परिचय काजू का मूलस्थान ब्राजील है, जहाँ से 16वीं सदी के उत्तरार्ध में उसे वनीकरण और मृदा संरक्षण केप्रयोजन से भारत लाया गया, मृदाक्षरण को रोकने वाला यह पौधा आज की तारीख में चाय और कॉफ़ी के बाद अधिकतम विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाली फसल है, सूखे मेवों में काजू का महत्वपूर्ण स्थान है, सभी प्रकार के उत्सवों और समारोहों में, खास तौर पर पश्चिमी देशों में स्नैक्स में काजू का होना लगभग अनिवार्य होता है। काजू की खेती का दायरा और इसका राष्ट्रीय महत्व देश के पश्चिमी और पूर्वी समुद्र तट के आप-पास के आठ राज्यों में काजू की व्यवसायिक स्तर पर खेती की जाती है- आन्ध्रप्रदेश, गोवा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओड़िशा, तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल, इनेक अलावा, असम, छतीसगढ़, गुजरात, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा के कुछ इलाकों में भी काजू की खेती की जाती है, भारत में 9.53 लाख हेक्टेयर क्षेत्र (2010-11) में काजू की खेती होती है और अनुमानत: 6.74 लाख टन कच्चे काजू का सालाना उत्पादन होता है, वियतनाम और नाइजीरिया के बाद भारत काजू का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है और सबसे बड़े क्षेत्र में काजू की खेती करने वाला सबसे बड़ा प्रोसेसर भी। भारत का काजू उत्पादन पूरे विश्व के काजू उत्पादन का 23% है। बहुत बड़ी संख्या में लघु एवं सीमांत किसान, विशेष रूप से समुद्रतटीय इलाके में रहने वाले किसान अपनी आजीविका का लिए काजू की खेती पर निर्भर है। लगभग 2 लाख कामगार जिनमें से 90% से अधिक महिलाएं हैं, काजू की फैक्टरियों में काम करती है। ये फैक्टरियां ज्यादातर केरल, आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में है। ऐसा अनुमान है कि काजू की खेती, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से लगभग 20 लाख लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। काजू के खेती लघु और सीमांत जोतों में की जाती है और काजू की खेती का 70% से अधिक क्षेत्र इसी प्रकार का है, इसलिए यह स्पष्ट है कि लघु और सीमांत किसानों के विकास में काजू की अहम भूमिका है। काजू की खेती के लिए तकनीकी अपेक्षाएं मृदा आम धारणा यह है कि काजू की खेती के लिए बहुत अच्छी मिट्टी होना आवश्यक नहीं है और यह अलग-अलग मृदाजन्य स्थितियों में अनुरूप अपने को ढाल लेता है और इसका उत्पादन पर कोई विपरीत असर नहीं होता, लेकिन सच्चाई यह है कि भले ही काजू की खेती कमजोर मिट्टी में हो जाएगी लेकिन बेहतर मिट्टी में फसल निश्चय ही बेहतर होगी। काजू के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी वह होगी जो गहरी हो जहाँ जलजमाव न हो, जो बलुआ दोमट किस्म की हो और मिट्टी के नीचे कठोर सतह न हो, शुद्ध बलुआ मिट्टी में भी काजू पैदा होगा लेकिन ऐसी मिट्टी में खनिजों की कमी आशंका होती है। काजू की खेती के लिए ऐसी मिट्टी उपयुक्त नहीं होती, जो भारी किस्म की हो और जिसमें जलनिकास की अच्छी व्यवस्था न हो, 8.0 से अधिक पीएच वाली मिट्टी भी काजू की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। काजू के फसल अत्यधिक क्षारीय या अत्यधिक लवणीय मिट्टी में नहीं बढ़ती, लाल बलुआ दुम्मट, लैटराइट तथा तटीय रेतीली मिट्टी भी, जिसका पीएच हल्का अम्लीय हो, काजू की खेती के लिए सर्वोत्तम होती है। जलवायु काजू उष्णकटिबंधीय पौधा है और उच्च तापमान में उग सकता है। नये पौधे अत्यधिक शीत नहीं सह पाते। काजू की खेती औसत समुद्र तल से 700 मीटर तक की ऊँचाई तक की जा सकती है, जहाँ लम्बी अवधि के लिए तापमान 20 डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे नहीं जाता। काजू की खेती के लिए ऐसे क्षेत्र आदर्श हैं, जहाँ तापमान 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तक होता है, और सलाना वर्षा 1000 से 2000 मिमी तक होती है। फूल लगने और फल लगने के बीच 36 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान होने पर पौधे पर फल नहीं आते, और आएं भी तो टिक नहीं पाते। पूरे साल होने वाली वर्षा काजू के लिए अच्छी नहीं होती, हालाँकि पौधे बढ़ सकते हैं और कभी कभी फल भी आ सकते हैं। काजू की अच्छी उपज के लिए जरूरी है कि साल कम से कम 4 महीने की निश्चित अवधि में मौसम सूखा रहे। अगर फूल लगने की अवधि में भारी वर्षा जो और नमी ज्यादा रहे तो फूल और फल झड़ जाते हैं और फफूँदजन्य रोगों का खतरा बढ़ जाता है। काजू की किस्में काजू की फसल में सुधार के लिए किए गए अनुसंधानों से ऐसी रोपण सामग्री का पाता चल पाया हैजिससे काजू के एक पेड़ से 20 से 25 किग्रा तक काजू का उत्पादन संभव है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के विभिन्न केंद्रों में समन्वय से कई उन्नत किस्में जारी की गई हैं। सम्बन्धित केन्द्रों द्वारा जारी की गई किस्मों की संख्या बढ़ाने और उनके वितरण के लिए सभी कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों में बड वुड बैंक स्थापित किए गए है। तालिका 1 में विभिन्न राज्यों के लिए उपयुक्त किस्मों का विवरण दिया गया है। तालिका 1 राज्य किस्म आन्ध्र प्रदेश बीपीपी 4, बीपीपी 6, बीपीपी 8 कर्नाटक चिंतामणि 1, चिंतामणि 2, धना (एच-1608), एनआरसीसी सेलेक्शन 2, भास्कर, उल्लाल 1, उल्लाल 3, उल्लाल 4, यूएन 50, वंगूर्ला 4, वेंगूर्ला 7 केरल धना, के 22-1, मडक्कतरा 1, मडक्कतरा 2, कनका, अमृता, प्रियंका मध्य प्रदेश टी नं. 40, वेंगुर्ला 4 महाराष्ट्र वेंगुर्ला 1, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 6, वेंगुर्ला 7 गोवा गोवा 1, गोवा 2, वेंगुर्ला1, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 6, वेंगुर्ला 7 ओड़िशा भुनेश्वर 1, बीपीपी और धना तमिलनाडू वीआरआई 1, वीआरआई 2 प.बंगाल झारग्राम 1, बीपीपी पौधा रोपने की सामग्री काजू संकर परागणवाली फसल है और बीज से पैदा हुए पौधों की काजू की गिरी, एप्पल और उत्पादकता में बहुत विविधता होती है और इसीलिए काजू में एकरूपता लाने के लिए वनस्पतिक प्रसार की वकालत की जाती है। एअरलेअरिंग की पद्धति काफी सफल रही है, लेकिन ऐसे पौधों की जीवित रहने की दर काफी कम है। कलमी या बीज से उत्पन्न पौधे की अपेक्षा ये सूखे से अधिक दुष्प्रभावित होते है और उनकी जीवनकाल भी अपेक्षाकृत कम होता है। जिन इलाकों में तूफ़ान ज्यादा आता है उनमें ऐसे पौधों के गिरने की संभावना ज्यादा होती है एपिकोटिल ग्राफ्टिंग और सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग ज्यादा सफल हुए हैं क्योंकी