निराई नियंत्रण अंगूर के बागों में निराई आमतौर मशीनों द्वारा की जाती है। पोषक तत्वों और नमी को अवशोषित करने के लिए फीडर रूटों हेतु बिना किसी मुकाबले के लगातार निराई अपेक्षित है। बैल से छूटा या ट्रैक्टर से खींचने वाले औजारों का इन्टरकलटीवेशन और निराई नियंत्रण के लिए प्रयोग किया जा सकता है, यदि बेलों के मध्य पर्याप्त स्थान दिया गया। है। अंगूर के बागों में जहां नजदीक वाली स्पेसिंग को अपनाया जाता है वहां हाथ की निराई या गाईन फोरकस से प्लाटों को खोदना और तीन महीने में निराई को उठाना एक आम बात है। मिट्टी को बदलने के लिए डिस्क हैरो से आवधिक खेती करना और गहरी परतो में पोषक तत्वों को देना आवश्यक है। काली मिट्टी के मामले में इस प्रथा से जड़ों को वातन सुविधा देने के लिए ऊपरी 8 सेंमी. मिट्टी को ढीला करने में मदद करती है। समस्याग्रस्त निराई जैसे Cyanodon dactylon और Cyperus rotundus को गहरा गड्डा खोदकर उनके डीप-सीटड रनरस को हटाकर हाथ से दूर किया जाता है। सूखने के बाद उजागर जड़ों को एकत्रित करके जलाया जाता है। क्योंकि हाथ वाली लेबर काफी मंहगी है, छंटाई के बाद निराई को नियंत्रित करने के लिए हरबीसाइडस का प्री-एमरजैन्स में प्रयोग करने जैसे Diuron, Simazine या atrazine @ 2 kg a./ha और Goal (Oxyfluorfen) @ 1 kg a.i/ha की सिफारिश की गई है। चार-छ: महीने की अवधि के लिए निराई को नियंत्रित करने में अमोनियम के 5g के साथ मिश्रित लाइफोसेट @ 10 मिलीग्राम / लीटर का पोस्ट-एमरजैन्स स्प्रे प्रभावी माना गया है। अंगूर की छंटाई एक बेल में किसी भी वनस्पति हिस्से को हटाया जाना छंटाई कहा जाता है। यह अंगूर की खेती करने में एक महत्वपूर्ण अभियान है। इसलिए एक बेल की छंटाई में ज्यादा देखभाल और परिशुद्धता की आवश्यकता होती है। अंगूर की बेलों की छंटाई करने का मुख्य उद्देश्य उत्पादकता को बढ़ाना, इन्टरकल्चर ऑपरेशनों को सरल बनाना, और अपेक्षित बेल आकार को बनाए रखना और निरंतर उत्पादकता हेतु बेल की जीवन शक्ति को बनाए रखना है। फ्रटिंग हेतु परिपक्व शूटस के आधे हैडिंग बैक द्वारा जनवरी-फरवरी के दौरान उत्तरी भारत में केवल एक बार आमतौर पर छंटाई की जाती है और शेष आधे की स्पर्स के नवीनीकरण हेतु छंटाई की जाती है जो अगले वर्ष में फूटिंग केनस में विकसित हो जाती है। महाराष्ट्र उत्तरी कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में कटाई के बाद तुरंत लगभग एक महीने के लिए बेलों को जबरदस्ती आराम की अवस्था में छोड़ दिया जाता है। यह बेलों के परिपक्व भागों में खाद्य सामग्री के भंडारण में मदद करता है। 1-2 कलियों को रखकर अप्रैल में केनों को पीछे से काटा जाता है जो 4-5 माह में केनों में विकसित हो जाती है। सूखी हुई केनों को भी हटा दिया जाता है। यहां इसे 'वापस छंटाई' या 'विकास' छंटाई कहा जाता है। सितम्बर-अक्तूबर के महीने में इन केनों की फलों के लिए छंटाई की जाती है। इस छंटाई को 'आगे की छंटाई' या सर्दियों की छंटाई कहा जाता है। वे बेलें जो एक वर्ष से अधिक की हो चुकी है, उनकी छंटाई की जा सकती