आम की आधुनिक बागवानी आम अपनी सुगंध एवं गुणों के कारण लोगों में अधिक लोकप्रिय है। विश्व के अनेकों देशों में आम की व्यवसायिक बागवानी की जाती है। परन्तु यह फल जितना लोकप्रिय अपने देश में है उतना किसी और देश में नहीं। हमारे देश में पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर आम की बागवानी लगभग हर एक भाग में की जाती है। हालांकि, व्यावसायिक खेती उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और गुजरात के राज्य में किया जाता है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में आम का कुल क्षेत्रफल 2,460 हजार हेक्टेयर है जिससे 17,290 हजार मीट्रिक टन आम पैदा किया जाता है। जलवायु आम की खेती समुद्र तल से 1,500 मीटर की ऊँचाई तक की जा सकती है परन्तु व्यावसायिक दृष्टि से इसे 600 मीटर तक ही लगाने की सलाह दी जाती है। तापक्रम में उतार-चढ़ाव, वर्षा, आंधी आदि आम की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। आम 5.0 से 44.0 डिग्री सेंटीग्रेड वार्षिक तापमान वाले क्षेत्रों में अच्छा पनपता है परन्तु 23.6 से 26.6 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान इसके लिए आदर्श माना जाता है। उत्तर भारत में दिसम्बर, जनवरी के महीनों में तापमान में उतार-चढ़ाव के चलते फूल जल्द निकलने शुरू हो जाते हैं। ऐसी मंजरियों में नर पुष्पों के संख्या अधिक होती है तथा उनमें गुच्छा रोग होने की संभावना अधिक होती है। मंजरियों के निकलते समय वर्षा होने से अत्यधिक नुकसान होता है और बीमारियों एवं कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है। आम के छोटे पौधों पर पाले का प्रभाव अधिक होता है। मृदा दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6 से 7.5 और जिसमें अच्छी जल निकास की व्यवस्था हो सर्वोत्तम होती है। आम की जड़ें जमीन में गहराई तक फैलती हैं अत: पौधों के समुचित विकास हेतु लगभग २ से 2.5 मीटर गहरी मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है। क्षारीय तथा लवणीय भूमि आम के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है ऐसी भूमि में पत्तियों पर सूखेपन के लक्षण दिखाई पड़ते हैं और पौधों का विकास धीमी गति से होता है। सामान्य लवणीय भूमि (2-3 डी एम/एम) में लवण सहनशील मूलवृंतों जैसे कुरुक्क्न, ओल्यूर तथा 13-1 का प्रयोग कर आम की बागवानी की जा सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा आम की कई किस्मों का विकास किया गया है। सन 1971 में विकसित मल्लिका दक्षिण भारत में व्यावसायिक स्तर पर उगाई जा रही है साथ ही साथ सन 1979 में विकसित बौनी किस्म आम्रपाली पूरे देश में काफी प्रचलित है। पिछले दशक में संस्थान द्वारा विमोचित आम की किस्मों (पूसा अरुणिमा, पूसा सूर्या, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा लालिमा तथा पूसा पीताम्बर) की मांग भी निरंतर बढ़ती जा रही है। प्रमुख किस्में राज्य किस्में आंध्र प्रदेश बंगलौरा, बंगनपल्ली, स्वर्णरेखा, मलगोवा, बानेशान, हिमायुददीन। उत्तर प्रदेश दशहरी, लंगड़ा, चौसा, बाम्बे ग्रीन, गौरजीत, रतौल, जाफरानी, लखनऊ सफेदा, आम्रपाली। उत्तराखण्ड दशहरी, लंगड़ा, चौसा, आम्रपाली, फजली। तमिलनाडु बंगलोरा, बांगनपल्ली, रूमानी, नीलम। कर्नाटक अल्फान्सो, मल्लिका, नीलम, बंगलोरा, बांगनपल्ली, पथरी। बिहार बम्बईया, गुलाब ख़ास, मिठुआ, मालदा, किशन