<p style="text-align: justify;"><img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/92b93294b902-915940-916947924940/93093e91c94d92f94b902-92e947902-92b93294b902-915940-916947924940/91d93e93091692394d921-92e947902-92b93294b902-915940-93594891c94d91e93e92893f915-916947924940/CK.jpg" width="187" height="141" /></p> <p style="text-align: justify;">झारखंड प्रदेश के कृषि योग्य भूमि के अधिकांश क्षेत्र पर खाद्यान्न फसलों की खेती की जाती हैजिसकी उत्पादकता बहुत ही कम है। बागवानी फसलों की खेती द्वारा इन क्षेत्रों का उत्पादकता बढ़ाया जा सकता है एवं अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान समय में झारखंड में फलोत्पादन लगभग 0.25 लाख हेक्टेयर भूमि में किया जाता है जो बहुत ही कम है। फलस्वरूप प्रति व्यक्ति प्रति दिन केवल 37 ग्राम फल की उपलब्धता है जबकि संतुलित आहार के लिये 85 ग्राम फल की आवश्यकता है। झारखंड की जलवायु फल उत्पादन के लिये बहुत ही अच्छी है। यहाँ फलों की अधिक से अधिक क्षेत्रों में खेती करके पर्यावरण में सुधार एवं कुपोषण निवारण के साथ-साथ निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">चीकू या सपोटा सैपोटेसी कुल का पौधा है, कि जो मैक्सिको का देशज है। परन्तु भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में इसकी बड़े क्षेत्रफल में खेती की जाती है। चीकू के फलों की त्वचा मोटी व भूरे रंग का होता है। इसके प्रत्येक फल में एक या दो काले रंग के बीच पाये जाते है। झारखंड में चीकू की खेती करने की काफी अच्छी संभावना है। यहाँ अभी चीकू का आयात गुजरात से किया जाता है जो कि ऊँचे दाम पर बिकता है। अत: यदि इसकी खेती झारखंड में शुरू की जाय तो यहाँ के किसानों की अच्छी आमदनी प्राप्त हो सकती है। यहाँ की मिट्टी एवं जलवायु सपोटा के लिए बहुत उपयुक्त है। इस फल को उपजाने के लिये बहुत ज्यादा सिंचाई और अन्य रख-रखाव की जरूरत नहीं है। थोड़ा खाद और बहुत कम पानी इसके पेड़ फलने-फूलने लगते हैं।<strong> </strong></p> <h3>उन्नत किस्में <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">देश में चीकू की कई किस्में प्रचलित हैं। उत्तम किस्मों के फल बड़े, छिलके पतले एवं चिकने और गूदा मीठा और मुलायम होता है। झारखंड क्षेत्र के लिए क्रिकेट बाल, काली पत्ती, भूरी पत्ती, पी.के.एम.1, डीएसएच-2 झुमकिया, आदि किस्में अति उपयुक्त हैं।</p> <h3>पौध प्रवर्धन <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">चीकू की व्यावसायिक खेती के लिये शीर्ष कलम तथा भेंट कलम विधि द्वारा पौधा तैयार किया जाता है। पौधा तैयार करने का सबसे उपयुक्त समय मार्च-अप्रैल है।</p> <h3>पौध रोपण <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">चीकू लगाने का सबसे उपयुक्त समय वर्षा ऋतु है। रोपाई के लिये गर्मी के दिनों में ही 7-8 मी. दूरी पर वर्गाकार विधि से 90 ग 90 ग से.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेना चाहिए। गड्ढा भरते समय मिट्टी के साथ लगभग 30 किलोग्राम गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, 2 किलोग्राम करंज की खली एवं 5-7 कि.ग्रा. हड्डी का चूरा प्रत्येक गड्ढे के दल से मिला कर भर देना चाहिये। एक बरसात के बाद जब गड्ढे के बीचों बीच लगा दें तथा रोपने के बाद चारों ओर की मिट्टी अच्छी तरह से दबा कर थाला बना दें।</p> <h3>खाद एवं उर्वरक <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">पेड़ों में प्रतिवर्ष आवश्यकतानुसार खाद डालते रहना चाहिये जिससे उनकी वृद्धि अच्छी हो और उनमें फलन अच्छी रहें। रोपाई के एक वर्ष बाद से प्रति पेड़ 4-5 टोकरी गोबर की खाद, 2-3 कि.ग्रा. अरण्डी/करंज की खली एवं 50:25:25 ग्रा. एन पी के प्रति पौधा प्रति वर्ष डालते रहना चाहिये। यह मात्रा 10 वर्ष तक बढ़ाते रहना चाहिए तत्पश्चात 500:250:250 ग्रा. एन.