इन पद्धतियों से कम समय में ज्यादा संख्या में कलमें तैयार की जा सकती है। काजू के पौधे की बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए भारतीय कृषि अनूसंधान परिषद ने काजू अनुसंधान परिषद ने काजू अनुसंधान निदेशकों, अपने उपकेंद्रों, कृषि विश्वविद्यालय और राज्य के बागवानी/कृषि विभागों के माध्यम से मानक तकनीकों के जरिये अत्यधिक संख्या में पौधे तैयार करने पर काफी बल दिया है। यह अधिकांश राज्यों में आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद गतिविधि है। नर्सरी में पौधे तैयार करने में 1 वर्ष से कम समय लगता है। किसान नर्सरी के लिए पौधे खरीद सकते हैं लेकिन अधिकृत और प्रमाणित नर्सरी से ही खरीद की जानी चाहिए पौधों की आपूर्तिकर्ताओं के पास इस तरह की जानकारी रहनी चाहिए कि पौधा कितने समय का है, किस किस्म का है, किस प्रकन्द (रूट स्टॉक) का प्रयोग किया गया है आदि, और इन सूचनाओं का उल्लेख बिल या कैश मेमो में किया जाना चाहिए। जमीन तैयार करना अगर कृषि भूमि जमीन को अच्छी तरह जोत कर उनको बराबर कर देना चाहिए,जंगली इलाके में जंगल को साफ कर जैव कचड़े को पूरी तरह जला देना चाहिए। इसके बाद जमीन को सीढ़ीदार आकार देना चाहिए या, अगर जमीन बहुत अधिक तिरछी हो तो मेड़ें बनाई जानी चाहिए। नमी को बनाए रखने के लिए पूरे कंटूर में ट्रेंच खोदे जाने चाहिए। जमीन को तैयार करने में जमीन के आकार–प्रकार के हिसाब से अलग-अलग लागत आएगी। आजकल जमीन को ठीक करने के लिए जेसीबी का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय हो गया है इसलिए इस मॉडल में इस लागत को भी शामिल किया गया है। मानसून के पहले यानी मई-जून में जमीन को ठीक करने का काम पूरा कर लिया जाना चाहिए। पौधों के बीच दूरी काजू के पौधे वर्गाकार डिजाइन में 7 से 9 मीटर की दूरी पर लगाए जाते हैं। 7.5 मीटर की दूरी पर लगाने से प्रति हेक्टेयर 175 पेड़ लगाए जा सकते हैं। जबकि, 8 मीटर की दूरी पर पौधे लगाने से प्रति हेक्टेयर 156 पेड़ आते हैं। काजू की खेती के लिए इतनी दूरी बेहतर होती है। ऐसा भी किया जा सकता है कि शुरू में 4 मीटर की दूरी पर पौधे लगाए जाएँ (प्रति हेक्टेयर 625 पौधे) और दसवें साल धीरे- धीरे अच्छे पौधों को 8 मीटर की दूरी मिल जाए। इस पद्धति से शुरू के सालों में अधिक उपज मिलती है। अधिक ढलान वाली जमीन में त्रिकोणीय डिजाइन में पौधे लगाना बेहतर है। अधिक ढलान जमीन में त्रिकोणाकार डिजाइन में पौधो लगाना बेहतर है। इससे पौधों की संख्या 15 प्रतिशत बढ़ जाती है और पेड़ों की वृद्धि और विकास प्रभावित नहीं होता। अगर जमीन ऊँची–नीची हो तो कंटूर के किनारे-किनारे पेड़ लगाए जाने चाहिए और जगह–जगह थाले और गड्ढे बनाए जाने चाहिए जिससे मिट्टी का कटाव नहीं होता और नमी बनी रहे। गड्ढों की खुदाई और भराई गड्ढों की खुदाई का काम काफी पहले यानी मई- जून तक पूरा हो जाना चाहिए। काजू के पौधे 60 सेंमी लम्बे। 