परिचय आम (मेंगिफेरा इंडिका) को 'फलों का राजा' के रूप में जाना जाता है। यह भारत के फल उद्योग में अलग स्थान रखता है। आम इकलौता ऐसा फल है. जिसे कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है जैसे-कच्चे फल की चटनी, अचार, अमचूर और आम पापड़ बनाने के लिए। पके फलों को खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यहां तक कि इसके बीज को स्टार्च और छिलके को पेक्टिन एवं एनार्डिका एसिड के स्रोतों के रूप में उपयोग किया जाता है। पंजाब में, आम की बागवानी मुख्य रूप से उपपर्वतीय क्षेत्रों तक ही सीमित है। ये क्षेत्र चूसने वाले आम की विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। इन क्षेत्रों में, पुराने आम के बागान मुख्य रूप से अंकुर उत्पत्ति से 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान स्थानीय फल प्रेमियों द्वारा लगाए गए थे। इसके अलावा इसकी बागवानी कंडी इलाकों में भी सफलतापूर्वक की जाती है। पंजाब में आम की बागवानी का नीबू प्रजाति और अमरूद के बाद तीसरा स्थान है। कंडी और नीम पहाड़ी इलाकों में पैदा पाहोने वाले देसी आमों में कई तरह की विभिन्नताएं पाई जाती हैं। ये विविधताएं फल के आकार, रंग, जूस की मात्रा, गुठली की लंबाई, गूदा और रेशे के आकार पर होती हैं। 70 के दशक की शुरुआत में डा. महिंदर सिंह रंधावा, उप कुलपति, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना ने इन प्राकृतिक विभिन्नताओं वाले देसी आमों को उपयोग में लाने और इनकी बागवानी करने के प्रयास किए। देसी आम की 60 से अधिक किस्में, जिनमें फल लंबे आकार के, छिलका कसा हुआ, रसदार गूदा, छोटा बीज, कम रेशे और छिलका हल्का लाल इत्यादि जैसे गुणों वाली प्रजातियों को अलग-अलग जगहों से लाकर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, फल खोज केंद्र, गंगीआं (दसुआ) जिला होशियारपुर में लगाया गया था। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब बायोडायवर्सिटी बोर्ड, चंडीगढ़ द्वारा विलुप्त हो रही आम की किस्मों में विभिन्नता और इनकी बागवानी की संभावनाओं के लिए कंडी और नीम पहाड़ी इलाकों में एक संयुक्त सर्वेक्षण किया गया। इसके पीछे उद्देश्य था कि इन किस्मों की कुदरती तौर से उग रहे वातावरण में ही बागवानी की जा सके। इस सर्वेक्षण के दौरान आम की विभिन्न प्रजातियों को इनके बाहरी और अंदरूनी रासायनिक गुणों के अनुसार देसी नामों के साथ साझा किया गया। आम की कुछ दिलचस्प किस्मों को उनके स्थानीय नामों से जाना जाता है जैसे-अंडा दशहरी (स्वाद और सुगंध आम की लोकप्रि किस्म ‘दशहरी', की तरह लेकिन फल आकृति अंडे की तरह), लड्डू आम, गोला घासीपुर और बेर आम (फल बेर के आकार की तरह)। पंजाब में लंबे आकार के आम को 'छल्ली' कहा जाता है (फलों का आकार एक छोटे मक्के की तरह होने के कारण)। आम की सात प्रजातियों में (इनामी छल्ली, चोई सिंधुरी, घासीपुर दी छल्ली, लड्डू अंब, महंतां दी लालटेन, सिंदूरी चौसा) आकर्षक पीला रंग और छिलके के ऊपर वाली तरफ लाल रंग देखा गया है। चुनी हुई बाकी किस्मों में फलों का रंग पीले से हल्का पीला, गहरा क्रीमी, हरा, पालक की तरह हरा और गाढ़ा हरा पाया गया। पूरी तरह से रंगीन फलों को स्थानीय रूप से पसंद किया जाता है और उन्हें आडू आम तथा पेन्सिल आम कहा जाता है। इन प्रजातियों को चूसने के लिए पसंद किया जाता है। इनमें छिलका पतला, रस प्रचुर मात्रा, गृदा नरम और रेशेदार तथा ये फल अधिक कीमत पर बिकते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में कप्तान मोंटोगोमरी द्वारा होशियारपुर जिला गजेटियर में बताया गया है कि बडी संख्या में आम की किस्में इस क्षेत्र में उगाई गईं थीं। इनमें शामिल हैं, पंचपाया आमः बड़ा फल, पांच तोले का, जो कि एक पाउंड के बराबर था। खरबूजाः फल औसत आकार का, अंदरूनी रंग एक खरबूजे की तरह माना जाता है। कसुंबलाः छोटा फल, बाहरी रंग जैसे कुसुम के फूल की तरह)। बसंतियाः छोटे फल, गूदा पील पेड़ाः छोटा और बहुत मीठा, आकार और स्वाद पेड़ा मिठाई की तरह माना जाता है। दिहलूः बड़े फल, अंदर से दही जैसा और रेशेरहित। मरबलाः बड़ा फल, मीठा, गुठली छोटी और इसको मुरब्बा बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। पथरः फल का औसत आकार, वजन और छिलके की कठोरता पत्थर जैसी, लंबे समय तक खराब नहीं होता। ललेर: एक नारियल की तरह आकार, फल, बड़े और मीठे; भदौरियाः औसत आकार, भादो (सितंबर) के महीने में पकने वाला, अन्य आम खत्म होने के बाद। संदुरिआः औसत आकार और रंग लाल सिन्दूर की तरह। केसरीः बड़े फल, रंग केसर की तरह। केलाः लंबा फल केले की तरह, गुठली बड़े आकार की। मिश्रीः बड़े फल, सबसे मीठे मिश्री की तरह; जवैनियाः बड़े फल अजवाइन की तरह खुशबू वाले; शहातिआः बड़े फल, शहद की तरह मीठे। गोराः बड़े और भूरे रंग का जैसे साफ किए गए कपास के गुच्छे की तरह। उपरोक्त किस्में उच्चतम मूल्य प्राप्त करती हैं, विशेष रूप से भदौरिया बाजार में तब आता है, जब अन्य फल उपलब्ध नहीं होते हैं। अन्य किस्में जो कम प्रचलित थीं सरू: छोटा फल, बहुत जल्दी खराब होने वाला। हरड़ः छोटा सा हरड़ के फल की तरह; दोहकीः छोटा फल और स्वाद तारपीन से मिलता हुआ। सफेदाः फल छोटा और सफेद रंग का। राड़ाः आकार में छोटा और मीठा बहेड़ा के फल की तरह। खालाः औसत आकार और स्वाद में खट्टा; कालाः औसत आकार, गहरे रंग की त्वचा पकने के बाद भी। इलाइचीः छोटे फल, गुच्छों में लगने वाले और सुगंध इलायची की तरह। दुधियाः छोटे फल, अंदरूनी रंग सफेद दूध की तरह; छल्लीः मक्के की तरह लंबे फल। काकड़ाः बड़े लंबे फल, अज्ञात नाम से उत्पत्ति। पिछले कुछ वर्षों से आम के बाग अनुपजाऊ या कम फायदा होने की वजह से काटे गए और काटे जा रहे हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने आम की अच्छी पैदावार और गुणवत्ता वाली चूसने वाली 8 किस्मों जैसे-जीएन-1 से लेके जीएन-7 और गंगीआं सिंदूरी की बागवानी की सिफारिश की है। इन प्रजातियों के विशेष गुण इस तरह हैं गुरमेल दा अम्ब (जीएन-1) पेड़ बड़े, फैले हुए गुंबद के आकार का, एक वर्ष ज्यादा और दूसरे वर्ष कम फल देने वाला होता है। इसका फल मध्यम आकार का (5.57x4.67 सें.