अंगूर (विटिस विनिफेरा) समशीतोष्ण से गर्म क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसल है। हालांकि, गर्म और शुष्क जलवायु इसके लिए आदर्श है। भारतीय अंगूर विभिन्न विशेषताओं अर्थात रंगीन, सफेद, बीजयुक्त, बीजरहित बड़े तथा छोटे दानों में आते हैं। अंगूर समुद्रतल से लगभग 250 ऊंचाई से ऊपर सफलतापूर्वक उगाए जाते हैं। देश में अंगूर की 20 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है। हालांकि, केवल एक दर्जन किस्में व्यावसायिक रूप से उगाई जाती हैं। प्रमुख अंगूर उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश शामिल हैं। देश में महाराष्ट्र कुल उत्पादन और उच्चतम उत्पादकता (81.22 प्रतिशत) के साथ उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है। देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती लगभग छह दशकों से की जा रही है। आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप में इसकी खेती काफी उन्नति पर है। उचित कटाई-छंटाई की तकनीक का उपयोग करते हुए मूलवृंतों के प्रयोग से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अंगूर की खेती की व्यापक संभावनाएं उजागर हुई हैं। प्रस्तुत लेख में अंगूर की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों और उनके प्रबंधन के बारे में जानकारी दी जा रही है। अंगूर की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों का विवरण निम्न है। पाउडरी मिल्ड्यू लक्षण यह रोग अन्सीनला नेक्टर द्वारा फैलता है। यह अंगूरों की पत्तियों, तनों तथा फलों को प्रभावित करता है। छोटी पत्तियों की दोनों सतहों पर सफेद रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। ये धब्बे पत्ती पर आकार में वृद्धि करते हैं तथा पत्ती की सतह पर फैल जाते हैं। पत्ती की सतह पर विशेष प्रकार का सफेद पाउडर जैसा आवरण होता है। रोग के अधिक फैलने पर पत्तियों का रंग धूसर सफेद दिखाई देने लगता है, जिससे पत्तियां बौनी, ऐंठी हुई तथाकरूप दिखाई देने लगती हैं। संक्रमित तने धूसर होकर गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। रोगग्रस्त अंगूर पूनिंग के समय संक्रमण के कारण पुष्प के भागों पर धूसर सफेद चूर्णिल वृद्धि दिखाई देती है। इससे पुष्प झड़ जाते हैं। रोग की उग्रता के फलस्वरूप सम्पूर्ण पुष्पण क्रम रंगहीन तथा बांझ दिखाई देने लगता है। रोग से प्रभावित अंगूर कुरूप तथा अनियमित आकार के हो जाते हैं और छिलके पर धूसर से गहरे भूरे धब्बे बन जाते हैं। प्रायः फलों के छिलके फट जाते हैं तथा अंदर का गूदा बाहर से दिखाई देने लगता है। रोगग्रस्त शिशु फलों की वृद्धि रुक जाती है। रोगाणु पोषक ऊतकों पर आक्रमण कर उसकी एपीडर्मल कोशिकाओं में चूषकांगों को प्रविष्ट करवाता है। ये कवक पोषक की सतह पर फैल जाते हैं। सफेद पाउडरी वृद्धि का कवक, जाल में से कोनिडियोफोर्स तथा कोनीडिया उत्पन्न करता है। रोग नियंत्रण रोग नियंत्रण के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं अंगूर की बेलों पर सल्फर डस्टिंग करनी चाहिए।