60 सेंमी चौड़े और 60 सेंमी गहरे पिटों में सामान्य स्तर पर रोपे जाते हैं। कठोर लैटराइट मिट्टी में एक मीटर लम्बाई वाले गड्ढे बनाने उचित हैं। मृदा और इसके ठीक नीचे की मृदा और उसके ठीक नीचे की मृदा को अलग-अलग रखा जाता है ताकि दोनों को धूप मिल सके। इससे दीमकों और चींटियों को हटाने में मदद मिलती हैं। जंगल के कूड़े–करकट को पौधे लगाने से पहले गड्ढे में जला देना बेहतर होता है। इसके बाद पूरी मृदा को 5 किग्रा. खेतड़ खाद या कंपोस्ट या 2 किग्रा. पोल्ट्री खाद या 200 ग्राम रॉक फॉस्फेट मिलाकर भर देते हैं। मृदाजन्य रोग से बचाने के लिए हर गड्ढे में मिट्टी के साथ 100 ग्राम बीएचसी मिलाते हैं। पौधा लगाना मानसून शुरु होते ही अच्छी गुणवत्ता वाले मूल पौधों से तैयार किए गए कलमी पौधों को रोपा जाता है।पौधों की मृत्युदर को कम करने और उनके लग जाने के लिए यह अनिवार्य है कि उनको स्थानीय स्तर पर उपलब्ध लकड़ी के डंडों का सहारा दिया जाए और आवश्यकतानुसार उन पर अस्थायी छत लगाई जाए (जंगल में पौधे लगाने के मामले में, विशेष रूप से दक्षिण–पश्चिम क्षेत्रों में)। यदि मानसून में वर्षा पर्याप्त न हो तो पौधे जड़ जमाने के लिए एक दो बार बाल्टी से पानी दिया जा सकता है। पौधे के आसपास आर्द्रता को बनाये रखने का इंतजाम काजू के पौधे प्राय: बंजर भूमि पर लगाये जाते है इसलिए आर्द्रता की कमी बनी रहती है। इसलिए जरूरी है आर्द्रता को बचाये रखने के लिए जमीन की काली पॉलीथीन से ढका जाए, इसके अलावा अगर स्थानीय रूप से उपलब्ध हो तो जड़ के पास हरी या सूखी घास या खरपतवार डाला जा सकता है। आर्द्रता की सुरक्षा के लिए पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े भी बेसिन में डाले जा सकते हैं। प्लास्टिक या पत्थर के उपयोग से मृदा की गुणवत्ता तो नहीं बढ़ेगी लेकिन मृदा में आर्द्रता बनी रहेगी और मिट्टी के माध्यम से आनेवाले कीड़े मकोड़ों से पौधा सुरक्षित रहेगा। खेतड़ खाद और उर्वरक हमारे देश में काजू की खेती में खाद व उर्वरकों का प्रयोग बहुत ही सीमित है। अच्छी उपज के लिए मृदा में एनपी का पर्याप्त अनुपात होना चाहिए। मृदा में जैव पदार्थ की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करने के लिए पौधा 10 से 15 कि.ग्राम खाद की आवश्यकता होती है। प्रौढ़ काजू वृक्ष के लिए जिन उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए वे है: 500 ग्राम नाइट्रोजन (1.1 किग्रा यूरिया), १२५ ग्राम पी2 ओ5 (7.50 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट) और १२५ ग्राम के2ओ (200 ग्राम पोटाश का म्यूरिएट)। एक पौधे के लिए पुष्टिकारक आवश्यकताओं को और उर्वरकों का विवरण तालिका 2 में दिया गया है: पौधे की आयु यूरिया (ग्राम) सिंगल सुपर फॉस्फेट (ग्राम) पोटाश का म्यूरिएट पहला साल 375 275 75 दूसरा साल 750 525 150 तीसरा साल 1100 750 200 उर्वरकों का प्रयोग बारिश के रूक जाने के तुरंत बाद किया जाना चाहिए। उर्वरक ड्रिप लाइन के किनारे किनारे वृत्ताकार ट्रेंच में डाला जाना चाहिए। उर्वरकों के प्रयोग के पहले मृदा की नमी सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। मानसून के पहले (मई-जून) और बाद (सिंतबर –अक्टूबर) – इस तरह दो बार डाला जाए, जब मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है। बलूवाही और लैटरा इट मृदा में ढलानवाली जमीन में और भारी वर्षा वाले इलाकों में उर्वरकों को पौधे से 1 ½मीटर की दूरी पर वृत्ताकार 25 सेंमी. चौड़े और 15सेंमी गहरे खड्डे में डाला जाना चाहिए। लाल दोमट मृदा और कम वर्षावाले क्षेत्रों में पहले साल पौधे से 5मी की दूरी पर, दूसरे साल 