<p style="text-align: justify;">भारत में वर्तमान में 2,312.30 हजार हैक्टर क्षेत्रफल में आम की बागवानी की जा रही है। देश के मुख्य आम उत्पादक राज्य, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, गुजरात व तमिलनाडु हैं। उत्तर प्रदेश में इसका सर्वाधिक उत्पादन (23.86 प्रतिशत) होता है। आधुनिक तकनीकों व आम की नई संकर किस्मों का उपयोग कर, किसान अपने बागों से गुणवत्तायुक्त उत्पादन एवं अधिक मुनाफा लंबे समय तक ले सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">भारत में आम की बागवानी का बड़ामहत्व है। आम के उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। इसकी बागवानी उष्ण एवं समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में अच्छी प्रकार से की जाती है। 600 मीटर की ऊंचाई तक आम के बाग व्यावसायिक रूप से लगाए जा सकते हैं। इसके लिए 23.8° से 26.6° सेल्सियस तापमान उत्तम होता है।</p> <p style="text-align: justify;">आम की संकर किस्मों के पौधे शीघ्र फलन देना शुरू कर देते हैं और इनमें बढ़वार व फैलाव भी अपेक्षाकृत कम होता है। इस कारण इन्हें सघन बागवानी में भी लगाया जा सकता है। संकर किस्मों में नियमित फलन होती है, जबकि देश में उगाई जाने वाली परंपरागत आम की पुरानी किस्मों में एकांतर फलन होती है।</p> <p style="text-align: justify;">आम के फल पकने के बाद जल्दी ही खराब होने लगते हैं और बाजार में इसकी भरमार होने के कारण किसानों को कम दाम पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। आम की संकर प्रजातियों को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजार की मांग को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है इसलिये संकर किस्मों के बाग लगाकर किसान अधिक उत्पादन व मुनाफा ले सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;"> महत्वपूर्ण संकर किस्में</h3> <h4 style="text-align: justify;">आम्रपाली</h4> <p style="text-align: justify;">यह दशहरी और नीलम किस्मों के संकरण से बनी संकर प्रजाति है। आम्रपाली नियमित रूप से फलने वाली बौनी प्रजाति है। इस किस्म को सघन बागवानी के लिये अत्यंत उपयुक्त पाया गया है। इसके फल जुलाई के अंतिम सप्ताह में पकने लगते हैं। फल गूदेदार व रेशारहित होते हैं। आम्रपाली गृह वाटिका में लगाने के लिये भी उपयुक्त किस्म है। इसके पौधों को 2.5 x 2.5 मीटर की दूरी पर लगाकर एक हैक्टर क्षेत्रफल में 1600 पौधे उगाए जा सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/12a21.jpg" width="197" height="290" /></p> <h4 style="text-align: justify;"> मल्लिका</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म नीलम और दशहरी किस्मों के संकरण से तैयार की गयी है मल्लिका मल्लिका नियमित फल देने वाली मध्यम ओजस्वी प्रजाति है। इसके पौधों को 8 x 8 मीटर पर रोपण करके प्रति हैक्टर क्षेत्रफल में 156 वृक्ष लगाये जा सकते हैं। इसके फल बड़े आकार के अत्यधिक गूदायुक्त व स्वादिष्ट होते हैं। फल मध्य जुलाई में पकने शुरू होते हैं। यह किस्म दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित है। विगत वर्षों में इसके फलों का निर्यात अमेरिका तथा खाड़ी देशों को किया गया है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/c12a23.jpg" width="260" height="307" /> </p> <h4 style="text-align: justify;">पूसा लालिमा</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म दशहरी व सेंसेशन किस्मों के संकरण से तैयार की गयी है। इसके वृक्ष मध्यम आकार के होते हैं और एक हैक्टर क्षेत्रफल में 278 पौधे लगाये जा सकते हैं। पूसा लालिमा नियमित फलन और शीघ्र पकने वाली प्रजाति है। इसके फल लाल रंग के व मध्यम आकार के बहुत ही आकर्षक होते हैं, जिनमें गूदा 70.1 प्रतिशत होता है। जून के पहले पखवाड़े में ये फल पकने प्रारंभ हो जाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cc12a22.jpg" width="223" height="217" /></p> <h4 style="text-align: justify;">पूसा पीताम्बर</h4> <p style="text-align: justify;">यह नियमित फल देने वाली व सघन बागवानी के लिये उपयुक्त किस्म है। इसको आम्रपाली व लाल सुन्दरी किस्मों के संकरण से तैयार किया गया है। 