पी.के. की मात्रा प्रत्येक वर्ष देना चाहिए। खाद एवं उर्वरक देने का उपयुक्त समय जून-जुलाई है। खाद को पेड़ के फैलाव की परिधि के नीचे 50-60 सें.मी. चौड़ी व 15 सें.मी. गहरी नाली बनाकर डालने से अधिक फायदा होता है।</p> <h3>सिंचाई <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है लेकिन गर्मी में 7 दिन एवं ठंडी में 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करने से सपोटा में अच्छी फलन एवं पौध वृद्धि होती है।</p> <h3>पौधों की देख-रेख एवं काट-छांट <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">चीकू के पौधे को शुरुआत में दो-तीन साल तक विशेष रख-रखाव की जरूरत होती है। उसके बाद बरसों तक इसकी फसल मिलती रहती है। जाड़े एवं ग्रीष्म ऋतु में उचित सिंचाई एवं पाले से बचाव के लिये प्रबंध करना चाहिये। छोटे पौधों को पाले से बचाने के लिये पुआल या घास के छप्पर से इस प्रकार ढक दिया जाता है कि वे तीन तरफ से ढके रहते हैं और दक्षिण-पूर्व दिशा धूप एवं प्रकाश के लिये खुला रहता है। चीकू का सदाबहार पेड़ बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है। इसका तना चिकना होता है और उसमें चारों ओर लगभग समान अंतर से शाखाएँ निकलती है जो भूमि के समानांतर चारों ओर फ़ैल जाती है। प्रत्येक शाखा में अनेक छोटे-छोटे प्ररोह होते हैं, जिन पर फल लगते है। ये फल उत्पन्न करने वाले प्ररोह प्राकृतिक रूप से ही उचित अंतर पर पैदा होते हैं और उनके रूप एवं आकार में इतनी सुडौलता होती है कि उनको काट-छांट की आवश्यकता नहीं होती। पौधों की रोपाई करते समय मूल वृंत पर निकली हुई टहनियों को काटकर साफ़ कर देना चाहिए। पेड़ का क्षत्रक भूमि से 1 मी. ऊँचाई पर बनने देना चाहिए। जब पेड़ बड़ा होता जाता है, तब उसकी निचली शाखायें झुकती चली जाती है और अंत में भूमि को छूने लगती है तथा पेड़ की ऊपर की शाखाओं से ढक जाती है। इन शाखाओं में फल लगने भी बंद हो जाते हैं। इस अवस्था में इन शाखाओं को छाँटकर निकाल देना चाहिये।</p> <h3>पुष्पन एवं फलन <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">वानस्पतिक विधि द्वारा तैयार चीकू के पौधों में दो वर्षो के बाद फूल एवं फल आना आरम्भ हो जाता है। इसमें फल साल में दो बार आता है, पहला फरवरी से जून तक और दूसरा सितम्बर से अक्टूबर तक। फूल लगने से लेकर फल पककर तैयार होने में लगभग चार महीने लग जाते हैं। चीकू में फल गिरने की भी एक गंभीर समस्या है। फल गिरने से रोकने के लिये पुष्पन के समय फूलों पर जिबरेलिक अम्ल के 50 से 100 पी.पी.एम. अथवा फल लगने के तुरन्त बाद प्लैनोफिक्स 4 मिली./ली.पानी के घोल का छिड़काव करने से फलन में वृद्धि एवं फल गिरने में कमी आती है।</p> <h3>रोग एवं कीट नियंत्रण <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">चीकू के पौधों पर रोग एवं कीटों का आक्रमण कम होता है। लेकिन कभी-कभी उपेक्षित बागों में पर्ण दाग रोग तथा कली बेधक, तना बेधक, पप्ती लपेटक एवं मिलीबग आदि कीटों का प्रभाव देखा जता है। इसके नियंत्रण के लिए मैंकोजेब 2 ग्रा./लीटर तथा मोनोक्रोटोफास 1.5 मिली./लीटर के घोल का छिड़काव करना चाहिए।</p> <h3>उपज <strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify;">चीकू में रोपाई के दो वर्ष बाद फल मिलना प्रारम्भ हो जाता है। जैसे-जैसे पौधा पुराना होता जाता है। उपज में वृद्धि होती जाती है। एक 30 वर्ष के पेड़ से 2500 से 3000 तक फल प्रति वर्ष प्राप्त हो जाते है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong> स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : </strong><a class="ext-link-icon" title="अधिक जानकारी के लिए " href="http://sameti.org/" target="_blank" rel="noopener"> समेति, कृषि विभाग </a>, झारखण्ड सरकार।</p>