7 मीटर की दूरी पर, तीसरे साल 1 मीटर की दूरी पर और चौथे और आगे के सालों में 1.5 मीटर की दूरी पर बनी वृत्ताकार मेड़ों पर डाला जाना चाहिए। निकाई भारत बरसात का मौसम खत्म होने पहले मिट्टी की हल्की खुदाई की जानी चाहिए। पौधे के आसपास उपजी घासफूस को खोदकर जड़ से निकाल देना बेहतर होता है यदि पर्याप्त संख्या में श्रमिक उपलब्ध न हों तो केमिकल का प्रयोग करते हुए भी यह काम किया जा सकता है। इसके लिए अग्रोडर 96 (2, 4-डी), 4 मिली मात्रा का छिड़काव 1 लीटर पानी में मिलकर किया जा सकता है जिसके बाद ग्रामक्सोन की 5 मिली मात्रा को 2 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव किया जा सकता है। प्रति छिड़काव में लगभग प्रति हेक्टेयर 400 लीटर (प्रति एकड़ 160 लीटर) घोल की आवश्यकता होगी। मानसून के बाद एक बार और छिड़काव करना होगा। काजू की खेती के साथ दूसरी फसलें लेना जब काजू के पौधे नये हो उस समय सोरगम और मिलेट की ऊँचाई तक जाने वाली किस्मों की खेती को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए क्योंकि इनकी छाया बहुत अधिक होती है। मूंगफली व बिन जैसी फसलें बेहतर होंगी। यदि उपयुक्त हो तो अनोना और फालसा जैसी छोटे आकार के पेड़ों के फलों की खेती की जा सकती है जो शुष्क क्षेत्र में उगाए जाते हैं। हॉर्स ग्राम (कुलथी), काऊपी (लोबिया) और मूंगफली आदि फसलें काजू की खेती के साथ ली जा सकती हैं। काजू, कैजुआराइना और नारियल की साथ- साथ खेती प्रचलित है। जमीन को ढकनेवाली फसलें फलीदार अच्छादन से मृदा की गुणवत्ता बढ़ जाती है क्योंकि पौधों के लिए पोषक तत्व मिलते हैं और मिट्टी में जैव पदार्थ की मात्रा में वृद्धि होती है। इसके अलावा इससे जमीन का भूरक्षण रूकता है और जमीन में नमी बनी रहती है। ऐसी फसलों के लिए बुवाई का कम मानसून के शुरू होने के पहले किया जा सकता है। ढलाई वाली जमीन में काजू के पौधों के बीच की जगह में मिट्टी को हल्की खुदाई कर और 30 सेंमीX 30 से.मी. की क्यारियों में बीज डालकर मिट्टी की हल्की परत डाल दी जाती है। बोने के पहले बीज को छह घंटे तक पानी में भिगोया जाता है। पौधों की देखभाल और छंटाई पौधे लगाने के पहले सालों के दौरान प्रकन्द से निकलने वाले कल्लों को हटाते रहना चाहिए ताकि पौधा मजबूती से ऊपर बढ़े। ये कल्ले पौधे के पोषक तत्वों को अपने इस्तेमाल में लाते हैं इसलिए उन्हें हटाने से पौधे को पोषक तत्व मिलते हैं और वह पुष्ट होता है। पेड़ को सही आकार देने के लिए 3-4 वर्षों तक कटाई-छंटाई आवश्यक है। निचली शाखाओं को और डालियों को हटाना शुरुआती तीन-चार वर्षों तक जरूरी नहीं है। पौधे के जमीन से पौना से एक मीटर तक एकल तने के रूप में बढ़ने तक उसकी छंटाई की जानी चाहिए। कमजोर और उलझी हुए डालियों को भी काट देना चाहिए। तेज हवा से पौधा गिर न जाए इसके लिए उसे समुचित सहारा देना जरूरी है। 