मी.). अंडाकार, बेसल साइनस उथला, पीठ वाला हस्सा थोड़ा उभरा हुआ। ढलानदार होता है। चोंच और सिरा तीखा, छिलका नरम, पकने के समय रंग हरा, गूदा संतरी रंग का व 55.4 प्रतिशत, रस पतला, मिठास 19 प्रतिशत और खटास 0.38 प्रतिशत गुठली छोटी, अंडाकार और रेशेदार होती है। फल जुलाई के दूसरे सप्ताह के दौरान पक जाता है। सिंदूरी समराली (जीएन-2) एक वर्ष ज्यादा और दूसरे वर्ष कम फल देने वाली किस्म। फल मध्यम से थोड़ा बड़ा (7.01 X 6.77 सें.मी.), औसत वजन 123.0 ग्राम, अंडाकार, बीच वाला हिस्सा थोड़ा उभरा हुआ, फल पीले रंग का परन्तु ऊपर से सिंदूरी ब्लश वाला। साइनस अनुपस्थित और देखने में बहुत आकर्षक, उच्च मिठास वाला 25 प्रतिशत गुठली छोटी, आयताकार और रेशेदार। फल जुलाई के मध्य में पककर तैयार होता है। कुकिआं दी छल्ली (जीएन-3) इसका वृक्ष बड़े आकार का और फैलावदार, लगभग प्रत्येक वर्ष फल देने वाला परंतु दूसरे वर्ष ज्यादा फल देने वाला होता है। जुलाई के दूसरे सप्ताह में पकने वाला। फल मध्यम आकार के (8.93 x 5.85 सें.मी.), आकार में अंडाकार, बेसल साइनस अनुपस्थित, चोंच सिरा नुकीला, छिलका मोटा और नरम होता है। फलों का रंग पालक हरा, खाने योग्य हिस्सा 51 प्रतिशत, गूदा पीला, रस पतला, मिठास 22 प्रतिशत और खटास 0.70 प्रतिशत होती है। गुठली मध्यम आकार की आयताकार और किनारों पर रेशेदार। बिजरोर दी बड (जीएन-4) पेड़ बड़े आकार का, टहनियां झुकी हुईं और प्रत्येक वर्ष फल देने वाली किस्म है। फल बड़े आकार के (9.98 X 5.51 सें.मी.) और वजन 187 ग्राम, गूदा 60.5 प्रतिशत, अंडाकार, प्रमुख उदर कंधे, बेसल साइनस गहरी, चोंच तीखी। फलों का रंग पीले हरे रंग काऔर जुलाई के तीसरे सप्ताह में तैयार हो जाते हैं। रस प्रचुर मात्रा में, थोड़ा गाढ़ा, मिठास 21 प्रतिशत और खटास 0.57 प्रतिशत होती है। गुठली बड़ी, आकार में आयताकार, औसत वजन 36.6 ग्राम और कम रेशेदार। हरियाणे दी कंघी (जीएन-5) पेड़ मध्यम आकार का और फैलावदार, एक वर्ष छोड़ के फल देने वाला, फल मध्यम आकार (7.47 x 6.21 सें.मी.), वजन 124.1 ग्राम, अंडाकार, बेसल साइनस उथला, चोंच नुकीली, पृष्ठीय कंधे टेढ़े और उदर प्रमुख, खाने योग्य भाग 58 प्रतिशत, छिलका पीला हरे रंग का, चमकीले लाल ब्लश के साथ, रस थोड़ा सा गाढ़ा, मिठास 22 प्रतिशत, गुठली मध्यम आकार की और रेशेरहित होती है। यह देर से पकने वाली किस्म है और अगस्त के प्रथम सप्ताह में पकती है। पंजाब ब्यूटी (जीएन-6) पेड़ छोटा, फैला हुआ और एक वर्ष छोड़ के फल देने वाला, फल बड़ा (208.0 ग्राम), अत्यधिक रंग वाला, गूदा 53.5 प्रतिशत, फल का आकार तिरछा, पृष्ठीय और उदर कंधे झुके हुए, पीछे की ओर मुड़ा हुआ, चोंच और साइनस प्रमुख। बेसल छोर पर लाल ब्लश के साथ रंग पीला, त्वचा ग्रंथियां प्रमुख, गूदा पीले रंग का, रसदार, मिठास 17 प्रतिशत और खटास 0.83 प्रतिशत, गुठली आयताकार, मध्यम और अत्यधिक रेशेदार होती है। यह किस्म जलाई के मध्य में पकती है। मलिया वाली छल्ली (जीएन-7) पेड मध्यम ऊंचाई का और प्रत्येक वर्ष औसत उपज देने वाला, फल का आकार मध्यम, औसत वजन 126 ग्राम, आकार में लंबा, बेसल साइनस और पृष्ठीय शोल्डर अनुपस्थित, वेंट्रल शोल्डर स्लोपिंग, साइनस उथला, शीर्ष गोल, छिलका नरम, गूदा नारंगी रंग का, प्रचुर मात्रा में रस, मिठास 19 प्रतिशत तथा खटास 0.40 प्रतिशत। गुठली बड़ी, आयताकार व रेशेदार और फल जुलाई के मध्य में पक जाते हैं। आम के पौधे लगाने का समय, विधि और देखरेख आम का पौधा वर्ष में दो बार लगाया जा सकता है। फरवरी-मार्च और अगस्त-सितंबर, पौधे लगाने के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है। आम को सामान्यतः 9x 9 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है,लेकिन चूसने वाली किस्मों के लिए 10x 10 मीटर की दूरी उपयुक्त होती है। लगाने के लिए गड्ढा (1x1x1 मीटर) लगभग एक महीने पहले तैयार कर लें। फर गड्ढे को ऊपर वाली मृदा को बराबर भागों में मिलाकर दोबारा जमीन से थोड़ा ऊंचा भर दें। प्रत्येक गड्ढे में 15 मि.ली. क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2 कि.ग्रा. मृदा में मिलाकर डालें। पौधा लगाने से कुछ दनों पहले गड्ढे में पानी देना चाहिए, नाकि मृदा अच्छी तरह से बैठ जाए। पौधों को गड्ढों के ठीक मध्य में प्लाटिंग बोर्ड की सहायता से उतनी ही ऊंचाई पर लगाएं जतना कि वह पौधशाला में था। पौधरोपण के बाद इसके आसपास की मृदा पैरों से दबा दें, ताकि पौधे की मृदा जड़ों के साथ ठीक से बैठ जाए। पौधा लगाने के बाद संचाई अवश्य करें। छोटे पौधों को सहारा देने के लिए इस तरह से स्टेक (डण्डे) लगाएं, ताकि जड़ों को क्षति न पहुंचे और उन्हें तने के साथ बांध दें। बहुत ज्यादा गर्मी और ठण्ड से बचाने के लिए पौधों को जरूर ढक देना चाहिए। नए लगाए पौधों का सर्वेक्षण लगातार करते रहें, ताकि पानी समय पर मिले और कीट एवं रोगों से चौधों को बचाया जा सके। आम के छोटे पौधों को पाले से बचाने के लिए घास या सरकण्डों के डंठल का छप्पर बनाएं। ध्यान रखें कि दक्षिण-पूर्व दिशा को खुला रखें, ताकि पौधों को धूप मिलती रहे। आम की नर्सरी को सर्दियों में कोहरे से बचाने के लए नायलॉन की छायादार जाली से ढक देना चाहिए। नए लगाए पौधों को खाद और पानी समय पर लगाएं और पौधों को स्वस्थ रखें। निवेदन लेखक बंधु फलफूल पत्रिका के लिए अपने लेख और संबंधित फोटो, कवरिंग लैटर के साथ सिर्फ ई-मेल पर ही भेजें। ध्यान रखें कि फोटो जेपीजे फॉर्मेट में और उच्च रेज्योल्यूशन की हों। लेख में अधिकतम 1200 शब्दों की संख्या रखने का प्रयास करें। इसके अतिरिक्त सुझाव और प्रतिक्रियाएं भी ई-मेल के माध्यम से भेज सकते हैं। भेजने के लिए कृपया कृतिदेव 010 टाइप फेस का प्रयोग करें। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, एम.एस. रंधावा फल खोज केंद्र, गंगीआं दसुआ, जिला होशियारपुर (नान)