प्रथम डस्टिंग 2 सप्ताह वाले नए प्ररोहों पर करनी चाहिए। द्वितीय डस्टिंग पुष्पण से पूर्व तथा तृतीय डस्टिंग अधपके फलों के बन जाने के बाद करनी चाहिए। समय-समय पर अन्य संक्रमण रोकने के लिए बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। लताओं को उपयुक्त वायु एवं प्रकाश मिलते रहने के लिए विकसित प्ररोहों को काटते रहना चाहिए। पत्तियों के झड़ जाने के बाद पूनिंग करनी चाहिए। रोगग्रस्त भागों को पौधों से अलग करके जला देना चाहिए। रोग नियंत्रण के लिए थायोफैनेट मेथिल या टॉप्सिन-एम का मिश्रण छिड़कना उपयोगी रहता है।कैप्टॉन, बिन्क्लोजोलिन + थीरम का 10 से 15 दिनों के अंतर पर प्रयोग करना चाहिए। ग्रेपवाइन फैनलीफ रोग लक्षण इस रोग के विषाणु के अनेक स्ट्रेन्स ने होते हैं और ये विभिन्न प्रकार के लक्षणों को ने उत्पन्न करते हैं। इनसे बहुत अधिक हानि ना होती है। विषाणु स्ट्रेन के अनुसार संक्रमित १. पत्तियां हरे या पीले मोजेक घेरे तथा फ्लैक्स रोग से प्रभावित अंगूर प्रदर्शित करती हैं। अन्य किस्मों में पत्तियां छोटी तथा अनियमित होती हैं। कई किस्मों में शिराएं असामान्य रूप से फैल जाती हैं, जिससे पत्ती की आकृति फैनलाइक हो जाती है। पत्तियों में क्रोम पीला कर्बुरण दिखाई देने लगता है। कर्बुरण क्षेत्र पीला हो जाता है तथा ऊतकक्षयी होकर अंत में पत्तियां गिर जाती हैं। तनों की सन्धियों की लंबाई असमान हो जाती हैं तथा दोहरी पर्व सन्धियां बन जाती हैं। पत्तियां चपटी तथा तने, छाल तथा काष्ठ पिटिंग दिखाई देने लगते हैं। फल बहुत कम बनते हैं। गुच्छों में से अधिकांश पुष्प झड़ जाते हैं। छोटे बीजरहित भारी फल अन्य फलों के साथ बनते हैं। अंगूर की लताएं बहुत कम विकसित होकर मर जाती हैं। ग्रेपवाइन फैनलीफ वायरस एक नीपो वायरस होता है। इसका व्यास 30 मि.मी. होता है। यह विषाणु कलिकायन ग्रॉफ्टिंग कटिंग तथा निमेटोड द्वारा संचरित होता है। निचला फफूंदी रोग रोग वाहकः प्लास्मोपारा विटिकोला लक्षण अंगूर के सभी हरे हिस्से अतिसंवेदनशील होते हैं। प्लास्मोपारा विटिकोला की वजह से अंगूर में डाउनी फफूंदी के पहले लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 5 से 7 दिनों के बाद पत्तियों पर दिखाई देते हैं। फोलियर लक्षण एक ऑयली उपस्थिति के साथ पीले गोलाकार धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं। प्रौढ़ पत्तियों पर तेल के टुकड़े एक भूरे-पीले प्रभामंडल से घिरे दिखते हैं। यह प्रभामंडल तेलपॉट के रूप में परिपक्व होता है। धब्बे, सफेद अंगूर की किस्मों में पीले और कुछ लाल अंगूर की किस्मों में लाल होते हैं। (जैसे-रूबी रेड)। पत्तियों पर रोग के लक्षण मौसम की स्थिति के तहत, बड़ी संख्या में ऑयल स्पॉट विकसित हो सकते हैं। पत्ती की अधिकांश सतह को कवर करने के लिए ये मोटे हो सकते हैं। उपयुक्त रूप से गर्म, नम रातों के बाद, पत्तियों और अन्य संक्रमित पौधों के हिस्सों के नीचे एक सफेद फफूंद वृद्धि (स्पोरंजिया) दिखाई देती है। इस निचती वृद्धि की उपस्थिति से रोग का नाम 'डाउनी मिल्ड्यू हो जाता है। रोग नियंत्रण गिरी हुई पत्तियों और टहनियों को इकट्ठा करके जलाएं चित माध्यम द्वारा हवा के संचलन के लिए बेल को जमीन से ऊपर रखा जाना चाहिए एम्बर क्वीन, कार्डिनल, चंपा, चैंपियन, डॉग्रिज और रेड सफलताना जैसी प्रतिरोधी किस्में उगाएं इस रोग को प्रभावी रूप से 1 प्रतिशत बी.एम. या फॉसेटिल-एल 0.2 प्रतिशत या धातुक्षय + मैंकोजेब 0.3 से 0.4 प्रतिशत या एजोक्सिस्ट्रोबिन या डेमीथरोफ के साथ 3-5 रोगनिरोधी स्प्रे देकर प्रभावी रूप से नियंत्रण किया जा सकता है। पियर्स रोग लक्षण इस रोग में अंगूर की हरी पत्तियों पर सूखने जैसे झुलसने के लक्षण दिखाई देते हैं, किन्तु पत्तियों के किनारे हरे बने रहते हैं। झुलसे क्षेत्र पत्ती के मध्य में अधिक विकसित होते हैं और बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं। अंत में पत्तियां झड़ जाती हैं, किन्तु उनके वृन्त तने पर लगे रहते हैं। पत्तियों के लक्षणों सहित अंगूरों के गुच्छों की वृद्धि रुक जाती | है तथा ये ग्लानि प्रदर्शित करके सूख जाते हैं। रोगग्रस्त तने अनियमित रूप से परिपक्व होते हैं तथा कार्टेक्स में भूरी छाल बनने लगती है। रोगग्रस्त पत्ते आने वाले मौसम में रोगग्रस्त पौधों में बसन्त वद्धि देर से होती है। पौधे बौने तथा प्रथम कुछ पत्तियों में शिरा बेण्डिग पाया पाए जाते हैं। बाद के मौसम में पत्तियों तथा फल पहले वाले लक्षण प्रदर्शित होते हैं। मूल तन्त्र में डाइबैक हो जाने के फलस्वरूप शीर्ष की वृद्धि मन्द हो जाती है। मौसम के प्रारंभ में लताओं के काष्ठ के सभी आन्तरिक भागों में पीली से भूरी धारियां दिखाई देती हैं, जो अरीय होती हैं। काष्ठ के जाइलम में गोंद बनने लगता है तथा अन्य जाइलम में टायलोसिस होने लगती है। इन दोनों क्रियाओं से जाइलम बेसिल्स अवरूद्ध हो जाते हैं और इससे रोगग्रस्त पौधों पर बाह्य लक्षण दिखाई देने लगते हैं। रोग वाहक जायलैला फेस्टीडियोसा, जो कुर्चीयुक्त जाइलमरोधक जीवाणु कहलाता है। रोग नियंत्रण प्रतिरोधी किस्मों को ही बोना चाहिए। व्यावसायिक स्तर पर अंगूर में इस रोग का नियंत्रण करना बहुत कठिन है। संक्रमित पौधे के आधार को ड्रेन्च उपचार देना चाहिए अर्थात 50 से 100 प्रतिशत टेट्रासाइक्लिन घोल की 4 लीटर मात्रा द्वारा सप्ताह में एक या दो बार अंगूर की बेलों को उपचारित करना चाहिए। कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, क्यूप्रिक हाइड्रोटॉक्साइड का छिड़काव करना चाहिए। बेनोमाइल 50 प्रतिशत का 10 से 14 दिनों के अंतर से छिड़काव करना चाहिए। कैप्टॉफॉल 80 प्रतिशत को 2 कि.ग्रा./हैक्टर तथा 10 से 14 दिनों के अंतर से मैंकोजेब 75 प्रतिशत को 2 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से छिड़कना चाहिए। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), देवी लाल धाकड़-शोध छात्र, सस्य विज्ञान विभाग, शिवम मौर्य-शोध छात्र, पादप रोग विज्ञान विभाग, गोवर्धन लाल कुम्हार-शोध छात्र, आनुवंशिकी और पादप प्रजनन, श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर (राजस्थान)।