4-5 वर्ष के बाद मुख्य तना जमीन से 4-5 मीटर की ऊँचाई पर पहुंच जाता है। इसके बाद 2-3 सालों में एकबार पेड़ की सूखी टहनियों को और उलझी हुई डलियों को हटा देने से पौधा स्वस्थ रहता है। पौधे की आवश्यक कटाई-छंटाई का कम अगस्त –सितम्बर में किया जाना चाहिए। जहाँ से कटाई की जाए वहाँ बोरडोक्स पेस्ट लगा देना चाहिए। पहले और दूसरे साल में जो फूल लगें, उन्हें हटा देना चाहिए। तीसरे साल के बाद ही पेड़ में फल लगने देना चाहिए। कीटों तथा रोगों से सुरक्षा 1. कीट यह पाया गया है कि 30 प्रजातियों के कीड़े काजू में लगते हैं। इनमें टी- मॉस्किवटो, फ्लावर थ्रिप, स्टेम एंड रूट बोरर और फ्रूट एंड नट बोरर प्रमुख है जिससे उपज में 30 प्रतिशत की हानि होती है। टी- मॉस्किवटो: ये कीड़े (छोटे और बड़े) पेड़ों की कोमल पत्तियाँ, हरी पत्तियों और कच्चे काजू फल को भी चाटते है। इसकी लार विषैली होती है जिससे उस जगह ख़राब हो जाती है जहाँ ये चाटते हैं। अगर बड़ी संख्या में नये पौधों में कीड़े लग जाए तो उनके मरने की खतरा होता है। इन कीड़ों के आक्रमण को दूर से ही पेड़ों की हालत से पहचाना जा सकता है। बरसात के मौसम की शूरूआत में इन कीड़ों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। इस कीट से काजू की रक्षा के लिए कार्बारिल, .1% या फोसालोन .07% या डाइमेथोट .05 प्रतिशत का छिड़काव एक बार नए पत्ते लगने के समय, एक बार पुष्पन के आरभिंक दौर में और एक बार फल लगते समय किया जाना चाहिए। थ्रिप ये कीड़े (छोटे-बड़े) पत्तों के भीतरी हिस्से में लगकर उन्हें मुख्य नस के पास खाते है जिसके कारण पत्तों पर पीले दाग पड़ जाते हैं जो बाद में भूरे हो जाते हैं। इसके कारण पत्तों के रंग सफेद होने लगता है। ये कीड़े सूखे मौसम में लगते हैं। मोनोक्रोटोफास .05% या कारबारिल .1% के छिड़काव से इनपर काबू पाया जा सकता है। स्टेम एंड रूट बोरर ये छोटे सफेद कीड़े तने और जड़ की छाल के ताजा ऊतकों में छेद कर देते हैं सबएपिडर्मल ऊतकों का आहार कर पेड़ का भीतर इधर-उधर सुरंगे बना देते हैं। वास्कुलर ऊतक के बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाने से रस का प्रवाह रूप जाता है जिससे स्टेम कमजोर हो जाता है। इसके खास लक्षण हैं। कॉलर रीजन में छोटे छोटे छेद, गमोसिस, पत्तों का पीला पड़कर झड़ना और टहनियों का सूख जाना। एक बार ये कीड़े लग जाएँ तो इन्हें पूरी तरह हटाना असंभव हो जाता है। फिर भी भी एक बार अप्रैल-मई में और एक बार नवंबर में 1 प्रतिशत बीएचसी के प्रयोग से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। फल में छेद करनेवाले कीड़े: ये कीड़े काजू के फल छेद कर देते है जिससे काजू हल्का जो जाता है और उसका आकार ख़राब जो जाता है। इससे बचने के लिए पुष्पण और फलन के समय मोनोक्रोटोफास .05% का छिड़काव करना चाहिए। रोग सौभाग्य में काजू में कोई गंभीर बीमारी नहीं लगती। काजू की एक ही समस्या है पाउडरी मिल्ड्यू जो एक फफूंदी के कारण पैदा होती है। यह बीमारी नई टहनियां और फूलों को प्रभावित करती है और वे ख़राब हो जाते हैं। यह रोग खास तौर पर ऐसे मौसम में लगता है जब आसमान में बादल छाए रहते हैं। 2% सल्फर डब्ल्यूपी के छिड़काव से इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। काजू की फसल काजू के पेड़ों में 3 साल के बाद फल लगना शुरू होता है जो 10 वें साल में अपने अधिकतम स्तर पर पहूंचता है और आगे 20 साल तक अच्छी उपज मिलती रहती है। काजू की फसल फरवरी और मई के बाद ली जाती है। पक जाने के बाद नीचे गिरे फलों को बटोरना होता है। लेकिन अगर जैम, जूस, फेनी आदि बनाने के लिए काजू उपयोग करना हो तो प्राकृतिक रूप से गिरने के पहले ही पेड़ से फल को उतारना