भोग, लंगड़ा, दशहरी, फजली, हिमसागर, चौसा, आम्रपाली। गुजरात अल्फान्सो, केसर, राजापुरी, जमादार। महाराष्ट्र अल्फान्सो, केसर, पियरी, मनकुर्द, मलगोवा। पश्चिम बंगाल हिमसागर, मालदा, फजली, किशनभोग, लखनभोग, रानी पसंद, बम्बई, आम्रपाली। उड़ीसा आम्रपाली, दशहरी, लंगड़ा, स्वर्णरेखा, नीलम। मल्लिका आम की यह किस्म नीलम तथा दशहरी के संकरण से विकसित की गई है। इसके पौधे मध्यम ओजस्वी तथा नियमित फलन देने वाले होते हैं। यह किस्म उत्तर भारत में उतनी प्रचलित नहीं है जितनी दक्षिण भारत में है। आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में इसकी व्यवसायिक खेती बढ़ रही है। फल मध्यम आकर (300-350 ग्राम) के तथा गूदा अधिक (74.8 प्रतिशत) होता है। यह किस्म प्रसंस्करण हेतु उपयुक्त पाई गई हैं। हमारे देश में एस किस्म के फलों का निर्यात अमेरिका तथा खाड़ी देशों में किया गया है। आम्रपाली यह किस्म, दशहरी एवं नीलम के संकरण से सन 1979 में विकसित की गई है। पौधे बौने तथा नियमित फलन देते हैं। उत्तर भारत में यह संकर किस्म अधिक बौनी होने के कारण सघन बागवानी हेतु अत्यंत उपयुक्त है। यह किस्म देर से पकती है। फल मध्यम आकार के, अधिक गूदेदार (74.8 प्रतिशत) तथा मिठास (22.8 प्रतिशत) से भरपूर होते हैं। एस किस्म में कैरोटीन की काफी अधिक मात्रा पाई जाती है। एस किस्म को प्रसंस्करण हेतु काफी उपयोगी पाया गया है। पूसा सूर्या इस किस्म का विकास आयातित किस्म एल्डन में से किया गया है। पूसा सूर्या घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार हेतु बहुत उपयुक्त है। यह प्रतिवर्ष फल देने वाली किस्म है जिसके पौधे मध्यम आकार के होते हैं। इसके फल देरी से पकते हैं तथा आकर्षक पीले रंग पर गुलाबी आभा लिए होते हैं। फल का आकार मध्यम (270 ग्राम), मिठासयुक्त (18.5 प्रतिशत कुल घुलनशील ठोस पदार्थ) तथा भंडारण क्षमता 8-10 दिनों तक होती है। पूसा अरुणिमा यह किस्म आम्रपाली एवं सेन्सेशन किस्मों के संकरण से विकसित की गई है। इसके पौधे मध्यम आकार के तथा नियमित फलन देने वाले होते हैं। यह किस्म देर से पकती है तथा तुड़ाई अगस्त के प्रथम सप्ताह में की जाती है। फल मध्यम आकार (250 ग्राम) त्तथा आकर्षक लाल रंग के होते हैं जिनमें मध्यम मिठास (19.5 प्रतिशत कुल घुलनशील पदार्थ) होता है। सामान्य दशा में लगभग 10-12 दिनों तक फल खराब नहीं होते एवं उनकी गुणवत्ता बनी रहती है। यह किस्म घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार हेतु उपयुक्त पाई गई है। पूसा प्रतिभा यह किस्म आम्रपाली व सेन्सेशन के संकरण से तैयार की गई है। इसके पौधे मध्यम ओजस्वी होते हैं, अत: इन्हें 6 मी. ग 6 मी. की दूरी पर लगाया जा सकता है। यह नियमित फलत देने वाली किस्म है और कलमी पौधे चौथे वर्ष से फल देना शुरू कर देते हैं। फलों के पीले सतह पफ लाल रंग की आभा होने के कारण इसके फल बहुत आकर्षक दिखते हैं। फल मध्यम आकार के (181 ग्राम) एवं आकर्षक लाल रंग के होते हैं, जिनमें अधिक गूदा (71.1 प्रतिशत), मध्यम मिठास (19.6 प्रतिशत) के साथ-साथ अच्छी सुगंध भी होती है। पकने के बाद लगभग 7 से 8 दिनों तक खराब नहीं होते है। यह किस्म घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजारों हेतु उपयुक्त है। पूसा श्रेष्ठ इस किस्म का विकास आम्रपाली व सेन्सेशन के संकरण से हुआ है। इसके पौधे मध्यम आकार के होते