है। फारवर्ड छंटाई का स्तर क्षेत्र, विविधता और बेल की ताक़त पर निर्भर करता है। आम तौर पर फारवर्ड छंटाई करने से लगभग 5 महीनों में बेलों से उपज आनी शुरू हो जाती है। तमिलनाडु में नवम्बर-दिसम्बर के दौरान मार्च-अप्रैल के दौरान काटी गई गर्मी की फसलों के लिए छंटाई की जाती है। जबकि मई-जून में छंटाई करने से अगस्त-सितम्बर के दौरान दूसरी फसल आ जाती है। दक्षिण इंटीरियर कर्नाटक में, फरवरी-मार्च के दौरान काटी गई गर्मी की फसलों के लिए अक्तूबर-नवम्बर के दौरान और जुलाई-अगस्त के दौरान काटी गई दूसरी फसल के लिए अप्रैल-मई के दौरान आगे की छंटाई की जाती है। अधिकतम उपज और फलों की अच्छी। क्वालिटी के लिए छंटाई के बाद एक बेल पर फल वाली कलियों की वांछित संख्या को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। बेलों (हल्की छंटाई) पर अधिकांश केनों को बनाए रखने से परिणामस्वस्प भारी फसल होती है, जबकि कम केनों के होने से हल्की फसल होती है। एक बेल की सभी केनों में एक जैसे फल नहीं आते हैं। ट्रंक के नजदीक होने की अपेक्षा जो केन ट्रंक से दूर होती है उनमें ज्यादा फल आते हैं। इसलिए बाद की अपेक्षा पहले ही हल्की छंटाई कर दी जाती है। शूट पिचिंग शूट पिचिंग छंटाई का एक हिस्सा है, मुख्यत: उपजाऊपन और वर्तमान मौसम विकास को बढ़ाने के लिए किया जाता है। जब मुख्य टहनी पर 7-8 पत्ते आ जाते है तो शूट पिचिंग की जाती है। पिचिंग के दौरान, परिपक्व शूट की टिप को केवल पांच नोडस को रोककर दबाया जाता है। परिणामस्वरूप, 1-2 लेटरल के साथ टर्मिनल कली का ग्रोथ शुरू हो जाता है। इन लेटरस को सब-केनस कहा जाता है। सब-केन के बेस से तीसरे नोड तक कलियों को निरपवाद रूप से उपयोगी होना पाया गया है, परिणामस्वरूप, उनमें 2-3 कलस्टर/केन आ जाते हैं। कली डॉर्मन्सी की समाप्ति सर्दियों के दौरान कम तापमान की अवस्था में बेलें निष्क्रिय हो जाती है। इसलिए इस निष्क्रियता को तोड़ना जरूरी है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में सामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत, छंटाई के बाद न्यूनतम तापमान सामान्यत: 10 डिग्री सेंटीग्रेड से पार हो जाता है और इसलिए कलियां निष्क्रिय नहीं हो पाती है। तथापि उत्तरी भारत में, छंटाई के बाद तापमान नीचे चला जाता है इसलिए कलियां वसन्त ऋतु आने तक निष्क्रिय ही रहती है। आरम्भिक बसन्त ऋतु में कलियों के देरी से फूटने से परिपक्वता में विलम्ब हो जाता है और बारिश की वजह से फसल बर्बाद हो जाती है। रसायनों जैसे हाइड्रोजन साइनामाइड @1.5% अथवा थियूरिया @ 4% के उपयोग से यूनिफार्म बड ब्रेक को प्राप्त किया जा सकता है। उष्णकटिबंधीय परिस्थितियों में छंटाई के 48 घंटे के भीतर कलियों के लिए ये रसायन दिये जाते हैं। एक टहनी पर केवल दो या तीन शिखर कलियां ही इन रसायनों से उपचारित होती है। जब ज्यादा कलियां उपचारित होती है। तो अधिकांश टहनियां उभर जाएगी जो प्रति गुच्छा पत्ती क्षेत्र को कम कर देगी और बेरी वृद्धि को प्रोत्साहित करेगी। विकास नियामकों का उपयोग विकास नियामकों का उपयोग न केवल बेलों की उत्पादकता को बढ़ाता है, बल्कि निर्यात के लिए उपयुक्त गुणवत्ता वाले अंगूरों की पैदावार में भी मदद करता है। प्रयोग होने वाले विकास प्रमोटरों और नियामकों का चयन निर्यात के मतलब हेतु अंगूरों में वांछित लक्षणों पर निर्भर करता है। विभिन्न विकास नियामकों और विकास प्रमोटरों का प्रभाव इस प्रकार से हैं:- औक्सिंस का प्रभाव विकास नियामकों संकेद्रण उपयोग करने का समय प्रभाव एनएए 20 पीपीएम 15-20 पीपीएम 20-25 पीपीएम बेरी निकलने पर स्प्रे शुगर फारमेशन स्टेज पर गुच्छों को डिबोना कटाई से पूर्व 10-15 दिन स्प्रे फूल व बेरी को गिरने से रोकना बेरी लस्टर में सुधार करना रास्ते में बेरी के गिरने को रोकना आईबीए 1000-1500 पीपीएम कलमों को डिबोना कलमों की जड़ो का विकास करना 4 सीपीए 10 पीपीएम पहला स्प्रे जब बेरी का साईज 3 एमएम डाइअ का हो । दूसरा स्प्रे जब बेरी का साईज 6 एमएम डाइअ का हो डंठल की मोटाई को बढ़ाना (स्त्रोत: एनआरसी ग्रपेस) जीए का प्रभाव संकेद्रण उपयोग करने की विधि उपयोग करने का समय प्रभाव 10 -15 पीपीएम छिड़काव फूल आने से पूर्व गुच्छे की स्टालक लम्बाई को बढ़ाता है। 20-25 पीपीएम 20-25 पीपीएम 20-25 पीपीएम छिड़काव बंच डिपिंग बंच डिपिंग बाद में 25 प्रतिशत कैपफॉल 50 प्रतिशत कैपफॉल 75 प्रतिशत कैपफॉल बेरियों की थिनिंग बेरियों की थिनिंग 35-40 पीपीएम बंच डिपिंग फल सैटिंग के बाद गुच्छों की थिनिंग 30-40 पीपीएम जीए + साइटोकिनन बंच डिपिंग बेरी का साईज 3-4 एमएम होने पर गुच्छे के आकार को बढ़ाता है। 30-40 पीपीएम जीए + साइटोकिनन बंच डिपिंग बेरी का साईज 6-7 एमएम होने पर गुच्छे के आकार को बढ़ाता है। (स्त्रोत: एनआरसी ग्रपेस) इथलीन का प्रभाव संकेद्रण उपयोग करने का समय प्रभाव 100 पीपीएम अप्रैल की छंटाई के दौरान कलियां आने के बाद 15 दिन शिखर वाली टहनी की ग्रोथ को कम करता है। 200 पीपीएम अप्रैल की छंटाई के दौरान 15-16 पत्तों के आने पर केन की मोटाई को बढ़ाता है। 1000-1500 पीपीएम अक्तूबर की छंटाई से पूर्व 3-4 दिन पत्तों के छडने को कम करता है। 250 पीपीएम वेरिसन स्टेज पर या शूगर फारमेशन स्टेज पर ब्रिकस प्रतिशत को बढ़ाता है। (स्त्रोत: एनआरसी ग्रपेस) साइटोकिन्नस का प्रभाव श्रेणी संकेद्रण उपयोग करने का समय प्रभाव 6 बीए 10 पीपीएम अप्रैल की छंटाई के बाद 15-16 पत्ता स्टेज कलियों में फल सेटिंग को बढ़ाता है। 10 पीपीएम अक्तूबर की छंटाई के बाद 30-40 पीपीएम सहित 3-4 एमएम की बेरी पर बेरी के साईज को बढ़ाता है। 10 पीपीएम अक्तूबर की छंटाई के बाद 30-40 पीपीएम सहित 6-7 एमएम की बेरी पर बेरी के साईज और आकार को बढ़ाता है। सीपीपीयू 2 पीपीएम जीए डिपिंग के साथ 3-4 एमएम की बेरी पर पहली बार लगाना स्टालक की मोटाई और बेरी के साईज को बढ़ाता है, गोल बेरी आकार को प्रोमोट करता है। और बेरियों के हरे रंग को बनाए रखता है। 6-7 एमएम की बेरी पर दूसरी बार लगाना (स्त्रोत: एनआरसी ग्रपेस) स्रोत: भारत सरकार का राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड अंगूर: इन्टरकल्चरल ऑपरेशन्स