जरूरी होता है। काजू के फल को उतारकर उनका ऊपरी भाग हटाकर फिर काजू की गिरियों को बाहर निकलते हैं और उन्हें 2-3 दिन धुप में सुखाया जाता है ताकि उनकी आर्द्रता 30 प्रतिशत से घटकर 9 प्रतिशत रह जाए। काजू पूरी तरह तैयार है या नहीं, यह जानने के लिए उसे पानी में डाला जाता है। जिन फलों में काजू परिपक्व रहता है वे पानी में नीचे बैठ जाते हैं जबकि खाली या कच्चे काजूवाले फल तैरते रहते है। फसल कटाई के मौसम में एक हफ्ते के अन्तराल पर काजू इकट्ठा किया जाता है। उस समय पेड़ के नीचे की जमीन की अच्छी सफाई जरूरी है जिससे फल एकत्र करने में सुविधा होगी। अनजाने मूल की या परम्परागत तरीके से विकसित की गयी किस्मों में एक पेड़ में एक किग्रा से कम कच्चा काजू निकलता है, जबकि उन्नत तकनीक के इस्तेमाल से 4-5 साल तक 4 से 5 किग्रा तक उपज ली जाती जा सकती है। उन्नत प्रजाति के पौधे के साथ-साथ उन्नत तकनीक के इस्तेमाल से उपज को 8 से 10 किग्रा प्रति पेड़ तक बढ़ाया जा सकता है। मार्केटिंग हमारे यहाँ प्रोसेसिंग की क्षमता लगभग 7 लाख टन की है जबकि कच्चे काजू का खुले बर्तन या मिट्टी के बर्तनया रोटेटिंग सिलिंडर या हॉट ऑइल बात पद्धति से रोस्ट करते है। पहले दो तरीके आसान और सस्ते है लेकिन उनमें बहुत समय लगता है और काजू के शेल का तरल पदार्थ आसान और सस्ते है लेकिन उनमें बहुत समय लगता है और काजू के शेल का तरल पदार्थ (सीएनएसएल) कम निकलता है। रोटेटिंग सिलिंडर में रोस्ट करने की पद्धति स्वास्थ्यकर और अधिक सक्षम है लेकिन सीएनएसएल का बहुत सारा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। हॉट ऑइल बाथ पद्धति रोस्टिंग होती है और सीएनएसएल की मात्रा भी ज्यादा निकलती है। साफ किए गए काजू को तार की जाली वाली टोकरियों में रखकर सीएनएसएल भरे टैंक में डूबाकर 180-200 डिग्री सेंग्रेड के तापक्रम में 60 से 90 सेंकड तक रखा जाता है। सीएनएसएल को लगातार हिलाया जाना होता है ताकि ओवरहिटिंग न हो और बहुत अधिक मात्रा में पॉलीमर न बने या काजू की गिरियाँ एक दुसरे में सट न जाए। यह प्रक्रिया अधिक लागत वाली है और कुछ ही प्रोफेसर इसका उपयोग करते हैं। सबसे ज्यादा इस्तेमाल रोटेटिंग सिलिंडर का होता है। रोस्टिंग के बाद हाथों से छिलका उतारा जाता है और गिरियाँ निकली जाती हैं। मशीन से छिलका उतारने पर काजू के टूटने की मात्र बढ़ जाती है। इस तरह प्राप्त काजू को गरम हवा के चैम्बर में सुखाया जाता है जिससे गिरी का छिलका या टेस्ट उतरा जाता है। बड़ी सावधानी से छिलका उतारा जाता है क्योंकी इस समय वे बहुत ही नाजुक होते है। काजू का शेलिंग प्रतिशत 20 से 25 तक होता है। ग्रेडिंग और पैकिंग प्रति पौंड काजू की गिरियों की संख्या के आधार पर निर्यात के प्रयोग से ग्रेडिंग की जाती है। साबुत (होल) काजू और टुकड़ा (स्प्लिट) काजू को अलग-अलग किया जाता है। साबुत काजू को आगे होल ह्वाइट कर्नेल, होल स्कौचर्ड कर्नेल, होल डेजर्ट कर्नेल (ए) और होल डेजर्ट कर्नेल (बी) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। इसी प्रकार टुकड़ा काजू को आगे ह्वाइट पीसेज, स्कौचर्ड पीसेज, डेजर्ट पीसेज (ए) और डेजर्ट पीसेज (बी) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। साबुत को अलग-अलग ग्रेड तक पैक किया जाता है, नामत: 