हैं, जिनको 6 मी. x 6 मी. की दूरी पर लगाया जा सकता है। फल आकर्षक लाल रंग के तथा आकार में लम्बोतर होते हैं। फल मध्यम आकार के (228 ग्राम) एवं आकर्षक लाल रंग के अधिक गूदा युक्त (71.9 प्रतिशत), मध्यम मिठास (20.3 प्रतिशत) के साथ-साथ अच्छी सुगंध वाले होते हैं। पकने के बाद फल 7 से 8 दिनों तक खराब नहीं होते। यह किस्म घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजारों हेतु उपयुक्त हैं। पूसा लालिमा यह किस्म दशहरी एवं सेन्सेशन के संकरण से तैयार की गई है। यह नियमित फलत देने वाली किस्म है जिसके पौधे मध्यम ओजस्वी होते हैं, अत: इन्हें 6 मी. x 6 मी. की दूरी पर लगाया जा सकता है। फल मध्यम आकार (209 ग्राम) के आकर्षक लाल रंग के होते हैं, जिनमें अधिक गूदा (70.1 प्रतिशत), मध्यम मिठास (19.7 प्रतिशत) के साथ-साथ अच्छी सुगंध भी होती है। पकने के बाद फल लगभग 5 से 6 दिनों तक खराब नहीं होते हैं। यह किस्म घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजारों हेतु उपयुक्त हैं। पूसा पीताम्बर पूसा पीताम्बर किस्म आम्रपाली व लाल सुन्दरी के संकर से तैयार की गई है। इसके पौधे मध्यम आकार के तथा नियमित फलत देते हैं। इस किस्म के पौधों पर गुच्छा रोग कम आता है। फल मध्यम आकार (213 ग्राम) के आकर्षक पीले रंग के रसयुक्त गूदा (73.6 प्रतिशत), मध्यम मिठास (18.8 प्रतिशत), के साथ-साथ अच्छी खुशबू वाले भी होते हैं। यह किस्म घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजारों हेतु उपयुक्त हैं। बाग़ स्थापना आम के बाग़ लगाने से पहले खेत को गहरा जोतकर समतल कर लेना चाहिए। इसके बाद जितनी दूरी पर पौधे लगाने है उतनी दूरी पर 1 मी. x 1 मी. x 1 मी. के गड्ढ़े मई-जून माह में खोद लेना चाहिए। गड्ढों से निकली मिट्टी में लगभग 50 किलो अच्छी किलो अच्छी तरह से सड़ी गोबर की खाद मिला देना चाहिए। इन गड्ढों को पौध लगाने के 20-25 दिन पूर्व गोबर मिली मिट्टी से भर दिया जाता है। दीमक की समस्या हो तो 100 ग्राम क्लोरपायरीफ़ॉस चूर्ण प्रति गड्ढ़े की दर से मिट्टी में मिला देना चाहिए। गड्ढ़े भरते समय मिट्टी को अच्छी तरह दबाते हैं और सतह से 15-20 सेमी. ऊपर तक भरते हैं। यदि गड्ढा भरने के बाद वर्षा न हो तो एक सिंचाई कर देते हैं जिससे गड्ढों की मिट्टी बैठ जाए। आम के पौधों को लगाने के लिए पूरे देश में वर्षा ऋतु सबसे उपयुक्त माना गया है क्योंकि इन दिनों वातावरण में पर्याप्त नमी होती है। ऐसे क्षेत्र जहां पर वर्षा अधिक होती है पौध लगाने का कार्य वर्षा के अंत में तथा जहां वर्षा कम होती है वहां वर्षाकाल के प्रारम्भ में रोपण कार्य करना चाहिए बाग़ लगाने के लिए पौधशाला से लाए जाने वाले पौधों को मिट्टी समेत चारों ओर से अच्छी तरह खोदकर निकालना चाहिए जिससे जड़ों को कम से कम नुक्सान पहुंचे। पौधों को पूर्व चिहिन्त गड्ढों के बीचों बीच पिण्डी के बराबर गड्ढा खोदकर उसमें रोपित कर देना तथा आसपास की मिट्टी को अच्छी तरह दबा देना चाहिए। पौध लगाने के बाद उसके चारों ओर सिंचाई के लिए थाली बना देना चाहिए। पोषण प्रबंधन पौध के लगाने के बाद पहले वर्ष में 100 ग्राम नत्रजन, 50 ग्राम फास्फोरस और 100 ग्राम पोटाश प्रति पेड़ के हिसाब से डालना चाहिए। प्रारम्भ के वर्षो में पेड़ों की बढ़वार तेजी से होती है इसलिए ऊपर दी गई पहले वर्ष की मात्रा उम्र के अनुसार हर वर्ष बढ़ाना चाहिए। एस तरह दस वर्ष