6 x 6 मीटर की दूरी पर एक हैक्टर क्षेत्रफल में पूसा पीताम्बर के 278 वृक्ष लगाये जा सकते हैं। इसके फल मध्यम आकार के व पकने पर आकर्षक पीले रंग के हो जाते हैं। ये फल रसीले एवं मनमोहक सुगंध वाले होते हैं। इनमें 18.8 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ होता है। ऐसा देखा गया है कि इस प्रजाति में गुच्छा रोग कम लगता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">पूसा श्रेष्ठ</h4> <p style="text-align: justify;">यह प्रत्येक वर्ष फलने वाली अत्यन्त आकर्षक किस्म है, जिसकी उत्पत्ति आम्रपाली व सेंसेशन किस्मों के संकरण से हुई है। इसके पौधे 6 x 6 मीटर की दुरी पर रोपण करके एक हैक्टर क्षेत्रफल में 278 वृक्ष लगाये जा सकते हैं। इसके फल आकर्षक, सुगंधित व लाल रंग लिए लंबाकार होते हैं, जिनमें 20.3 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ होता है। पूसा श्रेष्ठ के फल जुलाई के पहले सप्ताह में पकने आरंभ हो जाते हैं और पके फलों को 6-7 दिनों तक आसानी से रखा जा सकता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">पूसा प्रतिभा</h4> <p style="text-align: justify;">यह प्रत्येक वर्ष फल देने वाली किस्म है, जिसे आम्रपाली व सेंसेशन किस्मों के संकरण से तैयार किया गया है। पूसा प्रतिभा के वृक्ष मध्यम आकार के होते हैंऔर एक हैक्टर क्षेत्रफल में 278 पौधे लगाये जा सकते हैं। इसके फल जुलाई के पहले सप्ताह में पकने शुरू हो जाते हैं। इस प्रजाति के फलों की पीली सतह पर लाल रंग की आभा बहुत ही आकर्षक होती है। इसके फलों में अच्छी सुगंध व मध्यम मिठास (19.5 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) होती है। फलों की निधानी आयु लगभग 6-7 दिनों की होती है। इस तरह की रंगीन छिलके वाली किस्मों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़ी मांग है।</p> <h4 style="text-align: justify;">पूसा सूर्या</h4> <p style="text-align: justify;">यह विदेशी किस्म 'एल्डन' का ही रूप है। इसमें नियमित फलन होता है और इसके वृक्ष मध्यम ओजस्वी होते हैं। इसके फल बड़े आकार के आकर्षक सुनहरे पीले रंग के होते हैं। एक हैक्टर क्षेत्रफल में इसके लगभग 278 वृक्ष लगाये जा सकते हैं। इसके फल मीठे (19.5 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) व मनमोहक सुगंध वाले होते हैं। फलों में 70 प्रतिशत गूदा होता है। फल जुलाई के मध्य से पकने शुरू हो जाते हैं। इस प्रकार की किस्मों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है।</p> <h4 style="text-align: justify;">पूसा अरुणिमा</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म आम्रपाली व सेंसेशन किस्मों के संकरण से तैयार की गयी है। इसमें नियमित फलन होती है और वृक्ष मध्यम ओजस्वी होते हैं। पूसा अरुणिमा के पौधों को 6 x 6 मीटर दूरी पर लगाना चाहिए और एक हैक्टर क्षेत्रफल में 278 पौधे लगाये जा सकते हैं। इसके फल बड़े आकार (250 ग्राम) के लालिमा लिए अत्यन्त आकर्षक होते हैं। यह देर से पकने वाली प्रजाति है। इसके फल अगस्त के पहले सप्ताह में तैयार हो जाते हैं। फलों में मध्यम मिठास (19.5 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) होती है। पकने के बाद फलों को सामान्य कमरे के तापमान पर 10-12 दिनों तक आसानी से रखा जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>उ</strong>परोक्त सभी संकर किस्में भाकृअनुपभारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में विकसित की गयी हैं। इनके अतिरिक्त देश के विभिन्न संस्थानों द्वारा भी आम की नवीन प्रजातियों का विकास किया गया है, जिनका विवरण निम्न है </p> <h3 style="text-align: justify;"><strong>आम की नवीन प्रजातियाँ </strong></h3> <h4 style="text-align: justify;">अर्का अरुणा</h4> <p style="text-align: justify;">यह नियमित फल देने वाली बौनी किस्म है। इसको बैंगनपल्ली व अल्फांसो किस्मों के संकरण से तैयार किया गया है। अर्का अरुणा के फल मीठे (20 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) व लालिमा लिए होते हैं। फलों का गूदा पीले रंग का व रेशारहित होता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">अर्का पुनीत</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म अल्फांसो व बैंगनपल्ली किस्मों के संकरण से तैयार की गयी है। अर्का पुनीत नियमित फलन देने वाली प्रजाति है। इसके फल पकने पर पीले रंग के लालिमा लिए होते हैं। फल मीठे (21 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) व रेशारहित अंडाकार होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>ये सभी किस्में भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु द्वारा तैयार की गयी हैं।</strong></p> <h4 style="text-align: justify;"> अरुणिमा</h4> <p style="text-align: justify;">यह आम्रपाली व वनराज किस्मों के संकरण से तैयार नियमित फलन देने वाली प्रजाति है। इसके फल मध्यम आकार (190-210 ग्राम) के तथा आकर्षक लाल रंग के होते हैं। फल मीठे (24.6 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) व गृदा नारंगी पीले रंग का होता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">अंबिका</h4> <p style="text-align: justify;">यह किस्म आम्रपाली व जनार्दन पसंद किस्मों के संकरण से विकसित की गई है। अंबिका नियमित फल देने वाली व देर से पकने वाली प्रजाति है। इसके फल लंबोत्तर अंडाकार व लगभग 300-350 ग्राम वजन के होते हैं। फल आकर्षक पीले रंग के एवं लालिमा लिए होते हैं। फलों में 21 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ पाया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">अरुणिमा और अबिका किस्में भाकृअनुप -केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) द्वारा तैयार की गयी हैं। </p> <h4 style="text-align: justify;">सिन्धु</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म को रत्ना व अल्फांसो किस्मों के संकरण से तैयार किया गया है। यह नियमित फलन देने वाली प्रजाति है। सिन्धु के फलों में गुठली बहुत पतली व छोटी होती है। इसके फल आकर्षक, मध्यम आकार के व रेशारहित होते हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;"> रत्ना</h4> <p style="text-align: justify;">इस किस्म को नीलम व अल्फांसो के संकरण से तैयार किया गया है। यह नियमित फलन देने वाली प्रजाति है। इसके फल आकर्षक. स्पंजी व रेशारहित होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सिन्धु और रत्ना किस्में कोंकण कृषि विद्यापीठ, महाराष्ट्र द्वारा जारी की गयी हैं।</strong></p> <p style="text-align: justify;">उपरोक्त आम की नवीन संकर किस्में नियमित फलन देने वाली तथा मध्यम सघन बागवानी के लिये उपयुक्त पाई गयी हैं। संकर आम के पौधे तीन वर्ष बाद फल देना शुरू कर देते हैं और तीसरे वर्ष में 5-6 फल मिल जाते हैं। इन प्रजातियों से 6-7 वर्ष बाद व्यावसायिक उत्पादन मिलना शुरू हो जाता है। दस वर्ष बाद 300 से 400 फल प्रतिवृक्ष मिलने शुरू हो जाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">आम के बाग लगाने के लिए किसान पौधे सरकारी संस्थान या सरकारी नर्सरी से ही लें। जलवायु तथा मृदा की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उचित नवीन किस्मोंकी बागवानी से अधिक उत्पादन एवं मुनाफा लिया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत: फल-फूल पत्रिका, आईसीएआर,जय सिरोही एवं करुणा दीक्षित प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन पुस्तकालय, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012 और सुरेश चंद राणा’भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्राीय केन्द्र करनाल-132001 (हरियाणा)।</p>