210, 240, 280, 320, 459, और 500, 320 लोकप्रिय ग्रेड है। ग्रेडेड काजू का पूरी तरह विकसित होना, हाथी दांत की तरह सफेद रंग का होना और किसी भी तरह के कीड़े-मकोड़ों के कारण हुई क्षति से मुक्त होना और बेदाग होना चाहिए। काजू की पैकिंग वीटा पैक मेथड से की जाती है जिसमें पैकिंग वीटा मेथड से की जाती है जिसमें पैकिंग के टिन से हवा निकाल दी जाती है और उसे कार्बन डाइऑक्साइड भर दिया जाता है और टिन को सील कर दिया जाता है। मॉडल परियोजना के लिए तकनीकी आर्थिक मानदंड अनुबंध 1 में दिए गए हैं। वित्तीय लाभप्रदता और बैंक से ऋण की पात्रता परियोजना लागत काजू के पेड़ से तीसरे साल में फल मिलने लगता है लेकिन उससे होने वाली आय खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। इसलिए 4 साल तक की लागत की पूंजीकृत कर दिया जाता है। एक हेक्टेयर में काजू की खेती करने की लागत रू. 83.800/- अनुमानित है जिसका ब्यौरा अनुबंध II में दिया गया है। मार्जिन राशि छोटे किसानों के लिए 5 प्रतिशत, मझोले किसानों के लिए 10 प्रतिशत और अन्य किसानों के लिए 15 प्रतिशत मार्जिन राशि रखी गई है। काजू की खेती के लिए बाकी लागत को बैंक ऋण के रूप में दिया जाएगा। तथापि, जो मॉडल यहाँ दिया गया है, उसमें 10 प्रतिशत की मार्जिन राशि रखी गई जो रू.8400/- प्रति हेक्टेयर होती है। बैंक ऋण वित्तीय संस्था से विकास लागत के 85% से 95% तक की राशि बैंक ऋण के रूप में मिलेगी। इस मॉडल में बैंक ऋण को 90% माना गया है, जो प्रति हेक्टेयर रू. 75400 होता है। ब्याज दर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर जारी किए गए दिशानिर्देश के भीतर रहते हुए बैंक अपनी ब्याज दर निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं। तथापि मॉडल परियोजना में 12% की दर रखी गई है, जो अधिकतम संभव दर है। जमानत भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा समय–समय पर इस विषय में जारी किए गए दिशानिर्देश के अनुसार। वित्तीय विश्लेष्ण एक हेक्टेयर में काजू की खेती के लिए वित्तीय विश्लेष्ण किया गया है। वित्तीय विश्लेषण के लिए आय को कम करके रखा गया है। 10 साल के काजू वृक्ष से 9 किलो काजू के उत्पादन को आधार बनाया गया है। परियोजना के आय और व्यय की गणना अनुबंध III में दर्शायी गयी है। मॉडल का आईआईआर 44% एनपीडब्ल्यू रू. 1,39,588 और बीसीआर 1.66 आ रहा है जिसका विवरण अनुबंध IV में दिया गया है। ऋण की चुकौती अवधि नकदी प्रवाह के आधार पर चुकौती अनुसूची तैयार की गई है जो अनुबंध V में दी गई है। मूलधन की चुकौती के लिए 3 वर्ष की अनुकम्पा अवधि के साथ 9 वर्ष की चुकौती अवधि मानी गई है। निष्कर्ष काजू की खेती कृषि – जलवायु स्थितियों के आधार पर उपयुक्त पाए गए क्षेत्रों में तकनीकी दृष्टि से साध्य, वित्तीय दृष्टि से लाभप्रद और बैंक ऋण के लिए पात्र गतिविधि है। दायित्व मुक्ति की घोषणा इस मॉडल परियोजना में व्यक्त किये गए विचार परमर्शात्मक प्रकृति के है। किसी भी प्रयोजन के लिए इसका उपयोग करनेवाले किसी भी व्यक्ति के प्रति नाबार्ड का कोई वित्तीय दायित्व नहीं है। परियोजनाओं की विशिष्ट आवश्कयताओं के कारण वास्तविक लागतों और प्रतिफल में परिवर्तन होंगे। स्रोत : झारखंड कृषि विभाग/जेवियर समाज सेवा संस्थान/ राँची