का पेड़ होने पर 1000 ग्राम नत्रजन, 500 ग्राम फास्फोरस और 1000 ग्राम पोटाश प्रति पेड़ के हिसाब से देना चाहिए। दस वर्ष पर यह मात्रा स्थिर कर दी जाती है और बाद में हर वर्ष यही मात्रा पौधों को दी जाती है। ऐसी भूमि जिसमें क्लोराइड की मात्रा अधिक हो उनमें म्यूरेट ऑफ़ पोटाश उर्वरक का प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिए। इसके स्थान पर पोटेशियम सल्फेट उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। उत्तर भारत में गोबर की खाद तथा फास्फेट युक्त उर्वरकों को अक्टूबर तक अवश्य देना चाहिए। नत्रजन एवं पोटाशधारी उर्वरकों की आधी मात्रा अक्टूबर माह में और शेष आधी मात्रा फल तुड़ाई के बाद जून-जुलाई माह में देनी चाहिए। जस्ते की कमी को पूरा करने के लिए 2 प्रतिशत जिंक सल्फेट तथा 1 प्रतिशत बुझे हुए चूने के घोल का छिड़काव मार्च-अप्रैल, जून तथा सितम्बर माह में करना चाहिए। इसी प्रकार मैंगनीज की कमी की पूर्ति के लिए 0.5 प्रतिशत मैंगनीज सल्फेट का छिड़काव नई पत्तियों पर करना चाहिए। बोरान की पूर्ति के लिए सामान्य अवस्था में 250 से 500 ग्राम बोरेक्स प्रति पौधे की दर से प्रयोग करना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जहां बोरान की कमी के लक्षण अक्सर दिखाई पड़ते हों वहां 0.6 प्रतिशत बोरेक्स के घोल के तीन छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर अप्रैल-मई माह में करना चाहिए। जल प्रबंधन उत्तर भारत में फलदार वृक्षों की अक्टूबर से जनवरी तक सिंचाई नहीं करनी चाहिए। साथ ही साथ फूल आने के समय भी सिंचाई रोक देनी चाहिए और जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाए तब से लेकर फलों के परिपक्व होने तक निश्चित अंतराल पर सिंचाई करना अति आवश्यक होता है। उत्तर भारत में सर्दियों में पाला पड़ता है व गर्मियों में लू चलती है अत: गर्मियों में बाग़ की सिंचाई 7-10 दिन के अंतर पर और जाड़ों में 15-20 दिन के अंतर पर करनी चाहिए। आजकल टपक सिंचाई प्रणाली का प्रभाव अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। अंत:शस्यन आरम्भ के वर्षों में पौधों के बीच खाली स्थान में दूसरी फसलें उगाकर अतिरिक्त आमदनी ली जा सकती है। रबी के मौसम में मटर, मसूर, गोभी, धनिया, पालक और मैथी, खरीफ में उड़द, मूंग, लोबिया, मिर्च, अदरक, हल्दी और ज्वार तथा जायद में लोबिया, मिर्च, तोरई और भिण्डी आदि फसलें उगाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। रोग प्रबंधन खर्रा (चूर्णिल आसिता) रोग एस रोग में मंजरियों, पत्तियों एवं नए फलों पर सफेद चूर्णिल परत दिखाई पड़ती है। यह बहुत ही विनाशकारी रोग है जो कभी-कभी पूरी फसल को नष्ट कर देता है। रोग ग्रसित पत्तियों और गुम्मा ग्रसित मंजरियों की छंटाई से प्राथमिक रोग कारक की मात्रा को कम किया जा सकता है जिससे बाद में रासायनिक नियंत्रण अधिक फायदेमंद होता है। सबसे अधिक नुकसान मंजरियों पर इस रोग के प्रकोप से होता है। रोकथाम हेतु मंजरियों पर गंधक के महीने चूर्ण (200-300 मेश) का बुरकाव करना चाहिए। पहला बुरकाव फूल खिलने से पहले, तत्पश्चात दो सप्ताह के अंतर पर कम से कम दो बार और बुरकाव करना चाहिए। यह बुरकाव प्रात: काल, जब पत्तियों एवं टहनियों पर ओस की नमी मौजूद हो, करना फायदेमंद होता है। एक पेड़ के लिए लगभग 500 ग्राम गंधक की आवश्यकता पड़ती है। कवकनाशी दवाईयां जैसे डाइनोकैप (1 मिली. प्रति लीटर पानी) का पहला छिड़काव जनवरी-फरवरी में या फूल खिलते समय कर देना चाहिए। कुल 2-3 बार इस फफूंदनाशी का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। श्यामवर्ण (एंथ्रेकनोज) रोग के लक्षण काले रंग के गोल या अनिश्चित आकार के धब्बों के रूप में नई पत्तियाँ, टहनियाँ, फूलों व फलों पर नजर आते हैं। रोगग्रस्त ऊतक सूखकर गिर जाते हैं। श्यामवर्ण रोग के लक्षण मंजरी के मुख्य अक्ष एवं पार्श्व-शाखाओं पर छोटे व गहरे रंग के धब्बे के रूप में भी दिखाई पड़ते हैं। रोगी पुष्प मुरझाकर गिर जाते हैं। इसबीमारी से बचाव हेतु रोगी टहनियों की छंटाई कर देनी चाहिए। कवकनाशी दवाईयां जैसे कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) अथवा कॉपर आक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव जनवरी माह से जून-जुलाई तक करना चाहिए। पहला छिड़काव मंजरियों के आने के पहले और शेष फल लगने पर करना चाहिए। शुरू में दो छिड़काव में एक सप्ताह और बाद में 15 दिन का अंतर होना चाहिए। शीर्षारंभी क्षय (डाई बैक) इस रोग के मुख्य लक्षण विशेषत: पेड़ों की टहनियों एवं शाखाओं का झुलसना, उनकी सभी पत्तियों का गिर जाना तथा सम्पूर्ण पेड़ का झुलसा हुआ दिखना है। विशेषतौर पर वर्षा के बाद अक्टूबर-नवम्बर के महीनों में यह रोग स्पष्ट से दिखाई पड़ता है। रोगी स्थान से गोंद निकलता है। रोग का संक्रमण कलम बांधे हुए जोड़ों पर होने से नए पौधे मर जाते हैं। रोगी टहनियों की कटाई-छंटाई कर देनी चाहिए। टहनियों की छंटाई करते समय ध्यान रखें कि उन्हें लगभग 8 से 10 सेंमी. रोगी स्थान के नीचे से काटे। कटाई के बाद बोर्डो मिश्रण (5:5:50) या कॉपर आक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। काली आसिता (सूटी मोल्ड) यह रोग आम पर आक्रमण करने वाले कीटों जैसे आम का फुदका, गुजिया कीट द्वारा तथा शल्कीय कीट पेड़ों की पत्तियों और टहनियों पर मीठा स्राव उत्पन्न करने से होता हैं। एस स्राव पर काली फफूंद बड़ी तेजी से वृद्धि करता है। पत्तियों का हरा भाग ढक जाने के कारण प्रकाश संश्लेषण कार्य धीमा हो जाता है। कीटनाशी दवा जैसे कार्बेरिल (2 मिली. प्रति लीटर पानी) या क्लोरापायरीफ़ॉस (5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी) या डायमेथोएट (रोगर) (1 मिली. प्रति लिटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए। इसके बाद एक या दो छिड़काव कॉपर आक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) करना चाहिए। कीट प्रबंधन भुनगा कीट (मैंगो हॉपर) वयस्क तथा शिशु कीट कोमल प्ररोहों पत्तियों तथा पुष्पक्रमों का रस चूसते हैं। निरंतर रस चूसे जाने के कारण बौर कमजोर हो जाते हैं और छोटे और बड़े फल गिरने लगते हैं। इसके अतिरिक्त ये भुनगे मधु जैसा चिपचिपा पदार्थ भी निकालते हैं, जिसके फलस्वरूप पत्तियों, प्ररोहों और फलों पर काली फफूंदी उगने लगती है। भुनगों के नियंत्रण के लिए कार्बेरिल (2 मिली. प्रति लीटर पानी) का 15 दिन के अंतर से छिड़काव करना चाहिए। इस बात का ध्यान रहें कि फूल पूरे खिले होने के अवस्था में छिड़काव न किया जाए, अन्यथा परागण करने वाले कीट भी नष्ट हो जाएंगे। इन रसायनों का फफूंदनाशक दवाओं के साथ मिलाकर भी छिड़काव किया जा सकता है। गुजिया कीट (मिली बग) गुजिया कीट की मादा, अप्रैल-मई में पेड़ों से नीचे उतर कर भूमि की दरारों में प्रवेश कर अंडे देती है। अंडे भूमि में नवम्बर-दिसम्बर तक सुप्तावस्था में रहते हैं। छोटे-छोटे अवयस्क अण्डों से निकलकर दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में आम के पौधों पर चढ़ना प्रारम्भ कर देते हैं। अच्छी धूप निकलने के समय ये अधिक क्रियाशील होते हैं। बच्चे और वयस्क मादा कीट जनवरी से मई तक बौर व एनी कोमल भागों से रस चूसकर उनकों सूखा देते हैं। इस कीट के प्रकोप से बचाव हेतु खरपतवार को गुड़ाई करके नवम्बर-दिसम्बर माह में बागों से निकाल देने से अंडे नष्ट हो जाते हैं। दिसम्बर माह में बाग़ की जुताई करके वृक्ष के तने के आस पास क्लोरपाइरीफ़ॉस चूर्ण (1.5 प्रतिशत) 250 ग्राम प्रति वृक्ष के हिसाब से मिट्टी में मिला देने से अण्डों से निकालने वाले अवयस्क मर जाते हैं। साथ ही साथ पॉलीथीन के 25 सेंमी. पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर भूमि की सतह से 30-45 सेंमी. ऊँचाई गुजिया कीट को वृक्षों पर ऊपर चढ़ने से रोका जा सकता है। पट्टी के दोनों सिरे सुतली से बाँधने चाहिए। इसके बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले घेरे पर लगाने से इस कीट को पट्टी के नीचे से चढ़ने को रोका जा सकता है। अगर किसी कारणवश उपरोक्त विधि न अपनाई गई हो और गुजिया पेड़ पर चढ़ गई हो तो ऐसी अवस्था में मोनोक्रोटोफ़ॉस (5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी) अथवा डायमेथोएट (1.0 मिली. प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए। तना बेधक (शूट बोरर) इस कीट के गिडार पेड़ों के तनों में प्रविष्ट होकर उनके अंदर के भागों को खाकर नुकसान पहुँचाते हैं। गिडार तने में ऊपर की ओर सुरंग बनाकर बढ़ते जाते हैं। जिसके फलस्वरूप पौधों की शाखाएं सूख जाती हैं। कीट का अधिक प्रकोप होने से पेड़ मर भी सकता है। गिडार तने के अंदर प्यूपा में बदल जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित शाखाओं को गिडार तथा प्यूपे सहित काटकर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा छिद्रों को साफ़ कर उनमें कीटनाशी घोल डालकर छिद्रों को बंद कर इन कीटों का सफलतापूर्वक नियंत्रण किया जा सकता है। शूटगॉल यह कीट उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तरी बिहार और पश्चिम बंगाल के तराई वाले इलाकों में एक गंभीर समस्या है। एस कीट के शिशुओं द्वारा पत्तियों की कलिकाओं से रस चूसने के फलस्वरूप, उनका पत्तियों के रूप में विकास नहीं हो पाता, बल्कि यह नुकीले गांठ में परिवर्तित होकर अंत में सूख जाते हैं। इस कीट द्वारा निर्मित गांठें साधारणत: सितम्बर-अक्टूबर में देखे जा सकते हैं। कीट का सफलतापूर्वक नियंत्रण, मोनोक्रोटोफ़ॉस (5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी) अथवा क्वीनलफ़ॉस (5मिली. प्रति 10 लीटर पानी) का 15 दिनों के अंतराल पर 2 छिड़काव अगस्त के मध्य से करने से किया जा सकता है। काला सिरा (ब्लैक टिप) एस फल विकार को कोयली तथा चिमनी रोग के नामों से भी जाना जाता है। विकार के लक्षण अप्रैल-मई माह में जब फलों का आकार लगभग 1 सेंमी., का हो जाता है, तो दिखाई पड़ने लगते हैं। फल के सिरे पर काले धब्बे इस रोग के विशेष लक्षण हैं। यह विकार ईंट के भट्टों से निकलने वाले धुएं में विद्यमान जहरीली गैसों जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, एथिलीन तथा कार्बन मोनोऑक्साइड के कारण होता है। इससे बचाव हेतु ईंट एवं चूने को भट्टों को बागानों से कम से कम 1.0 से 1.5 किमी. दूर रखना चाहिए। कम से कम 15 मीटर ऊँची चिमनियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जहां तक संभव हो भट्टों में काम फल लगने के समय से पकने के समय अर्थात मार्च के प्रथम सप्ताह से मई के तीसरे सप्ताह तक बंद कर देना चाहिए। पेड़ों पर सुहागा 6-8 किग्रा. प्रति हजार लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। कुल तीन छिड़काव की आवश्यकता पड़ती है। पहला छिड़काव फूल आने के पूर्व, दूसरा छिड़काव फूल खिलते समय तथा तीसरा छिड़काव फल लगने के समय करना चाहिए। फलों की तुड़ाई एवं उपज फलों की परिपक्वता का अनुमान फलों के रंग को देखकर अथवा पानी में डुबोकर किया जा सकता है। यदि अधिकांश फल पानी में डूब जाए तो समझना चाहिए कि फल परिपक्व हो चुके हैं और तुड़ाई की जा सकती है। तुड़ाई के समय इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि फलों को किसी प्रकार की चोट न पहुंचे तथा फल डंठल (2-3 सेंमी.) सहित तोड़े जाएं। कलम से तैयार पौधे चौथे वर्ष से फल देना आरम्भ कर देते हैं। सामान्यत: दस वर्ष पुराने परम्परागत पद्धति में लगाए गए तथा वैज्ञानिक ढंग से देखरेख किए गए पौधों से 300-500 फल प्राप्त हो जाते हैं। श्रेणीकरण आम के फलों का श्रेणीकरण, उनकी किस्म, रंग, आकार एवं परिपक्वता के आधार पर करना आवश्यक होता है। बड़े आकार के फल छोटे फलों की अपेक्षा देर से पकते हैं तथा बड़े फलों की भंडारण क्षमता 2-3 दिन अधिक होती है। क्षतिग्रस्त, रोगग्रस्त एवं ठीक तरह से न पके फलों को छांट देना चाहिए। फलों की गुणवत्ता अधिक दिनों तक बनाएं रखने के लिए श्रेणीकरण एवं पेटीबंदी प्रक्रिया कोडेक्स के अनुसार की जानी चाहिए। फल भार के आधार पर आम के फलों का श्रेणीकरण नीचे दिया गया है। श्रेणी फल भार (ग्राम) ‘ए’ 200-350 ‘बी’ 351-550 ‘सी’ 551-800 आम की किस्मों का तुलनात्मक विवरण विवरण मल्लिका आम्रपाली पूसा सूर्या पूसा अरुणिमा पूसा प्रतिभा पूसा श्रेष्ठ पूसा लालिमा पूसा पीताम्बर फलत नियमित नियमित नियमित नियमित नियमित नियमित नियमित नियमित पौधे से पौधे की दूरी (मी.) 6-6 6-6 6-6 6-6 6-6 6-6 6-6 6-6 औसत फल भार (ग्राम) 300-350 150-200 270-300 250-275 180-200 200-230 200-230 200-220 गूदा प्रतिशत 71.5 72.5 70.5 70.5 71.0 72.0 70.0 72.5 कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 23.0 22.8 18.5 19.5 19.6 20.5 20.0 18.8 विटामिन ‘सी’ (मिग्रा./100 ग्राम गूदा) 37.8 35.0 40.2 39.3 34.9 40.3 34.7 39.8 कुल कैरोटिनायड पदार्थ (माइक्रोग्रा./ 100 ग्रा. गूदा) 10,392 16,830 - - 11,474 10,964 13,028 11,737 विशिष्ट गुण निर्यात की जा रही है उत्तर भारत में बौना आकर सघन बागवानी के लिए उपयुक्त सुनहरा पीला रंग निर्यात के लिए उपयुक्त भण्डार 8-10 दिन भंडारण पकने के बाद 8-10 दिन छिलका लाल रंग का निर्यात के लिए उपयुक्त पीले रंग पर लाल निर्यात के लिए उपयुक्त फल लाल रंग तथा लम्बोतर आकार निर्यात के लिए उपयुक्त उत्तर भारत में जल्द पकने वाली (जून का प्रथम पखवाड़ा), छिलका लाल रंग का निर्यात के लिए उपयुक्त गुच्छा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधित फल रसीले तथा पीले रंग के। स्त्रोत: कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार