आम भारत का एक प्रमुख एवं राष्ट्रीय फल है। विश्व में कुल आम उत्पादन का लगभग 44 प्रतिशत भाग में उत्पन्न होता है । देश के प्राय: सभी क्षेत्रों में आम की खेती की जाती है। व्यावसायिक स्तर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश में इसकी खेती की जाती है। बागों का जीर्णोद्धार करने की आवश्यकता भारतीय आम के फलों में उत्तम खुशबू, स्वाद, रंग तथा पौष्टिक गुणों के कारण इनकी विदेशों में बहुत मांग है। आम के पौधे लगाने के 3-4 वर्षों के बाद फल देने लगते हैं । और 40-50 वर्षों तक फल देते रहते हैं। आम के पौधे पुराने होने पर उत्पादन कम हो जाता है, बाग घने हो जाते हैं । अत: ऐसे समय किसानों के लिए लाभदायक नहीं रह जाता है। ऐसी स्थिति में या तो पुराने बागों को काटकर नये बाग लगाये जाएँ या फिर पौधों का जीर्णोद्धार कर आने वाले 25-30 वर्षों तक पुन: अच्छे उत्पादन प्राप्त करें। नये बागों को लगाने का खर्च 50-60 हजार प्रति हेक्टेयर आता है और 4-5 वर्षों तक फल नहीं मिलता। अत: जीर्णोद्धार करने से अतिरिक्त लकड़ी भी मिलती हैं जो जलावन के काम आती है। आम की पुराने पौधों का जीर्णोद्धार इसलिए भी जरूरी है कि पौधे आपस में सट जातें है जिससे पर्याप्त धुप नहीं लग पाता है । पुराने वृक्षों की वांछित कटाई – छंटाई करने से नये तने निकलते हैं। ताकि वे पुन: फल दें सकें। जीर्णोद्धार प्रक्रिया में वैज्ञानिक तरीके से पौधों की डाली, छत्रक और फल देने वाली शाखाओं का निर्धारण किया जाता है और कृत्रिम वृक्षों की 2 वर्षो तक समग्र देख-रेख कर अगले वर्ष फल देने योग्य बना दिया जाता है। जीर्णेाद्धार करने की विधि पहला चरण पुराने बाग जो प्राय: 10 मीटर x 10 मी के दूरी पर लगाये जाते हैं 40-45 वर्षों में घने हो जाते हैं । ऐसे बगीचों में लम्बी-लम्बी तथा बिना पत्ती व डाली की शाखाओं की अधिकता हो जाती है जिसमें ऊपर की तरफ कुछ पत्तियाँ या मंजर लगते हैं। प्राय: ऐसा देखा गया है कि 10 मी. पौधे से पौधे और 10 मी लाइन से लाइन की दूरी पर लगाये गए आम के बगीचे लगभग 40-45 वर्षों में घने हो जाते हैं। ऐसे बगीचों में लम्बी–लम्बी तथा बिना पत्ती व डाली की शाखाओं की अधिक हो जाती है जिनमें की ऊपर की तरफ ही कुछ पत्तियाँ या मंजर लगते हैं । ऐसे पौधों में सूर्य के परकाश तथा वायु के संरचना में भी बाधा पड़ती है। परिणामस्वरुप बीमारियों तथा कीड़ों का प्रकोप बढ़ जाता है तथा उत्पादन कम हो जाता है ऐसे पौधों को जीर्णोद्धार प्रक्रिया द्वारा पुन: फलत में ला कर कम से कम खर्च में गुणवत्तायुक्त पैदावार प्राप्त की जा सकती है। द्वितीय चरण जीर्णोद्धार करने के लिए पौधों की चुनी हुई शाखाओं को जमीन से 4-5 मी. की ऊँचाई पर चाक या सफ़ेद पेन्ट से चिन्हित कर देते हैं शाखाओं को चुनते समय यह ध्यान रखें की चारों दिशाओं में बाहर की तरफ स्थित शाखाओं को ही चुनें । पौधों के बीच में स्थित शाखाओं, रोगग्रस्त व आड़ी- तिरछी शाखाओं, को उनके निकलने की स्थान से ही काट दें । शाखाओं को तेज धार वाली आरी या मशीन चालित ‘प्रूनिंग सॉ’ की सहायता से काटते हैं । तत्पश्चात ऊपर से पूरी शाखा को काट देते ऐसा करने से डालियों के फटने की संभावना नहीं रह जाती । कटे हुए भाग का संरक्षण कटाई के तुरंत बाद कटे भाग पर फूफंदनाश्क दवा (कॉपर आक्सीक्लोराइड) को करंज या अरंडी के तेल में मिलाकर पेस्ट कर देते हैं। कटे भाग पर गाय के ताजे गोबर में चिकनी मिट्टी मिलाकर लेप करना भी प्रभावकारी पाया गया है इससे कटे भाग को किसी फफून्दियूक्त बीमारी के संक्रमण से बचाया जा सकता है । कटाई के बाद पौधों के तनों में चूना से पुताई कर देते हैं । ऐसा करने से गोंद निकलने तथा छाल फटने की समस्या कम हो जाती है। गाय के ताजे गोबर में चिकनी मिट्टी मिलाकर तैयार किये गये लेप को पूरे पौधे में लगाने से अच्छा परिणाम मिला है । खाद और धान के पुआल की उपयोगिता कटाई के बाद पौधों का थाला बना दें तथा गुड़ाई करके फरवरी – मार्च में सिंचाई करें। मानसून की शुरूआत में ही प्रत्येक पौधे को 1 कि. ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट 1.5 कि. ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश, 200 ग्राम जिंक सल्फेट तथा 50 कि. ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद को अच्छी तरह मिलाकर नाली विधि से दें। इस विधि में खाद देने के लिए पौधों के तनों से 1.5 मी. की दूरी पर गोलाई में 60 सेमी. चौड़ी तथा 30- 45 सेमी. गहरी नाली बनायें । इस नाली को खाद के मिश्रण से भरकर इसके बाहर की तरफ गोलाई में मेढ़ बना दें। 1 कि. ग्रा. यूरिया को अक्टूबर माह में थाले में डालकर अच्छी तरह मिला दें। अंतिम बरसात के बाद अक्टूबर माह में थालों में धान के पुआल की पलवार बिछा दें जिससे लम्बे समय तक नमी संरक्षित रह सके। यह प्रक्रिया प्रत्येक वर्ष करें। बिरलीकरण पौधों में 70-80 दिनों के अंदर सूसूप्त कलियों से नये- नये कल्ले निकलते हैं। आवश्यकतानुसार प्रत्येक डाली में 8- 10 अच्छे, स्वस्थ तथा ऊपर की ओर बढ़ने वाले कल्लों को छोड़कर बाकी सभी कल्लों को सिकेटियर की सहायता से काट दें । इस प्रक्रिया को बिरलीकरण कहते हैं । नव सृजित अवांछित कल्लों के बिरलीकरण के उपरांत 2 मि. ग्रा. धनकोप ( कॉपर ऑक्सीक्लोराइड) प्रति लिटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना लाभदायक पाया गया है।जीर्णोद्धार किये गये पौधों में उचित देखभाल के अभाव में कभी – कभी तना बेधक कीट का प्रकोप अधिक होता है। यदि पेड़ के नीचे लकड़ी का बुरादा गिरा हूआ दिखे तो समझें कि इस कीट का आक्रमण हो गया है। बचाव के लिए ग्रसित भाग के छाल को खुरच दें तथा कीड़े के बिल को साईकिल की तीली से साफ करके उसमें पेट्रोल या नूवान से भीगी रूई ठूँस कर चिकनी मिट्टी से लेप कर दें । नये कल्लों पर पत्तीखाने वाले कीड़े या पत्ती झुलसने जैसे बीमारी दिखाई दे तो उस पर 0.2 प्रतिशत कवच + ०.15 प्रतिशत मोनोक्रोटोफास दवा का 15 दिनों के अन्तराल पर 2 छिड़काव करें । अवांछित शाखाओं और कल्लों को काटना पौधों में अच्छा क्षत्रक विकसित करने के लिए समय-समय पर अवांछित शाखाओं तथा कल्लों को काटते रहना चाहिए तथा पत्तों पर आने वाले कीड़े तथा बीमारियों का नियन्त्रण करते रहें । प्रथम दो वर्षों में कल्लों की उचित वृद्धि के लिए अक्टूबर माह में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव करें । वांछित कल्लों की बढ़वार सुनिश्चित करने के लिए कुछ कल्लों की उनके निकलने के स्थान से ही काट दें । समय-समय पर यह सुनिश्चित करते रहें की छत्रक के अंदर पर्याप्त धूप, रोशनी तथा वायु का आवागमन हो रहा है। अंतरफसलीय चक्र जीर्णोद्धार का पश्चात् बगीचे की जमीन काफी खाली हो जाती है जिसमें तरह- तरह की अंतरफसल जैसे जायद में लौकी, खीरा व अन्य सब्जियां, खरीफ में अरहर, मूंग, उड़द व अन्य दलहनी फसलें तथा रबी में आलू, मटर, सरसों, फरसबिन, बोदी इत्यादि फसलों की सफल खेती कर सकती हैं । इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी के साथ- साथ बगीचे की मिट्टी में भी सुधार होता है । अंतरशस्य फसल पौधों के पूर्ण छत्रक विकास होने तक लगाई जा सकती है । उसके बाद छाया में होने वाली फसलों जैसे हल्दी, अदरक, ओल की सफल खेती भी की जा सकती है । मंजर सुरक्षा जीर्णोद्धार किये गये आम के पौधों में तीसरे वर्ष से मंजर आना प्रारम्भ हो जाता है सभी पौधों में मंजर सुनिश्चित करने के लिए दुसरे वर्ष के सितम्बर माह में पौधों को 12 मि. ली. कल्तार (पैक्लोब्यूट्राजाल) प्रति पौधा के दर से एक लिटर पानी में मिलाकर मुख्य तने के पास उपचारित करें । यह भी प्रक्रिया तीसरे- चौथे वर्ष भी करें परन्तु कल्तार की मात्रा 6 मि. ली. प्रति पौधा कर दें । मंजर सुरक्षा के लिए पौधों पर मंजर निकलने के पहले तथा फूल खिलने के बाद कैराथेन (3 ग्राम) + मोनोक्रोटोफास(1.5 मि.ली.) प्रति लिटर पानी के दर से घोल बनाकर छिड़काव करें । छिड़काव करते समय घोल में सैन्डोबिट / साबुन का प्रयोग करें । रासायनिक दवा का छिड़काव करें छोटे – छोटे फलों को कीड़े, बीमारी तथा झड़ने से बचाने के लिए रासायनिक दवा का छिड़काव करें । पाउडरी मिल्ड्यू तथा भुनगा कीट नियन्त्रण के लिए कैराथेन 3 ग्राम प्रति लिटर + मोनोक्रोटोफास 1.5 मि. ली प्रति लिटर का पानी में घोल बनाकर 15-20 दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करें । फलों को झड़ने से बचाने के लिए फल लगने के बाद पौधों की 15 दिनों के अन्तराल पर कम से कम तीन सिंचाई करें और थालों में पलवार बिछायें । आम के पुराने पौधों के जीर्णोद्धार प्रक्रिया के लिए मासिक कार्यक्रम पहला साल दिसम्बर – जनवरी अप्रैल- मई अगस्त – सितम्बर अनूत्पद्क बाग का चुनाव डालियों को चिन्हित करना । डालियों की कटाई तथा कटी डालियों को हटाना । कटे भाग पर गाय का गोबर या कॉपर अक्सिक्लोराइड का पेस्ट लगाना । पौधों की सिंचाई करना तथा थालों में 1 कि. ग्रा. यूरिया डालकर गुड़ाई करना । जायद का फसल लगाना पौधों में यदि तना छेदक का प्रकोप दिखे तो उसका नियंत्रण करना । तना छेदक का समय पर नियन्त्रण करना । पतीयों पर आने वाले कीड़ों तथा बीमारयों का नियन्त्रण करना । चुने हुए कल्लों के अतिरिक्त अन्य कल्लों को निकलना । खरीफ का फसल की बुवाई करना । फरवरी – मार्च जून- जुलाई अक्टूबर-नवम्बर पूरे तने पर गाय के गोबर का लेप लगाना या चूने में कॉपर अक्सिक्लोराइड मिलकर पुताई करना । पौधों के नीचे गुड़ाई करके थाला बनाना । खालीपड़ी जमीन को जायद की फसल की लिए तैयार करना । कल्लों का बिरलीकरण करना तथा कटे हुए भाग पर कॉपर- अक्सिक्लोराइड का लेप लगाना । पौधों में नाली विधि से खाद एवं उर्वरक प्रयोग करना पौधों के कटे हुए शिरों पर पालीथीन बांधना । पत्तियों पर आने वाले कीड़ों तथा बिमारियों का रोकथाम करना । उर्वरक की बाकी बची मात्रा को थालों में देकर गुड़ाई करना था मेड बनाना । थालों में पुवाल की पलवार बिछाना । रबी फसल की बुवाई करना। दूसरा साल दिसम्बर-जनवरी अप्रैल- मई अगस्त- सितम्बर चुने हूए काल्लों के अतिरिक्त अन्य निकलने वाले कल्लों की कटाई। तना छेदक एवं पत्ते खाने वाले कीड़ों का समुचित नियंत्रण । थालों की गुड़ाई करके पलवार को मिट्टी में मिलाना । पौधों की सिंचाई करना । अधिक घने क्षत्रक वाले पौधों अंदर के तरफ वाली कुछ शाखाओं को निकालना । नये पत्तियों पर आने वाली कीड़ों तथा बिमारियों का नियंत्रण करना । थालों में कल्तार का प्रयोग करना । फरवरी – मार्च जून-जुलाई अक्टूबर- नवम्बर पत्तियों पर लगने वाले कीड़ों तथा बीमारियों का नियंत्रण । पौधों की सिंचाई करना । जायद की फसल के तैयारी करना । खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करके थाला बनाना । खरीफ फसल के लिए तयारी करना । धान के पुवाल की पलवार बिछाना । पौधों में सिंचाई रोक देना । जिंक सल्फेट 2 ग्राम/लिटर पानी की दर से छिड़काव करना । तीसरा साल दिसम्बर – जनवरी अप्रैल- मई अगस्त – सितम्बर पौधों में सिंचाई रोक देना । चुने हुए कल्लों के अतिरिक्त अन्य कल्लों को निकाल देना । रबी की फसल लगाना । फल लग जाने के बाद कैराथेन तथा मोनोक्रोटोफास का दूसरा छिड़काव करना । फल झड़ने से बचाने के लिए प्लैनोफिक्स का छिड़काव पौधों में खाद देना तथा थाल बनाना ।कल्तार की निर्धारित मात्रा का प्रयोग करना । सूटगाल सिला से प्रभावित डालियों को काट कर हटाना । फरवरी – मार्च जून- जुलाई अक्टूबर-नवम्बर आम के टिकोला को कीड़ा लगने से कैसे बचायें किसान फलों के राजा आम के मौसम की शुरूआत हो चुकी है। आम के पेड़ों में मटर के दानें जैसे आम (टिकोला) लगना शुरू भी हो चुका है। आम के बगीचे के मालिक एवं किसानों के सामने आम के टिकोले को बचना एक चुनौतीपूर्ण भरा काम होता है। किसान जानकारी के अभाव में इसके रख-रखाव पर ध्यान नहीं देते हैं, जिसके कारण आम के टिकोले में विभिन्न तरीके के कीड़़े लग जाते हैं। कीड़ा लग जाने से आम के टिकोले बड़े होकर आम का रूप लेने से पहले ही पेड़ से गिर जाते हैं। बची खुचे आम के टिकोले आंधी-तुफान में गिर जाते हैं। इससे जो बचता है वहीं आम लोगों तक पहुंच पाता है। आम के टिकोले के रख-रखाव के संबंध में दारीसाई कृषि अनुसंधान केन्द्र के तकनिकी पदाधिकारी विनोद कुमार की राय पर अगर किसान अमल करे तो काफी मात्रा में आम के टिकोले कीड़ा लगने से काफी हद तक बचाया जा सकता है और लोगों को भरपूर मात्रा में आम मिल सकेगा। वैज्ञानिक के सुझाव 1. आम के पेड़ों में जब फल मटर के दाने से बड़े आकार का हो जाये तो मालाथियॉन 50 प्रतिशत का 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे। हल्के बादल छाये रहने पर टिकोले पर ऐंथ्रेकनोज एवं चुर्णील फफूंदी होने की संभावना काफी बढ़ जाता है।इससे बचाव के लिये आधा ग्राम कारबेंडाजिम के साथ ही सल्फेक्स डब्ल्यू पी 2-3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे। इसके छिड़काव के कुछ दिनों के बाद पोषक तत्व या हारमोन का छिड़काव करे। इससे फल के आकार एवं चमक में वृद्धि होता है साथ ही फल का गिरना भी रूक जाता है। इसके लिये एनएए (नेफथेलिक एशिटीक एसीड) जो बाजार में प्लानोफिक्सया एसिमोन अथवा ट्रासेल या मल्टिप्लेक्स 50-100पीपीएम (5-10 मिलीलीटर प्रति 100 लीट पानी) उपलब्ध है इसका घोल बनाकर छिड़काव करे। 2. आम के प्ररोहों में घुंडी पैदा करने वाले, लीफगाल एवं दहीया कीट से बचाव के लिये मोनोक्रोटोफॉस 1 मिलीलीटर या मेटासिस्टाक्स प्रति लीटर घोल तैयार कर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करे। इससे उक्त कीट से बचाव हो सकता है। स्त्रोत: राष्ट्रीय बागवानी मिशन,कृषि भवन प्रांगन, कांके रोड, राँची, झारखण्ड एवं केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान,रहमानखेड़ा लखनऊ(उ.प्र.) आम के प्रभेद