परिचय अमरुद भारत वर्ष का एक प्रमुख फल है जिसकी 1,51,501 हें। भूमि में खेती से 1,63,140 मि. टन (1997-98) उपज प्राप्त हुई। इसके निर्यात से लगभग 10 करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। इसकी खेती प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, लखनऊ, आगरा, बस्ती, फैजाबाद के साथ-साथ आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र, महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र, गुजरात के उत्तरी एवं मध्य क्षेत्रों तथा झारखंड में सफलतापूर्वक की जाती है। अमरुद का फल ताजे रूप में खाने के अलावा परिरक्षित पदार्थ (जैसी रक्वैश, नेक्टर, साइडर तथा जूस निकालने के बाद बचे गूदे से टॉफी) बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। अमरुद के फलों में विटामिन ‘सी’, लौह एवं अन्य खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। भूमि एवं जलवायु अमरुद की सफल खेती के लिए उचित जल निकासयुक्त बलुई-दोमट मिट्टी अत्यधिक उपयुक्त पायी गई है। झारखंड क्षेत्र की उपरवार मट्टी जिसका पी.एच. मान सामान्य से थोड़ा कम है अमरुद की खेती के लिए उपयुक्त साबित हो रही है। यह एक उपोष्ण कटिबन्धीय फल वृक्ष है जो झारखंड के कम आर्द्रता वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। उपोष्ण जलवायु के कारण इस क्षेत्र में अमरुद लम्बे समय तक मिलता रहता है, परन्तु हस्त बहार के फल जो शरद ऋतु में पककर तैयार होते हैं सबसे अच्छे माने जाते हैं। झारखंड की उपोष्ण जलवायु में अमरूद के पौधों में फूल मध्य मार्च से आने प्रारम्भ हो जाते हैं जो रुक-रुक कर सितम्बर तक आते रहते हैं एवं इसके फल अगस्त के मध्य से मार्च के अंत तक प्राप्त होते रहते हैं। इस प्रकार की संभावनायें देश के अन्य जगहों पर संभवत: बहुत कम पायी जाती हैं। यदि नवम्बर से मार्च तक अमरुद में सिंचाई की व्यवस्था की जाये तो इसके फल गुणवत्ता में इलाहाबाद के समतुल्य देखे गये हैं। किस्में सरदार (लखनऊ-49): इस किस्म के वृक्ष मध्य ऊँचाई एवं फैलाव वाले होते हैं। यह एक व्यावसायिक किस्म है जिसके फल अंडाकार, हल्के हरे से पीले तथा कभी-कभी चित्तीदार होते है। इसमें गूदा अधिक एवं बीज कठोर होता है। इलाहाबाद सफेद: इसके वृक्ष मध्यम आकार और अधिक फैलावदार होते हैं। फल का आकार गोल से चपटा गोल होता है, जो पकने पर हल्के पीले रंग का हो जाता है। इस किस्म के फलों में बीज मुलायम तथा मिठास अधिक होती है। यह एक व्यवसायिक किस्म है जो इलाहाबाद के गंगीय मैदान में बहुत प्रचलित है। अर्का मृदुला यह इलाहाबाद सफेदा के बीजू पौधे से चयनित किस्म है। इसके वृक्ष छोटे, मध्यम आकार वाले एवं फैलावदार होते है। इस किस्म के फल गोल एवं चपटे आकार के होते हैं जिसमें बीज कम एवं मुलायम होता है। इसका गूदा अधिक मुलायम, मीठा एवं स्वादिष्ट होता है। अमरुद के प्रमुख किस्मों का तुलनात्मक विवरण निम्नवत है: किस्म फल वजन (ग्रा.) फल की लंबाई (सें.मी.) फल की चौड़ाई (सें.मी.) कुल घुलनशील ठोस (ब्रिक्स) अम्लता (%) विटामिन ‘सी’ (मि.ग्रा. 100 ग्रा.) बीज का गुण लखनऊ-49 235 6.2 6.7 9.5 0.77 150.6 कठोर इलाहाबाद सफेदा 210 5.0 5.9 11.6 0.98 120.4 मुलायम अर्का मृदुला 225 5.7 6.0 11.9 0.91 115.8 अति मुलायम चित्तीदार 285 6.2 7.0 10.5 0.70 149.2 कठोर एपल कलर 155 5.2 5.9 8.2 0.91 10.0 कठोर बनारसी 170 5.6 5.0 10.0 0.84 110.5 मुलायम संगम 145 4.2 4.5 9.2 0.98 100.6 कठोर बेहद कोकोनेट 210 4.2 6.2 11.2 0.84 120.0 कठोर पियर शेप्ड 175 4.4 5.0 9.0 0.91 115.0 कठोर मुस्तफापुर 145 5.4 5.9 9.0 0.98 150.0 कठोर पौध प्रवर्धन व्यावसायिक खेती के लिए अमरुद के पौधे वानस्पतिक विधि से तैयार किये जाते हैं। इस विधि से तैयार पौधे फलन जल्दी देते हैं और किस्म की सत्यरूपता बनी रहती है। इस विधि में गुटी लगाना, दाबा लगाना (स्टूल लेयरिंग) तथा चश्मा बाँधना (पैचबंडिंग) प्रमुख है। गूटी द्वारा गूटी तैयार करने के लिए जून-जुलाई के महीने में चुनी हुई डाली पर शीर्ष से 40-50 सें.