द्र बेल-5, नरेन्द्र बेल-7, पंत अपर्णा, सी.एस.एच. बेल-2, गया कागजी चीकू क्रिकेट बाल, काली पत्ती, भूरी पत्ती, डीएस.एच-2 जामुन स्थानीय, फरेन्दा गुलाब जामुन स्थानीय चिरौंजी स्थानीय कमरख स्थानीय कैथा स्थानीय केंद स्थानीय नाशपाती नेतरहाट लोकल, नख पीयर सतालू प्रभात, प्रताप, फ्लोरिडा सन, फ्लोरिडा रेड, शान-ए-पंजाब आसाम लेमन गंधराज इमली पी.के.एम.-1, प्रतिष्ठान, 3 स्थानीय पौधों की देख-रेख एवं काट-छांट पौधा लगाने के प्रथम 2-3 वर्षो तक समुचित देख-रेख की आवश्यकता पड़ती है। ख़ास तौर पर जाड़े एवं गर्मी में पौधों की नियमित सिंचाई तथा ‘लू’ एवं पाले से बचाना जरूरी होता है। पौधों के 2-3 वर्ष की उम्र तक उसमें काट-छांट करके निश्चित आकार देना चाहिए जिससे भविष्य में इनका ढांचा मजबूत एवं आकार सुडौल बन सकें। जब पौधे फलन में आ जाते है तब कुछ प्रजातियों जैसे नाशपाती एवं सतालू में जनवरी-फरवरी में काट-छांट करने से नई शाखाओं एवं फूलों का विकास होता है। इमली, शरीफा, चीकू, कमरख, बेल, चिरौंजी इत्यादि में नियमित काट-छांट की आवश्यकता कम पड़ती है। पौधों की समय-समय पर निकाई-गुड़ाई करके खरपतवार नियंत्रण करते रहना चाहिए। खाद एवं उर्वरक गौण एवं स्थानीय फलदार पौधों को संतुलित खाद एवं उर्वरक देने से उनकी बढ़वार अच्छी एवं पैदावार अधिक होती है। पौधों को 3 वर्षो तक 20-25 कि.ग्रा. सड़ी गोबर की खाद, 1.5-2.0 कि.ग्रा. करंज की खली, 150 यूरिया, 150 सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट तथा 150 ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश देना चाहिए। इस मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाते रहना चाहिए और पूर्ण विकसित होने पर पौधों को 30-40 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 3 कि.ग्रा. करंज की खली, 1 कि.ग्रा. यूरिया, 800-1000 ग्रा. सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट एवं 400 ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वृक्ष प्रति वर्ष देना चाहिए। खाद एवं उर्वरकों को जून-जुलाई में छत्रक के नीचे गोलाई में देकर अच्छी तरह ढक देना चाहिए। नाशपाती एवं सतालू में फरवरी-मार्च में खाद देने से अच्छी पैदावार मिलती है। खाद एवं उर्वरक देने के बाद यदि बरसात नहीं हो रही है तो समुचित सिंचाई करने से पौधों को लाभ मिलता है। सिंचाई एवं जल संरक्षण पौधों के प्रारंभिक अवस्था में गर्मी के मौसम में 10-12 दिनों के अंतराल तथा सर्दी के मौसम में 15-20 दिनों के अंतराल पर पानी देना चाहिए। पौधों के जड़ों के पास नमी का उचित स्तर बनाये रखने तथा वर्षा जल को संरक्षित रखने के लिए सितम्बर-अक्टूबर में धान के पुआल या सूखे खरपतवार की पलवार (मल्चिंग) बिछाने से पौधों की बढ़वार एवं उपज अच्छी होती है। स्थानीय फल-पौधे चूँकि इस जलवायु के पूर्ण अभ्यस्त होते हैं अत: इन्हें अधिक पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती है, परन्तु भरपूर पैदावार के लिए पौधों को समय-समय पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करना लाभदायक होता है। नाशपाती, सतालू और चीकू में फल विकास के समय पानी आवश्यक होता है जबकि शरीफा, इमली इत्यादि का फल विकास वर्षा ऋतु में होने के कारण सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है। पुष्पण एवं फलन वानस्पतिक विधि से तैयार पौधे जल्दी फल देने लगते हैं जबकि बीज द्वारा तैयार पौधों में फलन देर से प्रारंभ होता है। इस केंद्र पर किए गए परीक्षणों से यह पता लगाया गया है कि उचित बाग़ प्रबंध करने पर शरीफा का बीजू पौधा तीसरे वर्ष से फल देना प्रारंभ कर देता है। विभिन्न पौधों में फूलने एवं फलने का समय निम्न सारणी में दिया जा रहा है। अत: उसमें उसी के अनुसार बाग़ प्रबंध एवं देख-रेख करनी चाहिए। स्थानीय फलों के फूलने-फलने की उम्र एवं समय फल फलने की उम्र (वर्ष) फूलने का समय फल पकने का समय बीजू कलमी शरीफा 2-3 2-3 जुलाई-अगस्त सितम्बर-अक्टूबर बेल 8-10 4-5 अप्रैल-मई मार्च-अप्रैल चीकू 8-10 2-3 फरवरी-अप्रैल जुलाई-अगस्त जामुन 8-10 5-6 मार्च-अप्रैल जून-अगस्त गुलाब जामुन 7-8 5-6 मार्च-अप्रैल जून-जुलाई चिरौंजी 10-12 5-7 फरवरी-मार्च मई-जून कमरख 8-10 5-6 मार्च-अप्रैल अगस्त-सितम्बर कैथा 10-12 - मार्च-अप्रैल अगस्त-सितम्बर केंद 15-20 7-8 फरवरी-मार्च मई-जून नाशपाती 5-6 3-4 फरवरी-मार्च जून-अगस्त सतालू 5-6 2-3 फरवरी-मार्च अप्रैल-मई आसाम लेमन 4-5 2-3 वर्ष भर वर्ष भर इमली 20-25 7-8 जुलाई-अगस्त फरवरी-मार्च पौध सुरक्षा गौण एवं स्थानीय फल साधारणत: कीट एवं रोग-रोधी होते है अत: इनमें किसी विशेष पौध सुरक्षा की आवश्यकता नहीं पड़ती। कुछ फलों जैसे जामुन, कैथा इत्यादि में तना वेधन कीट का प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिए टहनी पर स्थित छिद्रों को साफ़ करके मिट्टी के तेल से भींगी हुई रुई ठूस कर चिकनी मिट्टी के लेप कर देने से उसमें उपस्थित कीट मर जाता है। यदि पत्ती खाने वाले या फूल का रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप देखा जाए तो उसे मोनोक्रोटोफास दवा से 0.1 प्रतिशत घोल (1 मि.ली. दवा प्रति ली. पानी) के छिड़काव से नियंत्रित किया जा सकता है। प्राकृतिक स्थिति में स्थानीय गौण फलों का प्रबंध कुछ गौण फल जैसे इमली एवं केंद का नया बागीचा लगाने पर उसमें फलन में काफी समय लगता है अत: यदि इनके पुराने पौधों को उसी स्थान पर अच्छी तरह से रखरखाव एवं देख-रेख किया जाए तो उनसे अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। जैसे कि विदित है की जंगल में उगने वाले पौधों का अधिकांश फल चिड़ियों या जंगली जानवरों द्वारा बर्बाद हो जाता है। अत: ऐसे पौधों को यदि अच्छी तरह से साफ़-सफाई करके उसका उचित प्रबंध किया जाए एवं उसमें जुलाई-अगस्त के महीने में उचित तरीके से खाद एवं उर्वरक का प्रयोग किया जाए तो उन पौधों से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। झारखंड प्रदेश में बहुत सारे छोटे-छोटे झुरमुट और जंगल हैं यदि उन स्थानों को स्वस्थान बागीचों (इन सीटू आरर्चड) में बदल दिया जाए तो इस क्षेत्र के स्थानीय फल प्रजातियों के उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार चिरौंजी की खेती कैसे करें जाने अधिक, इस विडियो को देखकर