मी. पहले गांठ के पास 2 सें.मी. की छाल उतार कर छल्ला बनाते हैं। छल्ले के ऊपरी शिरे पर 1000 पी.पी.एम., आई.बी.ए. का लेप लगाकर छल्ले को नम मॉस घास से ढककर 300 गेज की पॉलीथीन का टुकड़ा लपेट कर सुतली से कस कर बांध देते हैं। गूटी बाँधने के करीब 2 माह के अंदर जड़े निकल आती हैं अत: इस समय डाली की लगभग आधी पत्तियों को निकाल कर एवं मुख्य पौधे से काटकर पौधशाला में आंशिक छायादार स्थान पर लगा दिया जाता है। मॉस घास के स्थान पर तालाब की मिट्टी (40 कि.ग्रा.) सड़ी हुई गोबर की खाद (40 कि.ग्रा.), जूट के बोरे का सड़ा हुआ टुकड़ा (10 कि.ग्रा.) तथा करंज की खली (2 कि.ग्रा.) के सड़े मिश्रण का भी प्रयोग कर सकते हैं। स्टूल लेयरिंग स्टूल लेयरिंग करने के लिए गूटी द्वारा तैयार पौधे की 2x 2 मी. की दूरी पर नर्सरी में लगाते हैं। जब पौधा एक से दो वर्ष पुराना हो जाये तो उसे मार्च-अप्रैल में जमीन के बराबर काट देते हैं। काटने के बाद उससे कई नये कल्ले निकलते हैं। इन कल्लों पर जमीन से 5-6 सें.मी. की ऊँचाई पर गूटी की भांति ही छल्ला बनाकर आई.बी.ए. पेस्ट लगाते हैं। तत्पश्चात गोबर की सड़ी खाद तथा मिट्टी को अच्छी तरह मिलाकर छल्ले को ढक देते हैं।पौधे को आवश्यकतानुसार समय-समय पर सिंचाई करते रहते हैं। स्टूल लेयरिंग में 2 माह के अंदर जड़ें निकल आती हैं जिनको मुख्य पौधे से अलग करके छायादार स्थान पर लगा दिया जाता है। स्टूलिंग करते समय एक ‘नर्स शूट’ (बिना छल्ला की हुई) छोड़ देते हैं जो पौधे को भोजन देता रहता है। पैच बडिंग पैच बडिंग द्वारा पौधा तैयार करने के लिए एक साल पुराने बीजू पौधों को मूलवृंत के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस केंद्र पर किये गये अध्ययन में मई-जून का महीना अमरुद में पैच बडिंग के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। पौधा रोपण एवं देखरेख अमरुद का पौधा अपेक्षाकृत छोटे कद का होता है। अत: इसे 5 5 मी. की दूरी पर लगाना चाहिए। झारखंड में अमरुद के पौधों को आम, लीची, आँवला और कटहल के बाग़ में पूरक पौधों के रूप में भी लगाया जा सकता है। प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक फल पैदा करने के लिए अमरुद को 2.5x 2.5x 5 मी. की दूरी पर ‘डबल हेज रो’ तरीके से लगाया जा सकता है। इस क्षेत्र में पौधा लगाने के लिए जुलाई से सितम्बर का समय अत्यंत उपयुक्त पाया गया है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहाँ फरवरी-मार्च में भी पौध रोपण किया जा सकता है। पौधा लगाने के एक माह पहले निधारित दूरी पर 60x 60x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार कर लेना चाहिए।गड्ढे को 15 दिन तक खुला छोड़ दें। तत्पश्चात गड्ढे के ऊपर की भुरभुरी मिट्टी में 15-20 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद, 1 कि.ग्रा. करंज/नीज की खली तथा 60 ग्राम एन.पी.के. का मिश्रण मिलाकर गड्ढे को अच्छी तरह भर दें। एक बरसात के बाद जब गड्ढे की मिट्टी दब जाये तब जुलाई के महीने में पौधों की गड्ढे के बीचो-बीच में लगाये। पौधा लगाने के बाद उसके चारों किनारों की मिट्टी से अच्छी तरह दबा दें। पौधे के चारों तरफ एक थाला बनाकर 10-15 ली. पानी दे दें एवं पौधों की पूर्ण रूप से स्थापना तक पानी देते रहें। अमरुद के पौधों में सुंदर एवं मजबूत ढांचा देने के लिए 2-3 वर्ष तक कटाई-छंटाई की जाती है। ढांचा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जमीन से 30-40 सें.मी. तक मुख्य तने पर कोई शाखा न हो। इसी ऊँचाई पर मुख्य तने से 3-4 शाखाओं को चारों तरफ समान रूप से निकलने देनी चाहिए। तदोपरान्त पौधे के आकार को नियमित रखने एवं अच्छी पैदावार के लिए समय-समय पर आवश्यक काट-छांट करते रहना चाहिए। अमरुद के छोटे पौधों में नियमित सिंचाई करते रहना चाहिए। सर्दियों में 20-25 दिन तथा गर्मियों में 10-15 दिन के अंतराल पर परिवर्तित थाला विधि से सिंचाई करते रहने से पौधों का विकास अच्छा होता है। सिंचाई के बाद समय-समय पर गुड़ाई एवं घास निकालते रहना चाहिए। जब पौधा फलन में आ जाता है तो निर्धारित मौसम की फसल लेने के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से अच्छी उपज प्राप्त होती है। झारखंड क्षेत्र में यह देखा गया है कि यदि अक्टूबर माह में पौधों के थालों में पुआल या घास की पलवार बिछा दी जाये तो फल उपज और गुणवत्ता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। खाद एवं उर्वरक अमरुद के बाग़ से अच्छी गुणवत्तायुक्त अधिक फलोत्पादन के लिए संतुलित मात्रा में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग आवश्यक होता है। इस क्षेत्र के लिए पौधों के उम्र के अनुसार निम्नलिखित खाद एवं उर्वरक की मात्रा संस्तुत की गयी है जिसे दो भागों में बाँट कर पहला भाग जून-जुलाई तथा दूसरा भाग अक्टूबर माह में देना चाहिए। जून-जुलाई में गोबर की सड़ी खाद, फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा तने से एक मी. दूरी पर पौधों के क्षत्रक के नीचे गोलाई में 15 सें.मी. गहरी नाली/खाई में देकर मिट्टी से ढक दें। यूरिया की बची आधी मात्रा को अक्टूबर में पेड़ों के क्षत्रक के नीचे देकर मिट्टी में मिला दें। यदि बरसात न हो रही हो तो खाद के बाद पानी देना आवश्यक होता है जिससे नमी बनी रहे। पौधे की आयु (वर्ष) गोबर की सड़ी खाद (कि.ग्रा.) यूरिया (ग्रा.) सुपर फास्फेट (ग्रा.) पोटेशियम सल्फेट (ग्रा.) 1 15 260 375 100 2 30 500 750 200 3 45 780 1125 300 4 60 1050 1500 400 5 वर्ष और अधिक 75 1300 1975 500 फसल प्रबंधन साधारणत: अमरुद के पौधों में साल में तीन बार फूल और फल लगते हैं। पहली फसल के फूल फरवरी-मार्च में आते है, जिनके फल मई-जून में पककर तैयार होते हैं। इसे ‘अम्बे बहार’ कहा जाता है। जिन स्थानों पर सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो वहाँ पर ‘अम्बे बहार’ की फसल से अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। दूसरी फसल के फूल मई-जून में आते हैं जिसे ‘मृग बहार’ कहा जाता है। इस बहार के फल बरसात के मौसम में पककर तैयार होते है जिसके कारण फलों की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है और उसमें फल छेदक कीट के साथ-साथ बीमारियों का भी प्रकोप अधिक होता है। तीसरी फसल के फूल अक्टूबर-नवम्बर में आते हैं जिसे ‘हस्त बहार’ कहा जाता है। इस फसल के फल जाड़े में (जनवरी-फरवरी) तैयार होते है। इस फसल में अपेक्षाकृत अधिक उपज एवं गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते हैं। झारखंड प्रदेश की जलवायु में ‘हस्त बहार’ की फसल से किसानों को अन्य किसी भी फसल की अपेक्षा अधिक गुणवत्ता के फल एवं ज्यादा उपज प्राप्त होती है। ऐसा देखा गया है कि ‘मृग बहार’ की फसल को नियंत्रित करने से ‘हस्त बहार’ की फसल अच्छी होती है। जिसके लिए एक फसल नियमन तकनीक का भी विकास किया गया है जो व्यवसायिक दृष्टि से सरल एवं लाभप्रद है। इसके अंतर्गत अप्रैल-मई में 10 दिनों के अंतराल पर पौधों पर यूरिया के 15 प्रतिशत घोल का दो छिड़काव कर दिया जाता है जिससे आने वाले फूल एवं पत्तियाँ गिर जाती है। तत्पश्चात पर्णीय शक्ति से ‘हस्त बहार’ की फसल में अधिक ओजपूर्ण फूल और फल आते है। जिससे उपज में वृद्धि होती है। उपज एवं विपणन अमरुद के फल अधपके अवस्था में ही पसंद किये जाते हैं अत: फलों के रंग एवं गूदे की कठोरता के अनुसार ही तुड़ाई करना चाहिए। दो पत्ती सहित फलों की तुड़ाई 2-3 दिनों के अंतराल पर करने से बाजार में अच्छी कीमत प्राप्त होती है। फलों को बांस या अरहर के टोकरियों में अमरुद की पत्ती या अखबार के एक तह पर रखकर बाजार में भेजा जा सकता है। अमरुद का पौधा लगाने के दो वर्ष बाद फल देने लगता है। पाँच वर्ष के एक पौधे के औसतन 30-40 कि.ग्रा. तथा 10 वर्ष पुराने पौधे से 70-80 कि.ग्रा. फल प्रति वर्ष प्राप्त हो जाता है। यदि अच्छी देखरेख की जाये तो अमरुद के बाग़ से 15-25 वर्ष तक फल का उपज प्राप्त कर सकते हैं। कीट, रोग एवं नियंत्रण फल-मक्खी इस कीट के नवजात भीतरी भाग को खाते हैं। इसकी मादा परिपक्व फलों को छेदकर अंडे देती है। 2-3 दिन बाद अंडे से सुंडी निकल कर गूदे को खाना शुरू कर देती है। प्रभावित फल सड़कर गिर जाते हैं। सुंडी 12-15 दिन बाद फलों के अंदर या भूमि में प्यूपा में बदल जाती है और बाद में मक्खी बनकर उड जाती है। बरसात के फलों को यह मक्खी अधिक प्रभावित करती है। फल-मक्खी के नियंत्रण के लिए साइपरमेथ्रिन 2.0 मि.ली./ली. या मोनोक्रोटोफ़ॉस 1.5 मि.ली./ली. की दर से पानी में घोल बनाकर फल परिपक्वता के पूर्व 10 दिनों के अंतर पर 2-3 छिड़काव करें। प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा बागीचे में फल मक्खी के वयस्क नर को फंसाने के लिए फेरोमोन ट्रेप लगाने चाहिए। तना वेथक यह अमरुद का एक हानिकारक कीट है जिसका प्रकोप उन बागों में अधिक होता है जिनकी देख-रेख ठीक से नहीं की जाती है। इस कीट की सुंडी मुलायम प्रारोहों के ऊपरी भाग को छेद कर नुकसान पहुंचाती है। इसके रोकथाम हेतु तने के छिद्रों को साफ़ कर नुवान (2 मि.ली./ली. पानी) के घोल में रुई भीगा कर छिद्रों में भर कर गीली मिट्टी से बंद कर देते हैं। उकठा रोग उकठा रोग फफूंद के प्रभाव से होता है। रोगग्रस्त पौधे 2-4 सप्ताह में मुरझा कर मर जाते हैं। कभी-कभी आंशिक मुरझा क्लान्ति से कुछ डाल सूख जाते हैं तथा कुछ हरे रहते हैं, पर ऐसे पेड़ भी अगले वर्ष पूर्ण रूप से सूख जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए कालीसेना (एस्पर्जिलस नाइजर के व्यवसायिक स्वरूप) नामक जैव कीटनाशी का पौधरोपण के समय प्रयोग करने से आंशिक सफलता मिली है। इस जैव कीटनाशी की 50 ग्रा. मात्रा व 5 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ गड्ढे में मिलाकर पौध रोपाई करें। पौधों में पोटेशियम एवं करंज की खली के प्रयोग से उकठा रोग की उग्रता में कमी पायी गयी है। जस्ता की कमी जस्ता तत्व की कमी होने के पत्तियों का पीला पड़ना, छोटा होना तथा पौधे की बढ़वार कम हो जाने के लक्षण मिलते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 2 प्रतिशत जिंक सल्फेट का छिड़काव अथवा 300 ग्रा. जिंक सल्फेट (कृषि ग्रेड) का पौधों की जड़ों में देना लाभप्रद पाया गया है। स्त्रोत: समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार